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वंहयन्-न्ती (vaMhayan-ntI)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“वहि वृद्धौ”@} 2 3 सिद्धान्तकौमुद्यां 4 एव उद्धृतोऽयं धातुः।
अन्ये सर्वे ‘बहि’ इत्येव पठन्ति।
धातुकाव्यव्याख्यायामपि 5 एवमेव।]] वंहकः-हिका, वंहकः-हिका, विवंहिषकः-षिका, वावंहकः-हिका
वंहिता-त्री, वंहयिता-त्री, विवंहिषिता-त्री, वावंहिता-त्री
वंहन्-न्ती, वंहयन्-न्ती, विवंहिषन्-न्ती
-- इत्यादिकानि रूपाणि सर्वाण्यपि भौवादिककण्ठतिवत् 6 ज्ञेयानि।
युचि- वंहनः इति।
प्रासङ्गिक्यः
01
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(१५८३)
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(१-भ्वादिः-६३३। अक। सेट्। आत्म।)
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[[[अ]
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[बालमनोरमायाम्]
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(१-८९)
06
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(१४९)