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मुमूलयिषन्-न्ती (mumUlayiSan-ntI)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“मूल रोहणे”@} 2 ‘मूलेः प्रतिष्ठितौ मूलेद् रोहणे मूलयेदिति।’ 3 इति देवः।
‘मुल--इति नन्दी’ इति क्षीरस्वामी।
मूलकः-लिका, मुमूलयिषकः-षिका, मूलयिता-त्री, मुमूलयिषिता-त्री
इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि चौरादिककूटयतिवत् 4 ज्ञेयानि।
अस्य धातोः उभयपदित्वात् शतरि-मूलयन्-न्ती, मुमूलयिषन्-न्ती, मूलयिष्यन्-न्ती- ती, मुमूलयिषिष्यन्-न्ती-ती
इति विशेषः।
5 मूलकः।
प्रासङ्गिक्यः
01
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(१२९७)
02
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(१०-चुरादिः-१६०३। सक। सेट्। उभ।)
03
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(श्लो। १५७)
04
=>
(२४०)
05
=>
[[३। स्वार्थे कन्प्रत्यये रूपमेवम्। मूलकः = शाकविशेषः।]]