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व्रज (vraja)

 
शब्दसागरः
English
व्रज
m.
(-जः)
1. A cow-pen, a station of cowherds.
2. A road.
3. A
flock, a herd, a multitude.
4. The district about Āgrā and Mathurā,
the scene of KRISHṆA'S juvenile adventures.
5. An abode.
n.
(-जं)
Wandering, roaming.
E.
व्रज् to go,
aff.
घञर्ये-क
Capeller Eng
English
व्रज॑
m.
(n. ) fold, shed, stable, station of herds
herd,
flock, troop, multitude
N.
of a region.
Yates
English
व्रज (जः) 1.
m.
A cow pen
a road
a flock, herd
district about
Agra.
n.
Wandering.
Spoken Sanskrit
English
व्रज - vraja -
m.
- cloud
व्रज - vraja -
m.
- fold
व्रज - vraja -
m.
- cattle-shed
व्रज - vraja -
m.
- road
व्रज - vraja -
m.
- flock
व्रज - vraja -
m.
- troop
व्रज - vraja -
m.
- multitude
व्रज - vraja -
m.
- enclosure or station of herdsmen
व्रज - vraja -
m.
- swarm
व्रज - vraja -
m.
- host
व्रज - vraja -
m.
- cow-pen
व्रज - vraja -
m.
- stall
व्रज - vraja -
m.
- herd
व्रज - vraja -
m.
- way
व्रज - vraja -
n.
- roaming
व्रज - vraja -
n.
- wandering
व्रज - vraja - verb - you go
व्रज - vraja -
m.
- cattle-shed
प्रपा - prapA -
f.
- place for watering cattle or a shed on the road-side containing a reservoir of water for travellers
गोपरीणस् - goparINas -
adj.
- abundantly furnished with cattle or milk
Wilson
English
व्रज r. 1st and 10th cls. (व्रजति व्राजयति) To go, to travel.
With परि prefixed, To wander about, as a mendicant. r. 10th cl. To prepare, to perfect.
व्रज
m.
(-जः)
1 A cow-pen, a station of cowherds.
2 A road.
3 A flock, a herd, a multitude.
4 The district about Agra and
Mathurā, the scene of
KṚṢṆA'S juvenile adventures.
n.
(-जं) Wandering, roaming.
E.
व्रज to go,
aff.
घ.
Apte
English
व्रजः [vrajḥ], [व्रज्-घञर्थे क]
A multitude, collection, flock, group
सगोव्रजो$त्यात्मपदुर्गमार्गः
Bhāg.*
1.13.3
नेत्रव्रजाः पौरजनस्य तस्मिन् विहाय सर्वान्नृपतीन्निपेतुः
R.*
6.7
7.6
Śi.*
6.6
14.33.
A station of cowherds
Bhāg.*
12.9.28.
A cow-pen, cow-shed
'व्रजः स्याद्गोकुलं गोष्ठम्' इति वैजयन्ती
निरुद्धवीवधासारप्रसारा गा इव व्रजम्
Śi.*
2.64
Ki.*
4.16.
An abode, a resting-place.
A road.
A cloud.
N.
of a district near Mathurā. -जम् Wandering, going.
Comp.
-अङ्गना, -यूवतिः
f.
a woman of Vraja, a cowherdess
मयुरागमनोन्मुखे मुरारावसुभारार्तिभृतां व्रजाङ्गनानाम्
Bv.*
2.165. -अजिरम् a cow-pen. -किशोरः, -नाथः, -मोहनः, -वरः, -वल्लभः epithets of Kṛiṣṇa. -भाषा the language current around Agra nad Mathurā
old Hindi language. -सानः a man.
Apte 1890
English
व्रजः [व्रज्-घञर्थे क] 1 A multitude, collection, flock, group
नेत्रव्रजाः पौरजनस्य तास्मिन् विहाय सर्वान्नृपतीन्निपेतुः R. 6. 7
7. 60
Śi. 6. 6, 14. 33.
2 A station of cowherds.
3 A cow-pen, cow-shed
Śi. 2. 64.
4 An abode, a resting-place.
5 A road.
6 A cloud.
7 N. of a district near Mathurā.
जं Wandering, going.
Comp.
अंगना,
युवतिः f. a woman of Vraja, a cowherdess
Bv. 2. 165.
अजिरं a cow-pen.
किशोरः,
नाथः,
मोहनः,
वरः,
वल्लभः epithets of Kṛṣṇa.
Monier Williams Cologne
English
1. व्रज
m.
(for 2. See
p.
1042, col. 1) a way, road,
L.
व्रज
n.
wandering, roaming,
W.
2. व्रज॑
m.
(n. only,
RV.
v, 6, 7
ifc. f(आ).
fr.
वृज्) a fold, stall, cow-pen, cattle-shed, enclosure or station of herdsmen,
RV.
&c.
&c.
व्रज॑
m.
N.
of the district around Agra and Mathurā (the abode of Nanda, of Kṛṣṇa's foster-father, and scene of Kṛṣṇa's juvenile adventures
commonly called Braj
cf.
वृजि),
Inscr.
a herd, flock, swarm, troop, host, multitude,
MBh.
Kāv.
&c.
(संग्रामः सव्रजः ‘a fight with many’,
MārkP.
व्रजो गिरिमयः, prob.
=
गिरि-व्रज, q.v.,
Hariv.
)
a cloud (= मेघ),
Naigh.
i, 10
N.
of a son of Havir-dhāna,
Hariv.
VP.
Monier Williams 1872
English
व्रज, अस्, m. a road
a flock, herd, multitude,
collection of anything
a station of cowherds, cow-
pen, cattle-shed, stall, stable
a resting-place, abode
a cloud (= मेघ according to Naigh. I. 10)
N.
of the district surrounding Agra and Mathurā (the
scene of Kṛṣṇa's juvenile adventures
it is com-
monly called Braj, cf. वृजि)
N. of a son of Havir-
dhāna
(अम्), n. going, wandering, roaming
[cf.
perhaps Lat. vulgus.]
—व्रज-किशोर, अस्, m. ‘youth
of Vraja, epithet of Kṛṣṇa.
—व्रज-नाथ, अस्,
m. ‘lord of Vraja, epithet of Kṛṣṇa.
—व्रज-
भू, ऊस्, ऊस्, उ, being or produced in Vraja
(ऊस्),
m. the tree Nauclea Cordifolia, = केलि-कदम्ब
(ऊस्), f. the district of Vraja.
—व्रज-मण्डल, अम्,
n. the district of Vraja.
—व्रज-मोहन, अस्, m.
‘the fascinator of Vraja, epithet of Kṛṣṇa.
—व्र-
ज-लाल, अस्, m., N. of a king.
—व्रज-वर, अस्,
m. ‘best in Vraja, epithet of Kṛṣṇa.
—व्रज-वल्-
लभ, अस्, m. ‘beloved in Vraja, epithet of Kṛṣṇa.
—व्रजाङ्गना (°ज-अङ्°), f. ‘woman of Vraja, a
Gopī, cowherdess, shepherdess.
—व्रजाजिर (°ज-
अज्°), अम्, n. a cow-yard, cattle-fold, cow-pen.
Macdonell
English
व्रज vraj-á,
m.
(n. RV.¹) fold, stall, cowpen
🞄herdsmenʼs station (C.)
herd, flock, 🞄swarm, host, multitude (C.)
(vrāj) -ana,
n.
🞄roaming, going (elsewhere
C.)
path (RV.¹).
Benfey
English
व्रज व्रज् + अ,
m.
1. A road.
2. A flock,
a herd, Chr. 292, 3 = Rigv. i. 86, 3
a mul-
titude, MBh. 6, 5441.
3. A cow-pen, Chr.
294, 4 = Rigv. i. 92, 4.
4. The name of
a district about अग्र and मथुरा।
--
Comp.
गो-,
m.
1. pasture ground for
cattle, Man. 4, 52. 2. a proper name,
MBh. 9, 2568.
नेत्र-,
m.
(pl.), all the
eyes, Ragh. 6, 7. -- Cf. perhaps Lat.
vulgus (or = वर्ग).
Hindi
Hindi
जाना
Apte Hindi
Hindi
व्रजः
पुं*
- व्रज् +
"समुच्चय, संग्रह, रेवड़, समूह"
व्रजः
पुं*
- व्रज् +
ग्वालों के रहने का स्थान
व्रजः
पुं*
- व्रज् +
"गोष्ठ, गौशाला"
व्रजः
पुं*
- व्रज् +
"आवास, विश्रामस्थल"
व्रजः
पुं*
- व्रज् +
"सड़क, मार्ग"
व्रजः
पुं*
- व्रज् +
बादल
व्रजः
पुं*
- व्रज् +
मथुरा के निकट एक जिला
L R Vaidya
English
vraja {% m. %} 1. A flock, a multitude, रुचिरचित्रतनूरुहशालिभिर्विचलितैः परितः प्रियकव्रजैः Sis.iv.32, R.vi.7
2. a station of cowherds
3. a cowpen
4. a road
5. an abode
6. name of a district near Mathurā, Bh.V.ii.165, 179.
Anekartha-Dvani-Manjari
Sanskrit
व्रज
पु
व्रज, गोष्ठ, मार्ग, सङ्ग, गण
व्रजो गोष्ठो व्रजो मार्गो व्रजः सङ्गो व्रजो गणः ५०
verse 2.1.1.50
page 0011
Indian Epigraphical Glossary
English
vraja, see Vraja-bhūmika. Cf. Ghoshal, H. Rev. Syst., p. 110.
धातुपाठः (Krishnacharya)
Sanskrit
धातुः:
व्रज्
मूलधातुः:
व्रज
धात्वर्थः:
गतौ
गणः:
भ्वादिः
कर्मकत्वं:
सकर्मकः
इट्त्वं:
सेट्
उपग्रहः:
परस्मैपदी
रूपम्:
व्रजति
धातुः:
व्रज्
मूलधातुः:
व्रज
धात्वर्थः:
मार्ग-संस्कार-गत्योः
गणः:
चुरादिः
कर्मकत्वं:
अकर्मकः
इट्त्वं:
सेट्
उपग्रहः:
उभयपदी
रूपम्:
व्राजयति-ते
धातुप्रदीपः
Sanskrit
व्रजँ व्रज मार्ग, संस्कार, गतौ
- व्राजयति (11) 83
अभिधानचिन्तामणिः
Sanskrit
--source--
गवां सर्वं गव्यं व्रजे गोकुलं गोधनं धनम् १२७३
-wordlist-
गव्य (क्ली), व्रज (पुंक्ली), गोकुल (क्ली), गोधन (क्ली), धन (क्ली)
--source--
संघाते प्रकरौघवारनिकरव्यूहाः समूहश्चयः
संदोहः समुदायराशिविसरव्राताः कलापो व्रजः
कूटं मण्डलचक्रवालपटलस्तोमा गणः पेटकं
वृन्दं चक्रकदम्बके समुदयः पुञ्जोत्करौ संहतिः १४११
समवायो निकुरम्बं जालं निवहसंचयौ
जातं तिरश्चां तद्यूथं संघसार्थौ तु देहिनाम् १४१२
-wordlist-
सङ्घात (पुं), प्रकर (पुं), ओघ (पुं), वार (पुंक्ली), निकर (पुं), व्यूह (पुं), समूह (पुं), चय (पुं), सन्दोह (पुं), समुदाय (पुं), राशि (पुं), विसर (पुं), व्रात (पुं), कलाप (पुं), व्रज (पुं), कूट (पुंक्ली), मण्डल (त्रि), चक्रवाल (पुं), पटल (स्त्रीक्ली), स्तोम (पुं), गण (पुं), पेटक (त्रि), वृन्द (क्ली), चक्र (पुंक्ली), कदम्बक (क्ली), समुदय (पुं), पुञ्ज (पुं), उत्कर (पुं), संहति (स्त्री), समवाय (पुं), निकुरुम्ब (क्ली), जाल (स्त्रीक्ली), निवह (पुं), सञ्चय (पुं), जात (क्ली), यूथ (क्ली), सङ्घ (पुं), सार्थ (पुं)
अभिधानरत्नमाला
Sanskrit
व्रज
व्रज, गोकुल, गोष्ठ, गोवृन्द, गोधन
व्रजः स्याद् गोकुलं गोष्ठं गोवृन्दं गोधनं धनम्
verse 2.1.1.262
page 0032
निकर
निकर, निकाय, निवह, विसर, व्रज, पुञ्ज, समूह, सञ्चय, समुदय, सार्थ, यूथ, निकुरम्ब, कदम्ब, पूग, राशि, चय, समवाय, वृन्द, सन्दोह, समाज, वितान, संहति, प्रकर, घन, ओघ, संघ, संघात, व्रात, कुल, उत्कर, पटल, पेटक, चक्र, चक्रवाल, मण्डल, जाल, जात, व्यूह, वार, स्तोम
निकरनिकायनिवहविसरव्रजपुञ्जसमूहसञ्चयाः,
समुदयसार्थयूथनिकुरम्बकदम्बकपूगराशयः
चयसमवायवृन्दसन्दोहसमाजवितानसंहति-
प्रकरघनौघसंघसंघातव्रातकुलोत्कराः स्मृताः ६८६
पटलं पेटकं चक्रं चक्रवालं मण्डलम्
जालं जातं तथा व्यूहवारस्तोमाश्च ते स्मृताः ६८७
verse 4.1.1.686
page 0079
नाममाला
Sanskrit
व्रात, पूग, समाज, समूह, सन्तति, व्रज, व्यूह, निकाय, निकुर, निकुरम्ब, कदम्बक, ओघ, समुदय, सङ्घ, सङ्घात, समिति, तति, निचय, प्रकर, पङ्क्ति
व्रातः पूगः समाजश्च समूहः सन्ततिर्व्रजः
व्यूहो निकायो निकुरो निकुरम्बं कदम्बकम् १३९
ओघः समुदयः सङ्घः सङ्घातः समितिस्ततिः
निचयः प्रकरः पङ्क्तिः पशूनां समजो व्रजः १४०
verse 0.1.1.139
page 0069
समज, व्रज
व्रातः पूगः समाजश्च समूहः सन्ततिर्व्रजः
व्यूहो निकायो निकुरो निकुरम्बं कदम्बकम् १३९
ओघः समुदयः सङ्घः सङ्घातः समितिस्ततिः
निचयः प्रकरः पङ्क्तिः पशूनां समजो व्रजः १४०
verse 0.1.1.139
page 0069
घोष, गोमण्डल, व्रज
त्रिमार्गनामगा गङ्गा घोषो गोमण्डलं व्रजः १६२
verse 0.1.1.162
page 0078
पुराणम्
English
व्रज / VRAJA. A king born in the family of manu Svāyambhuva. He was the son of havirdhāna. Six sons named prācīnabarhis, śukra, gaya, kṛṣṇa, vraja and ajina, were born to havirdhāna by his wife dhiṣaṇā. (agni purāṇa, Chapter 16).
Vedic Reference
English
Vraja denotes in the first instance, in the Rigveda, ^1 the place
to which the cattle resort (from vraj, ‘go’), the ‘feeding ground’
to which the milk-giving animals go out^2 in the morning from
the village (Grāma), while the others stay in it all day and
night.^3 Secondarily it denotes the ‘herd’^4 itself. This is
Geldner's view, ^5 which seems clearly better than that of Roth^6
who regards Vraja as primarily the ‘enclosure’ (from vṛj), and
only thence the ‘herd’
for the Vraja does not normally mean
an ‘enclosure’ at all: the Vedic cattle were not stall-fed as a
general rule. In some passages, however, ‘pen, ’^7 in others
‘stall, ’^8 is certainly meant. The word is often used in the
myth of the robbing of the kine.^9 It occasionally denotes a
‘cistern.’^10
1) Rv. ii. 38, 8
x. 26, 3, and perhaps
97, 10
101, 8. Cf. Medhātithi on
Manu, iv. 45, and Mahābhārata, i. 41,
15, where go-vraja is equal to gavāṃ
pracārāḥ, ‘the pastures of the kine, in
i. 40, 17.
2) Rv. ii. 38, 8.
3) Cf. Sāyaṇa on Aitareya Brāhmaṇa,
ii. 18, 14.
4) Rv. v. 35, 4
vii. 27, 1
32, 10
viii. 46, 9
51, 5.
5) Vedische Studien, 2, 282 et seq.
Rig-
reda, Glossar, 174. Cf. Hopkins, Journal
of the American Oriental Society, 13, 77.
6) St. Petersburg Dictionary, s.v. But
cf. Böhtlingk, Dictionary, s.v.
7) Av. iii. 11, 5
iv. 38, 7
Śāṅkhāyana
Āraṇyaka, ii. 16. Metaohorically, in
the Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, vi. 4, 22,
Mādhyaṃdina, it is a pen with a bolt
(sārgala) and with a palisade (sa-pari-
śraya). The sense of ‘pen’ is also
possible in Rv. x. 97, 10
101, 8, and
is not radically opposed to it, for Vraja
denotes the place where the cattle are
fed, and can therefore be applied to
the stall where they are during the
night. Cf. Goṣṭha.
8) Rv. x. 4, 2, where the ‘warm
Vraja’ to which the cows resort is
alluded to, and iv. 51, 2, where the
Dawns open wide the doors of the
Vraja of darkness
Taittirīya. Brāh-
maṇa, iii. 8, 12, 2, where the Vraja is
said to be made of Aśvattha wood.
The sense of ‘stall’ is probable in
Vājasaneyi Saṃhitā, i. 25.
9) See Geldner, op. cit., 2, 283 et
seq.
10) Vājasaneyi Saṃhitā, x. 4 = Tait-
tirīya Brāhmaṇa, i. 8, 11, 1 = Maitrāyaṇī
Saṃhitā, ii. 6, 7.
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskrit
व्रज, गतौ इति कविकल्पद्रुमः
(भ्वा०-पर०सक०-सेट् ।) व्रजति इति दुर्गादासः
व्रज, संस्कृतौ गतौ इति कविकल्पद्रुमः
(चुरा०-पर०-सक०-सेट् ।) क, व्राजयति ।विरेफौ तौ तौ एतौ विरेफौ रेफरहितौ चस्याताम् इति दुर्गादासः
व्रजं,
क्ली,
व्रजनम् गमनम् व्रज गतौ इत्यस्मात्घप्रत्ययेन निष्पन्नमिदम् इति सिद्धान्त-कौमुदी
व्रजः,
पुं,
(व्रज गतौ + “गोचरसंचरेति ।” ।३ ११९ इति घप्रत्ययेन निपातनात् साधुः ।)समूहः इत्यमरः
(यथा, महाभारते ।१८९ १२ ।“ततः प्रतापः सुमहान् शब्दश्चैव विभावसोः ।प्रादुरासीत् तदा तेन बुबुधे जनव्रजः
”)गोष्ठम् (यथा, माघे ६४ ।“निरुद्धवीवधासारप्रसारा गा इव व्रजम् ।उपरुन्धन्तु दशार्हाः पुरीं माहिष्मतीं द्बिषः
पन्थाः इति मेदिनी
अग्रवणमथुरयोश्चतुष्पार्श्ववर्त्तिदेशः अस्य विवरणं यथा, मात्स्ये ।“व्रजमण्डलभूगोलं शेषनागफणं वरम् ।कुमुदाख्यं महाश्रेष्ठं सर्व्वेषां मध्यसंस्थितम्
तस्योपरिस्थितं लोकं सर्व्वस्थानं महाफलम् ।कृष्णलीलाविहारार्थमुच्चस्थानविराजितम्
चतुरष्टकक्रोशेन परिपूर्णविराजितम् ।अस्य प्रदक्षिणीकुर्व्वन् धनधान्यसुखं लभेत्
दानार्च्चावासतो लोको विष्णुलोकमवाप्नुयात् ।आवासान्म्रियते चेह पुनर्जन्म विद्यते
पुण्यं लक्षगुणं लब्ध्वा कृतेऽस्मिन् व्रजमण्डले ।कृष्णेन निर्म्मितास्तीर्थाः सार्द्धद्बयसहसकाः
*तत्रादौ वनोपवनप्रतिवनाधिवनान्यष्टचत्वा-रिंशत् तानि चतुरष्टक्रोशपरिमाणस्थितानिचतुर्भागशोऽभ्यन्तरस्थितानि क्रमश आह ।पाद्मे ।“वनानि द्बादशान्याहुर्यमुनोत्तरदक्षिणे ।महावनं महाश्रेष्ठं द्वयं काम्यवनं शुभम्
कोकिलाख्यं तृतीयञ्च तूर्य्यं तालवनं तथा ।पञ्चमं कुमुदाख्यञ्च षष्ठं भाण्डीरसंज्ञकम्
नाम्ना छत्रवनं श्रेष्ठं सप्तमं परिकीर्त्तितम् ।अष्टमं खदिरं प्रोक्तं नवमं लोहजं वनम्
नाम्ना भद्रवनं श्रेष्ठं दशमं बहुपुण्यदम् १० ।एकादशं समाख्यातं वहुलावनसंज्ञकम् ११
नाम्ना विल्ववनं श्रेष्ठं द्वादशं कामनाप्रदम् १२ ।इति द्वादशसं ज्ञानि वनानि शुभदानि
”इति द्वादशवनानि
अथ द्वादशोपवनान्याह वाराहे ।“आदौ ब्रह्मवनं नाम द्बितीयं त्यप्सरा-वनम् ।तृतीयं विह्वलं नाम कदम्बाख्यं चतुर्थकम्
नाम्ना स्वर्णवनं श्रेष्ठं पञ्चमं परिकीर्त्तितम् ।सुरभीवननामानं षष्ठमाह्लादवर्द्धनम्
श्रेष्ठं प्रेमवनं नाम सप्तमं शुभदं नृणाम् ।मयूरवननामानमष्टमं परिकीर्त्तितम्
मालेङ्गितवनं श्रेष्ठं नवमं मानवर्द्धनम् ।शेषशायिवनं श्रेष्ठं दशमं पापनाशनम् १०
एकादशं समाख्यातं नारदाख्यं शुभोदितम्११ ।द्बादशं परमानन्दवनं सर्व्वार्थदायकम् १२
इति द्वादशसंज्ञानि वनान्युपवनानि
”इति द्वादशोपवनानि
*
अथ द्वादशप्रतिवनानि भविष्ये ।“आदौ रङ्कवनं श्रेष्ठं पुरसंज्ञाविराजितम् ।वार्त्तावनं द्बितीयञ्च करहाख्यं तृतीयकम्
चतुर्थं काम्यनामानं वनं कामप्रदं नृणाम् ।वनमञ्जननामानं पञ्चमं स्त्रीशुभप्रदम्
नाम्रा कर्णवनं श्रेष्ठं षष्ठं स्वप्नवरप्रदम् ।कृष्णाक्षिपलकं नाम वनं सप्तममीरितम्
बन्दप्रेक्षणकृष्णाख्यं वनं नन्दनमष्टमम् ।वनमिन्द्रवनं नाम नवमं कृष्णपूजितम्
शिक्षावनं शुभं प्रोक्तं दशमं नन्दभाषितम् १० ।चन्द्रावलीवनं श्रेष्ठमेकादशमुदाहृतम् ११
नाम्ना लोहवनं श्रेष्ठं द्बादशं शुभदं नृणाम् १२ ।इति प्रतिवनान्याहुर्मार्गे वामे दक्षिणे ।इति द्वादशसंज्ञास्ते देवावासफलप्रदाः
”इति द्वादश प्रतिवनानि
*
अथ द्वादशाधिवनानि विष्णुपुराणे ।“मथुरा प्रथमं नाम राधाकुण्डं द्बितीयकम्२ ।नन्दग्रामं तृतीयञ्च गूढस्थानं चतुर्थकम्
पञ्चमं ललिताग्रामं वृषभानुपुरञ्च षट् ।सप्तमं गोकुलं स्थान-७ मष्टमं बलदेवकम्
गोवर्द्धनवनं श्रेष्ठं नवमं कामनाप्रदम् ।वनं जाववटं नाम दशमं परिकीर्त्तितम् १०
मुख्यवृन्दावनं श्रेष्ठमेकादशं प्रकीर्त्तितम् ११ ।सङ्केतवटकं स्थानं वनं द्बादशं कीर्त्तितम् १२
इति द्बादशसंज्ञानि वनान्यधिवनानि ।वनानामधिपाः प्रोक्ता व्रजमण्डलमध्यगाः
एषां नैव विलोकेन वनयात्रा निष्फला ।एषाञ्च दर्शनेनैव वनयात्रा शुभप्रदा
आदौ लीलां यदा पश्येद्बनयात्रां ततश्चरेत् ।सर्व्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोकमवाप्नुयात् ।सर्व्वत्र विजयी भूयाद्बनयात्राप्रभावतः
”इति व्रजभक्तिविलासे अध्यायः
वाचस्पत्यम्
Sanskrit
व्रज गतौ
भ्वा०
पर०
सक०
सेट् व्रजति अव्राजीत्
व्रज संस्कारे गतौ
चु०
उ०
सक०
सेट् ब्राजयति ते अविव्रजत्
व्रज
पु०
व्रज--घञर्थे समूहे अमरः गोष्ठे पथिमेदि० मथुरासमीपस्थे देशभेदे चमात्स्ये “व्रजमण्डलभूगोलं शेषनागफणाम्बरम् ।कुमादाख्यं महाश्रेष्ठं सर्वेषां मध्यसंस्थितम् तस्यो-परिस्थितं लोकं सर्वस्थानं महाफलम् कृष्णलीलाविहारार्थमुच्चस्थानविराजितम् चतुरष्टक ८४ क्रोशेन प-रिपूर्णविराजितम् अस्य प्रदक्षिणां कुर्वन् धनधान्यसुखंलभेत् दानार्च्चावासतो लोको विष्णुलोकमवाप्नु-यात् आवसन् म्रियते चेत्तु पुनर्जन्म विद्यते पुण्यंलक्षगुणं लब्ध्वा कृतेऽस्मिन् व्रजमण्डले कृष्णेन नि-र्मितास्तीर्थाः सार्द्धद्वयसहस्रकाः” तत्रादौ वनोपवनप्रतिवनाधिवनान्यष्टचत्वाविंशत् तानि चतुरष्टक्रोशपरि-माणस्थितानि चतुर्भागशोऽभ्यन्तरस्थितानि क्रमश आह ।पाद्मे “वनानि द्वादशान्याहुर्यमुनोत्तरदक्षिणे महावनं १महाश्रेष्ठं वरं काम्यवनं शुभम् कोकिलाख्यंतृतीयञ्च तुर्य्यं तालवनं तथा पञ्चमं कुमुदाख्यञ्च ५षष्ठं भाण्डीरसंज्ञकम् नाम्ना छत्रवनं श्रेष्टं सप्तमं परिकीर्त्तितम् अष्टमं खदिरं प्रोक्तं नवमंलीहजं वनम् नाम्ना भद्रवर्न १० श्रेष्ठं दशमं बहु-पुण्यदम् एकादशं समाख्यातं बहुलावनसंज्ञकम् ११ ।नाम्ना विल्ववनं १२ श्रेष्ठं द्वादशं कामनाप्रदम् इतिद्वादशसंज्ञानि वनानि शुभदानि च” द्वादशोपवना-न्याह नाराहे “आदौ ब्रह्मवनं नाम द्वितीयं त्वप्स०रोवनम् तृतीयं विह्वलं नाम कदम्बाख्यं चतु-र्थकम् नाम्ना स्वर्णवनं श्रेष्ठं पञ्चमं परिकीर्त्ति-तम् सुरभीवननामा पि षष्ठमाह्लादवर्द्धनम् श्रेष्ठंप्रेमवनं नाम सप्तमं शुभदं नृणाम् मयूरवननामा पि चाष्टमं परिकीर्त्तितम् मानेङ्गितवनं ९श्रेष्ठं नवमं मानबर्द्धनम् शेषशायिवनं १० श्रेष्ठं दशमंपापनाशनम् एकादशं समाख्यातं नारदाख्यं ११शुभोदितम् द्वादशं परमानन्दवनं १२ सर्वार्थदायकम् ।इति द्वादशसंज्ञानि वनान्युपवनानि च” द्वादशप्रतिव-नानि भविष्ये “आदौ रङ्गवनं श्रेष्ठं पुरसंज्ञाविरा-जितम् वार्त्तावनं द्वितीयञ्च करहाटं तृतीयकम् ।चतुर्थं काम्यनामापि वनं कामप्रदं नृणाम् वनमञ्जन-नामापि पञ्चमं स्त्रीशुभप्रदम् नाम्ना कर्णवनं श्रेष्ठंषष्ठं स्वप्नवरप्रदम् कृष्णाक्षिपलकं नाम वनं सप्तस-मीरितम् नन्दप्रेक्षणकृष्णाख्यं वनं नन्दन मष्टमम् ।वनमिन्द्रवनं नाम नवमं कृष्णपूजितम् शिक्षावनं १०शुभं प्रोक्तं दशमं नन्दभासितम् चन्द्राबलीवनं ११श्रेष्ठमेकादशमुदाहृतम् नाम्ना लोहवनं १२ श्रेष्ठंद्वादशं शुभदं नृणाम् इति प्रतिवनान्याहुर्मार्गेवामे दक्षिणे इति द्वादशसंज्ञास्ते देवावासफल-प्रष्टाः” द्वादशाधिवनान्याह विष्णुपु० “मथुरा प्रयमंनाम राधाकुण्डं द्वितीयकम् नन्दग्राम स्तृतीयश्चगूढस्थानं चतुर्थकम् पञ्चमं ललिताग्रामं वृषभानुपुर ञ्चषट् सप्तमं गोकुलं स्थान मष्टमं बलदेवकम् गोव-र्द्धनवनं श्रेष्ठं नवमं कामनाप्रदम् वनं जाववटं १०नाम दशमं परिकीर्त्तितम् मुख्यं वृन्दावनं ११ श्रेष्ठमे-कादशं प्रकीर्त्तितम सङ्केतवटकं १२ स्थानं वनं द्वादशंकीर्त्तितम् इति द्वादशसज्ञानि वनान्यधिवनानि ।वनानामधिपाः प्रोक्ता व्रजमण्डलमध्यगाः एषां नैवविलोकेन वनयात्रा निष्फला एषाञ्च दर्शनेनैववनयात्रा धुभप्रदा आदौ लोलां यदा पश्येद्वनयात्रांततश्चरेत् सर्वान् कामानवाप्नोति विष्णुलोकमवाप्नु-यात् सर्वत्र विजयी भूयाद्वनयात्राप्रभावतः”
धातुवृत्तिः
Sanskrit
व्रजँ व्रज (अर्थः) मार्गसंस्कार, गत्योः
( व्राजयति ) व्रजि मार्गसंस्कारयोर्गतौ चेति मैत्रेयादयः अत्र धनपालो मार्गे चेति पठति स्वामी तु व्रजस्यथाने वजिं पठित्वा मार्गेति द्वितीयं धातुमाह तन्त्रान्तरे तु वजिव्रजी द्वौ पठित्वा मार्गसंस्कारगती अर्थौ उक्तौ ( व्राजयति मार्गयति ) व्रजति व्रजतीति शपि वाजयतीति वातेर्णौ "वो विधूनने जुक्'' इति जुगागमे मृग अन्वेषणे कथादौ मार्ग अन्वेषणे इति युजादौ 82-83
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“व्रज गतौ”@} 2 व्राजकः-जिका, व्राजकः-जिका, विव्रजिषकः-षिका, वाव्रजकः-जिका
व्रजिता-ती, व्राजयिता-त्री, विव्रजिषिता-त्री, वाव्रजिता-त्री
इत्यादिकानि रूपाणि समस्तान्यपि भौवादिकध्रजतिवत् 3 ज्ञेयानि।
4 व्रजः, 5 व्रज्या, 6 व्राज्यम्, 7 परिव्राट्-प्ररिव्राड्-परिव्राजौ-परिव्राजः, इमानि रूपाण्यधिकान्यत्रेति विशेषः।
8।]] व्राजिः, 9 वज्रम्।
10
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१६६०)
02
=>
(१-भ्वादिः-२५३। सक। सेट्। पर।)
03
=>
(९२६)
04
=>
[[७। ‘गोचरसञ्चरवहव्रज--’ (३-३-११९) इत्यधिकरणे घप्रत्ययान्तो निपातितः। व्रजः = गोकुलम्।]]
05
=>
[[८। ‘व्रजयजोर्भावे क्यप्’ (३-३-९८) इति भावे स्त्रीलिङ्गे क्यप्प्रत्ययः। क्तिनोऽपवादः। परिव्रज्या सन्न्यासः।]]
06
=>
[[९। ण्यति, ‘अजिव्रज्योश्च’ (७-३-६०) इति कुत्वनिषेधः।]]
07
=>
[[१०। परावुपपदे औणादिके (द। उ। ९-८) क्विप्प्रत्यये, दीर्घे जकारस्य षकारे रूपमेवम्। परित्यज्य सर्वं व्रजति इति परिव्राट् = यतिः।]]
08
=>
[[११। औणादिके (द। उ। १-५३) ञिप्रत्यये, ञित्त्वादुपधावृद्धिः। तेन रूपमेवम्। व्राजिः = मनः [मुनिः]
09
=>
[[१२। व्रजति सर्वत्र प्रेरित इति औणादिके (द। उ। ८-४६) रन्प्रत्यये निरूढः। रेफलोपो निपातनात्। वज्रम् = पविः।]]
10
=>
[पृष्ठम्१२७५+ २७]
1 {@“व्रज मार्गसंस्कारगत्योः”@} 2 “वजि 3 मार्गसंस्कारयोर्गतौ चेति मैत्रेयादयः।
स्वामी तु व्रजस्थाने वजिं पठित्वा मार्गेति द्वितीयं धातुमाह” इति धातुवृत्तावुक्तम्।
‘-- मार्गणे’ इति धनपालः।
‘द्वौ धातू इत्यन्ये’ इति क्षीरस्वामी।
‘व्रज--’ इति चन्द्रः।
‘व्रज मार्गसंस्कारे’ इति दुर्गः।
उभयोरप्यनयोर्वज- व्रजपक्षयोर्मार्गणं संस्कार इत्येवार्थस्तन्त्रान्तरे पठ्यते” इति पुरुषकारे प्रोक्तम् 4।
व्राजकः-जिका, विव्राजयिषकः-षिका
व्राजयिता-त्री, विव्राजयिषिता-त्री
व्राजयन्-न्ती, विव्राजयिषन्-न्ती
इत्यादिकानि रूपाणि सर्वाण्यपि चौरादिक- क्लपयतिवत् 5 ज्ञेयानि।
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१६६१)
02
=>
(१०-चुरादिः। सक। सेट्। उभ।)
03
=>
(व्रजि?)
04
=>
(दैवश्लो। ५७)
05
=>
(२८२)
Capeller
German
व्रज॑
m.
(n. ) Hürde, Stall
Herde, Schwarm,
Menge (nur
m.
).
Grassman
German
vrajá, m., einmal ({360, 7}) n. [von vṛj], Hürde, Stall (der Rinder, Pferde)
2〉 Viehstand, doch auch hier Stall möglich. Vgl. die Adj. gómat, aśvín, gávya, áśvia, urubjá, uṣṇá, dṛḍhá, saptáāsia, die Gen. gós, gávām, gónām, áśvasya, (bildlich divás), und die Zusammensetzungen áśmavraja u. s. w.
-ás 1〉 {264, 10}.
-ám 1〉 {10, 7}
{92, 4}
{130, 3}
{132, 4}
{229, 8}
{297, 15}
{312, 6}
{316, 8}
{387, 10}
{399, 6}
{486, 24}
{507, 8}
{626, 25}
{644, 6}
{652, 5}
{789, 4}
{806, 1}
{814, 8}
{820, 6}
{830, 2}
{851, 5}
{854, 7}
{866, 8}
{871, 11}
{888, 7}
{923, 10}
{925, 11}. 2〉 abhí psúras pruṣāyati nas ā́ pruṣāyati {852, 3}
kṛṇudhvam vas nṛpā́ṇas {927, 8}.
-ásya 1〉 duā́rā {347, 2} (neben támasas)
dúras {503, 11}. 2〉 sātā́ {451, 3} (gómatas)
{131, 3} (gáviasya).
1〉 2〉 {86, 3}
{388, 5}
{543, 1}
{548, 10}
{661, 6}
{666, 9}
{679, 6}
{1020, 5}.
-ā́ [du.] 1〉 {418, 1} ‿iva (mitrā́váruṇā).
-ā́n 1〉 {327, 13}.
-ā́ [A. pl. n.] 1〉 {360, 7} (gónaam).
vrajá:
-ám 1〉 {156, 4}
-ā́n 4〉 {514, 3}.
Burnouf
French
व्रज व्रज
m.
chemin, route.
Troupe, troupeau
Vacherie, station de bergers.
Np. d'un district près d'Agra [la
bergerie de Kṛṣṇa]. -- N. action d'aller, d'errer çà et là.
व्रजभू
m.
nauclea cordifolia, bot.
व्रज्या
f.
marche, mouvement en avant
attaque, assaut
action de rôder [par ex. pour mendier]
Troupe
théâtre.
Stchoupak
French
व्रज-
m.
enclos à bestiaux, pâturage
troupeau, troupe, foule.
°नाथ-
m.
Kṛṣṇa.
°सुन्दरी- °स्त्री-
f.
bergère
व्रजाङ्गना- id.
व्रजावास-
m.
campement de bouviers, de bergers.
व्रजौकस्-
m.
bouvier, pâtre.
व्रजस्-पति-
m.
= °नाथ-।