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विवेलयिषकः-षिका (vivelayiSakaH-SikA)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“विल क्षेपे”@} 2 ‘वेलेत्तु चलने वेलेः वरणे विलतीति शे।।’ 3 इति देवः।
क्षीरस्वामी ‘किल--’ इति पठति।
मैत्रेयस्तु ‘पिल’ इति पठति।
क्षीरस्वामिमैत्रेयजैनकातन्त्रशाकटायनवोपदेवादयो धातुममुं नाभ्युप- गच्छन्ति।
वेलकः-लिका, विवेलयिषकः-षिका, वेलयिता-त्री, विवेलयिषिता-त्री
इत्यादिकानि रूपाणि सर्वाण्यपि चौरादिककीटयतिवत् 4 ज्ञेयानि।
ल्युटि- 5 प्रवेलनम्।
प्रासङ्गिक्यः
01
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(१६०९)
02
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(१०-चुरादिः-१६०५। सक। सेट्। उभ।)
03
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(श्लो। १५७)
04
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(१९४)
05
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[[आ। ‘काल्यप्रवेलनकरोऽयमवेलयद्…।’ धा। का। ३-२२]]
1 {@“वेल कालोपदेशे”@} 2 अदन्तः।
‘काल इत्यपि धातुः इति मैत्रेयः’ इति मा।
धा।
वृत्तिः।
धा।
का।
व्याख्यायामपि 3 एवमेव।
‘--कालोपयोगे’ इति केचित्।
‘कालोपदेशे--काले सन्दर्भे च’ इति काशकृत्स्नः।
वेलकः-लिका, विवेलयिषकः-षिका
वेलयिता-त्री, विवेलयिषिता-त्री
इत्यादिकानि रूपाणि सर्वाण्यपि चौरादिककेतयतिवत् 4 ज्ञेयानि।
प्रासङ्गिक्यः
01
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(१६४४)
02
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(१०-चुरादिः-१८८१। सक। सेट्। उभ।)
03
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(३-५६)
04
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(२६०)