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रिरहयिषकः-षिका (rirahayiSakaH-SikA)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“रह त्यागे”@} 2 कथादिः, उदन्तः,
‘रहयेत् रहति त्यागे गतौ रंहेस्तु रंहति।’ 3 इति देवः।
रहकः-हिका, रिरहयिषकः-षिका
रहयिता-त्री, रिरहयिषिता-त्री
इत्यादिकानि समस्तान्यपि रूपाणि चौरादिकचहयतिवत् 4 बोध्यानि।
णमुलि रहम् २, इत्येकमेव रूपमिति विशेषः।
यत्प्रत्यये-विरह्यः 5 इति ज्ञेयम्।
प्रासङ्गिक्यः
01
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(१३८८)
02
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(१०-चुरादिः-१८५९। सक। सेट्। उभ।)
03
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(श्लो। १९५)
04
=>
(५१५)
05
=>
[[B। ‘मन्त्री तौ प्रपटय्य पाशवटनैः पापौ विरह्यौ पुरात्।’ धा। का। ३-५३।]]