| YouTube Channel

वङ्घिता-त्री (vaGghitA-trI)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“वघि गत्याक्षेपे”@} 2 “आक्षेपो-निन्दा, गतौ गमनारम्भे चेति स्वामी” इति मा।
धा।
वृत्तिः।
‘गत्याक्षेपो वेगगतिः गमनारम्भो वा’ इति क्षीरस्वामी।
वङ्घकः-ङ्घिका, वङ्घकः-ङ्घिका, विवङ्घिषकः-षिका, वावङ्घकः-ङ्घिका
वङ्घिता-त्री, वङ्घयिता-त्री, विवङ्घिषिता-त्री, वावङ्घिता-त्री
इत्यादिकानि रूपाणि सर्वाण्यपि भौवादिककङ्कतिवत् 3 बोध्यानि।
शानचि- 4 वङ्घमानः इति ज्ञेयम्।
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१५३३)
02
=>
(१-भ्वादिः-११०। सक। सेट्। आत्म।)
03
=>
(१४०)
04
=>
[[आ। ‘प्रवङ्घमानस्य तस्य सत्वरं विमङ्घनस्याधिकराघितात्मनः।’ धा। का। १-१६।]]