| YouTube Channel

वह (vaha)

 
शब्दसागरः
English
वह
m.
(-हः)
1. Bearing, conveying.
2. Any vehicle or means of con-
veyance, as a horse, a car, &c.
3. The shoulder of an ox.
4. Air,
wind.
5. A road, a way.
6. Any male river.
7. A measure of four
Droṇas.
f.
(-हा) A river in general.
E.
वह् to bear,
aff.
Capeller Eng
English
व॑ह
a.
=
prec.
, also
intr.
flowing towards or through
(—°).
m.
n.
the shoulder of the yoked animal or the part of the yoke
lying on it.
Yates
English
वह (हः) 1.
m.
Any vehicle
the
shoulder of an ox
wind
road
bearing.
f.
A river.
Spoken Sanskrit
English
वह - vaha -
adj.
- flowing through or into or towards
वह - vaha -
adj.
- bearing along
वह - vaha -
adj.
- causing
वह - vaha -
adj.
- bearing on
वह - vaha -
adj.
- conveying
वह - vaha -
adj.
- effecting
वह - vaha -
adj.
- producing
वह - vaha -
adj.
- bringing
वह - vaha -
adj.
- exposing one's self to
वह - vaha -
adj.
- bearing
वह - vaha -
adj.
- carrying
वह - vaha -
m.
- wind
वह - vaha -
m.
- shoulder of an ox or any draught animal
वह - vaha -
m.
- horse
वह - vaha -
m.
- shoulder-piece of a yoke
वह - vaha -
m.
- male river
वह - vaha -
m.
- breathing of a cow
वह - vaha -
m.
- way
वह - vaha -
m.
- act of bearing or conveying
वह - vaha -
m.
- weight or measure of four droNas
वह - vaha -
m.
- road
वह vaha
m.
shoulder-piece of a yoke
वह vaha
m.
shoulder-piece of a yoke
विवध vivadha
m.
shoulder-yoke fcarrying burdens
योगभारक yogabhAraka
m.
shoulder-yoke for carrying burdens
विवधिक vivadhika
adj.
one who carries a burden on a shoulder-yoke
वीवधिक vIvadhika
adj.
one who carries a burden on a shoulder-yoke
पर्याहार paryAhAra
m.
yoke worn across the shoulders in carrying a load
Wilson
English
वह r. 1st cl. (वहति) To bear, to carry, to convey or transport.
(वहते) To flow as a stream. (इ) वहि r. 10th cl. (वंहयति)
To shine. r. 1st cl. (वंहते) To grow or increase
this last root is more
properly बहि q. v.
वह
m.
(-हः)
1 Bearing, conveying.
2 Any vehicle or means of conveyance, as a horse, a car, &c.
3 The shoulder of an ox.
4 Air, wind.
5 A road, a way.
6 Any male river.
7 A measure of four Droṇas.
f.
(-हा) A river in general.
E.
वह to bear,
aff.
घ.
Apte
English
वहः [vahḥ], [वह्-कर्तरि अच्]
Bearing, carrying, supporting
&c.
The shoulder of an ox.
A vehicle or conveyance in general.
Particularly, a horse
दर्शनस्पर्शनवहो घ्राणश्रवणवाहनः
Mb.
* 12.236.1.
Air, wind.
A way, road.
A male river (नद).
A measure of four Droṇas.
A current, stream.
The breathing of a cow. -हा a river, stream.
Apte 1890
English
वहः [वह्-कर्तरि अच्] 1 Bearing, carrying, supporting &c.
2 The shoulder of an ox.
3 A vehicle or conveyance in general.
4 Particularly, a horse.
5 Air, wind.
6 A way, road.
7 A male river (नद).
8 A measure of four Droṇas.
9 A current, stream.
Monier Williams Cologne
English
व॑ह mf(आ)n. (ifc. ) carrying, bearing, conveying, bringing, causing, producing, effecting (cf. गन्ध-, दारु-, पुण्य-व्°
&c.
)
flowing through or into or towards (cf. पर-लोक-व्°, सर्व-लोक-व्°
&c.
)
bearing along (said of rivers),
Hcat.
bearing (a name),
Kull.
on
Mn.
iv, 203 (in a quotation)
exposing one's self to (heat
&c.
),
MBh.
व॑ह
m.
the act of bearing or conveying (cf. दुर्-, सुख-व्°)
the shoulder of an ox or any draught animal,
AV.
VS.
Br.
MBh.
the shoulder-piece of a yoke,
AV.
ŚBr.
a horse,
L.
a male river,
L.
a road, way,
L.
wind,
L.
the breathing of a cow,
L.
a weight or measure of four Droṇas,
L.
Monier Williams 1872
English
वह, अस्, आ, अम्, bearing, carrying, conveying,
bringing (often at the end of comps., e. g. पुष्प-
गन्ध-व्°, ‘bringing flowers and perfumes, and
sometimes with a passive sense, cf. दुर्-व्°, सु-व्°)
one who bears or carries
(अस्), m. the act of bearing
or conveying
any vehicle or means of conveyance
(as a car, carriage, horse, &c.)
the shoulder of an
ox
a road, way
a measure of four Droṇas
air,
wind
any male river
a current
(आ), f. a river,
stream in general.
—वहं-लिह, अस्, m. ‘shoulder-
licking (?), ‘an ox.
Macdonell
English
वह váh-a,
a.
(—°) drawing, conveying
flowing, 🞄— through, into, or towards
bearing 🞄along (of rivers)
bringing
producing, effecting
🞄bearing (a name)
having, provided 🞄with
exposing oneself to (heat etc.)
m.
🞄shoulder of a draught animal
shoulder-piece 🞄of the yoke.
Benfey
English
वह वह,
I.
m.
1. Bearing, convey-
ing.
2. Any vehicle, as a horse, a car.
3. The shoulder of an ox.
4. A road,
a way.
5. Any male river, a current
(? Sāv. 4, 31, at the end of a comp.
adj.
rather, carrying purity, i. e. clear).
6.
Air, wind.
7. A measure of four
द्रोणस्।
II.
f.
हा, A river in general.
III. Latter part of comp. words
e. g.
पुष्प-गन्ध-,
adj.
Bringing flowers
and perfumes, Indr. 2, 9.
सर्व-गन्ध-,
adj.
Conveying all scents, Man. 1, 76.
दुर्वह, i. e.
दुस्-,
adj.
,
f.
हा, Difficult
to be borne, Utt. Rāmac. 41, 4
or
carried, MBh. 12, 3047.
वार्त्ता-,
m.
A
chandler, a vendor of grain, oil, etc.
श्लाघा-,
adj.
,
f.
हा, Earning praise,
Böhtl. Ind. Spr. 1155.
सु-,
I.
adj.
1.
Bearing well.
2. Patient.
3. Easy to
be borne.
II.
f.
हा।
1. The Indian
lute.
2. The name of several plants.
हुत- (vb. हु),
m.
Agni or fire, Megh,
44
Ṛt. 1, 27. -- Cf. ὄχος
Lat. via
Goth. vigs
O.H.G. wagan, see वह्।
Apte Hindi
Hindi
वहः
पुं*
- वह् + कर्तरि अच्
"वहन करने वाला, ले जाने वाला, सहारा देने वाला"
वहः
पुं*
- वह् + कर्तरि अच्
बैल के कंधे
वहः
पुं*
- वह् + कर्तरि अच्
सवारी यान
वहः
पुं*
- वह् + कर्तरि अच्
विशेष करके घोड़ा
वहः
पुं*
- वह् + कर्तरि अच्
"हवा, वायु"
वहः
पुं*
- वह् + कर्तरि अच्
मार्ग सड़क
वहः
पुं*
- वह् + कर्तरि अच्
"नद, नाला"
वहः
पुं*
- वह् + कर्तरि अच्
चार द्रोण की माप
L R Vaidya
English
vaha {% m. %} 1. Bearing, conveying
2. the shoulder of an ox
3. a horse
4. air, wind
5. a road, a way
6. a measure of four Droṇas.
Bopp
Latin
वह (r. वह् s. अ)
1) Adj. ferens, afferens. IN. 2. 9.
2) Subst.
m. fluctus. SA. 4. 31. in comp. BAH.
Indian Epigraphical Glossary
English
vaha, cf. a-vaha (IE 8-5)
[free] carrying of loads [which
the villagers had to provide for the touring officers of the
king or land-lord]
may also be a horse for the use of the officers.
(EI 31
IA 18
CII 4), a streamlet
a water-channel.
(Ep. Ind., Vol. XIV, p. 177), a common highway.
धातुपाठः (Krishnacharya)
Sanskrit
धातुः:
वह्
मूलधातुः:
वह
धात्वर्थः:
प्रापणे
गणः:
भ्वादिः
कर्मकत्वं:
द्विकर्मकः
इट्त्वं:
अनिट्
उपग्रहः:
उभयपदी
रूपम्:
वहति-ते
धातुप्रदीपः
Sanskrit
वहँ वह प्रापणे
- वहति वहते पुरुषवाहं वहति भारं वहति प्रवहति उह्यते उवाह ऊहे ऊहतुः ऊहाते उवहिथ उवोढ वोढा ।अवाक्षीत् अवोढ वहः प्रवाहः वह प्रापण इति सकर्मकोऽयम् अर्थान्तरे वृत्ते स्यन्दनेऽर्थे वर्त्तमानोऽकर्मकः नदी वहतीति इह तु जीवति प्रणान् धारयतीति पटमिच्छति पटीयतीति धात्वर्थेन कर्मण उपसंग्रहेऽकर्मकत्वम् इहास्ते शेत इति प्रसिद्धितः इह सङ्गच्छते संपश्यते अहत इति कर्माविवक्षायाम् तदुक्तम् - ''धातोरर्थान्तरे वृत्ते धात्वर्थेनोपसंग्रहात् ।प्रसिद्धेरविवक्षातः कर्मणोऽकर्मिका क्रिया'' ।। 1 ।। इति ।। 1012 ।।
अभिधानचिन्तामणिः
Sanskrit
--source--
जम्बालेचकिलौ पङ्कः कर्दमश्च निषद्वरः
शादो हिरण्यबाहुस्तु शोणो नदे पुनर्वहः १०९०
भिद्य उध्यः सरस्वांश्च द्रहोऽगाधजलो ह्रदः
-wordlist-
जम्बाल (पुंक्ली), इचकिल (पुं), पङ्क (पुंक्ली), कर्दम (पुं), निषद्वर (पुं), शाद (पुं), हिरण्यबाहु (पुं), शोण (पुं), नद (पुं), वह (पुं), भिद्य (पुं), उद्ध्य (पुं), सरस्वत् (पुं), द्रह (पुं), अगाधजल (पुं), ह्रद (पुं)
--source--
वहः स्कन्धोंऽसकूटं तु ककुदं नैचिकं शिरः
-wordlist-
वह (पुं), स्कन्ध (पुं), अंसकूट (क्ली), ककुद (पुंक्ली), नैचिक (क्ली)
अभिधानचिन्तामणिपरिशिष्टम्
Sanskrit
--source--
वायौ सुरालयः प्राणः संभृतो जलभूषणः
शुचिर्वहालो नघटः पश्चिमोत्तरदिक्पतिः १६९
अङ्कतिः क्षिपणुर्मर्को ध्वजप्रहरणश्चलः
शीतलो जलकान्तारो मेघारिः सृमरोऽपि १७०
-wordlist-
सुरालय (पुं), प्राण (पुं), सम्भृत (पुं), जलभूषण (पुं), शुचि (पुं), वह (पुं), लोलघट (पुं), पश्चिमोत्तरदिक्पति (पुं), अङ्कति (पुं), क्षिपणु (पुं), मर्क (पुं), ध्वजप्रहरण (पुं), चल (पुं), शीतल (पुं), जलकान्तार (पुं), मेघारि (पुं), सृमर (पुं)
अभिधानरत्नमाला
Sanskrit
नीचकी
नीचकी, वह
नीचकी शिरोदेशः स्कन्धदेशो वहः स्मृतः
verse 2.1.1.267
page 0032
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskrit
वह, त्विषि इति कविकल्पद्रुमः
(चुरा०-पर०-अक०-सेट् ।) क, वंहयति त्विषिदीप्तौ इति दुर्गादासः
वह, प्रापणे इति कविकल्पद्रुमः
(भ्वा०-उभ०-द्विक०-अनिट् ।) प्रापणमिहञ्यन्तस्य रूपम् ऐ, उह्यात् ञ, वहतिवहते भारं ग्रामं जनः प्रापयतीत्यर्थः औ, अवाक्षीत् अर्थान्तरे अकर्म्मकोऽयम् यथा ।जम्बूः सरिद्वहति सीमनि कम्बुकण्ठीतिनैषधे मन्दं मरुद्बहति गर्ज्जति वारिवाहः ।इति महानाटके ववाह रक्तं पुरुषास्ततोजाताः सहस्रशः इत्यादि सिद्ध्यर्थमोष्ठ्या-दिञ्च वहधातुं मन्येते वर्णदेशशरणदेवौ ।वस्तुतस्तु बह्वाद्यसम्मतत्वादेवोष्ठ्यादिरनेनोपे-क्षितः ववाह इति चण्डीप्रयोगस्य तु वाहङ यत्ने इत्यस्मात् गणकृतानित्यत्वात् परस्मैपद-सिद्धिः अनेकार्थत्वात् सुस्राव इत्यर्थः अथवावव इत्याह इत्येव व्याख्यानम् इति दुर्गा-दासः
वहः,
पुं,
(वहति युगमनेनेति वह + “गोचर-सञ्चरेति ।” ११९ इति घप्रत्ययेनसाधु ।) वृषस्कन्धप्रदेशः इत्यमरः
(यथा, महाभारते २१ ।“यस्य बाहू समौ दीर्धौ ज्याघातकठिनत्वचौ ।दक्षिणे चैव सव्ये गवामिव वहः कृतः
”वहतीति वह् + अच् ।) घोटकः वायुः ।इति मेदिनी हे,
पन्थाः इति त्रिकाण्ड-शेषः
नदः इति हेमचन्द्रः
(वाहके, त्रि ।यथा, मनुः ७६ ।“आकाशात्तु विकुर्व्वाणात् सर्व्वगन्धवहःशुचिः ।बलवान् जायते वायुः वै स्पर्शगुणो मतः
”)
वाचस्पत्यम्
Sanskrit
ब(व)ह वृद्धौ
भ्वा०
आत्म० अक० सेट् इदित् बं(व)हतेअबं(वं)हिष्ट बवंहे महिसाहर्य्यादयमोश्छादिरितिपाणिनीयाः दन्तोष्ट्यादिरिति बोपदेवः
वह दीप्तौ
चु०
उभ०
सक०
सेट् इदित् वंहयति ते अवं-हिष्ट
वह प्रापणे
भ्वा०
उभ०
द्विक० यजा० अनिट् वहति तेअवाक्षीत् अवोढ उवाह ऊहे ऊढः अस्य प्रधानकर्म-ण्यंव लकारादयः
वह
पु०
उह्यतेऽनेन वह--अच् वृषस्कन्धदेशे अमरः ।वह--कर्त्तरि अच् घोटके वाहौ पथि त्रिका०५ नद्यां स्त्री हेमच०
क्षीरतरङ्गिणी
Sanskrit
वहँ वह प्रापणे
- वहते, वहति प्रणिवहते, प्रणिवहति (द्र0 8417) उवाह, ऊहुः, ऊहे सहिवहोरोदवर्णस्य (6 3112) वोढा अदिखादिनीवहीनाम् (1452 वा0) कर्म संज्ञा नास्ति वाहयति भारं चैत्रेण मैत्रः वह्यं करणम् (31102) कर्त्रोर्जीवपुरुषयोर्नशिवहोः (3243) णमुल्-पुरुषवाहं वहति प्रवाहः उह्यतेऽनेनेति वाहः स्कन्धोऽश्वश्च गोचरसंचर (33119) इति वहः साधुः वहो (द0 उ0 1196 कपाठः) इत्यूः- वधूः वहिश्रिश्रुयुद्रुग्लाहा (उ0 451) इति निः-वह्निः अशित्रादिभ्य इत्रोत्रौ (उ0 4173) वहित्रम् 974
धातुवृत्तिः
Sanskrit
वहँ वह (अर्थः) प्रापणे
( वहति उवाह ऊहतुः उवहिथ उवोढ ऊहिव ) क्रादिनियमादिट्, थलि भारद्वाजनियमादिडभावे धत्वढत्वष्टुत्वढलोपेषु "सहिवहोरोदवर्णस्य'' इत्योत्वे उवोढेति भवति एवमन्यत्रापि तवर्गादौ ढत्वादि यजिवत्सम्प्रसारणम् ( वोढा वक्ष्यति ) "षढोः कः सि'' इति कत्वे षत्वम् ( वहतु अवहत् वहेत् ) आशिषि कित्त्वात्सं प्रसारणे ( उह्यात् अवाक्षीत् अवोढाम् ) अत्र ढत्वादीनामसिद्धत्वात्पूर्वमेव हलन्तलक्षणायां वृद्धौ पश्चाड्ढत्वादीति अवोढामित्यत्राकारस्य "सहिवहोः'' इत्योत्वे पुनर्वृद्धिः प्रागेव कृतत्वान्न भवति (वहते वोढा वक्ष्यते ऊहे ऊहिषे वहताम् अवहत वहेत वक्षीष्ट अवोढ अवक्षाताम् अवक्षत अवोढाः अवोढम् अवक्षि प्रवहति ) "प्राद्वहः'' इति कर्त्रभिप्राये क्रियाफलेऽपि परस्मैपदम् केचित् "परेर्मृषः'' इत्यत्र वहिमनुवर्त्त्य परिपूर्वादपि नित्यं परस्मैपदमेवाहुः ( परिवहतीति प्रणिवहति ) "नेर्गद'' इत्यादिना णत्वम् इदमड्व्यवायेऽपि प्रण्यवहदित्यत्रापि भवति ( प्रवहाणि ) "आनि लोट्0" इति णत्वम् कर्मणि ( उह्यते औह्यत, ) अत्र यजिवल्लादेशे यकि संप्रसारणे आडागमः ( विवक्षते वावह्यते वावोढः वावहतीत्यादि ) वाहयति भारं देवदत्तेन ( अवीवहत् )अत्र प्रयोज्यस्य [नीवह्योः प्रतिषेध ] इति कर्म्मत्वनिषेधः गत्यादिसूत्रे तु फलतया प्रतीयमानगतयोऽपि गत्यर्थत्वेन गृह्यन्ते इत्ययं प्रतिषेधः अयं [ वहेर्नियन्तृकर्तृकस्य ]इति वचनान्नियन्तृकर्तृकस्य भवतीति वाहयति यवान्बलीवर्दानित्यत्र प्रयोज्यः कर्मैव नियन्ता सारथिः वहत्यनेनेति वह्यं शकटादि "वह्यं करणम्'' इति यति निपात्यते, अन्यत्र ण्यति वाह्यः (कूलमुद्वहः) "उदि कूले रुजिवहोः'' इत्युत्पूर्वाद्वहेः कूलशब्दउपपदे खः वहत्यनेनेति (वहः) "गोचर''इत्यादिना करणे घः (पुरुषवाहं वहति) पुरुषप्रेष्यो भूत्वा वहतीत्यर्थः "कर्त्रोर्जीवपुरुषयोर्नशिवहोः'' इति यथासंख्यात् कर्तृवाचिनि पुरुषउपपदे णमुल्, कषादित्वात्तस्यैवधातोरनुप्रयोगः ( ऊढः ऊढिः ) निष्ठाक्तिनोः संप्रसारणे ढत्वादि कल्पनाया अपोढः (कल्पनापोढः) "अपेतापोढमुक्तपतितापत्रस्तैरल्पशः'' इत्यनने पञ्चमीसमासः (प्रौढः, प्रौढिः ) [ प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु वृद्धिर्वक्तव्या ] इति वृद्धिः ( प्रवाहणः ) ण्यन्तानां नन्द्यादिपाठाल्ल्युः "कृत्यचः'' "णेर्विभाषा'' इति णत्वं "पूर्वपदात् संज्ञायाम्'' इति वा, प्रवाहणस्यापत्यम्, ( प्रावाहणेयः प्रवाहणेयः ) "शुभ्रादिभ्यश्च'' इति ढकि "प्रवाहणस्य ढे''इति पूर्वपदस्य वा वृद्धिः उत्तरपदस्य तु नित्या, स्वत एवोत्तरपदस्य वृद्धिमत्त्वेऽपि पुनर्वृद्धिविधानं पूर्वपदवृध्यभावपक्षेऽपि प्रवाहणेयीभार्य इत्यत्र ( सूत्रम्) वृद्धिनिमित्तस्य तद्धितस्यारक्तविकारे (इति सूत्रम्) इति पुंवद्भावनिषेधो यथा स्यादिति "स्त्रियाः पुंवत्'' इति पुंवत्त्वं रक्तविकारव्यतिरिक्तार्थवृद्धिनिमित्ततद्धितान्तस्य स्त्रीप्रत्ययान्तस्य नेति सूत्रार्थः ननु प्रवाहणेयीशब्दस्य गोत्राभिधायित्वाद् "गोत्रं चरणैः सह'' इति जातित्वात् "जातेश्च'' इति पुंवद्भावनिषेधस्य सिद्धत्वात्किं तदर्थेन, वृद्धिविधानेन, एवं तर्हि "जातेश्च'' इत्यस्यानित्यत्वमनेन ज्ञाप्यते, तेन हस्तिनीनां समूहो हास्तिकमित्यत्र लिङ्गविशिष्टपरिभाषया "अचित्तहस्तिधेनोष्ठक्'' इति ठकि "भस्याढे तद्धिते'' इति पुंवद्भावो भवति प्रवाहणेयस्यापत्वं प्रावाहणेयः "तत्प्रत्ययान्तस्य'' इति ढान्तस्य प्रवाहणेयशब्दस्य ञिति णिति किति वा तद्धिते परतः पूर्वपदस्य वा वृद्धिरुत्तरपदस्य तु नित्या, अत्र बाह्यतद्धितनिमित्ता नित्या वृद्धिः पक्षे बाध्यते (इक्षुवाहनम् ) उपरिनिपतितेक्षुकं वाहनमित्यर्थः इक्षुशब्द आहितेष्विक्षुषु वर्त्तते, ( सूत्रम्) वाहनमाहितात् (इति सूत्रम्) इति णत्वं, वाहने यदारोपितं तदाहितमित्युच्यते, तादृक्पूर्वपदस्थान्निमित्तात् परस्य वाहनशब्दस्थनकारस्य णकारइति सूत्रार्थः आहितादन्यत्र दाक्षिवाहनम् (वह्निः) "वहिश्रिश्रुयुद्रुग्लाहात्वरिभ्यो निद्'' इति निप्रत्ययः नित्वादाद्युदात्तः ( वधूः ) "वहेर्धश्च'' इति ऊकारप्रत्ययो धश्चान्तादेशः वध्वा भावकर्मणी वाधवम् युवादित्वादण् ( अनड्वान् ) अनसि वहो क्विप्, "डश्चानसि''इति उणादिसूत्रेण अनस्युपपदे वहेः क्विप् अनसोऽन्त्यस्य डकारश्च संप्रसारणपूर्वत्वे सौ "सावनडुह'' इति नुम्, अयं आदित्याधिकारेणावर्णान्ताद् विधानात् "चतुरनडुहोः'' इत्यामं बाधते, अन्यथा सर्वनामस्थानान्तरे सावकाशमात्वं सौ विशेषविहिते नुम् बाधेत्, हकारस्य संयोगान्तलोपः, "वसुस्रंसु''इत्यादिना दत्वे पूर्वत्रासिद्धत्वात् भवति हे अनड्वन्नित्यत्र आमम्बाधित्वा "अम् सम्बुद्धौ'' इति अमागमः अनेनापि नुमो बाधः अदित्याधिकारादेव, अनडुद्भ्यामित्यादौ पदत्वे "वसुस्रंसु'' इत्यादिना दत्वम् ( अनुड्वही अनड्वाही ) गौरादिपाठात् डीष्यपि पक्षे आमागमः प्रियोऽनड्वान् यस्य प्रियानडुत्कः उरः प्रभृतिषु अनड्वानिति पाठात् कप् अस्मिन् स्वादौ पदत्वात् दत्वम् चर्त्वम् अत्रैकवचनान्तस्य तस्य पाठात् वचनान्तरेण विग्रहे "शेषाद् विभाषा'' इति कपो विकल्पनात् प्रियानड्वानित्यपि भवति अङ्गाधिकारे तस्य तदन्तस्येत्युक्तत्वादत्रापि नुमादि भवति धेनुश्च अनड्वांश्च धेन्वनडुहम् "अचतु'' इत्यादिना द्वन्द्वेऽजन्तो निपातितः पचादयोऽनुदात्ताः स्वरितेतः 984
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“वह प्रापणे”@} 2 यजादिः।
‘प्रापणे = धारणे’ इति काशकृत्स्नः।
वाहकः-हिका, वाहकः-हिका, 3 विवक्षकः-क्षिका, वावहकः-हिका
4 वोढा-ढ्री, 5, वाहयिता-त्री, विवक्षिता-त्री, वावहिता-त्री
परिवहन्-उद्वहन् 6 -न्ती, प्रणिवहन्, प्रवहन्-न्ती, 7 व्यतिवहन्-न्ती, 8 वाहयन् भारं देवदत्तेन, वाहयन् यवान् बलीवर्दान्, विवक्षन्-न्ती
-- वक्ष्यन्-न्ती-ती, वाहयिष्यन्-न्ती-ती, विवक्षिष्यन्-न्ती-ती
-- वहमानः 9, वाहयमानः, विवक्षमाणः, वावह्यमानः
वक्ष्यमाणः, वाहयिष्यमाणः, विवक्षिष्यमाणः, वावहिष्यमाणः
10 11 विश्वोट्, 12 अनड्वान्-अनड्वाहौ-अनड्वाहः
-- -- 13 ऊढम्- 14 कल्पनापोढः- 15 प्रौढः-ऊढवान्, वाहितः, विवक्षितः, वावहितः-तवान्
16 वहः-वहनः-वाहः, 17 कूलमुद्वहः 18, वहः, 19 भारवाही, 20 प्रवाहणः
21 ऋषीवहः, कपीवहः, मुनीवहः, 22 वावहिः, वाहः, विवक्षुः, वावहः
प्रणिवोढव्यम्, वाहयितव्यम्, विवक्षितव्यम्, वावहितव्यम्
23 प्रणिवहनीयम्, वाहनीयम्, विवक्षणीयम्, वावहनीयम्
24 25 वह्यम् 26 27, वाह्यम्, वाह्यम्, विवक्ष्यम्, वावह्यम्
उह्यमानः, वाह्यमानः, विवक्ष्यमाणः, वावह्यमानः
ईषद्वहः-दुर्वहः-सुवहः
-- -- -- 28 वहः, वाहः, परिवाहः-परीवाहः, वाहः, विवक्षः, वावहः
प्रणिवोढुम् 29, वाहयितुम्, विवक्षितुम्, वावहितुम्
30 प्रौढिः, वहा, वाहना, विवक्षा, वावहा
वहनम्, 31 इक्षुवाहणम्, वाहनम्, दाक्षिवाहनम्-इन्द्रवाहनम्, भारवाहणम् 32, विवक्षणम्, वावहनम्
ऊढ्वा, वाहयित्वा, विवक्षित्वा, वावहित्वा
प्रवह्य, प्रवाह्य, प्रविवक्ष्य, प्रवावह्य
33 पुरुषवाहं 34, वाहम् ऊढ्वा वाहम् २, वाहयित्वा २, विवक्षम् २, विवक्षित्वा २, वावहम्
वावहित्वा
35 वह्निः, 36 वधूः।
37
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१५८२)
02
=>
(१-भ्वादिः-१००४। द्विकर्म। अनि। उभ।)
03
=>
[[१। धातोरनिट्त्वात् सन्नन्ते, ‘हो ढः’ (८-२-३१) इति धातुहकारस्य ढत्वे, ‘षढोः कः सि’ (८-२-४१) इति ककारे ‘आदेशप्रत्यययोः’ (८-३-५९) इति षत्वे रूपं बोध्यम्।]]
04
=>
[[२। तृचि, ‘सहिवहोरोद् अवर्णस्य’ (६-३-११२) इत्युपधाकारस्य ओकारे ढत्व- ष्टुत्वढलोपदीर्घेषु रूपमेवम्। एवं तव्यदादिष्वपि ज्ञेयम्। ‘आकाशो वै नामरूपयो- र्निर्वहिता--’ (छान्दोग्ये ८-१४-१) इत्यत्र तु छान्दसत्वात् ओकार उपधायाः। प्रत्ययस्येडागमोऽपि छान्दसत्वादेव। स्पष्टमिदमुपनिषद्भाष्येषु।]]
05
=>
[निर्वहिता]
06
=>
[[आ। ‘लाङ्गूलमुद्धतं धुन्वन् उद्वहन् परिघं गुरुम्।’ भ। का। ९। ७।]]
07
=>
[[३। “‘वि’ ‘अति’ इत्युपसर्गद्वयपूर्वकात् वहधातोः ‘कर्तरि कर्मव्यतिहारे’ (१-३-१४) इत्यात्मनेपदे प्राप्ते ‘न गतिहिंसार्थेभ्यः’ (१-३-१५) इति निषेधे व्यतिवहन् इति रूपं सिद्ध्यति। आचार्यचरणैः ‘वहेर्न निषेध इति केचित्’ इत्युक्तत्वात् तन्मते व्यतिवहते इत्युदाहृतम्” इति प्रक्रियाकौमुदी।]]
08
=>
[[४। ‘नीषह्योः प्रतिषेधः’ (वा। १-४-५२) इति अण्यन्तावस्थायां कर्तुः ण्यन्ते कर्मत्वस्य प्रतिषेधात् रूपमेवम्। ‘वहेः अनियन्तृक्र्तृकस्य’ (वा। १-४-५२) इति कर्मत्वस्य प्रतिप्रसवसद्भावात्, अत्र नियन्तृ = (सारथि) कर्तृकत्वात् कर्मत्वं भवत्येव।]]
09
=>
[[B। ‘सहैव चरमाणौ द्वौ वहमानौ मितं धनुः’। अत्र वयोवचने चानश् इति प्रक्रियासर्वस्वे।]]
10
=>
[पृष्ठम्१२१९+ २८]
11
=>
[[१। विश्वं वहतीत्यर्थे क्विपि सम्प्रसारणपूर्वरूपगुणढत्वादिकेषु रूपमेवम्।]]
12
=>
[[२। अनः वहतीत्यर्थे ‘अनसि हेः’ इति क्विपि, ‘डश्चानसः’ (द्रष्टव्या द। उ। ९-१०७) इति अनश्शब्दान्त्यवर्णस्य उकारे रूपमेवम्। ‘सावनडुहः’ (७-१-८२) इति नुम्।]]
13
=>
[[३। क्तप्रत्यये सम्प्रसारणढत्वष्टुत्वढलोपदीर्घादिषु रूपमेवम्। एवं क्त्वाक्तिन्प्रभृतिष्वपि।]]
14
=>
[[४। कल्पनायाः अपोढः इति वृत्तौ ‘अपेतापोढ--’ (२-१-३८) इति क्तान्तेन पञ्चमीसमासः।]]
15
=>
[[५। ‘प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु’ (वा। ६-१-८९) इति वृद्धिः। एवं प्रौढिः इति क्तिन्नन्तेऽपि ज्ञेयम्।]]
16
=>
[[६। वह इत्यत्र पचाद्यच्। वहनः इति तु सारथ्यादिवाचकं पदं ‘कृत्यल्युटो बहुलम्’ (३-३-११३) इति बहुलग्रहणात् कर्तरि ल्युटि बोध्यम्।]]
17
=>
[[७। कूलं उद्वहतीति वृत्तौ उत्पूर्वात् वहेः ‘उदि कूले रुजिवहोः’ (३-२-३१) इति खश्। खित्त्वात् नुम्। शित्त्वात् शपि तस्य ‘अतो गुणे’(६-१-९७) इति पररूपम्।]]
18
=>
[[आ। ‘उत्तीर्णौ वा कथं भीमाः सरितः कूलमुद्वहाः।’ भ। का। ६-९६।]]
19
=>
[[८। भारं वहतीति भारवाही। णिनिप्रत्ययान्तमिदम्।]]
20
=>
[[९। प्रपूर्वकात् ण्यन्तात् वाहयतेः नन्द्यादित्वात् कर्तरि ल्युः। ‘कृत्यचः’ (८-४-२९) इति णत्वम्, इति केचित्। वस्तुतस्तु ‘णेर्विभाषा’ (८-४-३०) इति प्राप्तं पाक्षिकं णत्वं बाधित्वाऽत्र संज्ञात्वात् ‘पूर्वपदात् संज्ञायां--’ (८-४-३) इति नित्यं णत्वमिति बोध्यम्।]]
21
=>
[[१०। ‘इको वहेऽपीलोः’ (६-३-१२१) इति इगन्तस्य पूर्वपदस्य पीलुवर्जितस्य वहे उत्तरपदे दीर्घो भवति।]]
22
=>
[[११। ‘सासहिवावहि’ -- (वा। ३-२-१७१) इति निपातनात् यङन्तात् कर्तरि किः किन् वा प्रत्ययः। द्वित्वादिकं बोध्यम्।]]
23
=>
[[१२। ‘नेर्गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्सातिवपतिवहति--’ (८-४-१७) इत्यादिना उपसर्गस्थात् निमित्तादुत्तरस्य नेः णत्वं बोध्यम्।]]
24
=>
[पृष्ठम्१२२०+ २६]
25
=>
[[१। वहत्यनेनेति करणार्थे शकटादिके विवक्षिते ‘वह्यं करणम्’ (३-१-१०२) इति निपातनात् यत्प्रत्ययान्तता। ण्यतोऽपवादः। करणभिन्नयोः भावकर्मणोरर्थयोः विवक्षितयोस्तु वाह्यम् इति ण्यदन्तत्वमेव।]]
26
=>
[[आ। ‘तेन वह्येन हन्तासि त्वमर्यं पुरुषाशिनम्।’ भ। का। ६-५२]]
27
=>
[शकटम्]
28
=>
[[२। वहन्त्यनेन बलीवर्दादयः भारमिति वहः = स्कन्धः। करणे ‘गोचरसञ्चरवह--’ (३-३-११९) इति घप्रत्ययान्तो निपातितः। हलन्तलक्षणघञोऽपवादः। वाहः अश्वः। अत्र तु वहतीति वाहः इति वा, उह्यतेऽनेनेति वा वृत्तिर्बोध्या।]]
29
=>
[[B। ‘वृद्धौ रसां राज्यधुरां प्रवोढुं कथं कनीयानहमुत्सहेय।’ भ। का। ३। ५४।]]
30
=>
[[३। प्रौढिरित्यत्र ‘प्रादूहोढोढ्येषैष्येषु’ (वा। ६-१-८९) इति वृद्धिः। इयं क्तिन्तन्त एव
\n\n क्तिजन्ते नेत्याहुः।]]
31
=>
[[४। अत्र ‘वाहनम् आहितात्’ (८-४-८) इति णत्वम्। वाहने यत् आरोपितं तत् आहितम्
\n\n उपरि निपतितेक्षुकं वाहनमित्यर्थः। दाक्षिवाहनम् इन्द्रवाहनम् इत्यादिषु तु आहितार्थकत्वाभावात् णत्वम्।]]
32
=>
[[C। ‘दूरादपावर्तितभारवाहणाः पथोऽपसस्रुस्त्वरितं चमूचराः।।’ शि। व। १२। ३४।]]
33
=>
[[५। ‘कर्त्रोर्जीवपुरुषयोर्नशिवहोः’ (३-४-४३) इति कर्तृवाचिनि पुरुषशब्दे उपपदे वहेः णमुल्। पुरुषप्रेष्यो भूत्वा वहतीत्यर्थः।]]
34
=>
(वहति)
35
=>
[[६। ‘वहिश्रि--’ (द। उ। १-२१) इति निप्रत्ययः। वहति, उह्यते वा वह्निः = अग्निः।]]
36
=>
[[७। ‘वहेर्धश्च’ (द। उ। १-१६६) इति ऊप्रत्ययः, धात्वन्तस्य धकारादेशश्च। वहति गृहकार्यमिति वधूः = स्नुषा।]]
37
=>
[पृष्ठम्१२२१+ २७]
Capeller
German
व॑ह fahrend, führend, fließend nach o.
durch, bringend, bewirkend, habend,
versehen mit (—°).
m.
Schulter des
Jochtieres o. Schulterstück des Jochs.
व॑ह als Subst. auch
n.
Burnouf
French
वह वह a. (वह्) qui porte. -- S.
m.
action de porter.
Tout ce qui peut porter, véhicule, en gén.
épaules, dos d'une
bête de somme
char
bateau
vent
flot
courant
route.
Mesure de 4 द्रोणस्। -- F. वहा cours d'eau, rivière.
Crét.
βαῖγες
gr.
αἶγες, αἰγίς, Αἰγαιῶν, etc.
germ. wogen
fr. vague
ang. wave, etc.
Gr.
ὄχος
lat. via [vehia].
वहत
m.
bœuf de trait.
Voyageur.
वहति
m.
bœuf de trait.
Vent.
Ami, conseiller. -- F.
[ई] rivière.
वहतु
m.
bœuf de trait.
Voyageur.
वहन
n.
bateau, radeau.
Action de porter, de traîner.
वहन्त
m.
(sfx. अन्त) vent.
Enfant [que l'on porte au
bras].
वहल a. (sfx. अल) qui peut porter, solide, robuste. -- S.
n.
bateau, radeau.
वहलचक्षुस्
n.
asclepias geminata, bot.
Stchoupak
French
वह-
ag. ifc. qui porte, roule, traîne, charrie
qui va (en voiture,
etc.)
qui conduit
qui coule dans ou vers
chargé, pourvu de
qui porte tel
nom
m.
nt. épaule, collier d'un animal de trait.
वहं-लिह- a. qui lèche l'épaule.