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व्याख्यानेद्राङ्क्षकः-क्षिका (vyAkhyAnedrAGkSakaH-kSikA)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“द्राक्षि घोरवासिते च”@} 2 ‘घोरनिवाशिते’ इति क्षीरस्वामी।
चकारात् काङ्क्षायाम् इति धा।
का।
व्याख्याने 3 द्राङ्क्षकः-क्षिका, द्राङ्क्षकः-क्षिका, दिद्रांक्षिषकः-षिका, दाद्रांक्षकः-क्षिका
इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि भौवादिककाङ्क्षतिवत् 4 ज्ञेयानि।
क्तिनि 5 द्राक्षा 6 इति विशेषः।
प्रासङ्गिक्यः
01
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(८७८)
02
=>
(१-भ्वादिः-६७०। अक। सेट्। पर।)
03
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(१-८५)
04
=>
(१८३)
05
=>
[[५। यवादौ (८-२-९) द्राक्षा इति निपातनान्नलोपः।]]
06
=>
[[C। ‘द्राक्षां जनो वाञ्छति नो फलानि ध्राङ्क्षद्बहुध्वाङ्क्षविचूषितानि।।’ धा। का। १। ८५।]]