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वेलकः-लिका (velakaH-likA)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“विल संवरणे”@} 2 ‘-- वरणे’ इति शाकटायनहेमचन्द्रौ।
‘--स्मृतौ’ इति वोपदेवः।
‘दन्त्योष्ठ्यादिरयम्।
‘--भेदने’ इति द।
उ।
वृत्त्याम् 3।
‘वेलेत्तु चलने वेलेर्वरणे विलतीति शे।।’ 4 इति देवः।
5 वेलकः-लिका, वेलकः-लिका, विवेलिषकः-विविलिषकः-षिका, वेविलकः-लिका
वेलिता-त्री, वेलयिता-त्री, विवेलिषिता-विविलिषिता-त्री, वेविलिता-त्री
इत्यादिकानि रूपाणि सर्वाण्यपि तौदादिककिलतिवत् 6 ज्ञेयानि।
7 विलालः।
आविलम् 8।
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१६०८)
02
=>
(६-तुदादिः-१३५८। सक। सेट्। पर।)
03
=>
(८-११५)
04
=>
(श्लो। १५७)
05
=>
[पृष्ठम्१२३९+ २६]
06
=>
(१९३)
07
=>
[[१। ‘तमिविडिविलि--’ (द। उ। ८। ११५) इति कालच्प्रत्यये रूपम्। विलालः = भिदुरः।]]
08
=>
[आवेलम्]
1 {@“विल क्षेपे”@} 2 ‘वेलेत्तु चलने वेलेः वरणे विलतीति शे।।’ 3 इति देवः।
क्षीरस्वामी ‘किल--’ इति पठति।
मैत्रेयस्तु ‘पिल’ इति पठति।
क्षीरस्वामिमैत्रेयजैनकातन्त्रशाकटायनवोपदेवादयो धातुममुं नाभ्युप- गच्छन्ति।
वेलकः-लिका, विवेलयिषकः-षिका, वेलयिता-त्री, विवेलयिषिता-त्री
इत्यादिकानि रूपाणि सर्वाण्यपि चौरादिककीटयतिवत् 4 ज्ञेयानि।
ल्युटि- 5 प्रवेलनम्।
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१६०९)
02
=>
(१०-चुरादिः-१६०५। सक। सेट्। उभ।)
03
=>
(श्लो। १५७)
04
=>
(१९४)
05
=>
[[आ। ‘काल्यप्रवेलनकरोऽयमवेलयद्…।’ धा। का। ३-२२]]
1 {@“वेल कालोपदेशे”@} 2 अदन्तः।
‘काल इत्यपि धातुः इति मैत्रेयः’ इति मा।
धा।
वृत्तिः।
धा।
का।
व्याख्यायामपि 3 एवमेव।
‘--कालोपयोगे’ इति केचित्।
‘कालोपदेशे--काले सन्दर्भे च’ इति काशकृत्स्नः।
वेलकः-लिका, विवेलयिषकः-षिका
वेलयिता-त्री, विवेलयिषिता-त्री
इत्यादिकानि रूपाणि सर्वाण्यपि चौरादिककेतयतिवत् 4 ज्ञेयानि।
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१६४४)
02
=>
(१०-चुरादिः-१८८१। सक। सेट्। उभ।)
03
=>
(३-५६)
04
=>
(२६०)
1 {@“वेलृ चलने”@} 2 ‘वेलेत्तु चलने वेलेर्वरणे विलतीति शे।।’ 3 इति देवः।
‘-- गतौ’ इति काशकृत्स्नकातन्त्रौ पठतः।
‘वेलॢ--’ इति पठित्वा वेल्लेर्द्विर्बद्धो लकारः--वेल्लति’ इति क्षीरस्वामी।
वेलकः-लिका, वेलकः-लिका, विवेलिषकः-षिका, वेवेलकः-लिका
वेलिता-त्री, वेलयिता-त्री, विवेलिषिता-त्री, वेवेलिता-त्री
इत्यादिकानि रूपाणि सर्वाण्यपि भौवादिककेलतिवत् 4 ज्ञेयानि।
5 वेला, 6 वेलनः, ‘वेलुः = हस्ताभरणम्’ इति काशकृत्स्नः।
7
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१६४५)
02
=>
(१-भ्वादिः-५३५। सक। सेट्। पर।)
03
=>
(श्लो। १५७)
04
=>
(२६२)
05
=>
[[४। ‘गुरोश्च हलः’ (३-३-१०३) इत्यकारप्रत्यये रूपमेवम्। “वेला तु ‘वेल कालोप- देशे’ (१०-१६५) इत्यस्मात्” इति क्षीरतरङ्गिण्यां दृश्यते। तदेव न्याय्यम्।]]
06
=>
[[५। ‘चलनशब्दार्थात्--’ (३-२-१४८) इति ताच्छीलिके युच्प्रत्यये अनादेशे रूपमेवम्।]]
07
=>
[पृष्ठम्१२६६+ २५]