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मिमार्जयि-षिता-त्री (mimArjayi-SitA-trI)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“मार्ज शब्दार्थः”@} 2 ‘शौचालङ्कारयोर्वा णौ मृजेर्मार्जति मार्जयेत्।।
मार्ष्टि शुद्धौ तथा मार्जेः शब्दार्थाद् मार्जयेण्णिचि।’ 3 इति देवः।
‘शुद्धौ इति द्रुमे।’ इति धा।
का।
व्या।
4।
मार्जकः-र्जिका, मिमार्जयिषकः-षिका
मार्जयिता-त्री, मिमार्जयि-षिता-त्री
इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि चौरादिकगर्जयतिवत् 5 ज्ञेयानि।
6 विमार्जनम्।
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१२४९)
02
=>
(१०-चुरादिः-१६४९। अक। सेट्। उभ।)
03
=>
(श्लो। ६०। ६१)
04
=>
(३-२८)
05
=>
(३७८)
06
=>
[[B। ‘इत्थं सुगाजितमृदङ्गविमार्जनानि--’ धा। का। ३। २८।]]