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पोपुन्थकः-न्थिका (popunthakaH-nthikA)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“पुथि हिंसासंक्लेशनयोः”@} 2 ‘पुथ्येत् पुन्थति हिंसार्थे, भाषार्थे पोथयेदिति।।’ 3 इति देवः।
पुन्थकः-न्थिका, पुन्थकः-न्थिका, पुपुन्थिषकः-षिका, पोपुन्थकः-न्थिका
इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि कुन्थतिवत् 4 ज्ञेयानि।
ल्यपि प्रपुन्थ्य 5 इति रूपम्।
6 खड्गोपपुन्थं खड्गेनोपपुन्थम् वा शत्रुं मारयति।
प्रासङ्गिक्यः
01
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(१०२०)
02
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(१-भ्वादिः-४४। सक। सेट्। पर।)
03
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(श्लो। १००)
04
=>
(२२०)
05
=>
[[आ। ‘ममन्थ विश्वं सुजनानकुन्थकान् प्रपुन्थ्य बन्धूनपि लुन्थति स्म यः।’ धा। का। १। ७।]]
06
=>
[[१। ‘हिंसार्थानां समानकर्मकाणाम्’ (३-४-४८) इति णमुल्प्रत्ययः।]]