षष्ठी (SaSThI)
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Spoken Sanskrit
Englishषष्ठी - SaSThI - - personification of a portion of prakRti
षष्ठी - SaSThI - - particular tithi when homage is offered to the sixth lunar digit
षष्ठी - SaSThI - - sixth
षष्ठी - SaSThI - - sixth or genitive case
षष्ठी - SaSThI - - sixth day of a lunar fortnight
षष्ठी मास्तिष्की - SaSThI mAstiSkI - - sixth cerebral [ Anat. ]
षष्ठी मस्तिष्की - SaSThI mastiSkI - - cerebral, sixth
षष्ठी मास्तिष्की - SaSThI mAstiSkI - - abducent nerve [ Anat. ]
षष्ठी विभक्ति - SaSThI vibhakti - phrase - genitive [ ration of source/possession - Gramm. ]
Apte
Englishषष्ठी [ṣaṣṭhī], 1 The sixth day of a lunar fortnight.
The sixth or genitive case (in )
An epithet of Durgā in the form of Kātyāyanī, one of the 16 divine mothers.
A goddess worshipped on the sixth day of child-birth (Mar. सटवाई)
गणेशं जन्मदां षष्ठीं देवीं जीवन्तिकामपि Śiva B.6.48. -तत्पुरुषः the genitive Tatpuruṣa compound, one in which, when dissolved, the first member usually stands in the genitive case. -पूजनम्, -पूजा worship of the goddess षष्ठी performed on the sixth day after a woman's delivery.
Apte 1890
Englishषष्ठी 1 The sixth day of a lunar fortnight
2 The sixth or genitive case (in gram.).
3 An epithet of Durgā in the form of Kātyāyanī, one of the 16 divine mothers.
Comp.
तत्पुरुषः the genitive Tatpurusha compound, one in which, when dissolved, the first member usually stands in the genitive case.
पूजनं,
पूजा worship of the goddess षष्ठी performed on the sixth day after a woman's delivery.
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Monier Williams Cologne
EnglishMacdonell
Englishषष्ठी ṣaṣṭh-ī, sixth (sc. tithi) day of a 🞄fortnight
sixth (sc. vibhakti) case, genitive
🞄personification of the sixth day after the 🞄birth of a child (when the main risks are 🞄[Page324-3] 🞄over): -jāgara, watch on the sixth day 🞄after the birth of a child (a certain ceremony)
🞄-tatpuruṣa, genitive Tatpuruṣa 🞄compound (in which the first member has the 🞄sense of a genitive)
-samāsa, compound 🞄in which the first member has the sense of a 🞄genitive.
Apte Hindi
Hindiषष्ठी
- षष्ठ + ङीप्
चान्द्रमास के किसी पक्ष की छठ
षष्ठी
- षष्ठ + ङीप्
(व्या* में ) छठी विभक्ति या सम्बन्ध कारक
षष्ठी
- षष्ठ + ङीप्
"कात्यायनी के रूप में दुर्गा का विशेषण, जो सोलह दिव्य मातृकाओं में से एक है"
L R Vaidya
EnglishEdgerton Buddhist Hybrid
English[ṣaṣṭhī, in Mv 〔ii.21.2〕 (vs): (atra kiṃ kāraṇaṃ uktaṃ yaṃ sapta kramate kramān, ) na ca aṣṭa na ca ṣaṣṭhī atra āgamanaṃ śṛṇu, … why he takes seven steps, and not eight or … (?) Senart em. ṣaṣṭi, sixty, which seems to be correct
see P. Mus, Barabudur 〔492, 480〕
Mv 〔i.318.10〕 caṅkrama-ṣaṣṭiḥ, a promenade of sixty paces. The only alternative, so far as I see, would be the unattractive one of understanding the ordinal ṣaṣṭhī in the mg. of the cardinal, six
the sense would, to be sure, then be simple.]
Abhyankara Grammar
Englishषष्ठी the sixth case
the genitive case. This case is generally an ordinary case or विभक्ति as contrasted with कारकविभक्ति. A noun in the geni- tive case shows a relation in gene- ral, with another noun connected with it in a sentence. Commen- tators have mentioned many kinds of relations denoted by the geni- tive case and the phrase एकशतं षष्ठ्यर्थाः (the genitive case has senses a hundred and one in all), . is frequently used by gramma- rians cf. षष्टि शेषे P. II. 3.50
cf. also बहवो हि षष्ठ्यर्थाः स्वस्वाम्यनन्तरसमीपसमूह्- विकारावयवाद्यास्तत्र यावन्त: शब्दे संभवन्ति तेषु सर्वेषु प्राप्तेषु नियमः क्रियते षष्ठी स्थानेयोगा इति । Kas. on P. I. 1.49. The genitive case is used in the sense of any karaka when that karaka
is not to be considered as a karaka
cf. कारकत्वेन अविवक्षिते शेषे षष्ठी भविष्यति. A noun standing as a subject or object of an activity is put in the genitive case when that activity is expressed by a verbal deriva- tive , and not by a verb itself
cf. कर्तुकर्मणोः कृति P. II. 3 .65. For the senses and use of the genitive case, cf. P. II. 3.50 to 73.
Wordnet
Sanskrit षष्ठी
व्याकरणशास्त्रे वर्णितः सः प्रत्ययः येन अवयवावयव्यादयः सम्बन्धाः प्रतीयन्ते।
षष्ठी इति विभक्तिः यह राम की पुस्तक है इत्यस्मिन् वाक्ये की इति षष्ठ्याः प्रत्ययः अस्ति। "ङ्स् ओस् आम् इति षष्ठी।"
षष्ठी
एका देवता यस्याः पूजनं षष्ठीतिथ्यां कुर्वन्ति।
"बिहारराज्ये षष्ठ्याः पूजनं उत्साहेन क्रियते।"
दुर्गा, उमा, कात्यायनी, गौरी, ब्रह्माणी, काली, हैमवती, ईश्वरा, शिवा, भवानी, रुद्राणी, सर्वाणी, सर्वमङ्गला, अपर्णा, पार्वती, मृडानी, लीलावती, चणडिका, अम्बिका, शारदा, चण्डी, चण्डा, चण्डनायिका, गिरिजा, मङ्गला, नारायणी, महामाया, वैष्णवी, महेश्वरी, कोट्टवी, षष्ठी, माधवी, नगनन्दिनी, जयन्ती, भार्गवी, रम्भा, सिंहरथा, सती, भ्रामरी, दक्षकन्या, महिषमर्दिनी, हेरम्बजननी, सावित्री, कृष्णपिङ्गला, वृषाकपायी, लम्बा, हिमशैलजा, कार्त्तिकेयप्रसूः, आद्या, नित्या, विद्या, शुभह्करी, सात्त्विकी, राजसी, तामसी, भीमा, नन्दनन्दिनी, महामायी, शूलधरा, सुनन्दा, शुम्यभघातिनी, ह्री, पर्वतराजतनया, हिमालयसुता, महेश्वरवनिता, सत्या, भगवती, ईशाना, सनातनी, महाकाली, शिवानी, हरवल्लभा, उग्रचण्डा, चामुण्डा, विधात्री, आनन्दा, महामात्रा, महामुद्रा, माकरी, भौमी, कल्याणी, कृष्णा, मानदात्री, मदालसा, मानिनी, चार्वङ्गी, वाणी, ईशा, वलेशी, भ्रमरी, भूष्या, फाल्गुनी, यती, ब्रह्ममयी, भाविनी, देवी, अचिन्ता, त्रिनेत्रा, त्रिशूला, चर्चिका, तीव्रा, नन्दिनी, नन्दा, धरित्रिणी, मातृका, चिदानन्दस्वरूपिणी, मनस्विनी, महादेवी, निद्रारूपा, भवानिका, तारा, नीलसरस्वती, कालिका, उग्रतारा, कामेश्वरी, सुन्दरी, भैरवी, राजराजेश्वरी, भुवनेशी, त्वरिता, महालक्ष्मी, राजीवलोचनी, धनदा, वागीश्वरी, त्रिपुरा, ज्वाल्मुखी, वगलामुखी, सिद्धविद्या, अन्नपूर्णा, विशालाक्षी, सुभगा, सगुणा, निर्गुणा, धवला, गीतिः, गीतवाद्यप्रिया, अट्टालवासिनी, अट्टहासिनी, घोरा, प्रेमा, वटेश्वरी, कीर्तिदा, बुद्धिदा, अवीरा, पण्डितालयवासिनी, मण्डिता, संवत्सरा, कृष्णरूपा, बलिप्रिया, तुमुला, कामिनी, कामरूपा, पुण्यदा, विष्णुचक्रधरा, पञ्चमा, वृन्दावनस्वरूपिणी, अयोध्यारुपिणी, मायावती, जीमूतवसना, जगन्नाथस्वरूपिणी, कृत्तिवसना, त्रियामा, जमलार्जुनी, यामिनी, यशोदा, यादवी, जगती, कृष्णजाया, सत्यभामा, सुभद्रिका, लक्ष्मणा, दिगम्बरी, पृथुका, तीक्ष्णा, आचारा, अक्रूरा, जाह्नवी, गण्डकी, ध्येया, जृम्भणी, मोहिनी, विकारा, अक्षरवासिनी, अंशका, पत्रिका, पवित्रिका, तुलसी, अतुला, जानकी, वन्द्या, कामना, नारसिंही, गिरीशा, साध्वी, कल्याणी, कमला, कान्ता, शान्ता, कुला, वेदमाता, कर्मदा, सन्ध्या, त्रिपुरसुन्दरी, रासेशी, दक्षयज्ञविनाशिनी, अनन्ता, धर्मेश्वरी, चक्रेश्वरी, खञ्जना, विदग्धा, कुञ्जिका, चित्रा, सुलेखा, चतुर्भुजा, राका, प्रज्ञा, ऋद्भिदा, तापिनी, तपा, सुमन्त्रा, दूती, अशनी, कराला, कालकी, कुष्माण्डी, कैटभा, कैटभी, क्षत्रिया, क्षमा, क्षेमा, चण्डालिका, जयन्ती, भेरुण्डा
सा देवी यया नैके दैत्याः हताः तथा च या आदिशक्तिः अस्ति इति मन्यते।
"नवरात्रोत्सवे स्थाने स्थाने दुर्गायाः प्रतिष्ठापना क्रियते।"
षष्ठी
चान्द्रमासे षष्ठी तिथिः।
"अद्य भाद्रपदमासस्य षष्ठी अस्ति।"
षष्ठी, नन्दी
शुक्लपक्षे वर्तमानः षष्ठम् दिनम् ।
"अद्य षष्ठी अस्ति"
अभिधानचिन्तामणिपरिशिष्टम्
Sanskritगौतमी कौशिकी कृष्णा तामसी बाभ्रवी जया ॥ ४७ ॥
कालरात्रिर्महामाया भ्रामरी यादवी वरा ।
बर्हिध्वजा शूलधरा परमब्रह्मचारिणी ॥ ४८ ॥
अमोघा विन्ध्यनिलया षष्ठी कान्तारवासिनी ।
जाङ्गुली बदरीवासा वरदा कृष्णपिङ्गला ॥ ४९ ॥
p{0003}
दृषद्वतीन्द्रभगिनी प्रगल्भा रेवती तथा ।
महाविद्या सिनीवाली रक्तदन्त्येकपाटला ॥ ५० ॥
एकपर्णा बहुभुजा नन्दपुत्री महाजया ।
भद्रकाली महाकाली योगिनी गणनायिका ॥ ५१ ॥
हासा भीमा प्रकूष्माण्डी गदिनी वारुणी हिमा ।
अनन्ता विजया क्षेमा मानस्तोका कुहावती ॥ ५२ ॥
चारणा च पितृगणा स्कन्दमाता घनाञ्जनी ।
गान्धर्वी कर्वरी गार्गी सावित्री ब्रह्मचारिणी ॥ ५३ ॥
कोटिश्रीर्सन्दरावासा केशी मलयवासिनी ।
कालायनी विशालाक्षी किराती गोकुलोद्भवा ॥ ५४ ॥
एकानसी नारायणी शैला शाकंभरीश्वरी ।
प्रकीर्णकेशी कुण्डा च नीलवस्त्रोग्रचारिणी ॥ ५५ ॥
अष्टादशभुजा पौत्री शिवदूती यमस्वसा ।
सुनन्दा विकचा लम्बा जयन्ती नकुलाकुला ॥ ५६ ॥
विलङ्का नन्दिनी नन्दा नन्दयन्ती निरञ्जना ।
कालंजरी शतमुखी विकराली करालिका ॥ ५७ ॥
विरजाः पुरला जीरी बहुपुत्री कुलेश्वरी ।
कैटभी कालदमनी दर्दुरा कुलदेवता ॥ ५८ ॥
रौद्री कुन्द्रा महारौद्री कालंगमा महानिशा ।
बलदेवस्वसा पुत्री हीरी क्षेमंकरी प्रभा ॥ ५९ ॥
मारी हैमवती चापि गोला शिखरवासिनी ।
गौतमी (स्त्री), कौशिकी (स्त्री), कृष्णा (स्त्री), तामसी (स्त्री), बाभ्रवी (स्त्री), जया (स्त्री), कालरात्रि (स्त्री), महामाया (स्त्री), भ्रामरी (स्त्री), यादवी (स्त्री), वरा (स्त्री), बर्हिध्वजा (स्त्री), शूलधरा (स्त्री), परमब्रह्मचारिणी (स्त्री), अमोघा (स्त्री), विन्ध्यनिलया (स्त्री), षष्ठी (स्त्री), कान्तारवासिनी (स्त्री), जाङ्गुली (स्त्री), बदरीवासा (स्त्री), वरदा (स्त्री), कृष्णपिङ्गला (स्त्री), दृषद्वती (स्त्री), इन्द्रभगिनी (स्त्री), प्रगल्भा (स्त्री), रेवती (स्त्री), महाविद्या (स्त्री), सिनीवाली (स्त्री), रक्तदन्ती (स्त्री), एकपाटला (स्त्री), एकपर्णा (स्त्री), बजुभुजा (स्त्री), नन्दपुत्री (स्त्री), महाजया (स्त्री), भद्रकाली (स्त्री), महाकाली (स्त्री), योगिनी (स्त्री), गणनायिका (स्त्री), हासा (स्त्री), भीमा (स्त्री), प्रकूष्माण्डी (स्त्री), गदिनी (स्त्री), वारुणी (स्त्री), हिमा (स्त्री), अनन्ता (स्त्री), विजया (स्त्री), क्षेमा (स्त्री), मानस्तोका (स्त्री), कुहावती (स्त्री), चारणा (स्त्री), पितृगणा (स्त्री), स्कन्दमाता (स्त्री), घनाञ्जनी (स्त्री), गान्धर्वी (स्त्री), कर्बुरा (स्त्री), गार्गी (स्त्री), सावित्री (स्त्री), ब्रह्मचारिणी (स्त्री), कोटिश्री (स्त्री), मन्दरावासा (स्त्री), केशी (स्त्री), मलयवासिनी (स्त्री), कालायनी (स्त्री), विशालाक्षी (स्त्री), किराती (स्त्री), गोकुलोद्भवा (स्त्री), एकानसी (स्त्री), नारायणी (स्त्री), शैला (स्त्री), शाकम्भरी (स्त्री), ईश्वरी (स्त्री), प्रकीर्णकेशी (स्त्री), कुण्डा (स्त्री), नीलवस्त्रा (स्त्री), उग्रचारिणी (स्त्री), अष्टादशभुजा (स्त्री), पौत्री (स्त्री), शिवदूती (स्त्री), यमस्वसा (स्त्री), सुनन्दा (स्त्री), विकचा (स्त्री), लम्बा (स्त्री), जयन्ती (स्त्री), नकुला (स्त्री), कुला (स्त्री), विलङ्का (स्त्री), नन्दिनी (स्त्री), नन्दा (स्त्री), नन्दयन्ती (स्त्री), निरञ्जना (स्त्री), कालञ्जरी (स्त्री), शतमुखी (स्त्री), विकराला (स्त्री), करालिका (स्त्री), विरजस् (स्त्री), पुरला (स्त्री), जारी (स्त्री), बहुपुत्री (स्त्री), कुलेश्वरी (स्त्री), कैटभी (स्त्री), कालदमनी (स्त्री), दर्दुरा (स्त्री), कुलदेवता (स्त्री), रौद्री (स्त्री), कुन्द्रा (स्त्री), महारौद्री (स्त्री), कालङ्गमा (स्त्री), महानिशा (स्त्री), बलदेवस्वसृ (स्त्री), पुत्री (स्त्री), हीरी (स्त्री), क्षेमङ्करी (स्त्री), प्रभा (स्त्री), मारी (स्त्री), हैमवती (स्त्री), गोला (स्त्री), शिखरवासिनी (स्त्री)
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskritषष्ठी, (षष्ठ + ङीप् ।) कात्यायनी । इतिमेदिनी ॥
षोडशमातृकान्तर्गतमातृकाविशेषः ।सा प्रकृतेः षष्ठीकला स्कन्दभार्य्या च । तस्याःस्वरूपादिर्यथा, --“प्रधानांशस्वरूपा या देवसेना च नारद ! ।मातृकासु पूज्यतमा सा च षष्ठी प्रकीर्त्तिता ॥
शिशूनां प्रतिविश्वेषु प्रतिपालनकारिणी ।तपस्विनी विष्णुभक्ता कार्त्तिकेयस्य कामिनी ॥
षष्ठांशरूपा प्रकृतेस्तेन षष्ठी प्रकीर्त्तिता ।पुत्त्रपौत्त्रप्रदात्री च धात्री त्रिजगतां सती ॥
सुन्दरी युवती रम्या सन्ततं भर्त्तुरन्तिके ।स्थाने शिशूनां परमा वृद्धरूपा च योगिनी ॥
पूजा द्वादशमासेषु यस्या विश्वेषु सन्ततम् ।पूजा च सूतिकागारे परा षष्ठदिने शिशोः ।एकविंशतिमे चैव पूजा कल्याणहेतुकी ।शश्वन्नियमिता चैषा नित्या काम्याहुतिः परा ॥
मातृरूपा दयारूपा शश्वद्रक्षणरूपिणी ।जले स्थले चान्तरीक्षे शिशूनां स्वप्नगोचरे ॥
”इति ब्रह्मवैवर्त्ते प्रकृतिखण्डे १ अध्यायः ॥
* ॥
अपि च ।श्रीनारायण उवाच ।“षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा तु षष्ठी प्रकीर्त्तिता ।तस्याः पूजाविधौ ब्रह्मन् इतिहासमिमं शृणु ॥
राजा प्रियव्रतश्चासीत् स्वायम्भुवमनोः सुतः ।योगीन्द्रो न वहेद्भार्य्यां तपस्यासु रतः सदा ॥
ब्रह्माज्ञया च यत्रेन कृतदारो बभूव सः ।सुचिरं कृतदारश्च न लेभे तनयं ततः ॥
पुत्त्रेष्टियज्ञं तञ्चापि कारयामास कश्यपः ।मानिन्यै तस्य कान्तायै मुनिर्यज्ञचरुं ददौ ॥
भुक्त्वा चरुञ्च तस्याश्च सद्यो गर्भो बभूव ह ।दधार तञ्च सा देवी दैवं द्वादशवत्सरम् ॥
ततः सुषाव सा ब्रह्मन् कुमारं कनकप्रभम् ।सर्व्वावयवसम्पन्नं मृतमुत्तानलोचनम् ॥
श्मशानञ्च ययौ राजा गृहीत्वा बालकं मुने ।एतस्मिन्नन्तरे तत्र विमानञ्च ददर्श ह ॥
ददर्श तत्र देवीञ्च कमनीयां मनोहराम् ।दृष्ट्वा तां पुरतो राजा तुष्टाव परमादरम् ॥
पप्रच्छ राजा तां दृष्ट्वा ग्रीष्मसूर्य्यसमप्रभाम् ।तेजसा ज्वलितां कान्तां शान्तां स्कन्दस्य नारद ॥
प्रियव्रत उवाच ।का त्वं सुशोभने कस्य कान्ते कान्तासि सुव्रते ।कस्य कन्या वरारोहा धन्या मान्या च योषि-ताम् ॥
देवसेनोवाच ।ब्रह्मणो मानसी कन्या देवसेनाहमीश्वरी ।दृष्ट्वा मां मनसा धाता ददौ स्कन्दाय भूमिप ॥
मातृकासु च विख्याता स्कन्दभार्य्या च सुव्रताबिश्वे षष्ठीति विख्याता षष्ठाशा प्रकृतेर्यतः ॥
इत्येवमुक्त्वा सा देवी गृहीत्वा बालकं मुने ।महाज्ञानेन तपसा जीवयामास लीलया ॥
गृहीत्वा बालकं देवी गगनं गन्तुमुद्यता ।पुनस्तुष्टाव तां राजा शुष्ककण्ठौष्ठतालुकः ॥
नृपस्तोत्रेण सा देवी परितुष्टा बभूव ह ।उवाच तं नृपं ब्रह्मन् ! वेदोक्तं कर्म्मनिर्म्मितम् ॥
देवसेनोवाच ।त्रिषु लोकेषु राजा त्वं स्वायम्भुवमनोः सुतः ।मम पूजाञ्च सर्व्वत्र कारयित्वा स्वयं कुरु ॥
तदा दास्यामि पुत्त्रन्ते कुलपद्ममनोहरम् ।इत्येवमुक्त्वा सा देवी तस्मै तद्बालकं ददौ ॥
राजा चकार स्वीकारं तत्पूजार्थञ्च सुव्रतः ।जगाम देवी स्वर्गञ्च दत्त्वा तस्मै शुभं वरम् ॥
आजगाम महाराजः स्वगृहं हृष्टमानसः ।देवीं तां पूजयामास ब्राह्मणेभ्यो धनं ददौ ॥
राजा च प्रतिमासेषु शुक्लषष्ठ्यां महोत्सवम् ।षष्ठ्या देव्याश्च यत्नेन कारयामास सर्व्वतः ॥
बालानां सूतिकागारे षष्ठाहे यत्नपूर्व्वकम् ।तापूजां कारयामास चैकविंशतिवासरे ॥
बालानां शुभकार्य्ये च शुभान्नप्राशने तथा ।सर्व्वत्र वर्द्धयामास स्वयमेव चकार ह ॥
ध्यानं पूजाविधानञ्च स्तीत्रं मत्तो निशामय ।यत् श्रुतं धर्म्मवक्त्रेण कौथुमोक्तञ्च सुव्रत ॥
शालग्रामे घटे वाथ वटमूलेऽथवा मुने ।भित्तौ पुत्तलिकां कृत्वा पूजयेद्वा विचक्षणः ॥
षष्ठांशां प्रकृतेः शुद्धां सुप्रतिष्ठाञ्च सुप्रभाम् ।सुपुत्त्रदाञ्च शुभदां दयारूपां जगत्प्रसूम् ॥
श्वेतचम्पकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् ।पवित्ररूपां परमां देवसेनामहं भजे ॥
इति ध्यात्वा स्वशिरसि पुष्पं दत्त्वा विचक्षणःपुनर्ध्यात्वा च मूलेन पूजयेत् सुव्रतां सतीम् ॥
पाद्यार्घ्याचमनीयैश्च गन्धधूपप्रदीपकैः ।नैवेद्यैर्विविधैश्चापि फलेन शोभनेन च ॥
मूलेनौँ ह्रीँ षष्ठीदेव्यै स्वाहेति विधिपूर्व्वकम्अष्टाक्षरं महामन्त्रं यथाशक्ति जपेन्नरः ॥
ततः स्तुत्वा च प्रणमेद्भक्तियुक्तः समाहितः ।स्तोत्रञ्च सामवेदोक्तं वरपुत्त्रफलप्रदम् ॥
अष्टाक्षरं महामन्त्रं लक्षधा यो जपेन्मुने ।स पुत्त्रं लभते नूनमित्याह कमलोद्भवः ॥
* ॥
स्तोत्रं शृणु मुनिश्रेष्ठ सर्व्वकामशुभावहम् ।आज्ञाप्रदञ्च सर्व्वेषां गूढं वेदेषु नारद ॥
प्रियव्रत उवाच ।नमो देव्यै महादेव्यै सिद्ध्यै शान्त्यै नमो नमःशुभायै देवसेनायै षष्ठ्यै देव्यै नमो नमः ॥
वरदायै पुत्त्रदायै धनदायै नमो नमः ।सुखदायै मोक्षदायै षष्ठीदेव्यै नमो नमः ॥
शक्तिषष्ठांशरूपायै सिद्धायै च नमो नमः ।मायायै सिद्धयोगिन्यै षष्ठीदेव्यै नमो नमः ॥
सारायै सारदायै च पारायै सर्व्वकारिण्यै ।बालाधिष्ठातृदेव्यै च षष्ठीदेव्यै नमो नमः ॥
कल्याणदायै कल्याण्यै फलदायै च कर्म्मणाम् ।प्रत्यक्षायै च भक्तानां षष्ठीदेव्यै नमो नमः ॥
पूज्यायै स्कन्दकान्तायै सर्व्वेषां सर्व्वकर्म्मसु ।देवरक्षणकारिण्यै षष्ठीदेव्यै नमो नमः ॥
शुद्धसत्त्वस्वरूपायै वन्दितायै नृणां सदा ।हिंसाक्रोधवर्ज्जितायै षष्ठीदेव्यै नमो नमः ॥
धनं देहि प्रियां देहि पुत्त्रं देति सुरेश्वरि ।धर्म्मं देहि यशो देहि षष्ठीदेव्यै नमो नमः ॥
देहि भूमिं प्रजां देहि विद्यां देहि सुपूजिते ।कल्याणञ्च जयं देहि षष्ठीदेव्यै नमो नमः ॥
इति देवीञ्च संस्तूय लेभे पुत्त्रं प्रियव्रतः ।यशस्विनञ्च राजेन्द्रं षष्ठीदेवीप्रसादतः ॥
षष्ठीस्तोत्रमिदं ब्रह्मन् यः शृणोति च वत्सरम् ।अपुत्त्रो लभते पुत्त्रं वरं सुचिरजीविनम् ॥
वर्षमेकञ्च या भक्ता संस्तुत्येदं शृणोति च ।सर्व्वपापविनिर्म्मुक्त्या महाबन्ध्या प्रसूयते ॥
वीरं पुत्त्रञ्च गुणिनं विद्यावन्तं यशस्विनम् ।शुचिं चिरायुष्मन्तमेव षष्ठीदेवीपसादतः ॥
काकबन्ध्या च या नारी मृतापत्या च या भवेत्वर्षं श्रुत्वा लभेत् पुत्त्रं षष्ठीदेवीप्रसादतः ॥
रोगयुक्ते च बाले च पिता माता शृणोति चेत्मासञ्च मुच्यते बालः षष्ठीदेवीप्रसादतः ॥
इति ब्रह्मवैवर्त्ते प्रकृतिखण्डे ४० अध्यायः ॥
* ॥
चन्द्रस्य षष्ठकलाक्रियारूपतिथिविशेषः । स तुशुक्लकृष्णपक्षभेदेन द्विविधः । तत्र चन्द्रस्यवृद्ध्यनुकूलषष्ठकलाक्रियारूपः शुक्लपक्षीयः । तस्यह्रासानुकूलषष्ठकलाक्रियारूपः कृष्णपक्षीयः । * ॥
वैशाखादिषु तस्या विशेषनामानि यथा, --“प्रसूत्या द्वादशे मासि सम्पूज्यापत्यवृद्धये ।सुते जाते तथा षष्ठ्यां षष्ठी द्वादशरूपिणी ॥
वैशाखे चान्दनी षष्ठी ज्यैष्ठे चारण्यसंज्ञिता ।आषाढे कार्द्दमी ज्ञेया श्रावणे लुण्ठनी तथा ॥
भाद्रे चपेटी विख्याता दुर्गाख्याश्वयुजे तथा ।नाड्याख्या कार्त्तिके मासि मार्गे मूलकरूपिणीपौषे मास्यन्नरूपा च शीतला तपसि स्मृता ।गोरूपिणी फाल्गुने च चेत्रेऽशोका प्रकीर्त्तिता ॥
”इति स्कन्दपुराणम् ॥
तत्कृत्यादि यथा, --अथ षष्ठी सा सप्तमीयुता ग्राह्या युग्मात् ।राजमार्त्तण्डे ।“ज्यैष्ठे मासि सिते पक्षे षष्ठी चारण्यसंज्ञिताव्यजनैककरास्तस्यामटन्ति विपिने स्त्रियः ॥
तां विन्ध्यवासिनीं स्कन्दषष्ठीमाराधयन्ति च ।कन्दमूलफलाहारा लभन्ते सन्ततिं शुभाम् ॥
”कन्दं सूरणादि । मूलं तदितरत् । भविष्ये ।“येयं मार्गशिरे मासि षष्ठी भरतसत्तम ।पुण्या पापहरा धन्या शिवा शान्तागुहप्रिया ॥
”देवीपुराणे चैत्रमधिकृत्य ।“षष्ठ्यां स्कन्दस्य कर्त्तव्या पूजा सर्व्वोपचारिकातहैव सुखसौभाग्यमन्ते विष्णुपुरं व्रजेत् ॥
”इयमेव स्कन्दषष्ठी पञ्चमीयुतैवोपोष्या ।“कृष्णाष्टमी स्कन्दषष्ठी शिवरात्रिचतुर्दशी ।एताः पूर्व्वयुताः कार्य्यास्तिथ्यन्ते पारणं भवेत् ॥
”इति ब्रह्मवैवर्त्तवचनात् ॥
विष्णुधर्म्मोत्तरे ।“अष्टमीञ्च तथा षष्ठीं नवमीञ्च चतुर्दशीम् ।शिरोऽभ्यङ्गं न कुर्व्वीत पर्व्वसन्धौ तथैव च ॥
”इति तिथ्यादितत्त्वम् ॥
* ॥
सा च कार्त्तिकेयाभिषेकतिथिः । यथा, --“स्वयं स्कन्दो महादेवः सर्व्वपापप्रणाशनः ।तस्य षष्ठीं तिथिं प्रादादभिषेके पितामहः ॥
अस्यां फलाशनो यस्तु यजेन्नियतमानसः ।अपुत्त्रोऽपि लभेत् पुत्त्रान् अधनोऽपि लभेत् धनम्यं यमिच्छेत मनसा तं तं लभति मानवः ॥
यश्चैतत् पठति स्तोत्रं कार्त्तिकेयस्य मानवः ।तस्य गेहे कुमाराणां क्षेमारोग्यं भवेद्ध्रुवम् ॥
”इति वाराहे स्कन्दोत्पत्तिनामाध्यायः ॥
* ॥
तत्र जातफलम् ।“विद्वान् वरिष्ठश्चतुरः सुकीर्त्तिःप्रलम्बबाहुर्व्रणकीर्णगात्रः ।सत्यप्रतिष्ठो धनपुत्त्रयुक्तःषष्ठीप्रसूतो मनुजश्चिरायुः ॥
”इति कोष्ठीप्रदीपः ॥
* ॥
तत्र यात्राकरणदोषो यथा, --“पञ्चम्यामीप्सितार्थः स्यात् षष्ठ्यां व्याधियुतोभवेत् ।सप्तम्यामर्थलाभः स्यादष्टम्यामस्त्रपीडनम् ।षष्ठ्यष्टमीद्वादशीषु न गच्छेत्त्रिदिनस्पृशि ॥
”इति ज्योतिस्तत्त्वम् ॥
वाचस्पत्यम्
Sanskritषष्ठी स्त्री षण्णां पूरणी डट् थुट् ङीप् । चन्द्रमसः षष्ठकलायाह्रासवृद्धिरूपक्रियारूपे १ तिथिभेद स्कन्दभार्य्यारूपे २ मा-तृकाभेदे “मातृकासु पूज्यतमा सा च षष्ठी प्रकीर्त्तिता ।शिशूनां प्रतिविश्वेषु प्रतिपालनकारिणी तपस्विनीविष्णुभक्ता कार्त्तिकेयस्य कामिनी । षष्ठांशरूपा प्रकृतेस्तेन षष्ठा प्रकीर्त्तिता । पुत्रपौत्रप्रदात्री च धात्री त्रि-जगतां सती । सुन्दरी युवती रम्या सन्ततं भर्तुरन्तिके ।स्थाने शिशूनां परमा वृद्धरूपा च यागिनी । पूजा द्वा-दशमासेषु यस्या विश्वेषु सन्ततम् । पूजा च सूतिका-गारे पुरा षष्ठदिने शिशोः । एकविंशतिमे चैव पूजाकल्याणहेतुकी । शश्वन्नियमिता चैषा नित्या काम्या-हुतिः परा । मातृरूपा दयारूपा शश्वद्रक्षणरूपिणी ।जले स्थले चान्तरीक्षे शिशूनां स्वप्नगोचरे” ब्रह्म० वै० प्र०१ अ० । “ब्रह्मणो मानसी कन्या देवसेना हलीश्वरी । दृष्ट्वामां मनसा धाता ददौ स्कन्दाय भूमिप । मातृकासु चविख्याता स्कन्दभार्य्या च सुव्रता । विश्वे षष्ठिति वि-ख्याता षष्ठांशात् प्रकृतेर्यतः” ४० अ० । “प्रसूत्या द्वादशेमासि सम्पूज्याऽपत्यवृद्धये । सुते जाते तथा षष्ट्यांषष्ठो द्वादशरूपिणी । वैशाखे चान्दनी षष्ठी ज्यैष्ठेचारण्यसंज्ञिता । आषाढे कार्दमी ज्ञेया श्रावणे लुण्ठनीतथा । भाद्रे चपेटी विख्याता दुर्गाख्याश्वयुजे तथा ।नाद्याख्या कार्त्तिके मासि मार्गे मूलकरूपिणी । पौषेमास्यन्नरूपा च शीतला तपसि स्मृता । गोरूपिणी फा-ल्गुने च चैत्रेऽशोका प्रकीर्त्तिता” स्कन्दपु० । षष्ठी-विहितकालव्यषस्था तिथिशव्दे दृश्या ।
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