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शिवा (zivA)

 
Apte
English
शिवा [śivā], 1
N.
of Pārvatī.
A jackal (in general)
जहासि निद्रामशिवैः शिवारुतैः
Ki.*
1.38
हरेरद्य द्वारे शिव शिव शिवानां कलकलः
Bv.*
1.32
R.*
7.5
11.61
12.39.
A fortunate woman.
Final beatitude.
The Śamī tree.
The yellow myrobalan.
Dūrvā grass.
A kind of yellow pigment.
Turmeric.
Comp.
-अरातिः a dog. -प्रियः a goat. -फला the Śamī tree.-रुतम् the howling of a jackal (a bad omen). -विद्या divination by the cries of jackals
Buddh.
Apte 1890
English
शिवा 1 N. of Pārvatī.
2 A jackal (in general)
जहासि निद्रामशिवैः शिवारुतैः Ki. 1. 38
हरेरद्य द्वारे शिव शिव शिवानां कलकलः Bv. 1. 32
R. 7. 50, 11. 61, 12. 39.
3 A fortunate woman.
4 Final beatitude.
5 The Śamī tree.
6 The yellow myrobalan.
7 Dūrvā grass.
8 A kind of yellow pigment.
9 Turmeric.
Comp.
अरातिः a dog
प्रियः a goat.
फला the Śamī tree.
रुतं the howling of a jackal
Monier Williams Cologne
English
शिवा॑ a
f.
Śiva's wife (also शिवी) See शिवा below
शिवा b
f.
the energy of Śiva personified as his wife (known as Durgā, Pārvatī
&c.
),
Inscr.
Kāv.
Kathās.
Pur.
final emancipation (= मुक्ति),
Pur.
a euphemistic
N.
of a jackal (generally regarded as an animal of bad omen),
GṛS.
Baudh.
MBh.
&c.
N.
of various plants (accord. to
L.
‘Prosopis Spicigera or Mimosa Suma
Terminalia Chebula or Citrina, Emblica Officinalis
Jasminum Auriculatum
turmeric
Dūrvā grass
&c.
’)
the root of Piper longum,
L.
a kind of yellow pigment (= °गो-रोचना),
L.
a kind of metre,
L.
(in music) a partic. Śruti,
Saṃgīt.
N.
of the wife of Anila,
MBh.
of the wife of Aṅgiras, ib.
of a Brāhman woman, ib.
of the mother of Nemi (the 22nd Arhat of the present Avasarpiṇī),
L.
of the mother of Rudra-bhaṭṭa,
Cat.
of a river,
MBh.
Hariv.
(In the following comp. not always, distinguishable from शिव
m.
or
n.
)
Macdonell
English
शिवा śivā,
f.
Śivaʼs energy personified as 🞄his wife
jackal (euphemistic term, as it is 🞄an animal of ill-omen).
Apte Hindi
Hindi
शिवा
स्त्री*
- शिव + टाप्
पार्वती
शिवा
स्त्री*
- शिव + टाप्
गीदड़ी
शिवा
स्त्री*
- शिव + टाप्
मोक्ष
शिवा
स्त्री*
- शिव + टाप्
शमी (जैंडी) का वृक्ष
शिवा
स्त्री*
- शिव + टाप्
आंवला
शिवा
स्त्री*
- शिव + टाप्
"दुर्वाघास, दूब"
शिवा
स्त्री*
- शिव + टाप्
पीला रंग
शिवा
स्त्री*
- शिव + टाप्
हल्दी
L R Vaidya
English
Siva {% (I) a. (f. वा) %} Auspicious, happy, lucky, fortunate, जहासि निद्रामशिवैः शिवारुतैः Kir.i.38, R.xi.33.
SivA {% f. %} 1. An epithet of Pārvatī
2. a jackal, जहासि निद्रामशिवैः शिवारुतैः Kir.i.38, R.vii.50
3. final emancipation
4. the Śamī tree
5. a kind of yellow pigment (गोरोचना)
6. the Dūrvā grass.
Bopp
Latin
शिवा f.
1) dea Siva, Sivi uxor.
2) canis aureus (shacal).
SA. 5. 75.
Anekartha-Dvani-Manjari
Sanskrit
शिवा
स्त्री
शिवा, गौरी, अभया, कील, क्रोष्ट्री, आमलकी, स्नुषा
शिवं भद्रं शिवः शम्भुः शिवा गौरी शिवाभया
शिवा कीलः शिवा क्रोष्ट्री भवेदामलकी शिवा
शिवः शर्वः शिवः शुक्लः शिवः कीलः शिवः पशुः
शिवा गौरी शिवा क्रोष्ट्री शिवं श्रेयः शिवा स्नुषा
verse 1.1.1.4
page 0001
Wordnet
Sanskrit
Synonyms:
शमी, सक्तुफला, शिवा, शक्तुफला, शक्तुफली, शान्ता, तुङ्गा, कचरिपुफला, केशमथनी, ईशानी, लक्ष्मीः, तपनतनया, इष्टा, शुभकरी, हविर्गन्धा, मेध्या, दुरितदमनी, शक्तुफलिका, समुद्रा, मङ्गल्या, सुरभिः, पापशमनी, भद्रा, शङ्करी, केशहन्त्री, शिवाफला, सुपत्रा, सुखदा, जीवः
noun
वृक्षविशेषः।
"शम्याः काष्ठस्य उपयोगः पूजाकार्येषु भवति।"
Synonyms:
हरिद्रा, हरित्, सुवर्णा, काञ्चनी, पीता, गौरी, स्वर्णवर्णा, कावेरी, उमा, शिवा, दीर्घरागा, हलद्दी, पौञ्जा, पीतवालुका, हेमनाशा, रञ्जनी, भङ्गवासा, घर्षिणी, पीतिका, रजनी, मेहघ्नी, बहुला, वर्णिनी, रात्रिनामिका, निशाह्वा, निशा, शर्वरी, वरवर्णिनी, वर्णदाता, मङ्गलप्रदा, हेमरागिणी, घर्षणी, जनेष्टा, कृमघ्नी, लसा, यामिनी, वराङ्गी, वरा, वर्णदात्री, पवित्रा, हरिता, विषघ्नी, पिङ्गा, मङ्गल्या, मङ्गला, लक्ष्मीः, भद्रा, शिफा, शोभा, शोभना, सुभगाह्वया, श्यामा, जयन्तिका
noun
ओषधिमूलविशेषः। हरिद्रा नाम ओषधेः पीतवर्णीयानि मूलानि ये जनैः पाकादिषु व्यञ्जनत्वेन उपयुज्यन्ते। रक्तशुद्धिकरत्वात् ते भेषजे तथा देहवर्णविधायित्वात् प्रसाधकेषु उपयुज्यन्ते।
"हरिद्रायाः लेपेन त्वक्शुद्धिः भवति।"
Synonyms:
आमलकी, तिष्यफला, अमृता, वयस्था, वयःस्था, कायस्था, श्रीफला, धात्रिका, शिवा, शान्ता, धात्री, अमृतफला, वृष्या, वृत्तफला, रोचनी, कर्षफला, तिष्या
noun
फलवृक्षविशेषः यस्य फलानि औषधरूपेण उपयुज्यन्ते।
"झञ्जावाते अस्य आमलकेः एका शाखा भग्ना।"
Synonyms:
हरिद्रा, हरित्, सुवर्णा, काञ्चनी, पीता, गौरी, स्वर्णवर्णा, कावेरी, उमा, शिवा, दीर्घरागा, हलद्दी, पौञ्जा, पीतवालुका, हेमनाशा, रञ्जनी, भङ्गवासा, घर्षिणी, पीतिका, रजनी, मेहघ्नी, बहुला, वर्णिनी, रात्रिनामिका, निशाह्वा, निशा, शर्वरी, वरवर्णिनी, वर्णदाता, मङ्गलप्रदा, हेमरागिणी, घर्षणी, जनेष्टा, कृमघ्नी, लसा, यामिनी, वराङ्गी, वरा, वर्णदात्री, पवित्रा, हरिता, विषघ्नी, पिङ्गा, मङ्गल्या, मङ्गला, लक्ष्मीः, भद्रा, शिफा, शोभा, शोभना, सुभगाह्वया, श्यामा, जयन्तिका
noun
ओषधिविशेषः अस्य पीतवर्णीयानि मूलानि पाकादिषु व्यञ्जनत्वेन उपयुज्यन्ते रक्तशुद्धिकरत्वात् ते भेषजे तथा देहवर्णविधायित्वात् प्रसाधकेषु अपि उपयुज्यन्ते।
"समये अकृतेन सिंचनेन हरिद्रा शुष्का जाता। / हरिद्रा कफ-पित्तास्त्रशोथ-कण्डुव्रणापहा।"
Synonyms:
दुर्गा, उमा, कात्यायनी, गौरी, ब्रह्माणी, काली, हैमवती, ईश्वरा, शिवा, भवानी, रुद्राणी, सर्वाणी, सर्वमङ्गला, अपर्णा, पार्वती, मृडानी, लीलावती, चणडिका, अम्बिका, शारदा, चण्डी, चण्डा, चण्डनायिका, गिरिजा, मङ्गला, नारायणी, महामाया, वैष्णवी, महेश्वरी, कोट्टवी, षष्ठी, माधवी, नगनन्दिनी, जयन्ती, भार्गवी, रम्भा, सिंहरथा, सती, भ्रामरी, दक्षकन्या, महिषमर्दिनी, हेरम्बजननी, सावित्री, कृष्णपिङ्गला, वृषाकपायी, लम्बा, हिमशैलजा, कार्त्तिकेयप्रसूः, आद्या, नित्या, विद्या, शुभह्करी, सात्त्विकी, राजसी, तामसी, भीमा, नन्दनन्दिनी, महामायी, शूलधरा, सुनन्दा, शुम्यभघातिनी, ह्री, पर्वतराजतनया, हिमालयसुता, महेश्वरवनिता, सत्या, भगवती, ईशाना, सनातनी, महाकाली, शिवानी, हरवल्लभा, उग्रचण्डा, चामुण्डा, विधात्री, आनन्दा, महामात्रा, महामुद्रा, माकरी, भौमी, कल्याणी, कृष्णा, मानदात्री, मदालसा, मानिनी, चार्वङ्गी, वाणी, ईशा, वलेशी, भ्रमरी, भूष्या, फाल्गुनी, यती, ब्रह्ममयी, भाविनी, देवी, अचिन्ता, त्रिनेत्रा, त्रिशूला, चर्चिका, तीव्रा, नन्दिनी, नन्दा, धरित्रिणी, मातृका, चिदानन्दस्वरूपिणी, मनस्विनी, महादेवी, निद्रारूपा, भवानिका, तारा, नीलसरस्वती, कालिका, उग्रतारा, कामेश्वरी, सुन्दरी, भैरवी, राजराजेश्वरी, भुवनेशी, त्वरिता, महालक्ष्मी, राजीवलोचनी, धनदा, वागीश्वरी, त्रिपुरा, ज्वाल्मुखी, वगलामुखी, सिद्धविद्या, अन्नपूर्णा, विशालाक्षी, सुभगा, सगुणा, निर्गुणा, धवला, गीतिः, गीतवाद्यप्रिया, अट्टालवासिनी, अट्टहासिनी, घोरा, प्रेमा, वटेश्वरी, कीर्तिदा, बुद्धिदा, अवीरा, पण्डितालयवासिनी, मण्डिता, संवत्सरा, कृष्णरूपा, बलिप्रिया, तुमुला, कामिनी, कामरूपा, पुण्यदा, विष्णुचक्रधरा, पञ्चमा, वृन्दावनस्वरूपिणी, अयोध्यारुपिणी, मायावती, जीमूतवसना, जगन्नाथस्वरूपिणी, कृत्तिवसना, त्रियामा, जमलार्जुनी, यामिनी, यशोदा, यादवी, जगती, कृष्णजाया, सत्यभामा, सुभद्रिका, लक्ष्मणा, दिगम्बरी, पृथुका, तीक्ष्णा, आचारा, अक्रूरा, जाह्नवी, गण्डकी, ध्येया, जृम्भणी, मोहिनी, विकारा, अक्षरवासिनी, अंशका, पत्रिका, पवित्रिका, तुलसी, अतुला, जानकी, वन्द्या, कामना, नारसिंही, गिरीशा, साध्वी, कल्याणी, कमला, कान्ता, शान्ता, कुला, वेदमाता, कर्मदा, सन्ध्या, त्रिपुरसुन्दरी, रासेशी, दक्षयज्ञविनाशिनी, अनन्ता, धर्मेश्वरी, चक्रेश्वरी, खञ्जना, विदग्धा, कुञ्जिका, चित्रा, सुलेखा, चतुर्भुजा, राका, प्रज्ञा, ऋद्भिदा, तापिनी, तपा, सुमन्त्रा, दूती, अशनी, कराला, कालकी, कुष्माण्डी, कैटभा, कैटभी, क्षत्रिया, क्षमा, क्षेमा, चण्डालिका, जयन्ती, भेरुण्डा
noun
सा देवी यया नैके दैत्याः हताः तथा या आदिशक्तिः अस्ति इति मन्यते।
"नवरात्रोत्सवे स्थाने स्थाने दुर्गायाः प्रतिष्ठापना क्रियते।"
Synonyms:
शिवा, हरितकी, अभया, अव्यथा, पथ्या, वयःस्था, पूतना, अमृता, हैमवती, चेतकी, श्रेयसी, सुधा, कायस्था, कन्या, रसायनफला, विजया, जया, चेतनकी, रोहिणी, प्रपथ्या, जीवप्रिया, जीवनिका, भिष्गवरा, भिषक्प्रिया, जीवन्ति, प्राणदा, जीव्या, देवी, दिव्या
noun
हरितकीवृक्षस्य फलं यद् हरितपीतवर्णीयम् अस्ति।
"शुष्ककासे शिवा अतीव उपयुक्ता अस्ति।"
Synonyms:
पार्वती, अम्बा, उमा, गिरिजा, गौरी, भगवती, भवानी, मङ्गला, महागौरी, महादेवी, रुद्राणी, शिवा, शैलजा, हिमालयजा, अम्बिका, अचलकन्या, अचलजा, शैलसुता, हिमजा, शैलेयी, अपर्णा, शैलकुमारी, शैलकन्या, जगद्जननी, त्रिभुवनसुन्दरी, सुनन्दा, भवभामिनी, भववामा, जगदीश्वरी, भव्या, पञ्चमुखी, पर्वतजा, वृषाकपायी, शम्भुकान्ता, नन्दा, जया, नन्दिनी, शङ्करा, शताक्षी, नित्या, मृड़ानी, हेमसुता, अद्रितनया, हैमवती, आर्या, इला, वारुणी
noun
शिवस्य पत्नी।
"पार्वती गणेशस्य माता अस्ति।"
Sanskrit Tibetan
Tibetan
ce spyang
१) अम्बूक २) भेरुण्डक ३) शिवा ४) शृगाल
ce cang
१) अम्बूक २) भेरुण्डक ३) शिवा ४) शृगाल
lce spyang
१) शिवा २) शृगाल
अभिधानचिन्तामणिः
Sanskrit
--source--
मरुदेवा विजया सेना सिद्धार्था मङ्गला
ततः सुसीमा पृथ्वी लक्ष्मणा रामा ततः परम् ३९
नन्दा विष्णुर्जया श्यामा सुयशाः सुव्रताचिरा
श्रीर्देवी प्रभावती पद्मा वप्रा शिवा तथा ४०
वामा त्रिशला क्रमतः पितरो मातरोऽर्हताम्
-wordlist-
अर्हन्मातृ (स्त्री), मरुदेवा (स्त्री), विजया (स्त्री), सेना (स्त्री), सिद्धार्था (स्त्री), मङ्गला (स्त्री), सुसीमा (स्त्री), पृथ्वी (स्त्री), लक्ष्मणा (स्त्री), रामा (स्त्री), नन्दा (स्त्री), विष्णु (स्त्री), जया (स्त्री), श्यामा (स्त्री), सुयशा (स्त्री), सुव्रता (स्त्री), अचिरा (स्त्री), श्री (स्त्री), देवी (स्त्री), प्रभावती (स्त्री), पद्मा (स्त्री), वप्रा (स्त्री), शिवा (स्त्री), वामा (स्त्री), त्रिशला (स्त्री)
--source--
गौरी काली पार्वती मातृमातापर्णा रुद्राण्यम्बिका त्र्यम्बकोमा
दुर्गा चण्डी सिंहयाना मृडानीकात्यायन्यौ दक्षजार्या कुमारी २०३
सती शिवा महादेवी शर्वाणी सर्वमङ्गला
भवानी कृष्णमैनाकस्वसा मेनाद्रिजेश्वरा २०४
निशुम्भशुम्भमहिषमर्दिनी भूतनायिका
-wordlist-
गौरी (स्त्री), काली (स्त्री), पार्वती (स्त्री), मातृमातृ (स्त्री), अपर्णा (स्त्री), रुद्राणी (स्त्री), अम्बिका (स्त्री), त्र्यम्बका (स्त्री), उमा (स्त्री), दुर्गा (स्त्री), चण्डी (स्त्री), सिंहयाना (स्त्री), मृडानी (स्त्री), कात्यायनी (स्त्री), दक्षजा (स्त्री), आर्या (स्त्री), कुमारी (स्त्री), सती (स्त्री), शिवा (स्त्री), महादेवी (स्त्री), शर्वाणी (स्त्री), सर्वमङ्गला (स्त्री), भवानी (स्त्री), कृष्णस्वसृ (स्त्री), मैनाकस्वसृ (स्त्री), मेनाजा (स्त्री), अद्रिजा (स्त्री), ईश्वरा (स्त्री), निशुम्भमथनी (स्त्री), शुम्भमथनी (स्त्री), महिषमथनी (स्त्री), भूतनायिका (स्त्री)
--source--
धात्री शिवा चामलकी कलिरक्षो बिभीतकः ११४५
-wordlist-
धात्री (स्त्री), शिवा (स्त्री), आमलकी (स्त्री), कलि (पुं), अक्ष (पुं), बिभीतक (त्रि)
--source--
सृगालो जम्बुकः फेरुः फेरण्डः फेरवः शिवा १२८९
घोरवाशी भूरिमायो गोमायुर्मृगधूर्तकः
हूरवो भरुजः क्रोष्टा शिवाभेदेऽल्पके किखिः १२९०
-wordlist-
सृगाल (पुं), शृगाल (पुं), जम्बुक (पुं), फेरु (पुं), फेरण्ड (पुं), फेरव (पुं), शिवा (स्त्री), घोरवाशिन् (पुं), भूरिमाय (पुं), गोमायु (पुं), मृगधूर्तक (पुं), हूरव (पुं), भरुज (पुं), क्रोष्टृ (पुं), किखि (स्त्री)
अभिधानरत्नमाला
Sanskrit
रुद्राणी
रुद्राणी, शर्वाणी, काली, कात्यायनी, भवानी, आर्या, अम्बिका, मृडानी, हैमवती, पार्वती, गौरी, उमा, भगवती, दुर्गा, चण्डी, दाक्षायणी, शिवा, अपर्णा, महादेवी, गिरिजा, मेनकात्मजा
रुद्राणी शर्वाणी काली कात्यायनी भवानी
आर्याम्बिका मृडानी हैमवती पार्वती गौरी १५
उमा भगवती दुर्गा चण्डी दाक्षायणी शिवा
अपर्णा स्यान्महादेवी गिरिजा मेनकात्मजा १६
verse 1.1.1.15
page 0003
गोमायु
गोमायु, भूरिमाय, शृगाल, जम्बुक, शिवा, फेरण्ड, फेरव, फेरु, क्रोष्टृ, मृगधूर्तक
गोमायुर्भूरिमायः स्याच्छृगालो जम्बुकः शिवा
फेरण्डः फेरवः फेरुः क्रोष्टा मृगधूर्तकः २२९
verse 2.1.1.229
page 0028
धात्री
धात्री, आमलकी, शिवा
हरीतक्यभया पथ्या धात्री चामलकी शिवा
verse 2.1.1.618
page 0069
वैजयन्तीकोषः
Sanskrit
Word: शिवा
Root: शिवा
Gender: स्त्री
Number: all
अर्थः शिवशक्तयः
Meaning(s):
One of the nine Śivaśaktis
Shloka(s):
1|1|49|1 वामा ज्येष्ठा शिवा रौद्री चित्तोन्मादकरी सुखा। (स्वर्गकाण्डः/आदिदेवाध्यायः)
Synonym(s):
1|1|49|1 शिवा (शिवा) (स्त्री) One of the nine Śivaśaktis शिवशक्तयः
Related word(s):
isa_k शिवशक्तयः
गुण-गुणी-भावः शिवः
उपाधि शक्तिः
Tamil
Tamil
சி’வா : பார்வதி தேவி.
Mahabharata
English
Śivā^1, wife of the Vasu Anila. § 116 (Aṃśāvat.): I, 66, 2589 (wife of Anila and mother of Manojava and Avijñātagati).
Śivā^2, wife of Aṅgiras. § 496 (Skandotpatti): III, 225, 14299 (bharyā tv Aṅgirasaḥ, Svahā assumed her form), 14301 (do.), (14303) (i.e. Svāhā), 14305 (do., cohabited with Agni).
Śivā^3, a brāhmaṇī. § 565 (Gālavac.): V, 109, 3796 (C. atra--i.e. in the south--siddhā Śivā nāma brāhmaṇī vedapāragā | adhītya sakalān Vedān lebhe sandeham akshayaṃ
for the reading of B. v. Śiva, pl.).
Śivā^4, a river. § 574 (Jambūkh.): VI, 9, 332 (in Bhāratavarsha).
पुराणम्
English
शिवा / ŚIVĀ. I Wife of aṅgiras. Consumed by lust she once slept with Agnideva and then flew away in the form of a she-kite. (Vana Parva, Chapter 225).
शिवा / ŚIVĀ II. Wife of the vasu called anila and mother of two sons called manojava and avijñātagati. (Ādi Parva, Chapter 66, Verse 25).
शिवा / ŚIVĀ III. The very noble wife of aṅgiras. (Vana Parva, Chapter 225 Verse 1)
शिवा / ŚIVĀ IV. A river in india made famous in the Purāṇas. (bhīṣma parva, Chapter 9, Verse 25).
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskrit
शिवा,
स्त्री,
(शिव + टाप् ।) दुर्गा मुक्तिः ।यथा, --“शिवा मुक्तिः समाख्याता योगिनां मोक्ष-गामिनी ।शिवाय यां जपेद्देवीं शिवा लोके ततः स्मृता
”इति देवीपुराणे ४५ अध्यायः
अपि ।“शिवा कल्पाणरूपा शिवदा शिवप्रिया ।प्रिये दातरि चाशब्दः शिवा तेन प्रकीर्त्तिता
”इति ब्रह्मवैवर्त्ते प्रकृतिखण्डे ५४ अध्यायः
अपरञ्च ।“शश्च कल्याणवचन इरेवोत्कृष्टवाचकः ।समूहवाचकश्चैव वाकारो दातृवाचकः
श्रेयःसंघोत्कृष्टदात्री शिवा तेन प्रकीर्त्तिता ।शिवराशिर्मूर्त्तिमती शिवा तेन प्रकीर्त्तिता
शिवो हि मोक्षवचनश्चाकारो दातृवाचकः ।स्वयं निर्व्वाणदात्री या सा शिवा परिकीत्तिता”इति ब्रह्मवैवर्त्ते श्रीकृष्णजन्मखण्डे २७ अघ्यायः
शमीवृक्षः हरीतकी शृगालः ताम-लकी इत्यमरः
आमलकी इति मेदिनी
बुद्धशक्तिविशेषः तु द्वाविंशजिनमाता ।इति त्रिकाण्डशेषः
हरिद्रा दूर्व्वा गोरो-चना इति राजनिर्घण्टः
*
शृगालस्यध्वनेः शुभाशुभं यथा, --“शोभनं शुभफलाप्तिसूचकंकथ्यतेत्यवितथं शिवारुतम् ।शान्तदीप्तककुभां विशेषतोज्ञानमत्र सदोपयुज्यते
दग्धा दिगुक्ता दिननाथयुक्ताविवस्वदाप्ता भवति प्रदीप्ता ।सा धूमिता यां सविता प्रयातःशेषा दिगन्ताः किल पञ्च शान्ताः
दग्धा दिगैशी ज्वलिता दिगैन्द्रीप्रधूमिता चानलदिक्क्रमेण ।प्रत्येकमेकं प्रहराष्टकेनभुङ्क्ते दिशोऽष्टौ सविता क्रमेण
आद्ये दिनस्य प्रहरे प्रवृत्तेमहेशदेवेशहुताशदिक्षु ।शिवा रटन्ती कुरुते नराणांसंत्रासकायव्ययबन्धनानि
अह्नो द्वितीये प्रहरस्य भागेसहस्रनेत्रानलकालदिक्षु ।शिवा रटन्ती कुरुते नराणांसंत्रासकायव्ययबन्धनानि
ब्राह्म्ये तृतीये प्रहरे दिनस्यहुताशवैवस्वतयातुदिक्षु ।शिवा रटन्ती कुरुते नराणांसंत्रासकायव्ययबन्धनानि
समागतेऽह्नः प्रहरे तुरीयेप्रेतेशरक्षःपतिपाशिदिक्षु ।शिवा रटन्ती कुरुते नराणांसंत्रासकायव्ययबन्धनानि
आद्ये निशायाः प्रहरे प्रवृत्तेरक्षोऽधियादःपतिवातदिक्षु ।शिवा रटन्ती कुरुते नराणांसंत्रासकायव्ययबन्धनानि
ततो द्वितीयप्रहरे रजन्या-स्तोयोऽधिनाथानिलसोमदिक्षु
शिवा रटन्ती कुरुते नराणांसंत्रासकायव्ययबन्धनानि
यामे तृतीयेऽपि यामवत्याःसमीरदोषाकरशम्भदिक्षु ।शिवा रटन्ती कुरुते नराणांसत्रासकायव्ययबन्धनानि
समागते रात्रितुरीययामेनिशाकरेशानसुरेशदिक्षु ।शिवा रटन्ती कुरुते नराणांसंत्रासकायव्ययबन्धनानि
”इति शिवारुते दग्धदीप्तधूमितदिक्त्रययाम-प्रकरणं प्रथमम्
*
“इतीरितं दिक्त्रययामयोगात्फलं विरुद्धं विरुतैः शिवायाः ।ब्रूमोऽथ दिक्पञ्चकयामयोगात्फलानि पुंसां क्रमतः शुभानि
कृतान्तरक्षोवरुणानिलेन्दु-दिक्ष्वाद्ययामे रटितैः, शृगाल्याः ।स्यादिष्टवार्त्ताश्रुतिरिष्टसिद्धि-र्लाभः सुभिक्षं प्रियलोकसङ्गः
रक्षः प्रचेतोऽनिलसोमशम्भु-दिक्षु द्वितीये प्रहरे रुतेन ।स्यादिष्टवार्त्ताश्रुतिरिष्टसिद्धि-र्लाभः सुभिक्षं प्रियलोकसङ्गः
जलेशवातेन्दुशिवामरेश-दिक्ष्वारवेण प्रहरे तृतीये ।स्यादिष्टवार्त्ताश्रुतिरिष्टसिद्धि-र्लाभः सुभिक्षं प्रियलोकसङ्गः
समीरसोमेशसुरेशवह्नि-दिक्षु स्वरेण प्रहरे चतुर्थे ।स्यादिष्टवार्त्ताश्रुतिरिष्टसिद्धि-र्लाभः सुभिक्षं प्रियलोकसङ्गः
शशाङ्करुद्रेन्दुहुताशकाल-दिक्ष्वारवैः पञ्चमयामभागे ।स्यादिष्टवार्त्ताश्रुतिरिष्टसिद्धि-र्लाभः सुभिक्षं प्रियलोकसङ्गः
ईशानशक्राग्निकृतान्तरक्षो-दिक्षु स्वरेण प्रहरे षष्ठे ।स्यादिष्टवार्त्ताश्रुतिरिष्टसिद्धि-र्लाभः मुभिक्षं प्रियलोकसङ्गः
इन्द्राग्निकालस्रपपाशपाणि-दिक्ष्वारवैः सप्तमयामकाले ।स्यादिष्टवार्त्ताश्रुतिरिष्टसिद्धि-र्लाभः सुभिक्षं प्रियलोकसङ्गः
अत्यन्तकृन्नैरृतपाशिवात-दिक्ष्वष्टमे प्रहरे रवेण ।स्यादिष्टवार्त्ताश्रुतिरिष्टसिद्धि-र्लाभः सुभिक्षं प्रियलोकसङ्गः
”इति श्रीवसन्तराजे शिवारुते दिग्यामप्रकरणंद्वितीयम्
*
“एकादिकानां निधनाष्टमानांशिवारुतानामधुना यदर्थम् ।प्राच्यादिकास्वष्टसु दिक्ष्वशेषंयद्यत् फलं तत्तदुदीरयामः
धनान्यभीष्टाप्तिमभीष्टलाभंध्रुवं ततोऽर्थस्य फलं शुभञ्च ।भयं प्रलापं सकलञ्च सौख्य-मेकादिशब्दैः कुरुते प्रशान्ते
भयान्यनिष्टश्रुतिरर्थहानि-रिष्टैर्व्वियोगो महती भीतिः ।स्याद्विग्रहाप्तिर्म्मरणञ्च दीप्तेत्वेकादिना चेत् कृतसप्तकेन
ऐन्द्र्यां निनादे प्रथमेऽर्थलाभोभवेद्द्वितीये निधिदर्शनञ्च ।कन्यां तृतीये लभते चतुर्थेअध्वागमं पञ्चमकेऽथ सिद्धिम्
षष्ठे रवे कुप्यति भूमिनाथोभीः सप्तमे स्याद्विफलोऽष्टमेषु
त्रासोऽग्निभागे प्रथमे द्वितीयेनराधिपः कुप्यति भीस्तृ तीये
घातश्चतुर्थे नगरस्य शब्देशिवाकृते पञ्चमके युद्धम् ।वदन्ति तज्ज्ञाः कलहञ्च षष्ठेभीः सप्तमे स्याद्विफलोऽष्टमस्तु
आद्ये शुभं स्यादशुभं द्वितीयेयाम्ये महाव्याधिभयं तृतीये ।स्वरे चतुर्थे स्वजनागमः स्यात्पुत्त्रो भवेत् पञ्चसु फेत्कृतेषु
जायेत कन्या रटिते षष्ठेभोः सप्तमे स्याद्विफलोऽष्टमस्तु ।ग्रामस्य घातो दिशि राक्षसाना-माद्ये द्वितीयेऽपि गोकुलस्य
मृत्युस्तृतीये द्विचतुष्पदानांहानिश्चतुर्थेऽपि पञ्चमेऽत्र ।चौराद्भयं राजभयञ्च षष्ठेभीः सप्तमे स्याद्विफलोऽष्टमस्तु
शब्दे शिवाया वरुणस्य भागेआद्ये भयं हानिरथ द्वितीये ।स्याद्राजदूतागमनं तृतीयेदाहश्चतुर्थे खलु चौरभीतिः
स्यात् पञ्चमे राजभयश्च षष्ठेभीः सप्तमे स्याद्विफलोऽष्टमस्तु ।वायव्यभागे भयमेकशब्देभयातिरेको भवति द्वितीये
वृष्टिस्तृतीये महृती चतुर्थेमेघागमो वर्षति पञ्चमे ।क्रोधं विधत्ते मृपतेश्च षष्ठेभीः सप्तमे स्याद्विफलोऽष्टमस्तु
दिश्युत्तरस्यां विहिते विरावेम्रियेत कश्चित् प्रथमे द्वितीये ।महाभयं विप्रवधस्तृतीयेक्षत्त्रं चतुर्थे खलु हन्यते
विट् पञ्चमे षष्ठरवे शूद्रोभीः सप्तमे स्याद्विफलोऽष्टमस्तु ।राहोस्तथा दर्शनमाद्यशब्देकेतोर्द्वितीये तथोत्तरेण
उल्काप्रपातस्त्रिषु दुर्द्दिनञ्चचतुर्षु भद्रं खलु पञ्चमे ।सङ्गो भवेद्वैरिजनश्च षष्ठेभीः सप्तमे स्याद्विफलोऽष्टमस्तु
आद्ये भवेद्दर्दिनमीशदेशेवृष्टिर्द्वितीये रवे शिवायाः ।वातस्तुतीये त्वशनिश्चतुर्थेम्रियेत कश्चित् खलु पञ्चमे
लभेत पृथ्वीं निनदे षष्ठेभीः सप्तमे स्याद्विफलोऽष्टमस्तु
”इति श्रीवसन्तराजे शिवारुते स्वराष्टकप्रकरणंतृतीयम्
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“क्षेमलाभपुनरागमनानांनिश्चयं यमधिगम्य विशङ्कः ।येन याति पथिकः परदेशंतं शिवारुतमथ प्रथयामः
यं यं देशं गन्तुमभ्युद्यतानांपुंसां शब्दानुच्चरन्ती शृगाली ।शान्तायां सा सिद्धये वाञ्छितानांदीप्तायान्तु स्यादभीष्टक्षयाय
प्राचीं दिशं सन्मुखभानुविम्बंप्रतिष्ठमानस्य नरस्य यस्य ।शब्दं शृगाली पुरतः करोतिबन्धं वधं वा प्रकरोति तस्य
प्राचीदिगीशाभिमुखस्य पुंसःप्रस्थानकामस्य शिवा सशब्दा ।भियेऽर्थनाशाय दक्षिणा स्या-द्वामा पुनर्वाञ्छितकार्य्यसिद्ध्यै
प्रत्यर्कमाशां चलितस्य पूर्व्वांशिवा विरावं पुरुषस्य यस्य ।करोति पृष्ठे प्रकरोति तस्यसर्व्वप्रकारामभिलाषसिद्धिम्
प्रस्थापिनो यस्य दक्षिणाशांशिवा रवं मुञ्चति दक्षिणेन ।आदित्यमुक्ता यदि नो तदानींध्रुवं भवेत्तस्य महीपतित्वम्
वैवस्वताशां चलितस्य यस्यदिवाकरस्तिष्ठति दक्षिणेन ।शिवा वामा कुरुते विरावंसम्पद्यते तस्य समस्तमिष्टम्
पुमान् यदा याम्यककुप्प्रवासीकरोति शब्दं पुरतः शृगाली ।आस्ते विवस्वानपि सम्मु खश्चेत्भवेत् तदानीमचिरेण मृत्युः
नरस्य याम्यां ककुभं यियासोःशृगालभार्य्या यदि पृष्ठभागे ।फेत्कारमामुञ्चति मानवस्यमृत्युश्च पुत्त्रेण भवत्यवश्यम्
दिशं प्रतीचीं व्रजतः शृगालीनरस्य यस्याभिमुखी विरौति ।शान्ता स्थिता शान्तफलप्रदात्नीदीप्ता तु दीप्तं फलमातनोति
प्राचेतसीं सञ्चलितस्य काष्ठांशृगालिका जल्पति दक्षिणेन ।यदा तदानीं सुबहूननर्थान्करोति चार्थानपि हन्ति पुंसः
दिशं प्रवेतःपरिपाल्यमानांनरस्य यस्य व्रजतः शृगाली ।वामा विरावं प्रकरोति शान्ताभवन्त्यभिप्रेतफलानि तस्य
यो वारुणीं याति दिशं मनुष्यःशृण्वन् शिवाया रटितानि पृष्ठे ।गतस्य तस्याशु हुताशभीति-रसंशयं स्यात् द्रविणक्षयश्च
यस्योत्तराशां चलितस्य पुंमःप्राच्यां शिवा मुञ्चति फेत्कृतानि ।भानुःप्रतीच्यां विहितस्थितिश्चे-दपेक्षितं सिध्यति तत्क्षणेन
मुञ्चत्यदीचीं चलितस्य पृष्ठेशिवा विरावं पुरुषस्य यस्य ।आस्ते मध्ये नभसो विवस्वां-स्तस्यार्थहानिर्मरणं प्रदिष्टम्
कुबेरकाष्ठां प्रति यः प्रयातिज्वालामुखी चाभिमुखी विरौति ।तस्याध्वगस्याभिमतार्थसिद्धि-र्भवेच्च सम्पत् पुनरागमश्च
तिष्ठति तीव्रकरो दिशि यस्यांफेत् कुरुते यदि तत्र शृगाली ।तद्व्रजतः पथिकस्य भवेतांनिश्चयतो धनजीवितनाशौ
दक्षिणतः प्रथमं यदि पश्चात्वामगता पथिकस्य शृगाली ।फेत् कुरुते कुरुते तदवश्यंक्षेमधनाप्तिगृहागमनानि
अध्यास्य शान्तां ककुभं नरस्यवामा शृगाली यदि वा रटन्ती
तदार्थलाभं वितरत्यवश्य-मर्थक्षयं दक्षिणतो रटन्ती
वामा प्रदीप्ते ककुभः प्रदेशे-ऽलाभं तथानर्थमुपादिशन्ति ।शिवा रटन्ती पथि दक्षिणा तुक्षिपत्यनर्थानथ सङ्कटेषु
शान्ते दिगन्ते यदि वा प्रदीप्तेपृष्ठे प्रयाणे प्रतिषेधयित्रो ।शब्दायमाना तु शिवा पुग्स्तात्निमज्जयत्यापदगाधसिन्धौ
वामेऽपसव्ये पुरतोऽथ पृष्ठेपुंमः शिवा जल्पति यत्र तत्र ।आयान्ति चौराः प्रथमे विरावेद्वयोर्भवेत्तस्करदर्शनञ्च
नृपादरोऽर्थागमनं तृतीयेतुर्य्ये क्षतिः पञ्चमकेऽर्थलाभः ।वाणिज्यसेवादिफलाय षष्ठेभोः मप्तमे स्याद्विफलोऽष्टमस्तु
हाहारवं मुञ्चति हृष्टभावाहास्यं तु तस्यास्तदुदाहरन्ति ।अग्रेसरा वा पथि या यियासोःसा द्विप्रकारापि मनोरथाप्त्यै
नृपस्य यात्रासमये पुरस्तात्प्रयाति चेद्वर्त्म निवेदयन्ती ।कुर्य्याच्छिवा वैरिपराभवं त-ज्जयश्रियञ्चाभिमतं विदध्यात्
कार्य्यान्तरेष्वप्यनुगम्यमानाश्रेयःप्रदा शान्तदिशि प्रदिष्टा ।शिवा प्रदीप्ते तु दिशि प्रदेशेसमारटन्ती महते भयाय
भयोद्गमे दीप्तदिशि प्रदीप्तै-र्नादैनृणां हन्ति भयानि देवी ।महान्ति सर्व्वाण्यपि शान्तनादाःशान्तस्थिता सर्व्व भयप्रदात्री
यदा नद्युत्तरगा नराणांशब्दे शृगाली कुरुते कदाचित् ।तटद्वये तत् परिरक्षणीयंमहद्भयं भावि जलेचरेभ्यः
”इति श्रीवसन्तराजे शिवारुते यात्राप्रकरणंचतुर्थम्
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“स्थानस्थितानामपि योगभाजांनैमित्तिकानामुपदिश्यते तु ।शिवाविरावैरशिवं शिवञ्चसुनिश्चितार्थं मुनिसम्मतेन
करोति फे फे इति सर्व्वदिक्षुयदा तदा स्थानविघातयुद्धे ।शिवा विधत्ते क्षुधिता त्वसंख्यान्रौद्रान् स्वरान् मुञ्चति चेदुपेक्षाम्
निरन्तरं रौति विदिक्षु दिक्षुसमन्दकारुण्यरवातुरा चेत् ।अपत्यमोहेन यदा शृगालीत्यक्त्यस्पृ हा सा कथितेह तजज्ञैः
स्थित्वा प्रदीप्ते ककुभो विभागेज्वालामुखी फेत् कुरुतेऽतिरौद्रम् ।ग्रामस्य तस्य प्रकरोति नाशंतस्याथवा तिष्ठात यस्य मध्ये
ग्रामस्य मध्यं समवाप्य यस्यज्वालामुखी मुञ्चति फेत्कृतानि ।स शून्यतां गच्छति निश्चयेनलोकस्य वा स्यादसुख प्रभूतम्
ग्रामान्तिके सप्त दिनानि यावतमहाभयोत्पादितफेत्कृतानि ।विरौति चेत्तत् कुरुते शृगालीतद्वासिलोकस्य भयं प्रभूतम्
मध्यं दिने यावदहानि पञ्चशिवा समीपे नगरस्य तस्यविरौति घातं विदधाति यस्यभयञ्च वह्निप्रभवं प्रभूतम्
पञ्चार्द्धरात्राणि कथञ्चिदेषाक्रू रारवा व्याहरते शृगाली ।यस्यान्तिके तं बहवो हठेनमुष्णन्ति चौरा जनसन्निवेशे
स्थानस्य यस्योपगता समीपंदिनानि पञ्चोच्चरति प्रभावे ।स्वरेण रौद्रेण शृगालभार्य्यास्यात्तत्र हानिर्महती नराणाम्
सुरक्षितस्यापि मनुष्यलक्षै-र्ग्रामस्य शीघ्रं ग्रहणं विधत्ते ।त्रयं दिनानां दिवसावसानेशिवा रटन्ति परुषस्वरेण
दिक्ष्वारटन्ति सकलासु रौद्रंभ्रमत्यखिन्ना परितः पुरश्चेत् ।शृगालभार्य्या खलु तद्व्रवीतियुद्धं महत्तत्र महाभिघातम्
ज्वालां विमुञ्चत्यतिरौद्रनादासमाकुला धावति या समन्तात् ।कौमारकं या जनयत्यकस्मात् ।कुर्य्याच्छिवा सा युवराजपातम्
रोमोद्गमं या जनयत्यकस्मात्फे इत्यतिक्रूररवा नराणाम् ।मूत्रं पुरीषन्तु तुरङ्गमाणांसा सर्व्वदा स्यादशिवा शिवेह
तरङ्गिणीरोधसि सौम्यरूपां-स्त्रीन् पञ्च वा मुच्यति या निनादान् ।शिवां शिवां तां नृपतित्वदात्रींवन्देत देवीमभिवन्दनीयाम्
श्मशानभूमौ दिनमध्यभागेमध्ये रजन्याः स्वगृहप्रदेशे ।या रौति तस्यै बलिमर्घ्ययुक्त्रंभक्त्या प्रदद्याद्यदि भद्रमिच्छेत्
सर्व्वेषु कार्य्येषु समुद्यतेषुबलिः शिवाया विनिवेदनीयः ।गृह्णाति यन्मिन् विषयेऽभ्युपेत्यदेवी बलिं जल्पति तत्र सिद्धिम्
”इति श्रीवसन्तराजे शिवारुते स्थानस्थितप्र-करणं पञ्चमम्
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“कथ्यते बलिविधानमिदानींशाकुनागममतेन शिवायाः ।दिव्यमन्त्रबलिवाधितदोषंसाधिताखिलसमुद्यतकार्य्यम्
शून्यालयं रुद्रगृहं श्मशानंचतुष्पथं मातृगृहं जलान्तम् ।बन्ध्यावनिश्चत्वरमेवमाद्याबलिप्रदानाय मताः प्रदेशाः
तेषाञ्च मध्यादुचितप्रदेशेविशोधितं मण्डलिकं विदध्यात् ।पौराणिकश्लोकपरीक्षितायाःसंगृह्य गोर्गोमयमन्तरीक्षात्
अत्यन्तजीर्णदेहाया बन्ध्यायाश्च विशेषतः ।रोगार्त्तनवसूताया गोर्गोमयमाहरेत्
तस्मिन् विचित्रं विततं विदध्यात्पिष्टाक्तकेनाष्टदलं सरोजम् ।मंपूजयेत्तत्र सुराधिपादीन्क्रमेण सर्व्वानपि लोकपालान्
मध्ये सुतैः पञ्चभिरभ्युपेताशिवान्विता पिष्टमयी प्रसन्ना ।पूज्या शिवा तुष्यति भक्तियोगात्प्रभूतपुष्पाक्षतधूपदीपैः
साज्यगुडौदनमाषकुलत्थै-र्यावकपूपलिकामिषमद्यैः ।संभृतिरत्र नरासनमात्रंबुद्धिमता बलिकर्म्मणि कार्य्या
प्राप्याष्टमीं वाथ चतुर्द्दशीं वासंमन्त्र्य मन्त्रण सप्तकृत्वः ।बलि शिवाया निशि निश्चयेनदद्यान्मनुष्यो यदि भद्रमिच्छेत्
अत्र मन्त्रः ओँ शिवे ज्वालामुखि बलिंगृहाण गृहाण हुं फट् स्वाहा ओँ शिवेशिवदूति भगवति चण्डे इदमर्घ्यं बलिलीला-समुचितं गृहाण गृहाण आगच्छ आगच्छवायुवेगेन शुभं कुरु कुरु स्वाहा इत्यर्घ्य-मन्त्रः बलिदानाय मन्त्रान्तरम् ओँ नमोभगवति एनं एनं बलिं गृह्ण गृह्ण गन्धपुष्प-धूपदीपादिकं दह दह पच पच घोररूपिणिभो भगवति पिबत पिबत स्वाहा ।एतस्य मन्त्रद्वितयस्य मध्या-देकेन केनाप्यभिमन्त्रणीयः ।बलिः शिवायाः सुमहाप्रभावंपृथक् पृथक् मन्त्रयुगं यदेतत्
ताम्बूलवस्त्रासनदक्षिणाभि-र्नैमित्तिकं शाकुनशास्त्रदक्षम् ।प्रपूजयेत्तत्र भवत्यभीष्ट-माचार्य्यवर्य्ये परितोषिते हि
अश्लेषिकावह्निकृतान्तरुद्र-धिष्ट्यानि पूर्व्वात्रितयेन सार्द्धम् ।ज्यष्ठाञ्च सन्त्यज्य विरौति येहश्रेयस्करी जम्बुकगेहिनी सा
हितैषिणी सर्व्वसमीहितेषुदेवी भवानी भुवि फेरवा ।कृताधिवासा कृपया सदवशिवारुते तेन यतेत विद्वान्
”इति श्रीवसन्तराजशाकुने सदागमार्थशोभनेसमस्तसत्यकौतुके विरचितं शिवारुतं षष्ठम्
*अथ तान्त्रिकशिवाबलिः तदुक्तं कुलचूडामणौ“विल्वमूले प्रान्तरे वा श्मशाने वाथ साधकः ।मांसप्रधानं नैवेद्यं सन्ध्याकाले निवेदयेत्
कालि कालीति वक्तव्यं ततः सा शिवरूपिणीपशुरूपा समायाति परिवारगणैः सह
भुक्त्वा रौति यदैशान्यां मुखमुत्तोल्य सुस्वरम् ।तदैव मङ्गल तस्य नान्यथा कुलभूषण
अवश्यमन्नदानेन नियतं तोषयेच्छिवाम् ।नित्यश्राद्धं तथा सन्ध्यावन्दनं पितृतर्पणम्
तथैव कुलसेव्यानां नित्यता कुलपूजने ।पशुरूपां शिवां देवीं यो नार्च्चयति निर्जने
शिवारावेण तस्याशु सर्व्वं नश्यति निश्चितम् ।जपपूजाविधानानि यत्किञ्चित् सुकृतानि ।गृहीत्वा शापं दत्त्वा शिवा रोदिति निर्जने
एकया भुज्यते यत्र शिवया देव भैरव ।तत्रैव सर्व्व शक्तीनां प्रीतिः परमदुर्लभा
पशुशक्तिः पक्षिशक्तिर्नरशक्तिर्यथाक्रमात् ।पूजनात् द्विगुणं कर्म्म मङ्गलं साधयेत्ततः
तेन सर्व्वप्रयत्नेन कर्त्तव्यं पूजनं महत् ।राजादिभयमापन्ने देशान्तरभयादिके
शुभाशुभानि कर्म्माणि विचिन्त्य बलिमाहरेत् ।गृह्ण देवि महाभागे शिवे कालाग्निरूपिणि
शुभाशुभफलं व्यक्तं ब्रूहि गृह्ण बलिं तव ।एवमुच्चार्य्य दातव्यो बलिः कुलजनप्रियः
यदि नो भुज्यते वत्स तदा नैव शुभं भवेत् ।शुभं यदि भवेत्तत्र भुज्यते तदशेषतः ।एवं ज्ञात्वा महादेव शान्तिस्वस्त्ययनं चरेत्
”इति तन्त्रसारः
वाचस्पत्यम्
Sanskrit
शिवा स्त्री शी--वन् नि० मङ्गलवत्यां स्त्रियां दुर्गायां“शिवा मुक्तिः समाख्याता योगिनां मोक्षदायिनी ।शिवायै यां यजेद्देवीं शिवा लोके ततः स्मृता” देवीपु० ४५ अ० मुक्तौ शृगाले हरीतक्यां शमीवृक्षे ता-मलक्याम् अमरः आमलक्यां मेदि० हरिद्रायां१० दूर्वायां ११ गोरचनायाञ्च राजनि० १२ शृगाल्याम्अमरः