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स्रन्भु (sranbhu)

 
धातुप्रदीपः
Sanskrit
स्रन्भुँ स्रम्भु विश्वासे
- विस्रम्भते सस्रम्भे अस्रभत् अस्रम्भिष्ट विस्रब्धः ।। 760 ।।
क्षीरतरङ्गिणी
Sanskrit
स्रन्भुँ स्रन्भु प्रमादे
- (अर्थविवरणम्) प्रमादोऽवलेपः
विस्रम्भते, विस्रभ्यते स्रन्सु इत्येके 385
स्रन्भुँ स्रन्भु विश्वासे
- विस्रम्भते व्यस्रभत्, व्यस्रम्भिष्ट स्रन्हुः इति कौशिकः-स्रंहते, ऊष्मान्तप्रस्तावात् 735
धातुवृत्तिः
Sanskrit
स्रन्भुँ स्रम्भु (अर्थः) विश्वासे
(विस्त्रम्भते सस्त्रम्भे स्त्रम्भिता अस्त्रभत् अस्त्रम्भिष्ट सिस्त्रम्भिषते सास्रभ्यते सास्त्रम्भि स्त्रम्भयति असस्त्रम्भत स्त्रम्भित्वा स्त्रब्ध्वा विस्त्रम्भी ) "वौ कषलम्'' इति घिनुण् स्त्रम्भतहत्यादि तालब्यादिः काश्यपादिमते प्रमादे गतः 745
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“स्रन्भु विश्वासे”@} 2।
सक।
सेट्।
आत्म।) तालव्यादिः दन्त्यादिश्चायं इति सि।
कौमुद्याम्।
‘स्रन्भु प्रमादे 3 प्रमादोऽवलेपः’ इति तरङ्गिण्यां दृश्यते।
पुरुषकारेणापि 4 उद्धृतोऽयं पाठः।
विस्रम्भमाणः।
विपूर्व एव विश्वास इति ज्ञापनार्थो विपूर्वस्य प्रयोगः।
5 विस्रम्भी ‘वौ कषलसकत्थस्रम्भः’ 6 इत्यादिना घिनुण्प्रत्ययः।
‘स्रन्हु इति कौशिकः’ इति स्वामी।
7
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१९७७)
02
=>
(१-भ्वादिः-७५७, (३९३)
03
=>
(भ्वादिः ३९३)
04
=>
(श्लो। १८५)
05
=>
[[B। ‘विकत्थी याचते प्रत्तमविस्रम्भी मुहुर्जलम्।’ भ। का। ७-११।]]
06
=>
(३-२-१४३)
07
=>
[पृष्ठम्१४०१+ ३१]