| YouTube Channel

शिवदूती (zivadUtI)

 
शब्दसागरः
English
शिवदूती
f.
(-ती) DURGĀ.
E.
शिव ŚIVA, and दूती, from दूत a messenger, fem.
aff.
ङीष्
Yates
English
शिव-दूती (ती) 3.
f.
Durgā.
Wilson
English
शिवदूती
f.
(-ती) DURGĀ.
E.
शिव ŚIVA, and टूती, from टूत a messenger, fem.
aff.
ङीष्.
Monier Williams Cologne
English
शिव—दूती
f.
‘Śiva's messenger’,
N.
of a form of Durgā,
MārkP.
of a Yoginī,
MW.
अभिधानचिन्तामणिपरिशिष्टम्
Sanskrit
--source--
गौतमी कौशिकी कृष्णा तामसी बाभ्रवी जया ४७
कालरात्रिर्महामाया भ्रामरी यादवी वरा
बर्हिध्वजा शूलधरा परमब्रह्मचारिणी ४८
अमोघा विन्ध्यनिलया षष्ठी कान्तारवासिनी
जाङ्गुली बदरीवासा वरदा कृष्णपिङ्गला ४९
p{0003}
दृषद्वतीन्द्रभगिनी प्रगल्भा रेवती तथा
महाविद्या सिनीवाली रक्तदन्त्येकपाटला ५०
एकपर्णा बहुभुजा नन्दपुत्री महाजया
भद्रकाली महाकाली योगिनी गणनायिका ५१
हासा भीमा प्रकूष्माण्डी गदिनी वारुणी हिमा
अनन्ता विजया क्षेमा मानस्तोका कुहावती ५२
चारणा पितृगणा स्कन्दमाता घनाञ्जनी
गान्धर्वी कर्वरी गार्गी सावित्री ब्रह्मचारिणी ५३
कोटिश्रीर्सन्दरावासा केशी मलयवासिनी
कालायनी विशालाक्षी किराती गोकुलोद्भवा ५४
एकानसी नारायणी शैला शाकंभरीश्वरी
प्रकीर्णकेशी कुण्डा नीलवस्त्रोग्रचारिणी ५५
अष्टादशभुजा पौत्री शिवदूती यमस्वसा
सुनन्दा विकचा लम्बा जयन्ती नकुलाकुला ५६
विलङ्का नन्दिनी नन्दा नन्दयन्ती निरञ्जना
कालंजरी शतमुखी विकराली करालिका ५७
विरजाः पुरला जीरी बहुपुत्री कुलेश्वरी
कैटभी कालदमनी दर्दुरा कुलदेवता ५८
रौद्री कुन्द्रा महारौद्री कालंगमा महानिशा
बलदेवस्वसा पुत्री हीरी क्षेमंकरी प्रभा ५९
मारी हैमवती चापि गोला शिखरवासिनी
-wordlist-
गौतमी (स्त्री), कौशिकी (स्त्री), कृष्णा (स्त्री), तामसी (स्त्री), बाभ्रवी (स्त्री), जया (स्त्री), कालरात्रि (स्त्री), महामाया (स्त्री), भ्रामरी (स्त्री), यादवी (स्त्री), वरा (स्त्री), बर्हिध्वजा (स्त्री), शूलधरा (स्त्री), परमब्रह्मचारिणी (स्त्री), अमोघा (स्त्री), विन्ध्यनिलया (स्त्री), षष्ठी (स्त्री), कान्तारवासिनी (स्त्री), जाङ्गुली (स्त्री), बदरीवासा (स्त्री), वरदा (स्त्री), कृष्णपिङ्गला (स्त्री), दृषद्वती (स्त्री), इन्द्रभगिनी (स्त्री), प्रगल्भा (स्त्री), रेवती (स्त्री), महाविद्या (स्त्री), सिनीवाली (स्त्री), रक्तदन्ती (स्त्री), एकपाटला (स्त्री), एकपर्णा (स्त्री), बजुभुजा (स्त्री), नन्दपुत्री (स्त्री), महाजया (स्त्री), भद्रकाली (स्त्री), महाकाली (स्त्री), योगिनी (स्त्री), गणनायिका (स्त्री), हासा (स्त्री), भीमा (स्त्री), प्रकूष्माण्डी (स्त्री), गदिनी (स्त्री), वारुणी (स्त्री), हिमा (स्त्री), अनन्ता (स्त्री), विजया (स्त्री), क्षेमा (स्त्री), मानस्तोका (स्त्री), कुहावती (स्त्री), चारणा (स्त्री), पितृगणा (स्त्री), स्कन्दमाता (स्त्री), घनाञ्जनी (स्त्री), गान्धर्वी (स्त्री), कर्बुरा (स्त्री), गार्गी (स्त्री), सावित्री (स्त्री), ब्रह्मचारिणी (स्त्री), कोटिश्री (स्त्री), मन्दरावासा (स्त्री), केशी (स्त्री), मलयवासिनी (स्त्री), कालायनी (स्त्री), विशालाक्षी (स्त्री), किराती (स्त्री), गोकुलोद्भवा (स्त्री), एकानसी (स्त्री), नारायणी (स्त्री), शैला (स्त्री), शाकम्भरी (स्त्री), ईश्वरी (स्त्री), प्रकीर्णकेशी (स्त्री), कुण्डा (स्त्री), नीलवस्त्रा (स्त्री), उग्रचारिणी (स्त्री), अष्टादशभुजा (स्त्री), पौत्री (स्त्री), शिवदूती (स्त्री), यमस्वसा (स्त्री), सुनन्दा (स्त्री), विकचा (स्त्री), लम्बा (स्त्री), जयन्ती (स्त्री), नकुला (स्त्री), कुला (स्त्री), विलङ्का (स्त्री), नन्दिनी (स्त्री), नन्दा (स्त्री), नन्दयन्ती (स्त्री), निरञ्जना (स्त्री), कालञ्जरी (स्त्री), शतमुखी (स्त्री), विकराला (स्त्री), करालिका (स्त्री), विरजस् (स्त्री), पुरला (स्त्री), जारी (स्त्री), बहुपुत्री (स्त्री), कुलेश्वरी (स्त्री), कैटभी (स्त्री), कालदमनी (स्त्री), दर्दुरा (स्त्री), कुलदेवता (स्त्री), रौद्री (स्त्री), कुन्द्रा (स्त्री), महारौद्री (स्त्री), कालङ्गमा (स्त्री), महानिशा (स्त्री), बलदेवस्वसृ (स्त्री), पुत्री (स्त्री), हीरी (स्त्री), क्षेमङ्करी (स्त्री), प्रभा (स्त्री), मारी (स्त्री), हैमवती (स्त्री), गोला (स्त्री), शिखरवासिनी (स्त्री)
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskrit
शिवदूती,
स्त्री,
(शिवेन दूतयति सन्देशं प्रापयती-न्यर्थे दूत + णिच् + पचाद्यच् यद्वा, शिवो दूतोयस्याः गौरादेराकृतिगणत्वात् ङीष् ।) दुर्गा ।इति त्रिकाण्डशेषः
योगिनीविशेषः यथा, “ब्रह्माणो प्रथमा प्रोक्ता ततो माहेश्वरी परा ।कीमारी वेष्णवी चैव वाराही पञ्चमी तथा
नारमिंहो तथैवैन्द्री शिवदूती तथाष्टमी ।एताः पूज्या महाभागा योगिनीः काम-दायिनोः
”तस्या उत्पत्तिमन्त्रध्यानादि यथा, --“कौषिक्या हृदयाद्देवी निःसृता ध्यानतोहरेः ।शिवदूतीति विख्याता शिवाशतसुसंवृता
मन्त्रमस्याः प्रवक्ष्यामि धर्म्मकामार्थदायकम् ।यत् श्रुत्वा साधको याति दुर्लभं शिवमन्दिरम्
येनाराध्य महादेवीं शिवदूतीं शिवात्मिकाम् ।न चिराल्लभते कामान्नरः सर्व्वजयी भवेत्
अन्तःसमाप्तिसहितो बिन्द्विन्दुभ्यां दशावरा ।स्वरेण पान्त्यदन्त्येन संसृष्टोऽन्तेन पूर्वशः
एव बिन्दुयुगलपूर्वस्थोपान्त्यपावकः ।षष्ठस्वरकलाशून्यैः संहितः प्रथमस्थितः
मन्त्रोऽयं शिवदूत्यास्तु शिवदूतीजयप्रदः ।रूपमस्याः प्रवक्ष्यामि शृणु वत्सक संमतम्
चतुर्भुजं महाकायं सिन्दूरसदृशद्युतिम् ।रक्तदन्तं मुण्डमालाजटाजूटार्द्धचन्द्रधृक्
नागकुण्डलहाराभ्यां शोभितं नखरोज्ज्वलम् ।व्याघ्रचर्म्मपरीधानं दक्षिणे शूलचक्रधृक्
वामे पाशं तथा चर्म्म बिभ्रदूर्द्ध्वं परिक्रमात् ।स्थूलवक्त्रञ्च पीनोष्ठं तुङ्गमूर्त्तिं भयङ्करम्
निक्षिप्य दक्षिणं पादं सन्तिष्ठेत् कुणपोपरि ।वामपादं शृगालस्य पृष्ठे फेरुशतैर्वृतम्
ईदृशं शिवदूत्यास्तु मूर्द्ध्नि ध्यायेद्विभूतये ।ध्यानमात्रादथैतस्या नरः कल्याणमाप्नुयात्
पूजनादचिराद्देवो सर्व्वान् कामान् ददाति
यः शिवाविरुतं श्रुत्वा शिवदूतीं शिवप्रदाम् ।प्रणमेत् साधको भक्त्या तस्य कामाः करेस्थिताः
यदा जघान जगतां रक्तबीजं हिताय वै ।महादेवी महामाया तदास्याः कायतः सृता
दूतं प्रस्थापयामास शिवं शुम्भाय साम्बिका ।तेन सा शिवदूतीति देवैः सर्व्वैः प्रगीयते
क्षेमङ्करी शान्ता वेदमाता महोदरी ।कराला कामदा देवी भगास्या भगमालिनी
भगोदरी भगाहारा भगजिह्वा भगा तथा ।एता द्वादश योगिन्यः पूजने परिकीर्त्तिताः
एता द्वादश योगिन्यः शिवदूत्याः सदैव हि ।विचरन्ति स्वयं देवी यत्र यत्रैव गच्छति
”इति कालिकापुराणे उत्तरतन्त्रे ५० अध्यायः
प्रमाणानन्तरं वामने ५३ अध्याये मार्कण्डेय-पुराणे देवीमाहात्म्ये रक्तबीजवधाध्याये चद्रष्टव्यम्
वाचस्पत्यम्
Sanskrit
शिवदूती स्त्री शिवो दूतो यस्याः दुर्गामूर्त्तिभेदे त्रिका०२ योगिनीभेदे “यदा जघान जगतां रक्तवीजं हितायवै महादेवी महामाया तदास्याः कायतः सृता ।दूत प्रस्थापयामास शिवं शुम्भाय साम्बिका तेन साशिवदूतीति देवैः सर्वैः प्रगीयते” कालिकापु० ६० अ० ।“यः शिवाविरुतं श्रुत्वा शिवदूतीं शिवप्रदाम् प्रणमेत्साधको भक्त्या तस्य कामाः करे स्थिताः” तत्रैव “ब्रह्माणा प्रथमा प्रोक्ता ततो माहेश्वरी पराः कोमारीवैष्णवी चैव वाराही पञ्चमी तथा नारसिंही तथैवैन्द्रीशिवदूतो तथाष्टभी एताः पूज्या महाभागाः योगिन्यःकामदायिकाः तत्रैव कौषिक्याः हृदयाद्देवी निःसृताध्यानता हरेः शिवदूतीति विख्याता शिवाशतसुसंवृता”तत्रैव