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पेपिसकः-सिका (pepisakaH-sikA)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“पिसृ गतौ”@} 2 ‘इह क्वचित्कोशे विसृ वेसृ--इति पठ्यते।’ इति मा।
धा।
वृत्तौ।
‘णौ पिंसयति भाषार्थे, गत्यां तु शपि पेसति।’ 3 इति देवः।
पेसकः-सिका, पेसकः-सिका, पिपिसिषकः-पिपेसिषकः-षिका, 4 पेपिसकः-सिका
इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि भौवादिककिटतिवत् 5 बोध्यानि।
6 पेस्वरः, अनुपिसितः 7।
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१००५)
02
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(१-भ्वादिः-७१९। सक। सेट्। पर।)
03
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(श्लो। १९२)
04
=>
[पृष्ठम्०८६५+ २९]
05
=>
(१९०)
06
=>
[[१। ‘स्थेशभासपिस--’ (३-२-१७५) इति ताच्छीलिके वरच्प्रत्यये एवं रूपम्।]]
07
=>
[[आ। ‘जीमूतचर्चिरवझर्झरवाद्यहृद्यं तेनैव चाऽनुपिसितो निलयं पिपेस।।’ धा। का। १। ८९।]]