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मूलकः-लिका (mUlakaH-likA)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“मूल प्रतिष्ठायाम्”@} 2 ‘मूलेः प्रतिष्ठितौ मूलेद् रोहणे मूलयेदिति।’ 3 इति देवः।
मूलकः-लिका, मूलकः-लिका, मुमूलिषकः-षिका, मोमूलकः-लिका
मूलिता-त्री, मूलयिता-त्री, मुमूलिषिता-त्री, मोमूलिता-त्री, इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि भौवादिककूलतिवत् 4 बोध्यानि।
5 मूलम्-अमूला- शतमूली, इमानि रूपाणि अस्य धातोः विशेषेण भवन्ति।
प्रासङ्गिक्यः
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(१२९६)
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(१-भ्वादिः-५२९। अक। सेट्। पर।)
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(श्लो। १५७)
04
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(२४४)
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[[२। पचाद्यचि रूपमेवम्। लिङ्गस्य लोकाश्रयत्वादजन्तत्वेऽपि क्लीबत्वमस्येति ज्ञेयम्। अमूला इति तु ‘मूलान्नञः’ (ग। सू। ४-१-४) इति टापि रूपमेवम्। शतमूली इति तु ‘पाककर्णपर्णपुष्पफलमूल--’ (४-१-६४) इत्यादिना ङीषि सिध्यति। एवं दर्भमूली इत्यादिष्वपि ज्ञेयम्।]]
1 {@“मूल रोहणे”@} 2 ‘मूलेः प्रतिष्ठितौ मूलेद् रोहणे मूलयेदिति।’ 3 इति देवः।
‘मुल--इति नन्दी’ इति क्षीरस्वामी।
मूलकः-लिका, मुमूलयिषकः-षिका, मूलयिता-त्री, मुमूलयिषिता-त्री
इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि चौरादिककूटयतिवत् 4 ज्ञेयानि।
अस्य धातोः उभयपदित्वात् शतरि-मूलयन्-न्ती, मुमूलयिषन्-न्ती, मूलयिष्यन्-न्ती- ती, मुमूलयिषिष्यन्-न्ती-ती
इति विशेषः।
5 मूलकः।
प्रासङ्गिक्यः
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(१२९७)
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(१०-चुरादिः-१६०३। सक। सेट्। उभ।)
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(श्लो। १५७)
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(२४०)
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[[३। स्वार्थे कन्प्रत्यये रूपमेवम्। मूलकः = शाकविशेषः।]]