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प्रतिष्ठा (pratiSThA)

 
Spoken Sanskrit
English
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- foot
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- foundation
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- stability
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- establishment on or accession to
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- tranquillity
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- homestead
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- any ceremony for obtaining supernatural and magical powers
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- perseverance in
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- base
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- superiority
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- limit
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- prop
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- standing still
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- performance of any ceremony or of any solemn act
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- comfort
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- dwelling
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- mystical name of the letter A
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- standpoint
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- high rank or position
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- boundary
प्रतिष्ठा - pratiSThA -
f.
- standpoint
परिवाप - parivApa -
m.
- standpoint
पद - pada -
n.
- standpoint
Apte
English
प्रतिष्ठा [pratiṣṭhā], 1
P.
To stand firm, be established.
To be supported.
To rest or depend upon.
To stay, abide, be situated.
To set (as the sun)
उदेति यतः सूर्यो यत्र प्रतितिष्ठति
Mb.
* 7.62.11.
Caus.
To place firmly on, station.
To set up, erect, establish
धुरि प्रतिष्ठापयितव्य एव
M.*
1.16.
To install, inaugurate (on a throne).
To entrust with, consign to.
To offer, present
पर्यङ्कमग्ऱ्यास्तरणं नानारत्नविभूषितम् तमपीच्छति वैदेही प्रतिष्ठापयितुं त्वयि
Rām.*
2.22.9.
प्रतिष्ठा [pratiṣṭhā], 1 Resting, remaining, situation, position
धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा Mahānār. Up.
अलसचलिताङ्गुष्ठ- शिरसि प्रतिष्ठा त्वय्यासीत् Śivamhimna. 12. अपौरुषेयप्रतिष्ठम्
Māl.
9
Ś.*
7.6.
A house, residence, home, habitation
अगाधसत्त्वो मगधप्रतिष्ठः
R.*
6.21
14.5.
Fixity, stability, strength, permanence, firm basis
अप्रतिष्ठे रघुज्येष्ठे का प्रतिष्ठा कुलस्य नः
U.*
5.25
अत्र खलु मे वंशप्रतिष्ठा
Ś.*
7
वंशः प्रतिष्ठां नीतः
K.*
28
Śi.*
2.34
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्
Bg.*
16.8
अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्संनिधौ वैरत्यागः Pātañjala S.
Basis, foundation, site
as in गृह- प्रतिष्ठा
लोकस्य नाभिर्जगतः प्रतिष्ठा
Mb.
* 12.245.27.
A prop, stay, support
(hence) an object of glory, a distinguished ornament
त्यक्ता मया नाम कुलप्रतिष्ठा
Ś.*
6.24
द्वे प्रतिष्ठे कुलस्य नः 3.19
Ku.*
7.27
Mv.*
7.21.
High position, pre-eminence, high authority
किंप्रमाणमिदं काव्यं का प्रतिष्ठा महात्मनः
Rām.*
7.94.23
मया नात्मप्रतिष्ठार्थिना
Mu.*
2.5.
Fame, glory, renown, celebrity
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः
Rām.*
1.2.15. (=
U.*
2.5.).
Installation, inauguration
तं गच्छन्त्यनु ये विपत्तिषु पुनस्ते तत्प्रतिष्ठाशया
Mu.*
1.14.
Attainment of a desired object, accomplishment, fulfilment (of one's desire)
औत्सुक्यमात्रमवसादयति प्रतिष्ठा
Ś.*
5.6.
Tranquillity, rest, repose.
A receptacle.
The earth.
The consecration of an idol or image
चलाचलेति द्विविधा प्रतिष्ठा जीवमन्दिरम्
Bhāg.*
11.27.13
cf.
प्राणप्रतिष्ठा.
A limit, boundary.
The foot
अहोरात्राणि प्रतिष्ठा Bṛi.
Up.*
1.1.1.
Completion of a vow.
A ceremony for obtaining supernaturel or magical powers.
Apte 1890
English
प्रतिष्ठा {c1c} P. 1 To stand firm, be established.
2 To be supported.
3 To rest or depend upon.
4 To stay, abide, be situated.
Caus. 1 To place firmly on, station.
2 To set up, erect, establish.
3 To install, inaugurate (on a throne).
4 To entrust with, consign to.
5 To offer, present.
प्रतिष्ठा 1 Resting, remaining, situation, position
अपौरुषेयप्रतिष्ठं Māl. 9
Ś. 7. 6.
2 A house, residence, home, habitation
R. 6. 21
14. 5.
3 Fixity, stability, strength, permanence, firm basis
अप्रतिष्ठे रघुज्येष्ठे का प्रतिष्ठा कुलस्य नः U. 5. 25
अत्र खलु मे वंशप्रतिष्ठा Ś. 7
वंशः प्रतिष्ठां नीतः K. 280
Śi. 2. 34.
4 Basis, foundation, site
as in गृहप्रतिष्ठा.
5 A prop, stay, support
(hence) an object of glory, a distinguished ornament
त्यक्ता मया नाम कुलप्रतिष्ठा Ś. 6. 23
द्वे प्रतिष्ठे कुलस्य नः 3. 21
Ku. 7. 27
Mv. 7. 21.
6 High position, preeminence, high authority
Mu. 2. 5.
7 Fame, glory, renown, celebrity
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः Rām. (= U. 2. 5.).
8 Installation, inauguration
Mu. 1. 14.
9 Attainment of a desired object, accomplishment, fulfilment (of one's desire)
औत्सुक्यमात्रमवसादयति प्रतिष्ठा Ś. 5. 6.
10 Tranquillity, rest, repose.
11 A receptacle.
12 The earth.
13 The consecration of an idol or image.
14 A limit, boundary.
15 The foot.
Monier Williams Cologne
English
1. प्रति-ष्ठा (√ स्था)
P.
Ā. -तिष्ठति, °ते to stand, stay, abide, dwell,
RV.
&c.
&c.
to stand still, set (as the sun), cease,
MBh.
BhP.
to stand firm, be based or rest on (loc. ), be established, thrive, prosper,
RV.
&c.
&c.
to depend or rely on (loc. ),
Vajracch.
to withstand, resist (acc. ),
MBh.
Hariv.
to spread or extend over (acc. ),
MBh.
:
Caus.
ष्ठापयति, to put down, place upon, introduce into (loc. ),
Br.
GṛŚrS.
to set up, erect (as an image),
Ratnāv.
to bring or lead into (loc. ),
MBh.
to establish in, appoint to (loc. ), ib.
R.
&c.
to transfer or offer or present to, bestow or confer upon (dat. or
loc.
),
ĀśvGṛ.
Mn.
MBh.
&c.
to fix, found, prop, support, maintain,
TS.
Br.
MBh.
Hariv.
to hold against or opposite,
R.
प्रति-°ष्ठा a (आ),
f.
See next
2. प्रति-ष्ठा॑
f.
(ifc. f(आ). ) standing still, resting, remaining, steadfastness, stability, perseverance in (comp. ),
VS.
&c.
&c.
a standpoint, resting-place, ground, base, foundation, prop, stay, support,
RV.
&c.
&c.
a receptacle, homestead, dwelling, house,
AV.
&c.
&c.
(ifc. abiding or dwelling in
Ragh.
Pur.
)
a pedestal, the foot (of men or animals),
AV.
Br.
ŚāṅkhŚr.
limit, boundary,
W.
state of rest, quiet, tranquillity, comfort, ease,
MBh.
Kāv.
setting up (as of an idol
&c.
,
RTL.
70)
pre-eminence, superiority, high rank or position, fame, celebrity,
Kāv.
Kathās.
Rājat.
establishment on or accession to (the throne
&c.
),
Hariv.
Śak.
Var.
Rājat.
the performance of any ceremony or of any solemn act, consecration or dedication (of a monument or of an idol or of a temple
&c.
cf.
प्राण-प्र्°), settling or endowment of a daughter, completion of a vow, any ceremony for obtaining supernatural and magical powers,
Var.
Kathās.
Rājat.
Pur.
a mystical
N.
of the letter आ,
L.
N.
of one of the Mātṛs attending on Skanda,
MBh.
of sev. metres,
RPrāt.
(with प्रजा-पतेः)
N.
of a Sāman, ĀrṣBr.
=
ह्रस्व,
Naigh.
iii, 2
=
योग-सिद्धि or -निष्पत्ति,
L.
Monier Williams 1872
English
प्रतिष्ठा प्रति-ष्ठा (प्रति-स्था), cl. 1. P. A.
-तिष्ठति, -ते, -ष्ठातुम्, to stand firmly, stand or
rest upon, to be supported
to depend upon
to
stay: Caus. P. -ष्ठापयति, -यितुम्, to place
firmly, to set up, erect
to place
to place with,
consign to (with loc.)
to offer.
Benfey
English
प्रतिष्ठा प्रतिष्ठा, i. e. प्रति-स्था,
f.
1. Place, Bhag. 14, 27.
2. A firm stand-
ing, staying, Bhag. 2, 70.
3. Quiet,
Vikr. d. 42.
4. The earth.
5. Ac-
complishment, completion.
6. Fame,
celebrity, Rājat. 5, 28
Utt. Rāmac.
131, 7.
7. Pre-eminence, MBh. 12,
6690.
8. Erecting the image of a
deity, Rājat. 1, 124.
--
Comp.
अ-प्र-
तिष्ठ,
adj.
1. without stability, Bhag.
16, 8. 2. perishable. जन्मप्रतिष्ठा,
i. e.
जन्मन्-,
f.
a mother, Śāk. 83, 8.
सु-,
I.
f.
1. erection (as of a temple),
consecration. 2. fame.
II.
adj.
,
f.
ठा,
famous, Nal. 12, 66.
Hindi
Hindi
आराम
Apte Hindi
Hindi
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
"ठहरना, रहना, स्थिति, अवस्था"
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
"गघर, निवसस्थान, जन्मभूमि, आवास @ रघु* ६/२१, १४/५"
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
"स्थैर्य, स्थिरता, दृढ़ता, स्थायिता, दृढाधार"
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
"आधार, नींव, ठिकाना"
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
"पाया, टेक, सहारा, कीर्तिभाजन, विश्रुत अलंकार"
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
"उच्चपद, प्रमुखता, उच्च अधिकार"
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
"ख्याति, यश, कीर्ति, प्रसिद्धि"
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
"अभीष्ट पदार्थ की प्राप्ति, निष्पत्ति, पूर्ति"
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
"शांति, विश्राम, विश्रान्ति"
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
आधार
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
पृथिवी
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
किसी देवप्रतिमा की स्थापना
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
सीमा हद
प्रतिष्ठा
स्त्री*
- प्रति+स्था+अङ्+टाप्
व्रत की पूर्ति
Shabdartha Kaustubha
Kannada
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಗೌರವ /ಮರ್ಯಾದೆ
निष्पत्तिः - > प्रति + ष्ठा (गतिनिवृत्तौ) - "अङ्" (३-३-१०६)
प्रयोगाः - > "अस्याधिकस्योपमयेपमाता दाता प्रतिष्ठां खलु तेभ्य एव"
उल्लेखाः - > नैष० ७-१६
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಸ್ಥಿರತೆ /ಭದ್ರವಾಗಿರುವಿಕೆ
प्रयोगाः - > "विपक्षमखिलीकृत्य प्रतिष्ठा खलु दुर्लभा"
उल्लेखाः - > माघ० २-३४
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಆಸ್ಪದ /ಸ್ಥಾನ
प्रयोगाः - > "वेदप्रतिष्ठान् वितताध्वराणां यूपानपश्यत् शतशो रघूणाम्"
उल्लेखाः - > रघु० १६-३५
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ವಾಸ ಸ್ಥಾನ /ಗೃಹ
प्रयोगाः - > "असौ शरणयः शरणोन्मुखानानगाध सत्त्वो मगधप्रतिष्ठः"
उल्लेखाः - > रघु० ६-२१
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಆಲಂಬನ /ಆಧಾರ /ಆಶ್ರಯ
प्रयोगाः - > "संरोपितेऽप्यात्मनि धर्मपत्नी त्यक्ता मया नाम कुलप्रतिष्ठा"
उल्लेखाः - > शाकु० ६-२४
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಯಶಸ್ಸು /ಕೀರ್ತಿ /ಪ್ರಖ್ಯಾತಿ
प्रयोगाः - > "प्राणप्रच्युतिभीरुणा मया नात्मप्रतिष्ठार्थिना"
उल्लेखाः - > मुद्रा० २-५
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ವಿಜಯ /ಸರ್ವೋತ್ಕರ್ಷದಿಂದಿರುವುದು
प्रयोगाः - > "मानिषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः"
उल्लेखाः - > चं० रा०
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಸ್ಥಾಪನೆ /ಇರಿಸುವುದು /ವಿಧಿವತ್ತಾಗಿ ಸ್ಥಾಪಿಸುವುದು
प्रयोगाः - > "ऐश्वर्यादनपेतमीश्वरमयं लोकोऽर्थतः सेवते तं गच्छन्त्यनु ये विपत्तिषु पुनस्ते तत्प्रतिष्ठाशया"
उल्लेखाः - > मुद्रा० २-४०
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಯಾಗ ನಿಷ್ಪತ್ತಿ
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ವೃತ್ತರತ್ನಾಕರದಲ್ಲಿ ಉಕ್ತವಾದ ನಾಲಕನೆಯ ಛಂದಸ್ಸು
प्रयोगाः - > "उक्तात्युक्ता तथा मध्या प्रतिष्ठान्या सुपूर्विका"
उल्लेखाः - > वृ० र०
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಸ್ಥಿತಿ /ಇರುವಿಕೆ
प्रयोगाः - > "त्रिस्रोतसं वहति यो गगनप्रतिष्ठां ज्योतींषि वर्तयति प्रविभक्तरश्मिः"
उल्लेखाः - > शाकु० ७-६
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ದೇವರ ಸಾನ್ನಿಧ್ಯಕ್ಕಾಗಿ ವಿಗ್ರಹಗಳನ್ನು ಶಾಸ್ತ್ರೋಕ್ತವಾಗಿ ಮಂತ್ರಗಳಿಂದ ಆವಾಹನಪೂರ್ವಕ ಸ್ಥಾಪನೆಮಾಡುವುದು
प्रयोगाः - > "पूजां विना प्रतिष्ठां नास्ति मन्त्रं विना प्रतिष्ठा तदुभयविप्रतिपन्नः पश्यतु गीर्वाणपाषाणम् ॥"
उल्लेखाः - > आर्यासप्त०
प्रतिष्ठा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಇಷ್ಟಸಿದ್ಧಿ /ಇಷ್ಟಪ್ರಾಪ್ತಿ /ಕಾರ್ಯವು ಕೈಗೂಡುವುದು
प्रयोगाः - > "औत्सुक्यमात्रमवसाययति प्रतिष्ठा"
उल्लेखाः - > शाकु० ५-६
L R Vaidya
English
pratizWA {% f. %} 1. Fixity, strength, firm foundation, विपक्षमखिलीकृत्य प्रतिष्ठा खलु दुर्लभा Sis.ii.34
2. prop, support, stay, द्वे प्रतिष्ठे कुलस्य मे Sak.iii.
3. tranquility, rest
4. a house, a home, a residence, R.vi.21, xiv.5
5. a receptacle
6. the earth
7. high authority, pre-eminence
8. fame, celebrity
9. the consecration of an idol
10. accomplishment, completion.
Bopp
Latin
प्रतिष्ठा f. (a r. स्था stare, esse praef. प्रति, v. gr. 80.)
1) ha-
bitatio, sedes, domus. BH. 14. 27. 2. 70. In fine comp.
BAH. BH. 6. 38. (Schol. अप्रतिष्ठ explicat per निराश्रय).
2) gloria. N. 12. 66. in fine comp. BAH.
Anekartha-Dvani-Manjari
Sanskrit
पद
क्ली
पद, लक्ष्मन्, परित्राण, क्रम, वस्तु, प्रतिष्ठा
पदं लक्ष्म परित्राणे क्रमे वस्तुप्रतिष्ठयोः
verse 2.1.1.12
page 0008
Aufrecht Catalogus Catalogorum
English
प्रतिष्ठा Śāṅkh. B. 1, 192.
Indian Epigraphical Glossary
English
pratiṣṭhā (EI 11
SII 1
BL
HA), installation, consecra-
tion
ceremony of installation or consecration (Ep. Ind., Vol.
XII, p. 20).
Lanman
English
pratiṣṭhā́, f. stead
standing-place
then
(like Eng. standing), position, i. e. celebrity.
[√sthā + prati.]
Wordnet
Sanskrit
Synonyms:
प्रतिष्ठा
noun
वर्णवृत्तविशेषः।
"प्रतिष्ठायां चत्वारः वर्णाः भवन्ति।"
Synonyms:
अवलम्ब्, आश्रि, विश्रम्, संश्रि, अधिष्ठा, आलम्ब्, विश्वस्, श्रि, वृत्, समालम्ब्, प्रतिष्ठा
verb
वशिताजन्यः निबन्धनकर्मकः उपजीवनानुकूलः व्यापारः।
"इतोऽपि पुत्राः पितरम् अवलम्बन्ते / आश्रयन्ते।"
Synonyms:
प्रतिष्ठा
noun
मन्दिरस्य मूर्तेः स्थापना।
"ग्रामे शिवमन्दिरस्य प्रतिष्ठायाः कार्यं प्रचलति।"
Synonyms:
प्रतिष्ठा
noun
संस्कारविशेषः
"समयः सर्वदेवानां प्रतिष्ठा शुभदा भवेत्[श क]"
Synonyms:
सम्मानम्, प्रभावः, माहात्म्यम्, प्रतापः, प्रतिष्ठा, अनुभावः, अनुभूतिः, आयत्तिः, आयतिः, आस्पदम्, इन्द्रता, इन्द्रत्वम्, गरिमान्, गुरुता, गुरुत्त्वम्, तेजस्विता, पक्तिः, भगः
noun
लोके प्रसिद्धिः।
"जनः तस्य सम्मानं करोति।"
Synonyms:
निवासः, वसतिः, वासः, वासस्थानम्, निवसतिः, निवासस्थानम्, निवासभूयम्, गृहम्, आवासः, अधिवासः, समावासः, आवसथः, वास्तुः, वास्तु, स्थानम्, अवस्थानम्, प्रतिष्ठा, आयतनम्, निकेतनम्, आलयः, निलयः, निलयिता, क्षिः
noun
तत् स्थानं यत्र पशवः जनाः वा वसन्ति।
"व्याघ्रस्य निवासः वने अस्ति।"
Synonyms:
यशः, कीर्तिः, ख्यातिः, प्रतिष्ठा, मर्यादा, सुकीर्तिः, सत्कीर्तिः, सुख्यातिः, परिख्यातिः, विश्रुतिः, प्रतिष्ठा, विश्रावः, प्रसिद्धिः, प्रकीर्तिः, कीर्तनम्, प्रथा, प्रथितिः, सम्प्रथी, समज्ञा, समाज्ञा, प्रतिपत्तिः, विख्यातिः, प्रविख्यातिः, प्रतिख्यातिः, समाख्या, जनश्रुतिः, जनप्रवादः, जनोदाहरणम्, कीर्तना, अभिख्यानम्, समज्या, आज्ञा
noun
दानादि-सद्गुण-प्रभवाद् विद्या-कलादिषु प्रावीण्याद् वा आदरस्य भावनया सहिता जनेषु श्रुतिः।
"सचिन तेण्डुलकर महोदयेन क्रिकेट क्रीडायां यशः धनं अर्जितम्।/ मन्दः कविः यशःप्रार्थी गमिष्यामि उपहास्यताम्। प्रांशुलभ्ये फले लोभाद् उद्बाहुर् इव वामनः॥"
Sanskrit Tibetan
Tibetan
dgod pa
१) उपन्यास २) निवेशन ३) प्रतिष्ठा ४) मापयन्ति ५) स्थापयेत् ६) हसन ७) हास ८) हास्य
jug pa'i rten
प्रतिष्ठा
Mahabharata
English
Pratishṭhā, a mātṛ. § 615u (Skanda): IX, 46, 2647.
पुराणम्
English
प्रतिष्ठा / PRATIṢṬHĀ I. A female follower of subrahmaṇya (Śloka 29, Chapter 46, śalya Parva).
प्रतिष्ठा / PRATIṢṬHĀ II. The installation of deities in temples. According to agni purāṇa it is the installation of śivaliṅga that is called pratiṣṭhā.
pīṭha is śakti (Power) and Liṅga is śiva. It is the union of śakti in the form of pīṭha and śiva in the form of liṅga that is called pratiṣṭhā. This pratiṣṭhā is attained by means of Śivamantras. There are five different kinds of Pratiṣṭhās:--1) Viśeṣapratiṣṭhā. Any pratiṣṭhā in which Brahmaśilā is used in combination is called Viśeṣapratiṣṭhā.2) Sthāpana. Fixing the liṅga on the pīṭha (platform) is called Sthāpana. 3) Sthitasthāpana. The fixing of the liṅga (idol) on the pīṭha (platform) when the liṅga gets shaky on it is called Sthitasthāpana.4) Utthāpana. Taking the idol out from the platform and refixing it, is called Utthāpana.5) Āsthāpana. A pratiṣṭhā in which after the fixation learned priests eonduct purification ceremonies, is called Āsthāpana.
Vedic Reference
English
Prati-ṣṭhā is found in one passage of the Atharvaveda, ^1
where Zimmer^2 thinks the word is used as a technical term of
law
possibly a ‘sanctuary’ may be meant, but it is more than
doubtful whether the sense of ‘home’ or ‘abode, as given by
Roth, ^3 is not quite adequate. Cf. Jñātṛ.
1) vi. 32, 3 = viii. 8, 21 = Śāṅkhāyana
Āraṇyaka, xii. 14.
2) Altindisches Leben, 181.
3) St. Petersburg Dictionary, s.v., 3.
So a pratiṣṭhā-kāma, ‘one desirous of a
fixed abode, Taittirīya Saṃhitā, ii. 1,
3, 4
Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, xxiii. 18,
1, etc.
अमरकोशः
Sanskrit
Word: प्रतिष्ठा
Root: प्रतिष्ठा
Gender: undefined
Number: undefined
Meaning(s):
seat
place
abode
power
affair
dignity
subject
business
authority
tenth lunar mansion
Shloka(s):
3|3|94|1 गोष्पदं सेविते माने प्रतिष्ठाकृत्यमास्पदम्। (नानार्थवर्गः)
Synonym(s):
3|3|94|1 आस्पदम् (आस्पद) (नपुं) seat, place, abode, power, affair, dignity, subject, business, authority, tenth lunar mansion
Related word(s):
जातिः स्थानम्
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskrit
प्रतिष्ठा,
स्त्री,
(प्रतितिष्ठतीति प्रति + स्था +“आतश्चोपसर्गे ।” १०६ इति भावादौअङ् टाप् ।) गौरवः (यथा, कथासरित्-सागरे ६९ ।“किञ्च व्याकरणं लोके प्रतिष्ठां प्रापयिष्यति
”)क्षितिः स्थानम् (यथा, रघुः १६ ३५ ।“वेदिप्रतिष्ठान् वितताध्वराणांयूपानपश्यच्छतशो रघूणाम्
”आश्रयः यथा, मार्कण्डेये ८४ १० ।“गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा
”)यागनिष्पत्तिः चतुरक्षरपद्यम् इति मेदिनी ।ते, १३
*
(स्थितिः यथा, हरिवंशे ।२८ ३७ ।“य इदं च्यावनं स्थानात्प्रतिष्ठाञ्च शतक्रतोः ।शृणुयाद्धारयेद्वापि दौरात्म्यमाप्नुयात्
”शरीरम् यथा, ऋग्वेदे १० ७३ ।“साकं प्रतिष्ठा हृद्या जघंथ
”)संस्कारविशेषः (यथा, आर्य्यासप्तशत्याम् ३८६ ।“पूजा विना प्रतिष्ठां नास्ति मन्त्रं विनाप्रतिष्ठा ।तदुभयविप्रतिपन्नः पश्यतु गीर्व्वाणपाषाणम्
”)तद्दिनादि यथा, --मत्स्यपुराणे ।“चैत्रे वा फाल्गुने वापि ज्यैष्ठे वा माधवे तथा ।समयः सर्व्वदेवानां प्रतिष्ठा शुभदा भवेत्
प्राप्य पक्षं शुभं शुक्लमतीते चोत्तरायणे ।पञ्चमी द्वितीया तृतीया सप्तमी तथा
दशमी पौर्णमासी तथा श्रेष्ठा त्रयोदशी ।आसु प्रतिष्ठा विधिवत् कृता बहुफला भवेत्
*प्रतिष्ठा सर्व्वदेवानां केशवस्य विशेषतः ।उतरायणमापन्ने शुक्लपक्षे शुभे दिने
कृष्णपक्षे पञ्चम्यामष्टम्याञ्चैव शस्यते
*
भुजबलभीमे ।‘युगादावयने पुण्ये कर्त्तव्यं विषुवद्वये ।चन्द्रसूर्य्यग्रहे वापि दिने पुण्येऽथ पर्व्वसु
या तिथिर्यस्य देवस्य तस्यां वा तस्य कीर्त्तिता ।गृह्यागमविशेषेण प्रतिष्ठा मुक्तिदायिनी
*
पद्मपुराणे ।‘प्रतिपद्धनदस्योक्ता पवित्रारोपणे तिथिः ।श्रिया देव्या द्वितीया तु तिथीनामुत्तमा स्मृता
तृतीया तु भवान्याश्च चतुर्थी तत्सुतस्य ।पञ्चमी सोमराजस्य षष्ठी प्रोक्ता गुहस्य
सप्तमी भास्करस्योक्ता दुर्गायाश्चाष्टमी तथा ।मातॄणां नवमी प्रोक्ता दशमी वासुकेस्तथा
एकादशी ऋषीणाञ्च द्वादशी चक्रपाणिनः ।त्रयोदशी त्वनङ्गस्य शिवस्योक्ता चतुर्द्दशी ।मम चैव मुनिश्रेष्ठ ! पौर्णमासी तिथिः स्मृता
’कल्पतरौ देवीपुराणम् ।‘महिषासुरहन्त्र्याश्च प्रतिष्ठा दक्षिणायने ।यस्य देवस्य यः कालः प्रतिष्ठाध्वजरोपणे
गर्त्तापूरशिलान्यासे शुभदस्तस्य पूजितः
’यस्य देवस्य प्रतिष्ठाध्वजरोपणे यः कालः शुभद-स्तस्य गर्त्तापूरशिलान्यासे गृहारम्भे कालःपूजित इत्यर्थः
*
प्रतिष्ठासमुच्चये ।‘माघे वा फालगुने वापि चैत्रवैशाखयोरपि ।ज्यैष्ठाषाढकयोर्वापि प्रतिष्ठा शुभदा भवेत्
*
भविष्ये ।‘सोमो वृहस्पतिश्चैव शुक्रश्चैव बुधस्तथा ।एते सौम्यग्रहाः प्रोक्ताः प्रतिष्ठा यज्ञकर्म्मणि
मत्स्यपुराणम् ।‘आषाढे द्वे तथा मूलमुत्तरात्रयमेव ।ज्येष्ठाश्रवणरोहिण्यः पूर्व्वभाद्रपदस्तथा
हस्ताश्विनी रेवती पुष्या मृगशिरस्तथा ।अनुराधा तथा स्वाती प्रतिष्ठादौ प्रशस्यते
’दीपिकायाम् ।‘प्राजेशवासवकरादितिभाश्विनीषुपौष्णामरेज्यशशिभेषु तथोत्तरेषु ।कर्त्तुः शुभे शशिनि केन्द्रगते जीवेकार्य्या हरेः शुभतिथौ विधिवत् प्रतिष्ठा
प्राजेशादयः रोहिणीज्येष्ठाहस्तापुनर्व्वस्वश्वि-नीरेवतीपुष्यामृगशिरौत्तरफल्गुन्युत्तराषाढो-त्तरभाद्रपन्नक्षत्राणि
*
सर्व्वमङ्गलादृष्टान्तेदेवीपुराणम् ।‘यथा द्वादशमे जीवे अष्टमे वाथ भास्करे ।प्रतिष्ठा कारिता विष्णोर्महाभयकरी मता
’कल्पतरौ देवीपुराणम् ।‘चतुर्व्वर्णैस्तथा विष्णुः प्रतिष्ठाप्यः सुखार्थिभिः ।’प्रतिष्ठा ब्राह्मणद्वारैव कर्त्तव्या ।‘कर्त्तुमिच्छति यः पुण्यं मम मूर्त्तिप्रतिष्ठया
अन्वेषणीयस्त्वाचार्य्यस्तेन लक्षणसंयुतः
ब्राह्मणः सर्व्ववर्णानां पञ्चरात्रविशारदः ।ब्राह्मणानामलाभे तु क्षत्त्रियो वैश्यशूद्रयोः
क्षत्त्रियाणामलाभे तु वैश्यः शूद्रस्य कल्पितः ।कदाचिदपि शूद्रस्तु कार्य्यार्थमर्हति
*
बृहन्नारदीये ।‘प्रणमेच्छूद्रसंस्पृष्टं लिङ्गं वा हरिमेव वा ।स सर्व्वयातनाभोगी यावदाहूतसंप्लवम्
’यावदाहूतसंप्लवं प्रलयपर्य्यन्तम्
तथा ।‘स्त्रीणामनुपनीतानां शूद्राणाञ्च जनेश्वर ! ।स्पर्शने नाधिकारोऽस्ति विष्णौ वा शङ्करेऽपिवा
*
प्रतिष्ठाप्रकारस्तु मत्स्यपुराणादावुक्तः तद-सम्भवे विद्याकरवाजपेयिप्रभृतिसम्मतो भवि-ष्याद्युक्तः यथा भविष्यपुराणम् ।‘स्नपनादि यथाशक्ति कृत्वा तन्मूलमन्त्रकम् ।विन्यसेद्धृदयाम्भोजे प्रतिमासु कृता भवेत्
’आदिपदात् पूजोत्सवहोमादि महाकपिल-पञ्चरात्रोक्तकर्म्म कर्त्तव्यम् तद्यथा, --‘सपुष्पं सकुशं पाणिं न्यसेद्देवस्य मस्तके ।पञ्चवारं जपेन्मूलमष्टोत्तरशतोत्तरम्
ततो मूलेन मूर्द्धादिपीठान्तं संस्पृशेदिति ।तत्त्वन्यासं लिपिन्यासं मन्त्रन्यासञ्च विन्यसेत्
पूजाञ्च महतीं कुर्य्यात् स्वमन्त्रोक्तां यथाविधि ।प्राणप्रतिष्ठामन्त्रेण प्राणस्थापनमाचरेत्
’लिपिन्यासस्तु मातृकान्यासः उक्तञ्च ।‘जपादौ सर्व्वमन्त्राणां विन्यसेन्न लिपिं विना ।कृतं तन्निष्फलं विद्यात्तस्मात् पूर्व्वं लिपिं न्यसेत्
कादिमतेऽपि ।‘मातृकायाः षडङ्गञ्च मातृकान्यासमेव ।सर्व्वासां प्रथमं कृत्वा पश्चात्तन्त्रोदितं न्यसेत्
एतद्वचनाच्च मातृकान्यासः पूर्व्वं पश्चात्तत्त्व-न्यासः
’क्रमदीपिकायामप्येवं क्रमः मन्त्रन्यासश्च तत्त-न्मन्त्रविशेषोक्तपदवर्णन्यासः तदभावे मूल-मन्त्रेण शिरसि हस्तन्यासः तत्त्वन्यासस्तुविष्णुविषयक एव न्यासप्रमाणानि सारदाक्रम-दीपिकोक्तान्यनुसन्धेयानि
*
प्राणप्रतिष्ठा-मन्त्रस्तु सारदात्रयोविंशतिपटलोक्तः यथा, --‘पाशाङ्कुशपुटाशक्तिर्वाणीबिन्दुविभूषितः ।याद्याः सप्त सकारान्ता व्योमसत्येन्दुसंयुतम्
समन्ते हंसमन्त्रः स्यात्ततोमुष्यपदं भवेत् ।प्राणा इति वदेत् पश्चात् इह प्राणास्ततः परम्
अमुष्य जीव इह स्थितोऽमुष्यपदं भवेत् ।सर्व्वेन्द्रियाण्यमुष्यान्ते वाङ्मनश्चक्षुरन्ततः
श्रोत्रघ्राणपदे प्राणा इहागत्य सुखं चिरम् ।तिष्ठन्त्वग्निवधूरन्ते प्राणमन्त्रोऽयमीरितः
प्रत्यमुष्यपदात् पूर्व्वं पाशाद्यानि प्रयोजयेत् ।प्रयोगेषु समाख्यातः प्राणमन्त्रो मनीषिभिः
’पाशाङ्कुशपुटाशक्तिरित्यनेन प्रथमं पाशवीजंआं ततः शक्तिबीजं ह्रीं ततोऽङ्कुशबीजं क्रोंवाणी यकारः बिन्दुविभूषितो यं याद्याःसप्त सकारान्ताः उद्धृतयकारानुवादेन सप्ततद्भिन्नं बीजं पूर्व्वं पृथगुद्धारस्तु सप्तानामपिसबिन्दुताख्यापनाय अङ्कुशवाय्वनलावनि-वरुणबीजानीत्युक्तम् अत्र वायुवीजस्यैकत्वंबीजत्वेन सर्व्वेषां सबिन्दुत्वं व्यक्तम् राघयभट्टो-ऽप्येवम् अन्यस्तु वाणीविन्दुविभूषिता इतिपठित्वा नादविन्दुविभूषिता इति व्याख्यातंयाद्या इत्यस्य विशेषणं वदति व्योम हकारःसत्य ओकारः इन्दुर्विन्दुः तेन हों अतएवपाशाङ्कुशान्तरितशक्तिमनोः परस्तादुच्चार्य्ययादिवसुवर्णगुणं सहंसमिति प्रपञ्चसारप्रति-पाद्यगुणमित्यनेन होमिति पद्मपादाचार्य्यैर्व्या-ख्यातम् अग्निवधूः स्वाहा तेनायं मन्त्रः ।आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हों हं सःअमुष्य प्राणा इह प्राणाः आमित्यादि अमुष्यजीव इह स्थितः आमित्यादि अमुष्य सर्व्वेन्द्रि-याणि आमित्यादि अमुष्य वाङ्मनश्चक्षुश्रोत्र-घ्राणप्राणा इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ।अमुष्य इति षष्ठ्यन्तदेवतानामोपलक्षणम् ।‘अदःपदं हि यद्रूपं यत्र मन्त्रे हि दृश्यते ।अमुष्याभिधानं तद्रूपं तत्र स्थाने नियोजयेत्
’इति नारदीयात्
वशिष्ठसंहितायाम् ।‘हृदि हस्तं सन्निधाय प्राणस्थापनमाचरेत्
*
प्रागुक्तभविष्यपुराणवचनेन तन्मूलमन्त्रकं तत्तद्-देवतामन्त्रकं वैदिकस्तान्त्रिकश्च ।‘ओङ्कारादिसमायुक्तं नमस्कारान्तकीर्त्तितम् ।स्वनाम सर्व्वसत्त्वानां मन्त्र इत्यभिधीयते
’ब्रह्मपुराणे ।‘ओङ्कारादिनमोऽन्तेन चतुर्थ्यन्ततत्तद्देवतानाम-रूपो वा ।”कालिकापुराणे ।‘प्रतिमायाः कपोलौ द्वौ स्पृष्ट्वा दक्षिणपाणिना ।तथैव हृदयेऽङ्गुष्ठं दत्त्वा शश्वच्च मन्त्रवित्
एभिर्मन्त्रैः प्रतिष्ठान्तु हृदयेऽपि समाचरेत् ।अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु ।अस्यै देवत्वसंख्यायै स्वाहेति यजुरीरयन्
अङ्गमन्त्रैरङ्गिमन्त्रैर्वैदिकैरित्यनेन ।प्राणप्रतिष्ठां सर्व्वत्र प्रतिमासु समाचरेत्
’अङ्गमन्त्रैः अङ्गन्यासमन्त्रैः अङ्गिमन्त्रैः मूल-मन्त्रैः वैदिकैर्मनोज्योतिरित्यादिभिः
*
स्नपनात् पूर्व्वं बल्मीकमृत्तिकादिभिस्तिसृभिःक्षालनमाह हयशीर्षपञ्चरात्रम् ।‘वल्मीकमृत्तिकाभिस्तु गोमयेन स्वभस्मना ।क्षालयेच्छिल्पिसंस्पर्शदोषाणामुपशान्तये
स्नापयेद्गन्धतोयेन शुद्धवत्या तु देशिकः
नमस्तेऽस्तु सुरेशानि प्रणीते विश्वकर्म्मणा ।प्रभाविताशेषजगद्धात्रि ! तुभ्यं नमो नमः
त्वयि संपूजयामीशे नारायणमनामयम् ।रहिता शिल्पिदोषैस्त्वमृद्धियुक्ता सदा भव
*
तेन यथाशक्ति स्नपनादिपूर्व्वकप्रतिमाहृदयेतन्मूलमन्त्रविन्यासेन देवताया विशेषसन्निधिःप्रतिष्ठेति राघवभट्टधृतमहाकपिलपञ्चरात्रे-ऽपि ।‘प्रतिष्ठाशब्दसंसिद्धिः प्रतिपूर्व्वाच्च तिष्ठतेः ।बह्वर्थत्वान्निपातानां संस्कारादौ प्रतेः स्थितिः
अर्थस्तदयमेतस्य गीयते शाब्दिकैर्जनैः ।विशेषसन्निधिर्या तु क्रियते व्यापकस्य तु
सन्मूर्त्तौ भावनामन्त्रैः प्रतिष्ठा साभिधीयते
*
स्वभस्मना गोमयभस्मना ।‘अष्टोत्तरं पलशतं स्नाने देयञ्च सर्व्वदा
’पलमाह मनुः ।‘पञ्चकृष्णलको माषस्ते सुवर्णस्तु षोडश ।’पलं सुवर्णाश्चत्वारः तेनाष्टरक्तिकाधिक-लौकिकमाषद्बयाधिकतोलकत्रयेण पलं भवतिएवंविधाष्टोत्तरपलशतेन लौकिकषष्ट्यांधकशत-त्रयतोलका इति एवं वल्मीकमृदादिक्षालनेगायत्त्र्या वल्मीकमृदा स्नापयेत् तत्रापिअष्टोत्तरशतपलं शूलपाणिलिखितन्यायात् ।गायत्त्र्या मूलमन्त्रेण वा गन्धोदकस्नाने शुद्धवत्याएतोन्विन्द्रमित्यादि ऋक्त्रयात्मिकया देशिकोगुरुर्यजमानो वा विज्ञः नमोऽस्तु इत्यादिमन्त्रौदेवतान्तरे तत्तद्देवतानामोहः शिवलिङ्ग-स्याप्यर्च्चात्वात् स्त्रीलिङ्गमविरुद्धम्
*
यमः ।‘कृत्वा देवकुलं सर्व्वं प्रतिष्ठाप्य देवताम् ।विधाय विविधं चित्रं तल्लोकं विन्दते ध्रुवम्
’नारसिंहे ।‘प्रतिमां लक्षणोपेतां नरसिंहस्य कारयेत् ।सर्व्वपापानि सन्त्यज्य तु विष्णुपुरं व्रजेत्
प्रतिष्ठा नरसिंहस्य यः करोति यथाविधि ।निष्कामो नरशार्द्दूल ! देहबन्धात् प्रमुच्यते ।सकामो नरसिंहस्य पुरं प्राप्य प्रमोदते
विधिवत् स्थापयेद्यस्तु कारयित्वा जनार्द्दनम् ।न जातु निर्गमस्तस्य विष्णुलोकात् कथञ्चन
’माधवमानसोल्लासे ।‘देवस्य प्रमितायान्तु यावन्तः परमाणवः ।तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते
’राजमार्त्तण्डे ।‘पुत्त्रोत्पत्तौ सदा श्राद्धमन्नप्राशनिके तथा ।चूडाकार्य्ये व्रते चैव नाम्नि पुंसवनेऽपि
पाणिग्रहे प्रतिष्ठायां प्रवेशे नववेश्मनः ।एतद्वृद्धिकरं नाम गृहस्थस्य विधीयते
’सूत उवाच ।‘कलौ चैकाहसाध्येन प्रतिष्ठां मन्त्रवित्तवान् ।मध्यमेनाधमेनापि प्रकुर्य्यात्तान्त्रिकैर्मतैः
’तथा ।‘नित्यं निर्व्वर्त्य मतिमान् कुर्य्यादभ्युदयं ततः ।विप्रान् संपूजयित्वाथ ततो यागपुरं व्रजेत्
गणेशग्रहदिक्पालान् प्रतिकुम्भेषु पूजयेत् ।स्थण्डिल विधिवद्विर्ष्णु परिवारगणं यजेत्
स्नापयेत् प्रथमं देवं तोयैः पञ्चविधैरपि ।पञ्चामृतैः पञ्चगव्यैः पञ्चमृत्पिण्डकैरपि
तिलतैलैश्च स्नेहैश्च कषायैरपि सत्तमाः ।पञ्चपुष्पोदकैर्वाथ त्रिपत्रैरपि सत्तमाः
तुलसीकुन्दमालूरपत्राण्याहुस्त्रिपत्रकम् ।चम्पकाम्रशमीपद्मकरवीरञ्च पञ्चमम्
मृत्तिका करिदन्तस्य पर्व्वताश्वखुरस्य ।कुशवल्मीकसम्भूतं मृदां पञ्चकमीरितम्
*
गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि सर्पिः कुशोदकम् ।कुर्य्यात् प्राणप्रतिष्ठाञ्च होमं कुर्य्याद्यथाविधि ।दक्षिणां विधिवद्दद्यात् पूर्णार्थं तदनन्तरम्
’इति भविष्यपुराणे तृतीयभागे अध्यायः
*
‘चतुरङ्गुलविस्तारा दीर्घा हस्तद्वयावधि ।पताका लोकपालानां दशानां परिकीर्त्तिताः ।पञ्चहस्ताश्च वै दण्डाः पताकानां प्रकीर्त्तिताः
’ज्योतिषे ।‘दुग्धं सशर्करञ्चैव धृतं दधि तथा मधु ।पञ्चामृतमिदं प्रोक्तं विधेयं सर्व्वकर्म्मसु
*
प्रतिष्ठानन्तरं मात्स्ये ।‘ततः सहस्रं विप्राणामष्टोत्तरशतन्तथा ।भोजयेच्च यथाशक्त्या पञ्चाशद्वाथ विंशतिम्
’षोडशोपचाराः आसनमित्यादि दशोप-चाराः पाद्यादि पञ्चोपचारा गन्धादि ।‘सर्व्वोपचारवस्तूनामलाभे भावनैव हि ।निर्म्मलेनोदकेनानुपूर्णतेत्याह नारदः
*
नारसिंहे ।‘स्नाने वस्त्रे नैवेद्ये दद्यादाचमनीयकम्
’कालिकापुराणम् ।‘यद्दीयते देवेभ्यो गन्धपुष्पादिकं तथा ।अर्घ्यपात्रस्थितैस्तोयैरभिषिच्य तमुत्सृजेत्
’देवीपुराणम् ।‘होमो ग्रहादिपूजायां शतमष्टोत्तरं भवेत् ।अष्टाविंशतिरष्टौ वा यथाशक्ति विधीयते
’कात्यायनः ।‘आज्यं द्रव्यमनादेशे जुहोतिषु विधीयते
’अत्र नीराजनमाह पूजारत्नाकरे देवीपुराणम् ।‘शङ्खभेर्य्यादिनिनदैर्जयशब्दैश्च पुष्कलैः ।यावतो दिवसान् वीर ! देव्या नीराजनं कृतम् ।तावत्कल्पसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते
भक्त्या पिष्टप्रदीपाद्यैश्चूताश्वत्थादिपल्लवैः ।ओषधीभिश्च मेध्याभिः सर्व्वबीजैर्यवादिभिः
नवम्यां पर्व्वकालेषु यात्राकाले विशेषतः ।यः कुर्य्याच्छ्रद्धया वीर ! देव्या नीराजनं नरः ।यस्तु कुर्य्यात् प्रदीपेन सूर्य्यलोकं गच्छति
’पर्व्वकाल उत्सवकालः देव्या इति स्त्रीत्वम-विवक्षितं वहुशो निबन्धकारैर्व्याख्यातत्वात्आचाराच्च
*
अथ प्रतिष्ठितमूर्त्तौ कदा-चित् पूजाभावेन महाकपिलपञ्चरात्रम् ।‘एकाहपूजाविहतौ कुर्य्याद्द्विगुणमर्च्चनम् ।त्रिरात्रे महापूजा संप्रोक्षणमतः परम्
मासादूर्द्धमनेकाहपूजा यदि विहन्यते ।प्रतिष्ठैवेष्यते कैश्चित् कैश्चित् संप्रोक्षणक्रमः
’संप्रोक्षणं ओँ देवस्य त्वेत्यादिना ।‘गवां रसैश्च संस्नाप्य दर्भतोयैर्विशोध्य ।प्रोक्षयेत् प्रोक्षणीतोयैर्मूलेनाष्टोत्तरं शतम्
सपुष्पं सकुशं पाणिं न्यसेद्देवस्य मस्तके ।पञ्चवारं जपेन्मूलमष्टोत्तरशतोत्तरम्
ततो मूलेन मूर्द्धादिपीठान्तं संस्पृशेदिति ।तत्त्वन्यासं लिपिन्यासं मन्त्रन्यासञ्च विन्यसेत्
प्राणप्रतिष्ठामन्त्रेण प्राणस्थापनमाचरेत् ।पूजाञ्च महतीं कुर्य्यात् स्वत्रन्त्रोक्तां यथाविधि ।यागहोमादिषु प्रायः संक्षेपोऽयं विधिः स्मृतः
’अस्पृश्यस्पर्शने तु बौधायनः तासां द्रव्यवत्कृतशौचानां देवार्च्चानां भूयः प्रतिष्ठापयेत् ।तासामस्पृश्यस्पर्शानाम् प्रकृतिद्रव्यस्य ताम्रादे-र्यथेष्टशौचं कृत्त्वा पुनः प्रतिष्ठां कारयेदितिरत्नाकरः तदा पूज्यत्वमित्याहू रत्नाकरा-दयः
*
आदित्यपुराणे ।‘खण्डिते स्फुटिते दग्धे भ्राजमानविवर्जिते ।योगहीने पशुस्पृष्टे पतिते दुष्टभूमिषु
अन्यमन्त्रार्च्चिते चैव पतितस्पर्शदूषिते ।दशस्वेतेषु नो चक्रुः सन्निधानं दिवौकसः
इति सर्व्वगतो विष्णुः परिभाषाञ्चकार
’उपचारद्रव्याणि सारदातिलके ।‘पाद्यं श्यामाकदूर्व्वाब्जविष्णुक्रान्ताभिरिष्यते ।’तद्युक्तजलमिति शेषः ।‘गन्धपुष्पाक्षतयवकुशाग्रतिलसर्षपैः ।सदूर्व्वैः सर्व्वदेवानामर्ध्यमेतदुदीरितम्
जातीलवङ्गकक्कोलैर्जलमाचमनीयकम् ।आज्यं दधिमधून्मिश्रं मधुपर्कं निवेदयेत्
कात्यायनः ।‘मधुपर्कं दधिमधुघृतसर्षपसहितं कांस्येकांस्येन ।’गन्धश्चन्दनकर्पूरकालागुरुभिरीरितः पुष्पाणिदेवदेयानि ।‘गुग्गुल्वगुरूशीरशर्करामधुचन्दनैः ।धूपयेदाज्यसंमिश्रैर्नीचैर्देवस्य देशिकः ।तत्र तत्र जलं दद्यादुपचारान्तरान्तरे
’अत्र वृद्धिहोमौ त्वनावश्यकौ यथाशक्ति इत्य-भिधानात्
*
तथा चाल्पधनानां यज्ञ-मण्डपेन विनापि पूजामाह विष्णुधर्म्मोत्तर-प्रथमकाण्डम् ।‘पूजा कार्य्या बहिर्वेद्यां श्रद्धया भृगुमन्दन ! ।न त्वल्पदक्षिणैर्यज्ञैर्यजेदिह कदाचन
विष्णुं देवनिकायस्थं यथाश्रद्धमरिन्दम ! ।तपसा पूजयेन्नित्यं तस्मादल्पधनो नरः
*
यद्येकाहे देवप्रतिष्ठावास्तुयागगृहोत्सर्गास्तदातन्त्रेण वृद्धिश्राद्धं कुर्य्यात् गणशः क्रियमाणेत्वितिवचनात्
*
तथा एकस्मिन्नपि अग्नौहोमद्वयं विघेयम् एकाग्नावनेकहोमकरण-पक्षे तन्त्रेण परिसमूहनादिकमाह गोभिलः ।गणेष्वेकं परिसमूहनमिध्मो वर्हिःपर्य्युक्षण-माज्यभागाविति
*
पूजादिकन्तु प्रत्येकमेव ।ब्रह्मपुराणे ।देवानां प्रतिमा यत्र घृताभ्यङ्गक्षमा भवत् ।पलानि तस्यै देयानि श्रद्धया पञ्चविंशतिः
अष्टोत्तरशतपलं स्नाने देयञ्च सर्व्वदा
’नारसिंहे ।यवगोधूमजैश्चूर्णैरुद्बर्त्योष्णेन वारिणा ।प्रक्षाल्य देवदेवेशं वारुणं लोकमाप्नुयात्
पादपीठन्तु यो दद्यात् विल्वपत्रनिघर्षणम् ।उष्णाम्बुना प्रक्षाल्य सर्व्वपापैः प्रमुच्यते
”इति प्रतिष्ठातत्त्वम्
*
प्रकारान्तरं गारुडे ४८ अध्याये मत्स्यपुराणेच द्रष्टव्यम्
वाचस्पत्यम्
Sanskrit
प्रतिष्ठा स्त्री प्रति + स्था--भावाधारादौ अङ् क्षितौ स्थाने३ गौरवे यागादिसमाप्तौ कर्त्तव्ये कर्मभेदे मेदि० देवादीनांपूज्यतादिप्रयोजके संस्कारभेदे देवताप्रतिष्ठाशब्दे तद्विवरणं दृश्यम् स्थैर्य्ये ह्रस्वे स्त्री निघण्टुः पात०सू० स्यैर्य्यभेदे फलभेद उक्तो यथा“अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः” सू० ।“सर्वप्राणिनां भवति” भा० “सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफला-श्रयत्वम्” सू० “धार्मिकोभव इति भवति धार्मिकः, स्वर्गंप्राप्नु हीति स्वर्गं प्राप्नोति अमोघास्य वाग्भवति” भा०“अस्तयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्” सू० “सर्वदिक्-स्थान्यस्योपतिष्ठन्ते रत्नानि” भा० “ब्रह्मचर्य्यप्रतिष्ठायांवीर्य्यलामः” सू० “यस्य लाभादप्रतिधान् गुणनुत्कर्ष-यति सिद्धश्च विनेवेषु ज्ञानमाधातुं समर्थो भवति इति”भा० आश्रये “ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा” श्रुतिः
Grassman
German
pratiṣṭhā́, f., [von sthā mit práti], 1〉 fester Standpunkt, fester Stand, parallel mit gādhá
2〉 worauf man sich verlässt, Haltpunkt.
-ā́m 1〉 {401, 7}
{932, 9}.
-ā́s [A. pl.] 2〉 sākám hṛ́diās jaghantha {899, 6} (Pad. pratiṣṭhā́ hṛ́diā).
Burnouf
French
प्रतिष्ठा प्रतिष्ठा
f.
(स्था) station, place, lieu
site, emplacement
habitation, séjour
la terre.
Action de
procéder à, d'exécuter, d'accomplir
consécration d'un édifice
action de placer une fille [de la marier]
d'accomplir une
cérémonie.
Stance de 4 vers de 4 syllabes chacun, ou de 3 vers de
8, 7 et 6 syllabes [en tout 21].
Gloire.
प्रतिष्ठान
n.
position fixe.
प्रतिष्ठित (pp. de स्था) situé
établi
fixé
au
fig. marié
consacré.
Présent: ब्रह्म हुते प्रतिष्ठितम्
Brahme est présent dans l'hostie.
Versé dans, habile, l.
Accompli: धर्मो प्रतिष्ठितस् loi exécutée.
Fameux.
Stchoupak
French
प्रति-ष्ठा-
(स्था-) habiter, résider, cesser, disparaître,
se coucher (soleil, étoiles)
être bien établi, être fondé sur (loc.)
prospérer
s'opposer à (acc.)
s'étendre sur (acc.)
caus. fixer, élever
(image d'une divinité)
conduire à, porter sur (loc.)
établir, mettre
une place, loc.)
offrir, donner, accorder qq'un, dat. loc.)
fonder
soutenir, fonder sur (loc.)
°ष्ठित- situé, placé, fondé, posé dans
(loc. ifc.)
qui se tient, qui habite, qui se trouve dans (loc.)
fixé, ferme,
enraciné
qui dépend de (loc. ifc.)
établi, prouvé
prospère
familier
avec (loc.)
entrepris
qui a atteint (comp.).
प्रतिष्ठित-मात्र- a. v. qui arrive à peine à se tenir debout.
प्रति-ष्ठा-
f.
fait de se tenir, stabilité
base, fondement,
support
fig. descendance
habitation, domicile, maison
repos, tranquillité,
confort
position élevée, dignité
supériorité
acte solennel,
cérémonie, consécration.
°काम- a. qui désire une base solide, une haute position.