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पुरीष (purISa)

 
शब्दसागरः
English
पुरीष
n.
(-षं)
1. Fæces, excrement, ordure.
2. Rubbish, mould.
E.
पॄ
to nourish or fill, (the body, )
aff.
ईषन्.
Capeller Eng
English
पु॑रीष
n.
crumbling or loose earth, rubbish, excrement,
ordure
poss. °वन्त्.
Yates
English
पुरीष (षं) 1.
n.
Fæces, ordure.
Spoken Sanskrit
English
पुरीष - purISa -
n.
- feces
विट्क - viTka - feces
विषा - viSA -
f.
- feces
विष्टा - viSTA -
f.
- feces
विष्ठा - viSThA -
f.
- feces
विष् - viS -
f.
- feces
मल - mala - m - feces [ any bodily excretion ]
उच्चार - uccAra -
m.
- feces
गूथ - gUtha -
m.
- feces
पुरीषण - purISaNa -
m.
- feces
कीट - kITa -
n.
- feces
दूर्य - dUrya -
n.
- feces
रुक्सद्मन् - ruksadman -
n.
- feces
वर्चस् - varcas -
n.
- feces
शमल - zamala -
n.
- feces
शारीर - zArIra -
n.
- feces
उत्सर्जन - utsarjana -
adj.
- expelling [ feces, etc. ]
श्लेष्मपुरीष - zleSmapurISa -
n.
- mucus and feces
शकृन्मूत्र - zakRnmUtra -
n.
- feces and urine
विण्मूत्र - viNmUtra -
n.
- feces and urine
पुरीष - purISa -
n.
- poop
पुरीष - purISa -
n.
- feces
पुरीष - purISa -
n.
- dirt
पुरीष - purISa -
n.
- crumbling or loose earth
पुरीष - purISa -
n.
- ordure
पुरीष - purISa -
n.
- disk
पुरीष - purISa -
n.
- rubbish
पुरीष - purISa -
n.
- fertilizer
पुरीष - purISa -
n.
- earth
पुरीष - purISa -
n.
- rubble
पुरीष - purISa -
n.
- excrement
पुरीष - purISa -
n.
- land
पुरीष - purISa -
n.
- anything used to fill up interstices in a wall
पुरीष - purISa -
n.
- orb
पुरीष purISa
n.
poop
हदते { हद् } hadate { had } verb 1 poop
पुरीष purISa
n.
rubble
चितिपुरीष citipurISa
n.
layer and the rubble-stones
Wilson
English
पुरीष
n.
(-षं) Fæces, excrement, ordure.
E.
पॄ to nourish or fill, (the body, )
aff.
ईषन्.
Apte
English
पुरीषम् [purīṣam], [पॄ-ईषन् किच्च
Uṇ.*
4.27]
Feces, excrement, ordure
तस्याः पुरीषे तन्मांसं पितरस्तस्य शेरते
Ms.*
3.25
4. 56
5
123
6, 76.
Rubbish, dirt. -ष्यम् excremental dirt
द्रवत्पुरीष्याः पुलिनैः समन्ततः
Bhāg.*
1.18.6.
Ved.
Water.
Comp.
-आधानम् the rectum. -उत्सर्गः voiding excrement. -निग्रहणम् obstruction of the bowels. -भेदः diarrhœa.
Apte 1890
English
पुरीषं [पॄ-ईषन् किच्च Uṇ. 4. 27] 1 Feces, excrement, ordure
Ms. 3. 250, 5. 123, 6. 76
4. 56.
2 Rubbish, dirt.
3 Ved. Water.
Comp.
आधानं the rectum.
उत्सर्गः voiding excrement.
निग्रहणं obstruction of the bowels.
Monier Williams Cologne
English
पु॑रीष
n.
(√ पॄ) earth, land,
RV.
(esp. ) crumbling or loose earth, rubbish (perhaps ‘that which fills up’, as opp. to that which flows off, ‘the solid’ opp. to the fluid), rubble, anything used to fill up interstices in a wall,
VS.
TS.
ŚBr.
GṛŚrS.
feces, excrement, ordure,
ŚBr.
&c.
&c.
(ifc. f(ई). ,
BhP.
)
a disk, orb (e.g. सूर्यस्य i.e. ‘fulness of the sun’ ?),
RV.
x, 27, 21
(with आथर्वण)
N.
of a Sāman, ĀrṣBr.
Monier Williams 1872
English
पुरीष पुरीष, अम्, n. (said to be fr. rt.
पॄ), vapour, damp exhalations rising in the air,
moisture, fluid in general (Sāy. = उदक)
dust,
anything crumbled
mould, rubbish, rubble-stones,
anything used to fill up interstices in a wall
feces,
excrement, ordure
(ई), f. epithet of a particular
religious observance.
—पुरीष-निग्रहण, अस्, आ,
अम्, stopping or obstructing the bowels.
—पुरीष-
पद, अम्, n., Ved. epithet of particular passages
inserted in the recitation of the Mahā-nāmnī verses.
—पुरीष-भेदिन्, ई, इनी, इ, ‘loosening the feces,
relaxing the bowels.
—पुरीष-वत्, आन्, अती, अत्,
Ved. furnished with rubbish or loose earth (used for
filling interstices).
—पुरीष-वाहण or पुरीष-
वाहन, अस्, आ, अम्, Ved. removing rubbish or
refuse.
—पुरीषाधान (°ष-आध्°) or पुरीष-
धान (?), अम्, n. ‘receptacle of excrement, the
last of the intestines, the rectum.
—पुरीषोत्सर्ग
(°ष-उत्°), अस्, m. the voiding of excrement.
Macdonell
English
पुरीष púr-īṣa,
n.
(a. —°,
f.
ī) [fillings, heaps: 🞄√ 1. pṛ́], crumbling earth (opp. fluids), land, 🞄earth (V.)
rubbish, rubbīe (V.)
dirt, excrement 🞄(Br., S.
C.)
-ādhāna,
n.
rectum, 🞄strait-gut
-utsarga,
m.
discharge of excrement.
Benfey
English
पुरीष पुरीष (akin to पॄ),
I.
n.
1. Fæces, excrements, Man. 5, 138.
2.
The remains of food (in a pot),
Bhāg. P. 5, 9, 12.
II.
f.
षी (perhaps
f.
of
पुरीष्य), The name of a religious
ceremony, 3, 12, 40.
Apte Hindi
Hindi
पुरीषम्
नपुं*
- "पृ + ईषन्, किच्च"
"मल, विष्ठा, गूथ (गोबर)"
पुरीषम्
नपुं*
- "पृ + ईषन्, किच्च"
"कूड़ाकरकट, गंदगी"
Shabdartha Kaustubha
Kannada
पुरीष
पदविभागः - > नपुंसकलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಮಲ /ಅಮೇಧ್ಯ
निष्पत्तिः - > पॄ (पालनपूरणयोः) - "ईषन्" (उ० ४-२७)
व्युत्पत्तिः - > पिपर्ति शरीरम्
प्रयोगाः - > "मध्यैर्मूत्रैः पुरीषैर्वा ष्ठीवनैः पूयशोणितैः संस्पृष्टं नैव शुध्येत पुनः पाकेन मृण्मयम् ॥"
उल्लेखाः - > मनु० ५-१२३
L R Vaidya
English
purIza {% n. %} 1. Feces, ordure, M.iv.36, iv.80, v.138
2. rubbish, mould.
Bopp
Latin
पुरीष n. faeces, excrementum. HIT. 85. 9.
Anekartha-Dvani-Manjari
Sanskrit
वर्चस्
क्ली
वर्चस्, तेजस्, पुरीष
तेजःपुरीषयोर्वर्चः सौवर्चो भक्तरक्तयोः
verse 3.1.1.3
page 0013
Lanman
English
púrīṣa, n. crumbling earth, as opp. to
fluids
rubble
loose earth. [‘fillings or
heaps, fr. √1pṛ, in the sense ‘fill, i. e.
heap’: 1197b.]
Sanskrit Tibetan
Tibetan
skyag pa
१) गूथ २) पुरीष ३) विट्
ngan skyugs
पुरीष
अभिधानचिन्तामणिः
Sanskrit
--source--
पुष्पिका तु लिङ्गमलं विड्विष्ठावस्करः शकृत्
गूथं पुरीषं शमलोच्चारौ वर्चस्कवर्चसी ६३४
-wordlist-
पुष्पिका (स्त्री), लिङ्गमल (क्ली), विष् (स्त्री), विष्ठा (स्त्री), अवस्कर (पुं), शकृत् (क्ली), गूथ (क्ली), पुरीष (क्ली), शमल (क्ली), उच्चार (पुं), वर्चस्क (पुंक्ली), वर्चस् (क्ली)
अभिधानरत्नमाला
Sanskrit
वर्चस्
वर्चस्, उच्चार, वर्चस्क, अवस्कर, गूथ, कीट, विष्, विष्ठा, पुरीष, शमल, मल
उच्यते वर्च उच्चारो वर्चस्कोऽवस्करः शकृत्
गूथं कीटं विट् विष्ठा पुरीषं शमलं मलम् ६३७
verse 3.1.1.637
page 0072
अमरकोशः
Sanskrit
Word: पुरीषम्
Root: पुरीष
Gender: नपुं
Number: all
Meaning(s):
orb
disk
poop
land
dirt
feces
earth
rubble
ordure
rubbish
excrement
fertilizer
crumbling or loose earth
anything used to fill up interstices in a wall
Shloka(s):
2|6|67|3 मूत्रं प्रस्राव उच्चारावस्करौ शमलं शकृत्॥ (मनुष्यवर्गः)
2|6|68|1 पुरीषं गूथवर्चस्कमस्त्री विष्ठाविशौ स्त्रियौ। (मनुष्यवर्गः)
3|3|232|1 तेजः पुरीषयोर्वर्चो महस्तूत्सवतेजसोः। (नानार्थवर्गः)
Synonym(s):
2|6|67|3 उच्चारः (उच्चार) (पुं) feces, rising, excrement, utterance, discharge, pronunciation
2|6|67|3 अवस्करः (अवस्कर) (पुं) cull, trash, privy, closet, toilet, ordure, faeces, wastrel, water closet, place for faeces, place for sweepings
2|6|67|3 शमलम् (शमल) (नपुं) sin, harm, fault, feces, ordure, blemish, impurity
2|6|67|3 शकृत् (शकृत्) (नपुं) ordure, excrement, fertilizer, dung [typically cow-dung]
2|6|68|1 पुरीषम् (पुरीष) (नपुं) orb, disk, poop, land, dirt, feces, earth, rubble, ordure, rubbish, excrement, fertilizer, crumbling or loose earth, anything used to fill up interstices in a wall
2|6|68|1 गूथम् (गूथ) (नपुं)
2|6|68|1 वर्चस्कः (वर्चस्क) (पुं)
2|6|68|1 वर्चस्कम् (वर्चस्क) (नपुं)
2|6|68|1 विष्ठा (विष्ठा) (स्त्री) form, rope, kind, abide, feces, dwell, expand, station, position, excrement, remain firm, to stand or go apart
2|6|68|1 विट् (विश्) (स्त्री)
3|3|232|1 वर्चः (वर्च) (पुं)
Related word(s):
परा_अपरासंबन्धः मलम्
जातिः अचलनिर्जीववस्तु
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskrit
पुरीषं,
क्ली,
(पिपर्त्ति शरीरमिति + “शॄ-पॄभ्यां किच्च ।” उणा० २७ इति ईषन् चकित् ।) विष्ठा इत्यमरः ६९
तदुत्सर्गविधिर्यथा, --“मुहूर्त्ते ब्राह्म उत्थाय रात्रिवासं परित्यजेत् ।परिधायापरं वस्त्रं शयनस्थानतोऽन्वहम्
मुखाङ्घ्रिहस्तान् प्रक्षाल्य द्विराचम्य ततो द्विजः ।कृष्ण कृष्ण स्मृतिं कृत्वा खनित्वा नैरृतीं दिशम्
खनित्रखननेनैव द्बादशाङ्गुल्यधोमृदम् ।गृहीत्वोदकपात्रञ्च मितं गच्छेद्धनुःशतम्
ग्रामाद्बा शरविक्षेपमात्रामनुदिते रवौ ।मैत्रमावश्यकं कर्त्तुं नगराच्च चतुर्गुणाम्
तत्त्रिमुष्ट्यायतं गर्त्तं तथा कृत्वा गभीरकम् ।कृत्वा त्वद्भिः खनित्रेण कुशैराच्छाद्य तत्तृणम्
शुष्कैः काष्ठैरयज्ञीयैर्भूगर्त्तमवगुण्ठितः ।संवीताङ्गो वेणुदलैः पत्रैर्मृण्मयभाजनैः
छत्रं खनित्रं संस्थाप्य वारिपात्रमुपानहौ ।ततो द्विजस्तूपविशेद्वस्त्रेणाच्छाद्य मस्तकम्
यज्ञोपवीतं कर्णेऽथ धृत्वा मौनी दक्षिणे ।आगतो द्बिजमग्निं नोपश्यन् सन्तञ्च भास्करम्
गुरुं समीरणं सर्व्वदेवतामूर्त्तिमेव ।मातरं पितरं चन्द्रं सर्व्वं गुरुजनं स्त्रियम्
*
उदङ्मुखस्त्रिसन्ध्यासु दिवसे यदा निशि ।दक्षिणामुख उत्सर्गं कुर्य्यान्मूत्रपुरीषयोः
पूर्व्वाह्णे तु द्विजः कुर्य्यात् पश्चिमाभिमुखोऽथवा ।अपराह्णे पूर्व्वमुखी मूत्रगूथविसर्जनम्
मध्याह्ने प्रयतः कुर्य्याद्यतवागुत्तरामुखः ।दक्षिणाभिमुखो रात्रौ द्बिजो मैत्रं प्रयत्नतः
निशायामन्धकारे तु छायायां दिवसे तथा ।यथेच्छसुमुखो भूत्वा मैत्रं कुर्य्यात् द्बिजो भयात्
दिग्भ्रमाच्च मनोदुःखाद्बिण्मूत्रस्य विसर्ज्जनम् ।मोहाद्वाधोमुखः कुर्य्याद्यतवाक् प्रयतो द्विजः
सन्न्यासी ब्रह्मचारी वानप्रस्थो गृही द्विजः ।शाखाध्यायी वेदानां सर्व्वयज्ञेषु दीक्षितः
मुनिश्च सर्व्वधर्म्मज्ञो दान्तः शान्त उदारधीः ।सदोत्तरमुखः कुर्य्याद्वैष्णवो नान्य एव
प्रातश्च मैत्रं सायाह्ने दक्षिणाभिमुखो निशि ।योगिनान्तु यथा स्त्रीणां शूद्रादीनामयं क्रमः
देवायतने वृक्षमूले जले नदे ।न नदीकूपमार्गेषु वापीगोष्ठभस्मसु
चिताग्निश्मशानेषु नोषरे द्बिजालये ।नाम्भःसमीपे पुण्ड्रे नाकाशे शाद्वले
समुद्रे काम्ये तीर्थे द्विजालये ।न यज्ञवृक्षमूलेषु नोपद्वारे चतुष्पथे
शस्यक्षेत्रे खले पुष्पोद्याने चत्वरे ।सोपानत्को नग्नश्च रथ्यासेव्यभूतले
वैष्णवालये गोत्रे सूर्य्याभिमुखस्तथा ।न फालकृष्टकेदारे तिष्ठंश्च कदाचन
गच्छन्न वल्मीके पर्व्वतमस्तके ।न जलं दिशो भागान्नाकाशमवलोकयन्
गोव्रजे नदीतीरे नित्यस्थाने गोमये ।न यज्ञभूमौ गृहे पंवित्रीकृतस्थले
द्विजो देहच्छायायां शकृन्मूत्रविसर्जनम् ।कुर्य्याद्यज्ञेष्टकाकूटे सप्राणिगर्त्तके
उद्धृताम्भोमृत्तिकाभ्यामित्थं नारद ! यत्नतः ।कृत्वोत्सर्गं ततः कुर्य्यात् शौचं मूत्रपुरीषयोः
शुष्ककाष्ठेन लोष्ट्रेणायज्ञीयेन तृणेन वा ।प्रमार्ज्य गुह्यमुत्तिष्ठेत् शिश्नञ्चैव विशेषतः
विधृत्य वामहस्तेन शिश्नन्तूपविशेन्निशि ।चेद्दक्षिणामुखः सन्ध्यां दिवोत्तरमुखस्तदा
पूतिगन्धिजलं दुष्टं सफेनञ्च सबुद्वुदम् ।तीर्थोदकं सलवणं पाथो वर्णान्तरन्तथा
समुद्रगानदीवारः सासुद्रञ्च सकर्द्दमम् ।यवनान्त्यजखाताम्भः समुद्रगनगोदकम्
धान्यक्षेत्रस्य सलिलं सकीटञ्च परित्यजेत् ।मानवो देवखाताम्भः सकले शौचकर्म्मणि
*
मृदः सकीटास्तीर्थानां देवायतनगोष्ठयोः ।नदोदधिनदीदेवखाततीरस्य मृत्तिकाः
महीतलोद्भवाः क्षेत्रकूड्ययोः सिकताश्च याः ।अन्तर्जला धूलिमृदो वल्मीकस्य कर्द्दमाः
ऊषराश्च हलोत्ख्याता मृत्तिका भवनस्य ।अश्वत्थतुलसीघात्रीमूलादीनाञ्च या मृदः
श्मशानभूमेः शैलस्य तथा पूतस्थलस्य ।शौचावशिष्टमार्गस्य आखूत्खाताश्च मृत्तिकाः
यज्ञस्थानस्य विप्राणां साधूनामालयस्य ।मृत्तिका वर्जयेदेता देवर्षे ! शौचकर्म्मणि
पवित्रस्थानतो ग्राह्या द्वादशाङ्गुल्यधोमृदः ।द्विजैः सकलशौचार्थं शर्करादिविवर्जिताः
*
प्रथमेऽद्भिर्नरः शौचं कुर्य्यान्मृद्भिरतः परम् ।पुनर्जलैः पुरीषस्य यथा गन्धक्षयो भवेत्
मृत्तिका प्रथमा शौचे त्वर्द्धप्रसृतिसम्मिता ।पूर्णप्रसृतिमात्रा तु द्वितीया सजला तथा
तृतीया प्रमिता शौचे सार्द्धप्रसृतिमृत्तिका ।चतुर्थ्याद्या क्रमादेवमर्द्धप्रसृतिवर्द्धिता
यया मृत्तिकया पूर्य्यं त्रिपर्व्व शौचकारिणः ।अर्द्धप्रसृतिमात्रा सा मुनिभिः परिकीर्त्तिता
गुदे दद्यान्मृदस्तिस्रः पञ्च वा सप्त वा तथा ।मृदमेकां तथा शिश्ने तिस्रो वा मृत्तिका द्बयम्
सप्त वामकरे दद्यान्मृदस्त्रिंशच्चतुर्द्दश ।तिस्रो वा हस्तयोः सप्त चतुर्द्दश षोडश
पाण्योरेकां मृदं पृष्ठे षड्वा तिस्रश्च मृत्तिकाः ।हस्तद्वयनखेष्वेकां तिस्रश्च षड्मृदस्तथा
*
मैथुने रेतःस्खलने मूत्रोत्सर्गे मृद्द्वयम् ।दद्यात्तिस्रश्च शिश्नैकां तिस्रो वामकरे मृदः
हस्ते मृद्द्वयं म्रक्षेत्तिस्रो वा शुद्धितत्परः ।पदैकैके द्विजस्तिस्रो गृहीत्थं शौचमाचरेत्
गृहिणो द्बिगुणं शौचं यत्नतो ब्रह्मचारिणाम् ।गृहस्थवानप्रस्थानां प्रोक्तं त्रिगुणमेव
सन्न्यासिनां वैष्णवानां शौचं सेव्यं चतुर्गुणम् ।हस्तपाद्बारिपात्रन्तु मृद्भिरद्भिश्च गोमयैः
दिवा यद्विहितं शौचं निशायामर्द्धकं भवेत् ।एतदर्द्धमशौचे तु जातके मृतकेऽपि
चौरादिवाधिते मार्गे शौचमस्यार्द्धमाचरेत् ।योषितामेतदर्द्धन्तु शूद्रादीनाञ्च नारद !
व्याधिभिश्चातुरो मर्त्य आर्त्तो यदि यथाबलम् ।शौचं कुर्य्यात् कृतं यत्र तत् स्थानं शोधयेज्जलैः
वेदस्मृतिपुराणानि धर्म्मशास्त्राणि नैत्यिकम् ।मैत्रादिकर्म्म यः कुर्य्याद्विहाय मन्दधीर्द्विजः
प्रतिप्रज्ञानमायुश्च प्रज्ञां हन्ति यशः श्रियम् ।बलमाचारहीनस्य सदा तस्यापवित्रता
*
सात्वताश्चेद्द्विजा भूपा वैश्यशूद्रान्त्यजाः स्त्रियः ।कुर्व्वन्ति शौचं यत्नेन यावच्चेतःपवित्रता
येषां कृष्णस्य मननं तथा नामप्रजल्पनम् ।सदैव स्मरणं भागवतानां साधुसेवनम्
भक्तिप्रधौतमनसां गोविन्दार्पितकर्म्मणाम् ।बाह्यान्तःकृष्णचित्तानां शुचिता तदहर्निशम्
मृद्गोमयजलैः शौचमनेकैः कुरुते यदि ।मनोऽपवित्रता यस्य कदाचिद्वै शुध्यति
गोविन्ददासता नास्ति यस्य लोकस्य जन्मनि ।सोऽपि देहाशुचिः कृत्वा शौचं मैत्रादिकर्म्मसु
शतधा यदि देवर्षे शौचं कुर्य्यात् सहस्रधा ।मृद्वारिगोमयैर्लोको भावदुष्टो शुध्यति
सदा चित्तापवित्रत्वमकार्ष्णो भुवि यो नरः ।तस्य तु स्यान्न मैत्रादिशौचेनैव शुध्यति
पर्व्वताकारकूटैश्च गोविट्सर्व्वनदीजलैः ।शौचं कृत्वा शुध्येत दुष्टचित्तो भवेद्यदि
”इति पाद्मोत्तरखण्डे १०९ अध्यायः
(उदकम् इति निघण्टुः १२
“पूरयतिजगत् प्रलयकाले पूर्य्यते अनेन तडाकादि पालकंवा जगतः शस्योत्पत्तिहेतुत्वात् प्रीणातेर्वाबाहुलकात् कीषन्प्रत्ययः ईकारस्योकारा-देशः पकारात् परो द्रष्टव्यः ।” इति तत्रदेवराजयज्वा
यथा, ऋग्वेदे १६३ ।“यदक्रन्दः प्रथमं जायमानउद्यन्त्समुद्रादुत वा पुरीषात्
”“पुरीषात् सर्व्वकामानां पूरकादुदकात्
”इति तद्भाष्ये सायनः
)
वाचस्पत्यम्
Sanskrit
पुरीष
न०
पॄ--ईषन् किच्च विष्ठायाम् अमरः उदके नि-षण्टुः पुरीषिन्शव्दे दृश्यम् विष्ठात्यागप्रकारादिकं यथा“मूहूर्त्ते ब्राह्म उत्थाय रात्रिवासं परित्यजेत् परिधायारं वस्त्रं शयनस्थानतोन्यहम् मुखाङ्घ्रिहस्तान्प्रक्षाल्य द्विराचम्य ततो द्विजः कृष्ण! कृष्ण! स्मृतिं कृत्वाखनित्वा नैरृतीं दिशम् खनित्रखननेनैव द्वादशा-ङ्गल्यधोमृदम् गृहीत्वोदकपात्रञ्च मितं गच्छेद्धनुःशतम् ग्रामाद्वा शरविक्षेपमात्रमनुदिते रवौ मैत्र-मावश्यकं कर्तुं नगराच्च चतुर्गुणम् तत्त्रिमुष्ट्यायतंगर्त्तं तथा कृत्वा गभीरकम् कृत्वा त्वद्भिः खनित्रेणकुशैराच्छाद्य तत्तृणम् शुष्कैः काष्ठैरयज्ञीयैर्भूगर्त्त-मवगुण्ठितः सवीताङ्गो वेणुदलैः पत्रैर्मृण्मयभा-जनैः छत्रं खनित्रं संस्थाप्य वारिपात्रमुपानहौ ।ततो द्विजस्तूपविशेद्वस्त्रेणाच्छाद्य मस्तकम् यज्ञोप-वीतं कर्णेऽथ धृत्वा मोनी दक्षिणे अग्रतो द्विज-मग्निं नो पश्यन् सन्तञ्च भास्करम् गुरुं समीरणंसर्वदेवतामूर्त्तिमेव मातरं पितरं चन्द्रं सर्वंगुरुजनं स्त्रियम् उदङ्मुखस्त्रिसन्ध्यासु दिवसे चयदा निशि दक्षिणामुख उत्सर्गं कुर्य्यान्मूत्रपुरी-पयोः पूर्वाह्णे तु द्विजः कुर्य्यात् पश्चिमाभिमुखो-ऽथ वा अपराह्णे पूर्वमुखो मूत्रगूथविसर्जनम् ।मध्याह्ने प्रयतः कुर्य्याद्यतवागुत्तरामुखः दक्षिणाभि-मुखो रात्रौ द्विजो मैत्रं प्रयत्नतः निशायामन्धकारे तुछायायां दिवसे तथा यथेच्छं सुमुखो भूत्वा मैत्रंकुर्य्यात् द्विजो भयात् दिग्भ्रमाच्च मनोदुःखाद्वि-ण्मूत्रस्य विसर्जनम् मोहाद्वाऽधोमुखः कुर्य्याद्यत-वाकप्रयतो द्विजः सन्न्यासी ब्रह्मचारी वानप्रस्थोगृही द्विज! शाखाध्यायी वेदानां सर्वयज्ञेषुदीक्षितः मुनिश्च सर्वधर्मज्ञो दान्तः शान्त उदारधीः ।सदोत्तरमुखः कुर्य्याद्वैष्णवो नान्य एव प्रातश्चमैत्रं सायाह्ने दक्षिणामिमुखो निशि योगिनान्तुतथा स्त्रीणां शूद्रादीनामयं क्रमः देवायतने वृक्ष-मूले जले नदे नदीकूपमार्गेषु वापी-गोष्ठभस्मसु चिताग्निश्मशानेषु नोषरे द्विजा-लये नाम्भःसमीपे पुण्ड्रे नाकाशे शाद्बले ।न समुद्रे काम्ये तीर्थे द्विजाश्रमे यज्ञ-वृक्षमूलेषु नोपद्वारे चतुष्पथे शस्यक्षेत्रे खलेपुष्पोद्याने चत्वरे सोपानत्कोन नग्नश्च रथ्या-सेव्यभूले वैष्णवालये गोत्रे सूर्य्याभिमुख-स्तथा फालकृष्टकेदारे तिष्ठंश्च सदाचन नगच्छन्न वल्मीके पर्वतमस्तके जलंन दिशोमागान्नाकाशमवलोकयन् गोव्रजेनदीतीरे नित्यस्थाने गोमये यज्ञभूमौ नगृहे पवित्रीकृतस्थले द्विजो देहच्छायायां शकृ-न्मूत्रविश्चजेनम् कुर्य्याद् यज्ञेष्टकाकूटे सप्राणि-गर्त्तके उद्धृताम्भोमृत्तिकाभ्यामित्थं नारद! यत्नतः ।कृत्वोत्सर्गं ततः कुर्य्यात् शौचं म्त्रपुरीषयोः शुष्क-काष्ठेन लोष्टेनायज्ञीयेन तृणेन वा प्रमार्ज्य गुह्य-मुत्तिष्ठेत् शिश्रञ्चैव विशेषतः विधृत्य वामहस्तेनशिश्नं तूपविशेन्निशि चेद्दक्षिणामुखः सन्ध्यां दिवोत्तर-मुखस्तदा पूतिगन्धि जलं दुष्टं सफेनञ्च सबुद्बुदम् ।तीर्थोदकं सलवणं पाथो वर्णान्तरन्तथा समुद्रगानदीवारः सामुद्रञ्च सकर्दमम् यवनान्त्यजखाताम्भःसमुद्रगनगोदकम् धान्यक्षेत्रस्य सलिलं सकीटञ्चपरित्यजेत् मानवो देवखाताम्भः सकले शौचकर्मणि” ।“मृदः सकीटास्तीर्थानां देवायतनगोष्ठयोः नदोदधिनदीदेवखाततीरस्य मृत्तिकाः महीतलोद्भवाः क्षेत्रकूड्ययोः सिकताश्च याः अन्तर्जला धूलिमृदोवल्मीकस्य कर्दमाः उषराश्च हलोत्खातामूत्तिका भवनस्य अश्वत्थतुलसीधात्रीमूलादीनां चया मृदः श्मशानभूमेः शैलस्य तथाऽपूतस्थलस्यच शौचावशिष्टा मार्गस्य आखूत्खाताश्च मृत्तिकाः ।वज्ञस्थानस्य विप्राणां साधूनामालयस्य मृत्तिकावर्जवेदेता देवर्षे! शौचकर्मणि पवित्रस्थानतोग्राह्या द्वादशाङ्गुल्यधोभृदः द्विजः सकलशौचार्थंशर्करादिविवर्जिताः प्रथमेऽद्भिनेरः शौचं कुर्व्यान्-मृद्भिरतःपरम् पुनर्जलैः पुरीषस्य यथा गन्धक्षयोभवेत् मृत्तिका प्रथमा शौचे त्वर्द्धप्रसृतिसम्मिता ।पूर्णप्रसृतिमात्रा तु द्वितीया सजला तथा तृतीयाप्रमिता शौचे सार्द्धप्रसूतिमृत्तिका चतुर्थ्याद्याःक्रमादेवमर्द्धप्रसृतिवर्द्धिताः यया मृत्तिकया पूर्य्यंत्रिपर्व शौचकारिणः अर्द्धप्रसृतिमात्रा सा मुनिभिःपरिकीर्त्तिता गुदे दद्यान्मृदन्तिस्रः पञ्च वा सप्त वातथा मृदमेकां तथा शिश्ने निस्रो वा मृत्तिकाद्वयम् ।सप्त वामकरे दद्यान्मृदस्त्रिंशच्चतुर्दश तिस्रो वाहस्तयोः सप्त चतुर्दश षीडश पाण्योरेकां मृदंपृष्ठे षड् वा तिखश्च मृत्तिकाः हस्तद्वयनखेष्वेकांतिखश्च षड् मृदस्तथा मैथुने रेतःस्खलने मूत्रोत्सर्गेच मृद्द्वयम् दद्यात्तिस्रश्च शिश्ने तिखो वामकरेऋदः हस्ते मृद्द्वयं म्रक्षेत्तिस्रो वा शुद्धितत्परः ।पादैकैके द्विजस्तिस्रो गृहीत्थं शौचमाचरेत् गृहिणोद्विगुणं शौचं यत्नतो ब्रह्मचारिणाम् गृहस्थात् वान-प्रस्थानां प्रोक्तं द्विगुणमेव सन्न्यासिनां वैष्णवानांशौचं सेव्यं चतुर्गुणम् हस्तपाद्वारिपात्रेषु मृद्भि-रद्भिश्च गोमयैः दिवा यद्विहितं शौचं निशाया-मर्द्धकं भवेत् एतदर्द्धमशौचे तु जातके मृतकेऽपिच चोरादिवाधिते मार्गे शौचमस्यार्द्धमाचरेत् ।योषितामेतदर्द्धत्नु शूदादीनाञ्च नारद! व्याधिभि-श्चातुरो मर्त्त्य आर्त्तो यदि यथाबलम् शौचं कुर्य्यात्कृतं यत्र तत् स्थानं शोधयेज्जलैः वेदस्मृतिपुराणानिधर्मशास्त्राणि नैत्यिकम् मैत्रादिकर्म यः कुर्य्याद्वि-हाय मन्दधीर्द्विजः प्रतिप्रज्ञानमायुश्च प्रज्ञां हन्ति-यशः श्रियम् नलमाचारहीनस्य सदा तस्यापवि-त्रता सात्वताश्चेद्द्विजा भूपा वैश्यशूद्रान्त्यजाःस्त्रियः कुर्वन्ति शौचं यत्नेन यावच्चेतःपवित्रता ।येषां कृष्णस्य मननं तथा नामप्रजल्पनम् सदेवस्मरणं भागवतानां साधुसेवनम् भक्तिप्रधौतजनसांगोविन्दार्पितकर्मणाम् वाह्यान्तःकृष्णचित्तानां शु-चिता तदहर्निशम् मृद्गोमयजलैः शौचमनेकैः कुरुतेयदि मनोऽपवित्रता यस्य कदाचिद्वै शुध्यति ।गोविन्ददासता नास्ति यस्य लोकस्य जन्मनि सोऽपिदेहाशुचिः कृत्वा शौचं मैत्रादिकर्ममु शतथा यदिदेवर्षे! शौचं कुर्य्यात् सहस्नधा मृद्वारिगोमयैर्लोकोभावदुष्टो शुध्यति सदा चित्तापवित्रत्वमकार्णाभुवि यो नरः तस्य तु स्यान्न मैत्रादिशौचेनैव सशुध्यति पर्वताकारकूटैश्च गोविट्सर्वनदीजलैः शौचंकृत्वा शुध्येत दुष्टचित्तो भवेद् यदि” पाष्मोत्तर-खण्डे १०९ अ० पुरीषतुल्यायां गृदि यवसे वेददी०पुरीषवाहनशब्दे दृश्यम्
Capeller
German
पु॑रीष
n.
Erde, Land, Schutt, Unrat, Kot.
Grassman
German
púrīṣa, n., ursprünglich „das Füllende, Ausfüllende“ [von pur]
daher „das zur Ausfüllung der Zwischenräume dienende (Schutt, Geröll)“, daher „der Dunst“ als das die Luft Füllende, „Nebel, Feuchtigkeit“. 1〉 Dunst, Nebel
2〉 vielleicht: Feuchtigkeit, Nass, Wasser
3〉 Schutt, Geröll. Diese letzte Bedeutung im RV. nicht sicher nachweisbar.
-am 1〉 {853, 23} (bṛ́būkam). 2〉 {399, 6}.
-āt 1〉 samudrā́t utá {163, 1}
{317, 3}
sū́ryasya bṛhatás {853, 21}.
-āṇi 1〉 ápiāni {490, 6}.
(?) {932, 5}.
Burnouf
French
पुरीष पुरीष et पुरीषण
n.
excréments, ordure.
Stchoupak
French
पुरीष-
nt. fèces, excréments, ordure.
°भीरु-
m.
n.
d'un prince.
°पुरीषोत्सर्ग-
m.
évacuation des excréments.