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विषवृक्षन्यायः (viSavRkSanyAyaH)

 
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Hindi
विषवृक्षन्यायः
पुं*
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"विषवृक्ष का नीतिवाक्य। यह उस स्थिति को प्रकट करने के लिए प्रयुक्त किया जाता जो यद्यपि उत्पातमय या आघातपूर्ण है तो भी उस व्यक्ति के द्वारा जिसने उसे बनाया है, नष्ट किये जाने के योग्य नहीं। जैसे कि एक वृक्ष चाहे वह विष का ही क्यों हो वह भी लगाने वाले के द्वारा काटा नहीं जाता।"
लौकिकन्यायः
English
Ex. विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं च्छेत्तुमसाम्प्रतम्। --कुमारसंभव II.55
हा हा मयेदं नो चारुकृतं यत्सुतभर्त्सनम्। विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं च्छेत्तुमसाम्प्रतम्॥ If some work, though despicable, is accomplished with one's own endeavour, it is not proper to set it aside. It is not proper, declares the maxim, to uproot a tree, nurtured by oneself, even though it is poisonous.