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विवर्धिषिता-त्री (vivardhiSitA-trI)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“वृधु भाषार्थः”@} 2 आस्वदीयः।
‘छेदने पूरणे चार्थे वर्धेर्वर्धयतीति णौ।।
3 इति देवः।
वर्धकः-र्धिका, विवर्धयिषकः-षिका, वर्धकः-र्धिका, विवर्धिषकः-षिका, वरीवृधकः- धिका
वर्धयिता-त्री, विवर्धयिषिता-त्री, वर्धिता-त्री, विवर्धिषिता-त्री, वरीवृधिता-त्री
इत्यादिकानि रूपाणि सर्वाणि चौरादिकजासयतिवत् 4 ज्ञेयानि।
णिजभावपक्षे यङन्ते सर्वत्र अभ्यासस्य रीगागमो भवतीति विशेषः।
प्रासङ्गिक्यः
01
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(१६३३)
02
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(१०-चुरादिः-१७८३। अक। सेट्। उभ।)
03
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(श्लो। १२३)
04
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(५९६)