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व्रजिता-ती (vrajitA-tI)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“व्रज गतौ”@} 2 व्राजकः-जिका, व्राजकः-जिका, विव्रजिषकः-षिका, वाव्रजकः-जिका
व्रजिता-ती, व्राजयिता-त्री, विव्रजिषिता-त्री, वाव्रजिता-त्री
इत्यादिकानि रूपाणि समस्तान्यपि भौवादिकध्रजतिवत् 3 ज्ञेयानि।
4 व्रजः, 5 व्रज्या, 6 व्राज्यम्, 7 परिव्राट्-प्ररिव्राड्-परिव्राजौ-परिव्राजः, इमानि रूपाण्यधिकान्यत्रेति विशेषः।
8।]] व्राजिः, 9 वज्रम्।
10
प्रासङ्गिक्यः
01
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(१६६०)
02
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(१-भ्वादिः-२५३। सक। सेट्। पर।)
03
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(९२६)
04
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[[७। ‘गोचरसञ्चरवहव्रज--’ (३-३-११९) इत्यधिकरणे घप्रत्ययान्तो निपातितः। व्रजः = गोकुलम्।]]
05
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[[८। ‘व्रजयजोर्भावे क्यप्’ (३-३-९८) इति भावे स्त्रीलिङ्गे क्यप्प्रत्ययः। क्तिनोऽपवादः। परिव्रज्या सन्न्यासः।]]
06
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[[९। ण्यति, ‘अजिव्रज्योश्च’ (७-३-६०) इति कुत्वनिषेधः।]]
07
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[[१०। परावुपपदे औणादिके (द। उ। ९-८) क्विप्प्रत्यये, दीर्घे जकारस्य षकारे रूपमेवम्। परित्यज्य सर्वं व्रजति इति परिव्राट् = यतिः।]]
08
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[[११। औणादिके (द। उ। १-५३) ञिप्रत्यये, ञित्त्वादुपधावृद्धिः। तेन रूपमेवम्। व्राजिः = मनः [मुनिः]
09
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[[१२। व्रजति सर्वत्र प्रेरित इति औणादिके (द। उ। ८-४६) रन्प्रत्यये निरूढः। रेफलोपो निपातनात्। वज्रम् = पविः।]]
10
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[पृष्ठम्१२७५+ २७]