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बिभाजयिषिता-त्री (bibhAjayiSitA-trI)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“भज विश्राणने”@} 2 विश्राणनम् = दानम्।
‘सेवायां भजते भजेदिति भजेः, विश्राणने भाजयेद्…’ 3 इति देवः।
भाजकः-जिका, बिभाजयिषकः-षिका
भाजयिता-त्री, बिभाजयिषिता-त्री
इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि चौरादिकगर्जयतिवत् 4 ज्ञेयानि।
5 विभाज्य।
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(११३८)
02
=>
(१०-चुरादिः-१७३४। सक। सेट्। उभ।)
03
=>
(श्लो। ६५)
04
=>
(३७८)
05
=>
[[आ। ‘आज्ञापनामिह विभाज्य नृपेण दृष्टौ…।।’ धा। का। ३। ४०।]]
1 {@“भाज पृथक्कर्मणि”@} 2 अदन्तः।
‘आमर्दे तु भनक्ति भाजयति णौ भाजेः पृथक्कर्मणि।।’ 3 इति देवः।
भाजकः-जिका, बिभाजयिषकः-षिका, भाजयिता-त्री, बिभाजयिषिता-त्री
इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि चौरादिककालयतिवत् 4 ज्ञेयानि।
यत्प्रत्यये-- 5 विभाज्यः इति।
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(११५४)
02
=>
(१०-चुरादिः-१८८७। अक। सेट्। उभ।)
03
=>
(श्लो। ६५)
04
=>
(१८५)
05
=>
[[B। ‘… ये ते निवांसितधियो ह्यसुभिर्विभाज्याः।।’ धा। का। ३। ५६।]]