प्रज्ञा (prajJA)
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Spoken Sanskrit
Englishप्रज्ञा - prajJA - - outlook
अवलोकन - avalokana - - outlook
अवेक्षण - avekSaNa - - outlook
प्रज्ञा - prajJA - - intelligence
बुद्धिशालिन् - buddhizAlin - - possessingintelligence
कृतकधी - kRtakadhI - - artificialintelligence(AI) [ computer ]
कृतकप्रज्ञा - kRtakaprajJA - - artificialintelligence(AI) [ computer ]
कृत्रिमप्रज्ञा - kRtrimaprajJA - - artificialintelligence(AI) [ computer ]
प्रज्ञाकल्प - prajJAkalpa - - artificialintelligence(AI) [ computer ]
प्रतिभा - pratibhA - - intelligence
बुद्धि - buddhi - - intelligence
चेतना - cetanA - - intelligence
वित्ति - vitti - - intelligence
धी - dhI - - intelligence
वार्त्ता - vArttA - - intelligence
सुक्रतूया - sukratUyA - - intelligence
काव्या - kAvyA - - intelligence
चेतनता - cetanatA - - intelligence
ज्ञप्ति - jJapti - - intelligence
ज्ञता - jJatA - - intelligence
दृष्टि - dRSTi - - intelligence
धीदा - dhIdA - - intelligence
पुरञ्जनी - puraJjanI - - intelligence
प्रज्ञा - prajJA - - intelligence
प्रज्ञा - prajJA - - clever or sensible woman
प्रज्ञा - prajJA - - mental attitude
प्रज्ञा - prajJA - - discrimination
प्रज्ञा - prajJA - - understanding
प्रज्ञा - prajJA - - Wisdom personified as the goddess of arts and eloquence [ i.e. SarasvatI ]
प्रज्ञा - prajJA - - mental disposition
प्रज्ञा - prajJA - - judgement
प्रज्ञा - prajJA - - awareness
प्रज्ञा - prajJA - - particular zakti or energy
प्रज्ञा - prajJA - - outlook
प्रज्ञा - prajJA - - device
प्रज्ञा - prajJA - - wisdom
प्रज्ञा - prajJA - - true or transcendental wisdom
प्रज्ञा - prajJA - - mentality
प्रज्ञा - prajJA - - design
प्रज्ञा - prajJA - - knowledge
प्रज्ञा - prajJA - - insight
प्रजानाति { प्रज्ञा } - prajAnAti { prajJA } - verb - be acquainted with
प्रजानाति { प्रज्ञा } - prajAnAti { prajJA } - verb - find out
प्रजानाति { प्रज्ञा } - prajAnAti { prajJA } - verb - discover
प्रजानाति { प्रज्ञा } - prajAnAti { prajJA } - verb - perceive
प्रजानाति { प्रज्ञा } - prajAnAti { prajJA } - verb - distinguish
प्रजानाति { प्रज्ञा } - prajAnAti { prajJA } - verb - learn
प्रज्ञापयति { प्रज्ञा } - prajJApayati { prajJA } - verb caus. - show or point out
प्रज्ञापयति { प्रज्ञा } - prajJApayati { prajJA } - verb caus. - summon
प्रज्ञापयति { प्रज्ञा } - prajJApayati { prajJA } - verb caus. - invite
प्रज्ञा prajJA insight
धीति dhIti insight
बुद्धि buddhi insight
प्रबोध prabodha insight
निर्वेध nirvedha insight [ penetration ]
चेतस् cetas insight
सम्बोधन sambodhana insight
ज्ञात्र jJAtra v. insight
समीक्षा samIkSA deep insight
निर्वेधभागीय nirvedhabhAgIya regarding insight
कवि kavi gifted with insight
निदर्शिन् nidarzin having an insight into
सम्यग्दृष्टि samyagdRSTi right insight or belief
सम्यग्दर्शनसम्पन्न samyagdarzanasampanna possessed of true insight
सुद्रष्टृ sudraSTR having a good insight into
मर्मज्ञ marmajJa having a deep insight into
सुद्रष्टृ sudraSTR having good insight into on
सम्यग्दर्शन samyagdarzana right perception or insight
पश्यते { पश् } pazyate { paz } verb have insight or discernment
पश्यति { पश् } pazyati { paz } verb have insight or discernment
कविक्रतु kavikratu having the insight of a wise man
प्रतीति pratIti clear apprehension or insight into anything
तत्त्वज्ञान tattvajJAna insight into the true principles of philosophy
दृष्टिन् dRSTin having an insight into or familiar with anything
प्रज्ञा prajJA awareness
स्मृति smRti awareness
समान्यस्थिति samAnyasthiti awareness
ज्ञान jJAna awareness
आत्मबोध Atmabodha self awareness
मनोलय manolaya loss of awareness [ due to total mental absorption ]
बुध्यति / -ते budhyati / -te verb recover awareness after fainting
Apte
Englishप्रज्ञा [prajñā], 9
To know, know about, be acquainted with.
To be aware of, find out.
To discern, distinguish. (प्रज्ञपयति)
To show, point out (as way).
To discover.
To call, summon, invite.
प्रज्ञा [prajñā], 1 Intelligence, understanding, intellect, wisdom
आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः 1.15
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता 2.57
शस्त्रं निहन्ति पुरुषस्य शरीरमेकं प्रज्ञा कुलं च विभवं यशश्च हन्ति ॥ Subhāṣ.
Discernment, discrimination, judgment
इयं निष्ठा बहुविधा प्रज्ञया त्वध्यवस्यति * 14.3.24.
Device or design.
A wise or learned woman.
Longing for (वासना)
impression (संस्कार)
तं विद्याकर्मणि समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च Bṛi. 4.4.2.
of the goddess Sarasvatī.
A particular Śakti or energy.
A true or transcendental wisdom
Buddh.Comp. -अस्त्रम् a missile, weapon
ततः प्रज्ञास्त्रमादाय मोहनास्त्रं व्यनाशयत् * 6.77.53. -घनः nothing but intelligence
Bhāg. -चक्षुस्, -नयन blind
(lit. having understanding as the only eyes)
ततो ज्ञास्यसि मां सौते प्रज्ञाचक्षुष- मित्युत * 1.1.149
1.13.28
Manodūta 115
12.16. (m. ) an epithet of Dhṛitarāṣṭra
* 3. 7.24
Kāvyamālā, Part.13. (n. ) the mind's eye, mental eye, the mind
1. -पारमिता one of the transcendent virtues
Buddh. -मात्रा an organ of sense.-वादः a wise saying
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे 2.11. -वृद्ध old in wisdom. -सहाय intelligent, wise. -हीन void of wisdom, silly, foolish.
Apte 1890
Englishप्रज्ञा {c9c} U. 1 To know, know about, be acquainted with.
2 To be aware of, find out.
3 To discern, distinguish.
Caus. (प्रज्ञपयति) 1 To show, point out (as way).
2 To discover.
3 To call, summon, invite.
प्रज्ञा 1 Intelligence, understanding, intellect, wisdom
आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः R. 1. 15
शस्त्रं निहंति पुरुषस्य शरीरमेकं प्रज्ञा कुलं च विभवं च यशश्च हंति ॥ Subhāṣ.
2 Discernment, discrimination, judgment.
3 Device or design.
4 A wise or learned woman.
5 N. of the goddess Sarasvatī.
Comp.
चक्षुस् a. blind
(lit. having understanding as the only eyes). (
m.) an epithet of Dhṛtarāṣṭra. (
n.) the mind's eye, mental eye, the mind
M. 1.
वादः a wise saying.
वृद्ध a. old in wisdom.
सहाय a. intelligent, wise,
हीन a. void of wisdom, silly, foolish.
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Monier Williams Cologne
EnglishMonier Williams 1872
Englishप्रज्ञा 1. प्र-ज्ञा, cl. 9. P. A. -जानाति, -जा-
नीते, -ज्ञातुम्, to know, understand (especially said
of knowing a way or mode of action)
to distinguish,
discern, discriminate
to know of, know about, be
acquainted with
to become aware of, to find out,
discover: Caus. -ज्ञपयति, -ज्ञापयति, -यितुम्,
to show or point out (the way)
to discover, betray
to summon, invite.
Macdonell
EnglishHindi
Hindi(स्त्री) बुद्धि, लोभी बिजली
Apte Hindi
Hindiप्रज्ञा
- प्र+ज्ञा+अ+टाप्
"मेधा, समझ, बुद्धिमत्ता"
प्रज्ञा
- प्र+ज्ञा+अ+टाप्
"विवेक, विवेचन, निर्णय"
प्रज्ञा
- प्र+ज्ञा+अ+टाप्
"तरकीब, योजना"
प्रज्ञा
- प्र+ज्ञा+अ+टाप्
बुद्धिमती और विदुषी स्त्री
प्रज्ञा
- प्र+ज्ञा+अङ्+टाप्
प्रकृष्ट बुद्धि
Shabdartha Kaustubha
Kannadaप्रज्ञा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಬುದ್ಧಿ /ತಿಳಿದುಕೊಳ್ಳುವ ಮತ್ತು ವಿಚಾರ ಮಾಡುವ ಶಕ್ತಿ
निष्पत्तिः - > प्र + ज्ञा (अवबोधने) - "अङ्" (३-३-१०५)
व्युत्पत्तिः - > प्रज्ञायते अनया
प्रयोगाः - > "आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः । आगमैः सदृशारम्भः आरम्भसदृशोदयः ॥"
उल्लेखाः - > रघु० १-१५
प्रज्ञा
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಚೆನಾಗಿ ತಿಳಿದ ಹೆಂಗಸು
L R Vaidya
EnglishBopp
LatinAnekartha-Dvani-Manjari
Sanskritप्रधान
क्ली
प्रधान, प्रकृति, प्रज्ञा
प्रधानं प्रकृतिः प्रज्ञा प्रधानं विदुरुत्तमम् ॥ ७८ ॥
verse 2.1.1.78
page 0013
Edgerton Buddhist Hybrid
EnglishWordnet
Sanskrit प्रतीतिः, बुद्धिः, सम्यग्दृष्टिः, प्रज्ञा, धीतिः, प्रबोधः
कस्याञ्चित् विशेषस्थितौ मनसि अकस्मात् स्फुटितः स्पष्टः विचारः।
"काचित् प्रतीतिः एव अस्मान् अस्याः समस्यायाः रक्षितुं शक्नोति।"
प्रतिभावान्, प्रतिभावती, प्रतिभाशाली, धीमान्, धीमती, प्रज्ञः, प्रज्ञा, सुधीः, गुणी, गुणिनी, गुणवान्, गुणवती, दक्षः, दक्षा
प्रतिभायुक्तः।
"अस्माकं प्रयोगशालायां प्रतिभाशालिनाम् अभावः नास्ति।"
आह्वे, ह्वे, प्रत्यादिश्, समाह्वे, आकारय, आनायय, आवाहय, उपाह्वे, निमन्त्रय, आमन्त्रय, अभिमन्त्रय, अभिप्रेष्, उपप्रेष्, उपमन्त्रय, प्रचोदय, प्रज्ञा, अभियुज्
समीपम् आगन्तुम् अन्येषां चोदनानुकूलः व्यापारः।
"पितामही पितामहं सङ्केतेन आह्वयति।"
प्रज्ञा, मेधा, प्रतिभा, मतिप्रकर्षः
सा नवनवोन्मेषालिनी बुद्धिः यया मनुष्यः कस्मिन् अपि कार्ये अधिकां योग्यतां सम्पादयति।
"स्वामीविवेकानन्दमहोदयस्य प्रज्ञा अद्भु+ता आसीत्।"
ज्ञा, विद्, बुध्, अवगम्, अव इ, अभि ज्ञा, अनुविद्, अभिसंविद्, अवबुध्, आविद्, प्रज्ञा
बोधनानुकूलः व्यापारः।
"न हि सर्वः सर्वं जानाति।"
दुर्गा, उमा, कात्यायनी, गौरी, ब्रह्माणी, काली, हैमवती, ईश्वरा, शिवा, भवानी, रुद्राणी, सर्वाणी, सर्वमङ्गला, अपर्णा, पार्वती, मृडानी, लीलावती, चणडिका, अम्बिका, शारदा, चण्डी, चण्डा, चण्डनायिका, गिरिजा, मङ्गला, नारायणी, महामाया, वैष्णवी, महेश्वरी, कोट्टवी, षष्ठी, माधवी, नगनन्दिनी, जयन्ती, भार्गवी, रम्भा, सिंहरथा, सती, भ्रामरी, दक्षकन्या, महिषमर्दिनी, हेरम्बजननी, सावित्री, कृष्णपिङ्गला, वृषाकपायी, लम्बा, हिमशैलजा, कार्त्तिकेयप्रसूः, आद्या, नित्या, विद्या, शुभह्करी, सात्त्विकी, राजसी, तामसी, भीमा, नन्दनन्दिनी, महामायी, शूलधरा, सुनन्दा, शुम्यभघातिनी, ह्री, पर्वतराजतनया, हिमालयसुता, महेश्वरवनिता, सत्या, भगवती, ईशाना, सनातनी, महाकाली, शिवानी, हरवल्लभा, उग्रचण्डा, चामुण्डा, विधात्री, आनन्दा, महामात्रा, महामुद्रा, माकरी, भौमी, कल्याणी, कृष्णा, मानदात्री, मदालसा, मानिनी, चार्वङ्गी, वाणी, ईशा, वलेशी, भ्रमरी, भूष्या, फाल्गुनी, यती, ब्रह्ममयी, भाविनी, देवी, अचिन्ता, त्रिनेत्रा, त्रिशूला, चर्चिका, तीव्रा, नन्दिनी, नन्दा, धरित्रिणी, मातृका, चिदानन्दस्वरूपिणी, मनस्विनी, महादेवी, निद्रारूपा, भवानिका, तारा, नीलसरस्वती, कालिका, उग्रतारा, कामेश्वरी, सुन्दरी, भैरवी, राजराजेश्वरी, भुवनेशी, त्वरिता, महालक्ष्मी, राजीवलोचनी, धनदा, वागीश्वरी, त्रिपुरा, ज्वाल्मुखी, वगलामुखी, सिद्धविद्या, अन्नपूर्णा, विशालाक्षी, सुभगा, सगुणा, निर्गुणा, धवला, गीतिः, गीतवाद्यप्रिया, अट्टालवासिनी, अट्टहासिनी, घोरा, प्रेमा, वटेश्वरी, कीर्तिदा, बुद्धिदा, अवीरा, पण्डितालयवासिनी, मण्डिता, संवत्सरा, कृष्णरूपा, बलिप्रिया, तुमुला, कामिनी, कामरूपा, पुण्यदा, विष्णुचक्रधरा, पञ्चमा, वृन्दावनस्वरूपिणी, अयोध्यारुपिणी, मायावती, जीमूतवसना, जगन्नाथस्वरूपिणी, कृत्तिवसना, त्रियामा, जमलार्जुनी, यामिनी, यशोदा, यादवी, जगती, कृष्णजाया, सत्यभामा, सुभद्रिका, लक्ष्मणा, दिगम्बरी, पृथुका, तीक्ष्णा, आचारा, अक्रूरा, जाह्नवी, गण्डकी, ध्येया, जृम्भणी, मोहिनी, विकारा, अक्षरवासिनी, अंशका, पत्रिका, पवित्रिका, तुलसी, अतुला, जानकी, वन्द्या, कामना, नारसिंही, गिरीशा, साध्वी, कल्याणी, कमला, कान्ता, शान्ता, कुला, वेदमाता, कर्मदा, सन्ध्या, त्रिपुरसुन्दरी, रासेशी, दक्षयज्ञविनाशिनी, अनन्ता, धर्मेश्वरी, चक्रेश्वरी, खञ्जना, विदग्धा, कुञ्जिका, चित्रा, सुलेखा, चतुर्भुजा, राका, प्रज्ञा, ऋद्भिदा, तापिनी, तपा, सुमन्त्रा, दूती, अशनी, कराला, कालकी, कुष्माण्डी, कैटभा, कैटभी, क्षत्रिया, क्षमा, क्षेमा, चण्डालिका, जयन्ती, भेरुण्डा
सा देवी यया नैके दैत्याः हताः तथा च या आदिशक्तिः अस्ति इति मन्यते।
"नवरात्रोत्सवे स्थाने स्थाने दुर्गायाः प्रतिष्ठापना क्रियते।"
सरस्वती, प्रज्ञा, भारती, वागीश्वरी, वाग्देवी, वीणावादिनी, शारदा, हंसवाहिनी, गिरा, इला, ब्राह्मी, इरा, ज्ञानदा, गीर्देवी, ईश्वरी, वाचा, वचसामीशा, वर्णमातृका, गौः, श्रीः, वाक्येश्वरी, अन्त्यसन्ध्येश्वरी, सायंसन्ध्यादेवता, गौरी
विद्यायाः वाण्यः च अधिष्ठात्री देवता।
"सरस्वत्याः वाहनं हंसः अस्ति।"
ज्ञानम्, परिज्ञानम्, विज्ञानम्, अभिज्ञानम्, बोधः, दोधनम्, प्रबोधः, अवबोधः, उद्बोधः, प्रज्ञा, उपलब्धिः, वेदनम्, संवेदनःसंवेदनम्, अवगमः, प्रमा, प्रमितिः, समुदागमः, उपलम्भः, ज्ञप्तिः, प्रतीतिः, ज्ञातृत्वम्, वेत्तृत्वम्, विपश्यम्
वस्तूनाम् अन्तःकरणे भासः।
"कन्याकुमारीनगरे आत्मचिन्तनमग्नेन विवेकानन्देन स्वामिना आत्मनः ज्ञानं प्राप्तम्।"
ज्ञानम्, परिज्ञानम्, अभिज्ञानम्, विज्ञानम्, बोधः, बोधनम्, प्रबोधः, अवबोधः, उद्बोधः, प्रज्ञा, उपलब्धिः, वेदनम्, संवेदः, संवेदनम्, अवगमः, प्रमा, प्रमितिः, समुदागमः, उपलम्भः, ज्ञप्तिः, प्रतीतिः, ज्ञातृत्वम्
मनसा वस्त्वादीनां प्रतीतिः।
"तस्मै संस्कृतस्य सम्यक् ज्ञानम् अस्ति।"
Sanskrit Tibetan
Tibetankhong du chud pa
१) अधिगत २) अधिगम ३) अधिगमन ४) अनुप्रविष्ट ५) अर्थम् ६) अवगति ७) अवगम ८) अवबुद्ध ९) अवबुद्ध्यन्ते १०) अवबोध ११) अवसित १२) अवस्यत्१३) अवस्यति १४) उपगत १५) गत १६) गति १७) गतिंगतः १८) गम्यते १९) चेतना २०) पर्याप्त २१) प्रज्ञा २२) प्रतिपत्ति २३) प्रतिवेध २४) प्रतीति २५) बुद्ध २६) बोद्ध्र २७) बोध २८) बोधित २९) विवेचयति ३०) वेदित ३१) व्युत्पत्ति ३२) व्युत्पादन
nyal slong
प्रज्ञा / शेनुषी
अभिधानचिन्तामणिः
Sanskritमतिर्मनीषा बुद्धिर्धीर्धिषणाज्ञप्तिचेतनाः ॥ ३०८ ॥
प्रतिभाप्रतिपत्प्रज्ञाप्रेक्षाचिदुपलब्धयः ।
संवित्तिः शेमुषी दृष्टिः सा मेधा धारणक्षमा ॥ ३०९ ॥
मति (स्त्री), मनीषा (स्त्री), बुद्धि (स्त्री), धी (स्त्री), धिषणा (स्त्री), ज्ञप्ति (स्त्री), चेतना (स्त्री), प्रतिभा (स्त्री), प्रतिपद् (स्त्री), प्रज्ञा (स्त्री), प्रेक्षा (स्त्री), चित् (स्त्री), उपलब्धि (स्त्री), संवित्ति (स्त्री), शेमुषी (स्त्री), दृष्टि (स्त्री), मेधा (स्त्री)
प्राज्ञी प्रज्ञा प्रजानत्यां प्राज्ञा तु प्रज्ञयान्विता ।
प्रज्ञा (स्त्री), प्राज्ञी (स्त्री), प्रजानती (स्त्री), प्राज्ञा (स्त्री), प्रज्ञान्विता (स्त्री)
अभिधानरत्नमाला
Sanskritप्रेक्षा
प्रेक्षा, प्रज्ञा, प्रतिभा, धी, धिषणा, शेमुषी, मनीषा, बुद्धि, मति, मेधा, संख्या, संवित्ति, उपलब्धि
प्रेक्षा प्रज्ञा प्रतिभा धीर्धिषणा शेमुषी मनीषा च ।
बुद्धिर्मतिश्च मेधा संख्या संवित्तिरुपलब्धिः ॥ ३३४ ॥
verse 2.1.1.334
page 0040
नाममाला
Sanskritशेमुषी, धिषणा, प्रज्ञा, मनीषा, धी, आशय
शेमुषी धिषणा प्रज्ञा मनीषा धीस्तथाऽशयः ॥ ११० ॥
verse 0.1.1.110
page 0055
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskritप्रज्ञा, (प्र + ज्ञा + कः । टाप् ।) बुद्धिः ।(यथा, रघुः । १ । १५ ।“आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृ शागमः ॥
”एकाग्रता । यथा, पञ्चदश्याम् । ७ । १०६ ।“तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्व्वीतब्राह्मणाः ॥
”)प्राज्ञी । प्रकर्षेण जानाति या । इत्यमरः ॥
सरस्वती । इति शब्दरत्नावली ॥
बुद्धिवैदिक-पर्य्यायः । केतुः १ केतः २ चेतः ३ चित्तम् ४क्रतुः ५ असुः ६ धीः ७ शचीः ८ माया ९वयुनम् १० अभिख्या ११ । इत्येकादशप्रज्ञा-नामानि । इति वेदनिवण्टौ ३ अध्यायः ॥
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit1 {@“ज्ञा अवबोधने”@} 2 प्वादिः।
‘जानातीति श्नि सिद्ध्येत्, ज्ञपयति तु पुनर्मारणादौ घटादेः णौ3मित्त्वेऽपीदमेव ज्ञपनमिति 4 पदं ज्ञापने मारणादौ।
तेनार्थाज्ञापनेऽर्थे ज्ञपयतिपदवज् ज्ञापयेदित्यपि स्यात्
उक्तस्योक्तिः, ‘णिचश्चे’ 5 त्युदितविहतये
ज्ञापयेत्-- ‘ज्ञा नियोगे’।।
6 इति देवः।
7 ज्ञायकः-यिका, 8 ज्ञापकः- 9 ज्ञपकः-पिका, 10 जिज्ञपयिषकः-षिका, ज्ञीप्सकः- प्सिका, 11 जिज्ञासकः-सिका, 12 जाज्ञायकः-यिका
ज्ञाता-त्री, ज्ञापयिता-ज्ञपयिता-त्री, जिज्ञपयिषिता-ज्ञीप्सिता-त्री, जिज्ञासिता-त्री, जाज्ञायिता-त्री
13 14 जानन् 15 -ती, 16 17 सञ्जानन्, 18 प्रतिजानन्, 19 20 जानन्, ज्ञापयन्-ज्ञपयन्-न्ती, जिज्ञपयिषन्-ज्ञीप्सन्-न्ती, 21 22 अनुजिज्ञासन् 23 -न्ती
ज्ञास्यन्-न्ती-ती, ज्ञापयिष्यन्-न्ती-ती, जिज्ञपयिषिष्यन्-न्ती-ती, ज्ञीप्सिष्यन्-न्ती-ती, 24 अनुजिज्ञासिष्यन्-न्ती-ती
-- 25 26 अपजानानः, 27 28 29 जानानः, 30 31 सञ्जानानः, 32 प्रतिजानानः, 33 34 जानानः, 35 36 जानानः, ज्ञापयमानः-ज्ञपय- मानः, जिज्ञपयिषमाणः-ज्ञीप्समानः, 37 38 जिज्ञासमानः, 39 40 41 42 अपजिज्ञासमानः, 43 जिज्ञासमानः, 44 सञ्जिज्ञासमानः, 45 प्रतिजिज्ञासमानः, 46 47 अनुजिज्ञासमानः, जाजायमानः
48 49 अपज्ञास्यमानः, ज्ञापयिष्यमाणः-ज्ञपयिष्यमाणः, जिज्ञपयिषिष्यमाणः- ज्ञीप्सिष्यमाणः, 50 अपजिज्ञासिष्यमाणः, जाज्ञायिष्यमाणः
51 सुज्ञाः-सुज्ञौ-सुज्ञः
-- -- -- 52 ज्ञातम्-ज्ञातः-ज्ञातवान्, ज्ञापितः-ज्ञपितः- 53 ज्ञप्तः, जिज्ञपयिषितः- ज्ञीप्सितः, जिज्ञासितः, जाज्ञायितः-तवान्
54 ज्ञः, 55 अज्ञः, 56 पथिप्रज्ञः, 57 58 प्राज्ञः, 59 अभिज्ञः, 60 नयज्ञः, 61 62 63 मनसाऽऽज्ञायी, 64 नीतिज्ञः, ज्ञापः-ज्ञपः, जिज्ञपयिषुः-ज्ञीप्सुः, जिज्ञासुः, 65 जिज्ञापयिषुः, 66 जाज्ञः
ज्ञातव्यम्, ज्ञापयितव्यम्-ज्ञपयितव्यम्, जिज्ञपयिषितव्यम्-ज्ञीप्सितव्यम्, जिज्ञासितव्यम्, जाज्ञायितव्यम्
ज्ञानीयम्, ज्ञापनीयम्-ज्ञपनीयम्, जिज्ञपयिषणीयम्-ज्ञीप्सनीयम्, जिज्ञासनीयम्, जाज्ञानीयम्
ज्ञेयम्, ज्ञाप्यम्-ज्ञप्यम्, जिज्ञपयिष्यम्-जीप्स्यम्, जिज्ञास्यम्, जाज्ञाय्यम्
67 ईषज्ञानः-दुर्ज्ञानः-सुज्ञानः
-- -- -- ज्ञायमानः, ज्ञाप्यमानः-ज्ञप्यमानः, जिज्ञपयिष्यमाणः-ज्ञीप्स्यमानः, जिज्ञास्यमानः, जाज्ञाय्यमानः
ज्ञायः, ज्ञापः-ज्ञपः, जिज्ञपयिषः-ज्ञीप्सः, जिज्ञासः, जाज्ञायः
ज्ञातुम्, ज्ञापयितुम्-ज्ञपयितुम्, जिज्ञपयिषितुम्-ज्ञीप्सितुम्, जिज्ञासितुम्, जाज्ञायितुम्
68 ज्ञातिः, 69 आज्ञा, 70 अनुज्ञा, 71 उपज्ञा, 72 उपज्ञम्, संज्ञा, प्रज्ञा, 73 74 आज्ञापना-ज्ञपना, जिज्ञपयिषा-ज्ञीप्सा, जिज्ञासा, जाज्ञा
ज्ञानम्, ज्ञापनम्-ज्ञपनम्, जिज्ञपयिषणम्-ज्ञीप्सनम्, जिज्ञासनम्, जाज्ञायनम्
ज्ञात्वा, ज्ञापयित्वा-ज्ञपयित्वा, जिज्ञपयिषित्वा-ज्ञीप्सित्वा, जिज्ञासित्वा, जाज्ञायित्वा
विज्ञाय, अनुज्ञाप्य- 75 अनुज्ञपय्य, प्रजिज्ञपयिष्य-प्रज्ञीप्स्य, प्रजिज्ञास्य, प्रजाज्ञाय्य
ज्ञायम् २, ज्ञात्वा २, ज्ञापम् २- 76 ज्ञपम् २- ज्ञापम् २, ज्ञापयित्वा २- ज्ञपयित्वा २, जिज्ञपयिषम् २, जिज्ञपयिषित्वा २, ज्ञीप्सम् २, ज्ञीप्सित्वा २, जिज्ञासम् २, जिज्ञासित्वा २, जाज्ञायम् २
जाज्ञायित्वा २।
01 (६२५)
02 (९-क्र्यादिः-१५०७। सक। अनि। पर। मित्।)
03 [चौ]
04 [ज्ञप मिद् इति]
05 (१-३-७४)
06 (श्लो। ८)
07 [[१। ‘आतो युक् चिण्कृतोः’ (७-३-३३) इति ण्वुलि परतो युगागमः। एवं घञि णमुल्यपि ज्ञेयम्।]]
08 [[२। मारणाद्यर्थस्याप्रतीत्या, अत्र मित्त्वं न
\n\n अतः, उपधाह्रस्वो न। एवं सर्वत्र ण्यन्ते मारणाद्यर्थाप्रतीतौ ज्ञेयम्।]]
09 [[३। घटादौ ‘मारणतोषणनिशामनेषु ज्ञा’ (ग। सू। भ्वादौ) इति जानातेः मित्संज्ञायाम्, आदन्तलक्षणे पुगागमे उपधाह्रस्वे रूपमेवम्। एवं ण्यन्ते ह्रस्वघटितरूपस्योपपत्तिः सर्वत्र ज्ञेया।]]
10 [[४। अस्य धातोर्ण्यन्तात् सनि रूपाणि प्रदर्शितानि। तत्र हेतुस्तु--‘सनीवन्तर्धभ्रस्ज- दम्भुश्रिस्वृयूर्णुभरज्ञपिसनाम्’ (७-२-४९) इति सूत्रेण ण्यन्तात् परस्य सन इड्- विकल्प एव। इट्पक्षे जिज्ञपयिषकः इति रूपम्। एवं इट्पक्षे सर्वत्र ण्यन्तात् सनि रूपं ज्ञेयम्। इडभावपक्षे, ‘आप्ज्ञपृधामीत्’ (७-४-५५) इतीत्त्वे, ‘अत्र लोपोऽभ्यासस्य’ (७-४-५८) इत्यभ्यासलोपे च रूपम्--ज्ञीप्सकः इत्यादि। एवं ण्यन्तात् सनि इडभावपक्षे रूपं ज्ञेयम्।]]
11 [[५। द्वित्वे, अभ्यासस्य, ‘सन्यतः’ (७-४-७९) इतीत्वे रूपम्। एवं सन्नन्ते सर्वत्र रूपं ज्ञेयम्।]]
12 [[६। द्वित्वे, अभ्यासस्य, ‘दीर्घोऽकितः’ (७-४-८३) इति दीर्घः। एवं यङन्ते सर्वत्र ज्ञेयम्।]]
13 [पृष्ठम्०५९२+ ३१]
14 [[१। ‘क्र्यादिभ्यः--’ (३-१-८१) इति श्ना विकरणप्रत्ययः। “ज्ञाजनोर्जा (७-३-७९) इति जादेशे, ‘श्नाऽभ्यस्तयोः--’ (६-४-११२) इत्याकारलोपे नुमि च रूपम्। अस्य प्वादित्वेऽपि ‘प्वादीनां ह्रस्वः’ (७-३-८०) इति ह्रस्वो न, ‘जा’ इति दीर्घादेशविधानसामर्थ्यात्। एवं जानानः इत्यत्रापि प्रक्रिया ज्ञेया।]]
15 [[आ। ‘जानन् अनादिविहितानपराधवर्गान् स्वामिन् भयात् किमपि वक्तुमहं न शक्तः।’ वग्दराजपञ्चाशति ३।]]
16 [मातुः]
17 [[२। ‘संप्रतिभ्यामनाध्याने’ (१-३-४६) इत्यत्र ‘अनाध्याने’ इत्युक्तत्वात्, प्रकृते शानज् न। आध्यानम् = उत्कण्ठापूर्वकं स्मरणम्।]]
18 [पितुः]
19 [स्वां गां]
20 [[३। ‘विभाषोपपदेन प्रतीयमाने’ (१-३-७७) इत्यत्र शानचो विकल्पितत्वात्, पक्षे शता भवति।]]
21 [पुत्रं]
22 [[४। ‘ज्ञाश्रुस्मृदृशां सनः’ (१-३-५७) इति विहितस्य शानचोऽनुपूर्वके सन्नन्ते ‘नानोर्ज्ञः’ (१-३-५८) इति निषेधात् शता भवति।]]
23 [[B। ‘अनुजिज्ञासतेवाथ लङ्कादर्शनमिन्दुना।’ भ। का। ८। ३५।]]
24 [पुत्रं]
25 [शतं]
26 [[५। ‘अपह्नवे ज्ञः’ (१-३-४४) इति जानातेः शानच्। शतं अपलपत इत्यर्थः।]]
27 [[C। ‘आत्मानमपजानानः शशमात्रोऽनयद् दिनम्। ज्ञास्ये रात्राविति प्राज्ञः प्रत्यज्ञास्त क्रियापटुः।।’ भ। का। ८। २६।]]
28 [सर्पिषो]
29 [[६। ‘अकर्मकाच्च’ (१-३-४५) इत्यात्मनेपदं शानच्। सर्पिषोपायेन प्रवर्तत इत्यर्थः। ‘ज्ञोऽविदर्थस्य करणे’ (२-३-५१) इति सूत्रेण, करणस्य शेषत्वेन विवक्षितत्वे षष्ठी।]]
30 [शतं]
31 [[७। ‘संप्रतिभ्यामनाध्याने’ (१-३-४६) इति शानच्। शतम् अपेक्षमाणः, सहस्रम् अङ्गीकुर्वाणः इति क्रमेणार्थः।]]
32 [सहस्रं]
33 [गां]
34 [[८। ‘अनुपसर्गाज्ज्ञः’ (१-३-७६) इति कर्त्रभिप्राये शानच्। उपसर्गसमभिव्याहारे तु प्रतिजानन् इत्येव भवति।]]
35 [स्वां गां]
36 [[९। ‘विभाषोपपदेन प्रतीयमाने’ (१-३-७७) इति शानज्विकल्पः।]]
37 [धर्मं]
38 [[१०। ‘ज्ञाश्रुस्मृदृशां सनः’ (१-३-५७) इति सन्नन्तात् शानच्।]]
39 [[ड्। ‘प्रेम जिज्ञासमानाभ्यः ताभ्योऽशप्सत कामिनः।।’ भ। का। ८। ३३।]]
40 [शतं]
41 [पृष्ठम्०५९३+ २६]
42 [[१। अत्र सर्वत्र ‘पूर्ववत् सनः’ (१-३-६२) इत्यात्मनेपदं, शानच्।]]
43 [सर्पिषो]
44 [शतं]
45 [सहस्रं]
46 [औषधस्य]
47 [[२। ‘मध्येऽपवादाः पूर्वान् विधीन् बाधन्ते, नोत्तरान्’ (परिभाषा ६२) इति न्यायेन ‘नानोर्ज्ञः’ (१-३-५८) इति निषेधः, ‘ज्ञाश्रुस्मृदृशां सनः’ (१-३-५७) इत्यस्यैव बाधकः, न तु ‘पूर्ववत् सनः’ (१-३-६२) इत्यस्य
\n\n तेन ‘पूर्ववत्--’ (१-३-६२) इति शानच् भवति।]]
48 [[३। ‘अपह्नवे ज्ञः’ (१-३-४४) इति शानच्। एवं पूर्वोक्तेषु सर्वेष्वप्युदाहरणेषु स्यप्रत्यये शानजन्तानि रूपाणि स्वयमूह्यानि।]]
49 [शतं]
50 [शतं]
51 [[४। क्विपि, रुत्वविसर्गौ भवतः। आकारान्तोऽयं शब्दः।]]
52 [[आ। ‘न ज्ञातं तात यत्नस्य पौर्वापर्यममुष्य ते।’ किरातार्जुनीये ११। ४२।]]
53 [[५। ‘वा दान्तशान्तपूर्णदस्तस्पष्टच्छन्नज्ञप्ताः’ (७-२-२७) इति ण्यन्तात् निष्ठायां मित्त्वपक्षे इडभावो विकल्पेन निपातितः। तेन रूपद्वयं बोध्यम्।]]
54 [[६। ‘इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः’ (३-१-१३५) इति कर्तरि कप्रत्ययः। आदन्तलक्षणण- प्रत्ययस्यापवादः।]]
55 [[B। ‘व्रीताशबृंहितजुषाभ्रिणता गजेन प्रक्षेतुमज्ञमनसा समनुद्रुतेन।’ धा। का। ३। ९।]]
56 [[७। प्रकर्षेण पन्थानं जानातीति पथिप्रज्ञः। ‘प्रे दाज्ञः’ (३-२-६) इति कप्रत्ययः। ‘आतो लोप इटि च’ (६-४-६४) इति आकारलोपः।]]
57 [[C। ‘विश्वासप्रदवेषोऽसौ पथिप्रज्ञः समाहितः।’ भ। का। ६। ९०।]]
58 [[८। ‘आतश्चोपसर्गे’ (३-१-१३६) इति कप्रत्ययः। आकारलोपः। प्रकर्षेण आ = समन्तात् जानातीति प्राज्ञः = पण्डितः।]]
59 [[ड्। ‘इन्द्रजिद्विक्रमाभिज्ञो मन्वानो वानरं जितम्।।’ भ। का। ९। ५२।]]
60 [[९। ‘आतोऽनुपसर्गे कः’ (३-२-३) इति कर्मोपपदे कर्तरि कप्रत्ययः। आकारलोपः।]]
61 [[E। ‘इति विविधमुदासे सव्यसाची यदस्त्रं बहुसमरनयज्ञः सादयिष्यन्नरातिम्।’ किरातार्जुनीये १६। ६३।]]
62 [पृष्ठम्०५९४+ २१]
63 [[१। ‘सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये’ (३-२-७८) इति ताच्छील्ये णिनिः। ‘मनसः संज्ञा- याम्’ (६-३-४) इति स्थिते, ‘आज्ञायिनि च’ (६-३-५) इति तृतीयाया अलुक्।]]
64 [[आ। ‘नीतिज्ञा नियतिज्ञा वेदज्ञा अपि भवन्ति शास्त्रज्ञाः। ब्रह्मज्ञा अपि सुलभाः स्वाज्ञानज्ञानिनो विरलाः।।’ नी। दीक्षितस्य वैरारयशतके २७।]]
65 [[B। ‘स्वां जिज्ञापयिषू शक्तिं बुभूर्षू नु जगन्ति किम्।’ भ। का। ९। ३७।]]
66 [[२। यङन्तात् पचाद्यचि यङवयवस्याकारस्यातो लोपे, यङोऽवशिष्टस्य लुकि, अल्लोपस्य स्थानिवद्भावादाकारलोपे च रूपम्।]]
67 [[३। ‘आतो युच्’ (३-३-१२८) इति ईषदाद्युपपदेषु खलपवादो युच्।]]
68 [[४। ‘क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम्’ (३-३-१७४) इति क्तिच्।]]
69 [[५। ‘आतश्चोपसर्गे’ (३-३-१०६) इत्यङ्।]]
70 [[C। ‘तस्य निर्वर्त्य कर्तव्यं सुग्रीवो राघवाज्ञया।’ भ। का। ६। १४५।]]
71 [[६। उपज्ञायते इत्युपज्ञा। कर्मण्यङ्। ‘पाणिन्युपज्ञं व्याकरणम्’ इत्यत्र पाणिनिकर्तृकप्राथमिकज्ञानविषयो व्याकरणमित्यर्थः। ‘उपज्ञोपक्रमं तदाद्या- चिख्यासायाम्’ (२-४-२१) इति नपुंसकत्वम्।]]
72 [[ड्। ‘अथ प्राचेतसोपज्ञं रामायणमितस्ततः।’ रघुवंशे १५। ६३।]]
73 [पृष्ठम्०५९५+ २३]
74 [[आ। ‘आज्ञापनामिह विभाज्य नृपेण दृष्टौ तौ शर्धनाय समयातयतां नियुद्धम्।।’ धा। का। ३। ४०।]]
75 [[१। ‘ल्यपि लघुपूर्वात्’ (६-४-५६) इति मित्पक्षे ण्यन्ताल्ल्यपि णेरयादेशः।]]
76 [[२। मित्त्वपक्षे ण्यन्ताण्णमुलि ‘चिण्णमुलोर्दीर्घोऽन्यतरस्याम्’ (६-४-९३) इति दीर्घ- विकल्पः।]]
Stchoupak
French१ प्र-ज्ञा-
connaître, comprendre, avoir expérience de (acc.)
découvrir, percevoir, apprendre
°ज्ञात- connu, compris, découvert,
connu comme, bien connu, notoire.
२ प्र-ज्ञा-
connaissance, intelligence
sagesse, jugement
-मय-
-ई- a. qui consiste en l'intelligence
-वन्त्- a. intelligent, sage,
habile.
°कोश- d'un homme.
°गुप्त- a. v. protégé par l'intelligence.
°चक्षुस्- nt. œil de l'intelligence
vision mentale
a. intelligent,
sage
aveugle.
°पारमिता- perfection dans la sagesse.
°वृद्ध- a. v. vieux d'expérience.
°सहाय- a. sage, intelligent.
°सागर- d'un ministre.
प्रज्ञाढ्य- d'un homme.
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