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नदी (nadI)

 
Capeller Eng
English
नदी v. नद॑.
Apte
English
नदी [nadī], A river, any flowing stream
रविपीतजला तपात्यये पुनरोघेन हि युज्यते नदी
Ku.*
4.44
यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे$ स्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय Muṇḍa.
Comp.
ईनः, ईशः, कान्तः the ocean
नदीनः पर्यन्ते परमपदवीनः प्रभवति Karpūrastava.
An epithet of Varuṇa
L.
D. B.
कान्ता the rose-apple.
a shrub. -कूलम्, -तीरम् the bank of a river. -कूलप्रियः a kind of reed. -ज
a.
aquatic.
(जः) an epithet of Bhīṣma.
antimony. (-जम्) a lotus. -तर
a.
crossing a river. -तरस्थानम् a landing-place, ferry. -दोहः freight, river-toll, fare.-धरः an epithet of Śiva. -पङ्कः the marshy bank of a river.
पतिः the ocean.
an epithet of Varuṇa. -पूरः a river which has overflown its banks.-भवम् river-salt. -मातृक
a.
watered by rivers, irrigated, supplied with the water of rivers, canals
&c.
(as a country
&c.
)
संग्रामभूमीषु भवत्यरीणामस्रैर्नदीमातृकतां गतासु
N.*
3.38
cf.
देवमातृक
देशो नद्यम्बुवृष्ट्यम्बुसंपन्नव्रीहिपालितः स्यान्नदीमातृको देवमातृकश्च यथाक्रमम् Ak. -मार्गः the course of a river.
मुखम् the mouth of a river
नदीमुखेनैव समुद्रमाविशत्
वृद्धौ नदीमुखेनैव प्रस्थानं लवणाम्भसः R.
a kind of grain. -रयः the current of a river. -वङ्कः the bend or arm of a river.
ष्णः (स्नः) bathing in rivers
ततो नदीष्णान् पथिकान् गिरिज्ञान्
Bk.*
2.43.
knowing the dangerous spots in rivers, their depth, course
&c.
ततः समाज्ञापयदाशु सर्वानानायिनस्तद्विचये नदीष्णान्
R.*
16.75
(hence)
experienced, clever. -सर्जः the Arjuna tree.
Apte 1890
English
नदी A river, any flowing stream
रविपीतजला तपात्यये पुतरोघेन हि युज्यते नदी Ku. 4. 44.
Comp.
ईनः,
ईशः,
कांतः the ocean.
कांता {1} the roseapple. {2} a shrub.
कूलप्रियः a kind of reed.
a. aquatic. (
जः) {1} an epithet of Bhīṣma. {2} antimony. (
जं) a lotus.
तरस्थानं a landing-place, ferry.
दोहः freight, river-toll, fare.
धरः an epithet of Śiva.
पंकः the marshy bank of a river.
पतिः,
ईनः {1} the ocean. {2} an epithet of Varuṇa.
पूरः a river which has overflown its banks.
भवं river-salt.
मातृक a. watered by rivers, irrigated, supplied with the water of rivers, canals &c. (as a country &c.)
N. 3. 38
cf. देवमातृक.
रयः the current of a river.
वंकः the bend or arm of a river.
ष्णः (स्नः) {1} bathing in rivers. {2} knowing the dangerous spots in rivers, their depth, course &c.
ततः सताज्ञापयदाशु सर्वानानायिनस्तद्विचये नदीष्णान् R. 16. 75
(hence) {3} experienced, clever.
सर्जः the Arjuna tree.
Monier Williams Cologne
English
नदी a (ई),
f.
See नदी॑.
नदी॑ b
f.
flowing water, a river (commonly personified as a female
but See नद॑ above),
RV.
&c.
&c.
(ifc. नदिका
cf.
कु-नदिका and गिरि-
ind.
-नदि
cf.
उप-नदि [beside -नदम्,
fr.
नद॑,
Pāṇ.
v, 4, 110])
N.
of 2 kinds of metre,
Col.
of partic.
fem.
stems ending in or (as नदी itself),
Pāṇ.
i, 4, 3,
&c.
Monier Williams 1872
English
नदी नदी। See rt. नद्, p. 466, col. 2.
Macdonell
English
नदी nad-ī́,
f.
river: -kūla,
n.
river-bank
🞄-tara,
m.
swimming across a river
-tīra,
n.
🞄river-bank.
Apte Hindi
Hindi
नदी
स्त्री*
- नद + ङीप्
"दरिया, प्रवहणी, सरिता"
Shabdartha Kaustubha
Kannada
नदी
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ನದಿ /ಹೊಳೆ
निष्पत्तिः - > णद (अव्यक्ते शब्दे) - "अच्" (३-१-१३४)
व्युत्पत्तिः - > नदति
प्रयोगाः - > "विविधकामहिता महिताम्भसः स्फुटसरोजवना जवना नदीः"
उल्लेखाः - > किरा० ५-७
विस्तारः - > ಪಚಾದಿಗಣದಲ್ಲಿ ಎಂದು ಟಕಾರಾಂತವಾಗಿರುವುದರಿಂದ ङीप् (४-१-१५) "नदी सरिति शोणादौ ना" - मेदि० ಎಂಟು ಸಾವಿರ ಧನುಃಪ್ರಮಾಣಕ್ಕೆ ಕಡಿಮೆಯಿಲ್ಲದಷ್ಟು ದೂರ ಪ್ರವಹಿಸುವ ಜಲಪ್ರವಾಹಕ್ಕೆ ನದಿಯೆಂದು ಹೆಸರು. "धनुः सहस्राण्यष्टौ गतिर्यासां विद्यते ता नदीशब्दवहा गर्तास्ते परिकीर्तिताः ॥"
L R Vaidya
English
nadI {% f. %} A river, any flowing water, नदीमिवांतः सलिलां सरस्वतीम् R.iii.9, M.vi.90.
भूतसङ्ख्या
Sanskrit
४, अपस्, अब्धि, अम्बु, अम्बुधि, अम्बुनिधि, अम्भोधि, अम्भोनिधि, अय, अर्णव, आप, आम्नाय, आय, आश्रम, उदधि, उदन्वान्, उपाय, कषाय, कृत, केन्द्र, कोष्ठ, गति, जल, जलधि, जलनिधि, तुरीय, तुर्य, तोय, दिक्, दिश्, दिशा, ध्यान, नदी, निगम, निम्नगेश, नीरधि, नीरनिधि, पयोधि, पयोनिधि, पाथ, पाथोधि, पितामहास्य, प्रणिम्नगेश, बन्ध, बन्धु, ब्रह्मोद्भव, महोर्मि, महोर्मिक, माल, युग, लवणोद, लोकपाल, वर्ण, वारिधि, वारिनिधि, वार्धि, विषधि, विषनिधि, वेद, श्रुति, सञ्ज्ञा, समुद्र, सलिलाकर, सागर, सुख
Bopp
Latin
नदी f. (a praec. signo fem. ई) id. MAH. 2. 751.
Lanman
English
nadī́, f. roaring stream
river. [√nad: cf.
Νέδα, Νέδων, names of streams.]
Abhyankara Grammar
English
नदी a technical term applied in Panini's grammar to words in the feminine gender ending in and excep- ting a few like स्त्री, श्री, भ्रू and others
it is optionally applied to words ending in and उ, of course in the fem. gender, before case affix- es of the dative, ablative, genitive and locative sing. The term was probably in use before Panini and was taken from the fem. word नदी which was taken as a model. Very probably there was a long list of words like नद् ( नदट्) चोर ( चोरट् ) etc. which were given as ending in ट् and to which the affix (ङीप्) was added for forming the femi- nine base
the first word नदी so formed, was taken as a model and all words in the list and similar others were called नदी
cf. P. I 4. 3-6.
Wordnet
Sanskrit
Synonyms:
नदी, सरित्, तरङ्गिणी, शैवलिनी, तटिनी, धुनी, स्रोतस्वती, द्वीपवती, स्रवन्ती, निम्नगा, आपगा, स्रोतस्विनी, स्रोतोवहा, सागरगामिनी, अपगा, निर्झरिणी, सरस्वती, समुद्रगा, कूलङ्कषा, कूलवती, शैवालिनी, समुद्रकान्ता, सागरगा, रोधोवती, वाहिनी
noun
जलस्य सः प्रवाहः यः पर्वतात् आरभ्य विशिष्टमार्गेण सागरं प्रति गच्छति।
"पर्वतप्रदेशे पाषाणसिकतादिषु नदी मार्गम् आक्रमति ।/ पाणिनेः नदी गङ्गा यमुना नदी स्थली।"
Synonyms:
नदी
noun
वृत्तविशेषः
"नदी नाम्ना द्वे वृत्ते सन्ति"
Sanskrit Tibetan
Tibetan
klung
१) सलिलोदक २) ओध (?) ३) नदी
klung chen po
१) नदी २) महानदी
chu
१) अप् २) अब्धातु ३) अम्बु ४) अम्भस् ५) उदक ६) चन्द्र ७) जल ८) तोय ९) नदी १०) पयः ११) पानीय १२) प्रवाह १३) मूत्र १४) वारि १५) सरित् १६) सलिल १७) सलिलोदक १८)
chu klung
१) ओघ २) नदी
chu bo
१) आपगा २) ओघ ३) नद ४) नदी ५) वाहिनी
klung chen po
नदी
अभिधानचिन्तामणिः
Sanskrit
--source--
नदी हिरण्यवर्णा स्याद्रोधोवक्रा तरङ्गिणी १०७९
सिन्धुः शैवलिनी वहा ह्रदिनी स्रोतस्विनी निम्नगा
स्रोतो निर्झरिणी सरिच्च तटिनी कूलंकषा वाहिनी
कर्बुर्द्वीपवती समुद्रदयिताधुन्यौ स्रवन्तीसर-
स्वत्यौ पर्वतजापगा जलधिगा कुल्या जम्बालिनी १०८०
-wordlist-
नदी (स्त्री), हिरण्यवर्णा (स्त्री), रोधोवक्रा (स्त्री), तरङ्गिणी (स्त्री), सिन्धु (पुंस्त्री), शैवलिनी (स्त्री), वहा (स्त्री), ह्रदिनी (स्त्री), स्रोतस्विनी (स्त्री), निम्नगा (स्त्री), स्रोतस् (क्ली), निर्झरिणी (स्त्री), सरित् (स्त्री), तटिनी (स्त्री), कूलङ्कषा (स्त्री), वाहिनी (स्त्री), कर्षू (स्त्री), द्वीपवती (स्त्री), समुद्रदयिता (स्त्री), धुनी (स्त्री), स्रवन्ती (स्त्री), सरस्वती (स्त्री), पर्वतजा (स्त्री), जलधिगा (स्त्री), कुल्या (स्त्री), जम्बालिनी (स्त्री)
अभिधानरत्नमाला
Sanskrit
सिन्धु
सिन्धु, स्रवन्ती, तटिनी, तरङ्गिणी, नदी, धुनी, निर्झरिणी, निम्नगा, कूलङ्कषा, शैवलिनी, सरस्वती, समुद्रकान्ता, ह्रदिनी, आपगा, स्रोतस्, स्रोतस्विनी, कर्षू, कुल्या, द्वीपवती, सरित्, रोधस्, वप्र, भिद्य, उद्ध्य, नद
सिन्धुः स्रवन्ती तटिनी तरङ्गिणी,
नदी धुनी निर्झरिणी निम्नगा
कूलङ्कषा शैवलिनी सरस्वती,
समुद्रकान्ता ह्रदिनी तथापगा ६६५
स्रोतः स्रोतस्विनी कर्षूः कुल्या द्वीपवती सरित्
रोधो वप्रस्तु विज्ञेयो भिद्य उद्ध्यो नदः स्मृतः ६६६
verse 3.1.1.665
page 0076
सिन्धु
सिन्धु, नदी, समुद्र
नदीसमुद्रयोः सिन्धुर्देशपर्वतयोर्मरुः
verse 5.1.1.838
page 0096
नाममाला
Sanskrit
स्रोतस्विनी, धुनी, सिन्धु, स्रवन्ती, निम्नगा, आपगा, नदी, नद, द्विरेफ, सरित्, तरङ्गिणी
स्रोतस्विनी धुनी सिन्धुः स्रवन्ती निम्नगाऽपगा
नदी नदो द्विरेफश्च सरिन्नामा तरङ्गिणी २४
verse 0.1.1.24
page 0012
Vedic Reference
English
Nadī, ‘stream, is mentioned in the Rigveda^1 and later.^2
Reference is made to shallows (gādha)^3 in the river's bed, to
the opposite bank (pāra), ^4 and to the bathing of horses in
streams.^5 Rivers are also mentioned in close connexion with
mountains.^6 The title Nadī-pati, ‘lord of rivers, ’^7 is once
used to express ‘ocean’ or ‘sea-water.’
1) i. 158, 5
ii. 35, 3
iii. 33, 4
v. 46,
6, etc.
2) Av. iii. 13, 1
xiv. 1, 43.
3) Rv. vii. 60, 7.
4) Śatapatha Brāhmaṇa, xi. 1, 6, 6.
5) Rv. viii. 2, 2.
6) Rv. v. 55, 7
x. 64, 8.
7) Śatapatha Brāhmaṇa, v. 3, 4, 10.
अमरकोशः
Sanskrit
Word: नदी
Root: नदी
Gender: undefined
Number: undefined
Meaning(s):
nadI
river
flowing water
Shloka(s):
1|10|29|2 स्यादालवालमावालमावापोऽथ नदी सरित्॥ (वारिवर्गः)
1|10|30|1 तरङ्गिणी शैवलिनी तटिनी ह्रादिनी धुनी। (वारिवर्गः)
1|10|30|2 स्रोतस्वती द्वीपवती स्रवन्ती निम्नगापगा॥ (वारिवर्गः)
1|10|30|3 कूलङ्कषा निर्झरिणी रोधोवक्रा सरस्वती। (वारिवर्गः)
3|3|70|1 नदी नगर्योर्नागानां भोगवत्यथ सङ्गरे। (नानार्थवर्गः)
3|3|101|1 देशे नदविशेषेऽब्धौ सिन्धुर्ना सरिति स्त्रियाम्। (नानार्थवर्गः)
3|3|112|1 वाणिन्यौ नर्तकीदूत्यौ स्रवन्त्यामपि वाहिनी। (नानार्थवर्गः)
Synonym(s):
1|10|29|2 (नदी) (स्त्री)
1|10|29|2 सरित् (सरित्) (स्त्री) river, ocean, creek, stream, thread, Ganges, string, lord of rivers, metre of 72 syllables, expression for the number four
1|10|30|1 तरङ्गिणी (तरङ्गिणी) (स्त्री)
1|10|30|1 शैवलिनी (शैवलिनी) (स्त्री)
1|10|30|1 तटिनी (तटिनी) (स्त्री)
1|10|30|1 ह्रादिनी (ह्रादिनी) (स्त्री)
1|10|30|1 धुनी (धुनी) (स्त्री)
1|10|30|2 स्रोतस्विनी (स्रोतस्विनी) (स्त्री)
1|10|30|2 द्वीपवती (द्वीपवती) (स्त्री)
1|10|30|2 स्रवन्ती (स्रवन्ती) (स्त्री)
1|10|30|2 निम्नगा (निम्नगा) (स्त्री) river, descending, mountain-stream, going downwards
1|10|30|2 आपगा (आपगा) (स्त्री)
1|10|30|3 कूलङकषा (कूलङ्कषा) (स्त्री)
1|10|30|3 निर्झरिणी (निर्झरिणी) (स्त्री)
1|10|30|3 रोधोवक्रा (रोधोवक्रा) (स्त्री)
1|10|30|3 सरस्वती (सरस्वती) (स्त्री) cow, any river, eloquence, excellent woman, learning wisdom, name of a river [mythical], celestial or oracular voice, speech or the power of speech, region abounding in pools and lakes, deity identified with education and knowledge
3|3|70|1 भोगवती (भोगवती) (स्त्री) serpent-nymph, night of the 2nd lunar day, sacred river of the serpent-demons, city of the serpent-demons in the subterranean regions
3|3|101|1 सिन्धुः (सिन्धु) (स्त्री)
3|3|112|1 वाहिनी (वाहिनी) (स्त्री) host, river, channel, battalion, army [mil.], body of forces, particular division of an army
Related word(s):
परा_अपरासंबन्धः सरस्वती_नदी
जातिः प्राकृतिकस्थानम्
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskrit
नदी,
स्त्री,
(नदतीति नद + अच पचादिगणेनदट् इति निर्द्देशात् टिड्ढेडि ङीप् ।) अष्ट-सहस्रधनुरन्यूनव्याप्ततोया सा गङ्गायमुना-सरस्वतीकावेरीगोदावरीप्रभृतिः तस्या लक्ष-णमाह छन्दोगपरिशिष्टम् ।“धनुःसहस्राण्यष्टौ गतिर्यासां विद्यते ।न ता नदीशब्दवहा गर्त्तास्ताः परिकीर्त्तिताः
”इति तिथितत्त्वम्
तत्पर्य्यायः सरित् तरङ्गिणी शैवलिनी ४तटिनी ह्रदिनी धुनी स्रोतस्वती ८द्वीपवती स्रवन्ती १० निम्रगा ११ आपगा १२ ।इत्यमरः १० ३०
ह्रादिनी १३ धुनिः १४स्रोतस्विनी १५ स्रोतोवहा १६ सागरगामिनी १७अपगा १८ इति भरतः
निर्झरिणी १९सरस्वती २० समुद्रगा २१ कूलङ्कषा २२ कूल-वती २३ शैवालिनी २४ सिन्धुः २५ समुद्र-कान्ता २६ सागरगा २७ कृष्णा २८ रोधो-वती २९ वाहिनी ३० तज्जलगुणाः स्वच्छ-त्वम् लघुत्वम् दीपनत्वम् पाचनत्वम् ।रुच्यत्वम् तृष्णापहत्वम् पथ्यत्वम् मधु-रत्वम् ईषदुष्णत्वञ्च
*
“सर्व्वा गुर्व्वी प्राङ्मुखी वाहिनी स्या-ल्लघ्वी पश्चाद्वाहिनी निश्चयेन ।देशे देशे तद्गुणा सा विशेषा-न्नैषा धत्ते गौरवं लाघवञ्च
प्रायो मृदुवहा गुर्व्वो लघ्व्यः शीघ्रवहाः स्मृताः ।नद्यः पाषाणसिकतावाहिन्यो विमलोदकाः
हिमवत्प्रभवा याश्च जलं तास्वमृतोपमम्
विन्ध्यात् प्राची प्राच्यवाची प्रतीचीया चोदीची स्यान्नदी सा क्रमेण ।वातारोग्यं श्लेष्मपित्तार्त्तिलोपंपित्तोद्रेकं पथ्यपाकञ्च धत्ते
पारिपात्रभवा याश्च विन्ध्याख्यप्रभवाश्च याः ।शिरोहृद्रोगकुष्ठानां ता हेतुः श्लीपदस्य
”इति राजनिर्घण्टः
(यथा ।“तथा प्राच्यां गमाश्चान्याः पश्चिमानुगमास्तथा ।”“ससैकता सपाषाणा द्बिविधा चाम्बुवाहिनी ।एवं चतुर्व्विघा नद्यो वातपित्तकफात्मिकाः
सदावहायास्त्वनवद्यमुष्णंमरुत्कफानां शमनञ्च तस्याः ।नीरं वसन्ते हितकृद्विशेषात्नदीभवं नैव हिमागमे
घनविमलशिलानां स्फालनाज्जातफेनंबहुलसजलवीचिच्छन्नसंक्षोभदृप्तम् ।ननु लघु सुशीतं नैव चोष्णं घनञ्चहरति पवनपित्तं श्लेष्मकृद्वारि सम्यक्
इति पाषाणनदीवारिगुणाः
*
सुघनविमलतोयं सैकतायाः प्रवाहंन भवति लघुत्वं श्लेष्मकृद्धन्ति पित्तम् ।भवति मधुरमेवं किञ्चिदुष्णं कषायंभवति सुखकृत्तच्छोषमूर्च्छां निहन्ति
इति सबातुकानदीवारिगुणाः
*
हिमवत्प्रभवा नद्यः पुण्या देवर्षिसेविताः ।घनपाषाणसिकतावाहिन्यो विमलोदकाः
हन्ति वातकफं तोयं श्रमशोषविनाशनम् ।किञ्चित् करोति वा पित्तं त्रिदोषशमनञ्जलम्
मलयप्रभवा नद्यः शीततोयामृतोपमाः ।हन्ति वातञ्च पित्तञ्च भ्रमशोषश्रमापहम्
गङ्गा सरस्वती शोनं यमुना सरयूः सची ।वेणा इरावती नीला उत्तरात् पूर्व्ववाहिनी
हिमवत्प्रभवा ह्येता हिमसम्भवशीतलाः ।समाः सर्व्वगुणैर्नद्यो वातश्लेष्महरा नृणाम्
आसां नवशतैर्युक्ता गङ्गा पूर्व्वसमुद्रगा ।तथा चर्म्मन्वती वेत्रवती पारावती तथा
सिप्रा महाप्रदीप्ता ऋषिकुल्या पयस्विनी ।शेवन्ती शैवलिन्यश्च सिन्धुयुक्ताः समुद्रगाः
वातपित्तहरं नीरं त्रिदोषघ्नमतःपरम् ।श्रमम्लानिहरं वृष्यं उत्तराशानुगामिनी
इति नद्य उत्तरानुगाः
*
तापी तापा गोलोमी गोमती शालिता मही ।सरस्वतीयुता नद्यो नर्म्मदा पश्चिमानुगाः
आसां जलं घनं शीतं पित्तघ्नं कफकृत्तथा ।वातदोषहरं हृद्यं कण्डूकुष्ठविनाशनम्
पश्चिमाद्रिसमुद्भूता गौतमी पुण्यभावना ।अस्याः शीतं जलं वापि कफवातविकारकृत्
पित्तप्रशमनं बल्यं मूत्रदोषविकारकृत् ।पुण्या पयस्विनी वेता प्रणीता वरानना
द्रोणा गोवर्द्धनी चान्या गौतम्यानुगता इमाः ।आसां जलं घनं नातिवातश्लेष्मविकारकृत्
पूर्व्वसागरगाश्चैव नद्यो नवशतैर्युताः
कावेरी वीरकान्ता भीमा चैव पयोष्णिका ।विभावरी विशाला गौरीदा मदनस्वसा
पार्व्वती चापरा नद्यो दक्षिणाद्रिगमा हिमाः ।प्रत्येकशो सेवेत युक्तायाश्च पृथक् पृथक्
सर्व्वासां परिसङ्ख्या शतानाञ्चैकविंशतिः ।क्रोशं क्रोशं भवेत् कुल्या योजने योजने नदी
योजनद्दयतो ज्ञेया महानीरा बुधैर्नदी
”इति हारीते प्रथमे स्थाने सप्तमेऽध्याये
“पश्चिमोदधिगाः शीघ्रवहा याश्चामलोदकाः ।पथ्याः समासात्ता नद्यो विपरीतास्त्वतोऽन्यथा ।उपलास्फालनाक्षेपविच्छेदैः खेदितोदकाः
हिमवन्मलयोद्भूताः पथ्यास्ता एव स्थिराः ।कृमिश्लीपदहृत्कण्ठशिरोरोगान् प्रकुर्व्वते
प्रच्यावन्त्या परान्तोत्था दुर्नामानिमतेन्द्रजाः ।उदरश्लीपदातङ्कान् सह्यविन्ध्योद्भवाः पुनः
कुष्ठपाण्डुशिरोरोगान् दोषघ्नाः पारिपात्रजाः ।बलपौरुषकारिण्यः --
”इति वाभटे सूत्रस्थाने पञ्चमेऽध्याये
“तत्र नद्यः पश्चिमाभिमुखाः पथ्या लघूदकत्वात् ।पूर्व्वाभिमुखास्तु प्रशस्यन्ते गुरूदकत्वात् ।दक्षिणाभिमुखा नातिदोषलाः साधारणत्वात् ।”“प्रायेण नद्यो मरुषु सतिक्ता लवणान्विताः ।ईषत्कषाया मधुरा लघुपाका बले हिताः
”इति सुश्रुते सूत्रस्थाने ४५ अध्याये
“वसुधा कीटसर्पाखुमलसन्दूषितोदकाः ।वर्षाजलवहा नद्यः सर्व्वदोषसमीरणाः
”इति चरके सूत्रस्थाने २७ अध्याये
)भारतवर्षे नद्यो यथा गङ्गा सिन्धुः सरस्वतीशतद्रुः वितस्ता विपाशा चन्द्रभागा सरयूःयमुना रावती देविका कुहूः गोमती धूत-पापा बाहुदा दृषद्वती कौशिकी निस्वीरागण्डकी चक्षुष्मती लोहिता इत्येता हिमवत्-पादनिर्गताः
वेदस्मृती वेदवती सिन्धुः अपर्णाचन्दना सदाचरा रोहिपारा चर्म्मण्वतीविदिशा वेत्रवती वयन्ती इत्येताः पारिपात्रो-द्भवाः
शोणा ज्योतीरथा नर्म्मदा सुरसामन्दाकिनी दशार्णा चित्रकूटा तमसा पिप्पलाकरतोया पिशाचिका चित्रोत्पला विशालावञ्जुका बालुका वाहिनी भुक्तिमती विरजापङ्किनी रिवी इत्येता ऋक्षप्रसूताः
मणि-जाला शुभा तापी पयोष्णी शीघ्रोदा वेष्णापाशा वैतरणी वेदी पाला कुमुद्बती तोया दुर्गाअन्त्या गिरा एता विन्ध्यपादोद्भवाः
गोदा-वरी भीमरथी कृष्णा वेणा वञ्जुला तुङ्गभद्रासुप्रयोगा ब्रह्मकावेरी शतमाला ताम्रपर्णीपुष्यावती उत्पलावती इत्येता मलयजाः
त्रियामा ऋषिकुल्या इक्षुरा त्रिविदाला मूलिनीवंशवरा महेन्द्रतनया ऋषिका लुषती मन्द-गामिनी पलाशिनी इत्येताः शुक्तिमत्प्रभवाः ।एताः प्राधान्येन कुलपर्व्वतनद्यः शेषाः क्षुद्र-नद्यः इति वराहपुराणम्
*
“कैलासपादसम्भूतं पुण्यं शीतजलं शुभम् ।मन्दोदकं नाम सरः पयस्तु दधिसन्निभम्
तस्मात् प्रभवते दिव्या नदी मन्दाकिनी शुभा ।दिव्यञ्च चन्दनन्तत्र तस्यास्तीरे महद्वनम्
प्रागुत्तरेण कैलासात् दिव्यं सौगन्धिकं गिरिम् ।सर्व्वधातुमयं दिव्यं शवलं पर्व्वतं प्रति
चन्द्रप्रभो नाम गिरिः सशुक्रो रत्नसन्निभः ।तत्समीपे सरो दिव्यमच्छोदन्नाम विश्रुतम्
तस्मात् प्रभवते दिव्या नदी ह्यच्छोदका शुभा ।तस्यास्तीरे वनं दिव्यं महच्चैत्ररथं शुभम्
तस्मिन् गिरौ निवसति मणिभद्रः सहानुगः ।यक्षः सेनापति क्रूरैर्गुह्यकैः परिवारितः
पुण्या मन्दाकिनी चैव नदी ह्यच्छोदका शुभा ।महीमण्डलमध्ये तु प्रविष्टे ते महोदधिम्
कैलासाद्दक्षिणप्राच्यां शिवं सर्व्वौषधिं गिरिम्मनःशिलामयं दिव्यं शवलं पर्व्वतं प्रति
लोहितो हेमशृङ्गस्तु गिरिः सूर्य्यप्रभो महान् ।तस्य पादे महद्दिव्यं लोहितं सुमहत् सरः
तस्मात् प्रभवते पुण्यो लोहितश्च नदो महान् ।देवारण्यं विशोकञ्च तस्य तीरे महद्वनम्
तस्मिन् गिरौ निवसति यक्षो मणिधरो बली ।सौम्यैः सधार्म्मिकैश्चैव गुह्यकैः परिवारितः
कैलासात् पश्चिमोदीच्यां ककुद्मानोषधीगिरिः ।ककुद्मति रुद्रस्य उत्पत्तिस्त्रिककुद्मतः
तदञ्जनन्त्रैककुदं शैलं त्रिककुदं प्रति ।सर्व्वधातुमयस्तत्र सुमहद्बैद्युतो गिरिः
तस्य पादे महद्द्विव्यं मानसं सिद्धसेवितम् ।यस्मात् प्रभवते पुण्या सरयूर्लोकपावनी
कैलासात् पश्चिमामाशां दिव्यः सर्व्वौषधिर्गिरिः ।अरुणः पर्व्वतश्रेष्ठो रुक्मधातुविभूषितः
भवस्य दयितः श्रीमान् पर्व्वतो हेमसन्निभः ।तस्य पादे महद्दिव्यं सरः काञ्चनबालुकम्
तस्य पादात् प्रभवति शैलोदं नाम तत् सरः ।तस्मात् प्रभवते पुण्या नदी शैलोदका शुभा
सा वङ्क्षुशीतयोर्म्मध्ये प्रविष्टा पश्चिमोदधिम् ।अभ्युत्तरेण कैलासं शिवं सर्व्वौषधिं गिरिम्
गौरन्तु पर्व्वतश्रेष्ठं हरितालमयं प्रति ।हिरण्यशृङ्गः सुमहान् दिव्यौषधिमयो गिरिः
तस्य पादे महद्दिव्यं सरः काञ्चनबालुकम् ।रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः
गङ्गार्थे तु राजर्षिरुवास बहुलाः समाः ।तत्र त्रिपथगा देवी प्रथमन्तु प्रतिष्ठिता
सोमपादात् प्रसूता सा सप्तधा प्रतिभज्यते ।भवस्य साङ्गे पतिता संरुद्धा योगमायया
ततो विसर्ज्जयामास सप्त स्रोतांसि गङ्गया ।त्रीणि प्राचीमभिमुखं प्रतीचीं त्रीण्यथैव
स्रोतांसि त्रिपथायास्तु प्रत्यपद्यन्त सप्तधा ।नलिनी ह्रादिनी चैव पावनी चैव प्राच्यगा
शीता वङ्क्षुश्च सिन्धुश्च तिस्रस्ता वै प्रतीच्यगा ।सप्तमी त्वनुगा तासां दक्षिणेन भगीरथम्
तस्माद्भागीरथी सापि प्रविष्टा दक्षिणोदधिम् ।सप्तैताः प्लावयन्ति स्म वर्षन्तद्धिममाह्वयम्
प्रसूताः सप्त नद्यस्तु शुभा बिन्दुसरोद्भवाः ।तान् देशान् प्लावयन्ति स्म म्लेच्छप्रायांश्च सर्व्वशः
सलिलान् कुस्तुरांश्चीनान् वर्व्वरान् यवनान्खशान् ।सूत्कुलांश्च कुलत्थांश्च अङ्गलौक्यावरांश्च यान्
कृत्वा द्बिधा हिमवन्तं प्रविष्टा दक्षिणीदधिम् ।अथ चीनमरूंश्चैव कालकांश्चैव चूलकान्
तुषारान् वर्व्वरान् कारान् पह्लवान् पारदान्शकान् ।एतान् जनपदान् वङ्क्षः प्लावयन्त्युदधिं गता
वरदान् कूटजांश्चैव गान्धारानौरसान् कुहून् ।शिवसौरानिन्द्रमरून् वसातीन् समतेजसा
सैन्धवारट्टकावेरान् कुपथान् भीमरौरुकान् ।शुनामुखांश्चोर्द्धमरून् सिन्धुरेतान्निषेवते
गन्धर्व्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरो-रगान् ।कलापग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान्नरान्
किरातांश्च पुलिन्दांश्च कुरून् वै भरतानपि ।पाञ्चालकौशिकान् मत्स्यान्मागधाङ्गांस्तथैव
ब्रह्मोत्तरांश्च वङ्गांश्च तामलिप्तांस्तथैव ।एतान् जनपदानार्य्यान् गङ्गा तारयते शुभा
ततः प्रतिहता विन्ध्ये प्रविष्टा दक्षिणोदधिम् ।ततस्तु ह्रादिनी पुण्या प्राचीमभिमुखा ययौ
प्लावयन्त्यपकांश्चैव निषादानपि सर्व्वशः ।धीवरानृषिकांश्चैव तथा लीनमुखानपि
केकरानेकवर्णांश्च किरातानपि चैव हि ।कालन्दरान् विवर्णांश्च कुशिकान् स्वर्गभूमिकान्
सा मण्डले समुद्रस्य तिरोभूत्वा तु सर्व्वशः ।ततस्तु पावनी चैव प्राचीमेव दिशं ययौ
कुपथान् प्लावयन्ती सा इन्द्रद्युम्नसरांस्यपि ।तथा खरपदान् देशान् वेत्रशङ्कुपथानपि
मध्ये चोज्जानकमरून् कुथप्रावरणानपि ।इन्द्रद्वीपात् समुद्रं सा प्रविष्टा लवणोदधिम्
ततस्तु पावनी प्रायात् प्राचीमाशां जवेन तु ।तोमरान् प्लावयन्ती सा हंसमार्गान् समृद्धकान्
पूर्णान् दर्भांश्च सेवन्ती भित्त्वा सा बहुधागिरिम् ।कर्णप्रावरणान् प्राप्य गता साश्वमुखानपि
सिकतापर्व्वतमरून् गत्वा विद्याधरान् ययौ ।वामिमण्डलकोष्ठन्तु सा प्रविष्टा महत् सरः
तासां नद्युपनद्यश्च शतशोऽथ सहस्रशः ।उपगच्छन्ति ता नद्यो यतो वर्षति वासवः
हेमकूटस्य पृष्ठे तु सर्पाणामुत्सवः स्मृतः ।सरस्वती प्रभवति तस्मात् ज्योतिष्मती तु या
अवगाहेतोभयतः समुद्रौ पूर्व्वपश्चिमौ ।सरो विष्णुपदं नाम निषधे पर्व्वतोत्तमे
तस्मात् द्बयं प्रभवति गन्धर्व्वी नकुला तें ।मेरोः पार्श्वात् प्रभवति ह्रदश्चन्द्रप्रभो महान्
जम्बुश्चैव नदी पुण्या यस्यां जाम्बुनदं स्मृतम् ।पयोदस्तु ह्रदो नीलः शुभः पुण्डरीकवान्
पुण्डरीका पयोदा तस्माद्वै संप्रसूयते ।सरस्तु सरसश्चैव स्मृतमुत्तरमानसम्
मृग्या मृगकान्ता तस्माद्व संप्रसूयते ।ह्रदाः कुरुषु विख्याताः पद्ममीनकुलाकुलाः
नाम्ना ते विजया नाम द्वादशोदधिसन्निभाः ।तेभ्यः शान्ता माध्वी द्वे नद्यौ संप्रसू-यतः
”इति मत्स्यपुराणे १०१ अध्यायः
*
अथ सिप्रादिसप्तनद्युत्पत्तिकारणम् ।“एवं विवाह्य विधिवत् सौवर्णे मानसाचले ।अरुन्धती वशिष्ठस्तु मोदमाप तया सह
तत्र यत् पतितं तोयं मानसाचलकन्दरे ।विवाहावभृथार्थाय शान्त्यर्थं वसुधाकृतम्
ब्रह्मविष्णुमहादेवपाणिभिः समुदीरितम् ।तत्तोयं सप्तधा भूत्वा पतितं मानसाचलात्
हेमाद्रेः कन्दरे सानौ सरस्याञ्च पृथक् पृथक् ।तत्तोयं पतितं सिप्रे देवभोग्ये सरोवरे
तेन सिप्रा नदी जाता विष्णुना प्रेरिता क्षितिम् ।महाकोषीप्रपाते यद्वारि पतितन्तु तैः
कौषिकी नाम सा जाता विश्वामित्रावतारिता ।उमाक्षेत्रे यत् षतितं तोयं तेन महानदी
कावेरी नाम सा जाता तदा कावेरसंसृता ।महाकाले सरःश्रेष्ठे पतितं तज्जलं गिरेः
हिमाद्रेः पार्श्वभागे तु दक्षिणे शम्भुसन्निधौ ।गोमन्ति नाम तैर्ज्जाता नदी गोमत्युदीरिता
मैनाको नाम यः पुत्त्रः शैलराजस्य प्रियः ।यस्तु तस्मिन् समुत्पन्नो मेनकोदरतः पुरा
तत्तत्र पतितं तोयं तस्माज्जाता महानदी ।देविकाख्या महादेवप्रेरिता सागरं प्रति
तत्तोयं सङ्गतं कुर्य्याद्धंसा वडवसन्निधौ ।तेनाभूत् सरयूर्न्नाम्ना नदी पुण्यतमा शुभा
यान्यम्भांसि महापार्श्वे खाण्डवारण्यसन्निधौ ।हिमवत्कन्दरे याम्ये इरावद्ध्रदमन्यतः ।इरावती नाम नदी तैस्तु जाता सरिद्वरा
एताः सर्व्वाः स्नानपानात् स्मरणैर्ज्जाह्नवीयथा ।फलं ददति मर्त्यानां दक्षिणोदधिगाः सदा
धर्म्मार्थकाममोक्षाणां बीजभूताः सनातनाः ।महानद्यस्तु सप्तैताः सर्व्वदा देवभोगदाः
एवं नद्यः सप्त जाताः सदा पुण्यतमोदकाः ।अरुन्धत्या वशिष्ठस्य विवाहे देवसन्निधौ
”इति कालिकापुराणे २३ अध्यायः
*
नद्यादीनां रूपद्वयं यथा, --“नद्यश्च पर्व्वताः सर्व्वे द्विरूपाश्च स्वभावतः ।तोयं नदीनां रूपन्तु शरीरमपरन्तथा
स्थावरं पर्व्वतानान्तु रूपं कायस्तथापरः ।शुक्तीनामथ कम्बूनां तथैवान्तर्गता तनूः
बहिरस्थिस्वरूपन्तु सर्व्वदैव प्रवर्त्तते ।एवं जलं स्थावरश्च नदीपर्व्वतयोस्तथा
अन्तर्व्वसति कायस्तु सततं नोपपद्यते ।आप्याय्यते स्थावरेण शरीरं पर्व्वतस्य तु
तथा नदीनां कायस्तु तोयेनाप्याय्यते सदा ।नदीनां कामरूपित्वं पर्व्वतानान्तथैव ।जगत्स्थित्य पुरा विष्णुः कल्पयामास यत्नतः
तोयहानौ नदीदुःखं जायते सततं द्विजाः ।विशीर्णे स्थावरे दुःखं जायते गिरिकायगम्
”इति कालिकापुराणे २२ अध्यायः
तस्या वैदिकपर्य्यायः अवनयः यह्व्य २खाः सीराः स्रोत्याः एन्यः धुनयः ७रुजानाः वक्षणाः स्वादोअर्णाः १० रोध-चक्राः ११ हरितः १२ सरितः १३ अग्रुवः १४नभन्वः १५ वध्वः १६ हिरण्यवर्णाः १७रोहितः १८ ससुतः १९ अर्णाः २० सिन्धवः २१कुल्याः २२ वर्य्यः २३ उर्व्व्यः २४ इरावत्यः २५पार्वत्यः २६ स्रवन्त्यः २७ ऊर्ज्जस्वत्यः २८पयस्वत्यः २९ सरस्वत्यः ३० तरस्वत्यः ३१ हर-स्वत्यः ३२ रोधस्वत्यः ३३ भास्वत्यः ३४ अजिराः ३५मातरः ३६ नद्यः ३७ इति सप्तत्रिंशन्नदी-नामानि इति वेदनिघण्टौ १३
(चतुर्द्दशाक्षरवृत्तिविशेषः तल्लक्षणं यथा, --“ननतजगुरुगैः सप्तयतिर्नदी स्यात्
”)
वाचस्पत्यम्
Sanskrit
नदी स्त्री नद--अच् पचादिगणे नदट् इति निर्देशात् टित्त्वेनङीप् अष्टसहस्रधनुरन्यूनदेशव्यापिजलायामकृत्रिमायांजलप्रवाहरूपायां गङ्गाप्रभृतौ “धनुः सहस्राण्यष्टौ चनतिर्यासां विद्यते ता नदीशब्दवहा गर्त्तास्तेपरिकीर्त्तिताः” छन्दोगप० उक्तपरिमाणवतीष्वेवनदीशब्दो रूढः द्वीपभेदे नदीभेदास्तत्तद्द्वीपशब्देदृश्याः जम्बूद्वीपस्था नदीभेदाश्च विस्तरेण जम्बू-द्वीपशब्दे ३०४६ पृ० भा० भी० पर्वोक्ता दर्शिताः कासा-ञ्चिन्नदीनामुत्पत्तिस्थानादिकं मत्स्यपुराणोक्तं प्रदर्श्यते ।“प्रागुत्तरेण कैलासाद्दिव्यं सौगन्धिकं गिरिम् ।सर्वधातुमयं दिव्यं सुवेलं पर्वतं प्रति चन्द्रप्रभो नामगिरिः शुभ्री रत्नसन्निभः तत्समीपे सरो दिव्य-मच्छोदं नाम विश्रुतम् तस्मात् प्रभवते दिव्या नदीह्यच्छोदिका शुभा तस्यास्तीरे वनं दिव्यं महच्चैत्र०रथं शुभम्” “कैलासाद्दक्षिणप्राच्यां शिवं सर्वौषधिंगिरिम् मनःशिलामयं दिव्यं शवलं पर्वतं प्रति ।लोहितो हेमशृङ्गस्तु गिरिः सूर्यप्रभो महान् तस्यपादे महद्दिव्यं लोहितं सुमहत्सरः तस्मात् प्रभबतेपुण्यो लौहित्यश्च नदो महान् दिव्यारण्यं विशो-कञ्च तस्य तीरे महद्वनम्” “कैलासात् पश्चिमोदीच्यांककुद्मानौषधीगिरिः ककुद्मति रुद्रस्य उत्पत्तिश्चककुद्मिनः तदञ्जनं त्रैककुदं शैलन्त्रिककुदं प्रति ।सर्वधातुमयस्तत्र सुमहान् वैद्युतो गिरिः तस्य पादेमहद्दिव्यं मानसं सिद्धसेवितम् तस्मात् प्रभवते पुण्यासरयूर्लोकपावनी तस्यास्तीरे वनं दिव्यं वैभ्राजं नामविश्रुतम्” “कैलासात् पश्चिमायां तु दिव्यः सर्वौषधि-र्गिरिः अरुणः पर्वतश्रेष्ठो रुक्मधातुविभूषितः ।भवस्य दयितः श्रीमान् पर्वतो हेमसन्निभः शातकौम्भ-मयैर्दिव्यैः शिलाजालैः समाचितः शतसंख्यैस्तापनीयैःशृङ्गैर्दिवमिवोल्लिखन् शृङ्गवान् सुमहादिव्यो दुर्गःशैलो महाचितः तस्मिन् गिरौ निवसति गिरिशोधूम्रलोचतः तस्य पादात् प्रभवति शैलोदं नामतत्सरः तस्मात् प्रभवते पुण्या नदी शैलोदका शुभा ।सा चक्षुःसीतयोर्मध्ये प्रविष्टा पश्चिमोदधिम् अस्त्यु-त्तरेण कैलासाच्छिवः सर्वौषधिर्गिरिः गौरन्तु पर्वत-श्रेष्टं हरितालमयं प्रति हिरण्यशृङ्गः सुमहान्दिव्यौषधिमयो गिरिः तस्य पादे महद्दिव्यं सरःकाञ्चनबालुकम् रम्यं विन्दुसरो नाम यत्र राजाभगीरथः गङ्गार्थे तु राजर्षिरुवास बहुलाः समाः”“दृश्यते भासुरा रात्रौ देवी त्रिपथगा तु सा अन्त-रिक्षं दिवं चैव भावयित्वा भुवङ्गता भवोत्तमाङ्गेपतिता संरुद्धा योगमायया तस्या ये विन्दवः केचित्रुद्धायाः पतिता भुवि कृतन्तु तैर्बहुसरस्ततो विन्दु-सरः स्मृतः” “त्रीणि प्राचीमभिमुखं प्रतीचीन्त्रीण्य-थैव तु स्रोतांसि त्रिपथायास्तु प्रत्यपद्यन्त सप्तधा ।नलिनी ह्लादिनी चैव पाबनी चैव प्राच्यगा सीताचक्षुश्च सिन्धुश्च तिस्रस्ता वै प्रतीच्यगाः सप्तमी त्वनुगातासां दक्षिणेन भगीरथम् तस्मात् भागीरथी सावै प्रविष्टा दक्षिणोदधिम् सप्त चैताः प्लावयन्ति व-र्षन्तु हिमसाह्वयम् प्रसूताः सप्त नद्यस्तु शुभा वि-न्दुसरोद्भवाः तान् देशान् प्लावयन्ति स्म म्लेच्छप्रायांश्चसर्वशः सशैलान् कुकुरान् रौध्रान् वर्बरान् यवनान्खसान् पुलिकांश्च कुलत्थांश्च अङ्गलोक्याम्बरांश्च यान् ।कृत्वा द्विधा हिमवन्तं प्रविष्टा दक्षिणोदधिम् अथवीरमरूंश्चैव कालिकांश्चैव शूलिकान् तुषारान् वर्व-रानङ्गाननुष्णान् पारदान् शकान् एतान् जनपदां-श्चक्षुः प्लावयित्वोदधिङ्गता दरदोर्जगुडांश्चैव गान्धा-रानौरसान् कुहून् शिवपौरानिन्द्रमरून् वसतीन् सम-तेजसा सैन्धवानुर्वसान् बर्बान् कुपथान् भीमरोमकान् ।शुनामुखांश्चोर्द्धमरून् सिन्धुदेशान्निषेवते गन्धर्वान्किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् कलापग्राम-कांश्चैव तथा किंपुरुषान्नरान् किरातांश्च पुलिन्दांश्चकुरून् वै भारतानपि पाञ्चालान् कौशिकान् मत्-स्यात् मागधाङ्गांस्तथैव ब्रह्मोत्तरांश्च वङ्गांश्च ताम्र-लिप्तांस्तथैव एतान् जनपदानार्यान् गङ्गा भाव-यते शुभा ततः प्रतिहता विन्ध्ये प्रविष्टा दक्षिणो-दधिम् ततस्तु ह्लादिनी पुण्या प्राचीनाभिमुखा ययौ ।प्लावयन्त्युपकांश्चैव निषादानपि सर्वशः धीवरानृषि-कांश्चैव तथा भीलमुखानपि केकरानेकर्णांश्च किराता-नपि चैव हि कालिन्दगतिकांश्चैय कुशिकान् स्वर्ग-भीमकान् सा मण्डले समुद्रस्य तीरे भूत्वा तु सर्वशः ।ततस्तु नलिनी चापि प्राचीमेव दिशं ययौ कुप-थान् प्लावयन्ती सा इन्द्रद्युम्नसरांस्यपि तथा खर-पथान् देशान् वेत्रशङ्कुपथानपि मध्येनोज्जानकम-रून् कुथप्रावरणान् ययौ इन्द्रद्वीपसमीपे तु प्रविष्टालबणोदधिम् ततस्तु पावनी प्रायात् प्राचीमाशाञ्ज-येन तु तोमरान् प्लावयन्ती हंसमार्गान् समूहकान् ।पूर्वान्देशांश्च सेवन्ती भित्त्वा सा बहुधा गिरिम् वर्ण-प्रावरणान् प्राप्य गता साश्वमुखानपि सिक्त्वा पर्वत-मेरुं सा गत्वा विद्याधरानपि शैलिमण्डलकोष्ठन्तुसा प्रविष्टा महत्सरः तासां नद्युपनगद्योऽन्याः शत-शोऽथ सहस्रशः उपगच्छन्ति ता नद्यो यतो वर्षतिवासवः” “हेमकूटस्य पृष्ठे तु सर्पाणां तत् सरः स्मृ-तम् सरस्वती प्रभवति तस्माज्ज्योतिष्मती तु या ।अवगाढे ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ सरो विष्णुपदंनाम निषधे पर्वतोत्तमे यस्मादग्रे प्रभवति गन्धर्बानु-कूले ते मेरोः पार्श्वात् प्रभवति ह्रदश्चन्द्रप्रभोमहान् जम्बूश्चैव नदी पुण्या यस्यां जाम्बूनदंस्मृतम् पयोदस्तु ह्रदो नीलः शुभः पुण्डरीकवान् ।पुण्डरीकात् पयोदाच्च तस्माद्द्वे संप्रसूयतः सरसस्तुसरस्त्वेतत् स्मृतमुत्तरमानसम् मृग्या मृगकान्ताच तस्माद्द्वे सम्प्रसूयतः ह्रदाः कुरुषु विख्याताःपद्ममीनकुलाकुलाः नाम्ना ते वै जया नाम द्वादशीदधिसन्निभा तेभ्यः शान्ता माध्वी द्वे नद्यौसम्प्रसूयतः किंपुरुषाद्यानि यान्यष्टौ तेषु देवीन वर्षति उद्भिदान्युदकान्यत्र प्रवहन्ति सरिद्वराः ।वलाहकश्च ऋषभो वक्रो मैनाक एव विनिविष्टाःप्रतिदिशं निमग्ना लवणाम्बुधिम्”भारतबर्षे नदीभेदाः वराहपु० उक्ता यथा “गङ्गासिन्धुः सरस्वती शतद्रुः वितस्ता विपाशा चन्द्रभागासरयूः यमुना इरावती देविका कुहूः गोमती धूतपापाबाहुदा दृषद्वती कौशिकी निःक्षीरा गण्डकी चक्षुष्मतीलोहिता इत्येता हिमवत्पादनिर्गताः वेद-स्मृती वेदवती सिन्धुः अपर्णा चन्द्रना सदाचरा रोहि-पारा चर्मन्वती विदिशा वेदवती वयन्ती इत्येताःपारिपात्रोद्भवाः! शोणा ज्योतीरथा नर्मदा सुरसामन्दाकिनी दशार्णा चित्रकूटा तमसा पिप्पला कर-तोया पिशाचिका चित्रोत्पला विशला वञ्जुला बालुका-वाहिनी शुक्तिमती विरजा पङ्किनीरिणी इत्येतांऋक्षपर्वतप्रसूताः मणिजाला शुभा तापी पयोष्णीशीघ्रोदा रेवा विपाशा वैतरणी वेदीपाला कुमुद्वती तोयादुर्गा अन्त्यगिरा एता विन्ध्यपादोद्भवाः गोदा-वरी भीमरथी कृष्णा वेण्वा वञ्जुला तुङ्गभद्रा मुप्र-योगा व्रह्मकावेरी शतमाला ताम्रपर्णी पुष्यावती उत्प-लावती इत्येता मलयभबाः त्रियामा ऋषिकुल्यावङ्क्षुरा त्रिविदा लोकमूलिनी वंशवरा महेन्द्रतनया ऋषिकाऽनुमती मन्दगामिनी पलाशिनी इत्येताः शुक्तिमत्-प्रभवाः एताः प्राधान्येन कुलाचलनद्यः शेषाःक्षुद्रनद्यः” वराहपुराणे मूलं दृश्यम् ।“कैलासपादसम्भूतं पुण्यं शीतजलं शुभम् मन्दोदकंनाम सरः पयस्तु दधिसन्निभम् तस्मात् प्रभवते दिव्यानदी मन्दाकिनी शुभा दिव्यञ्च चन्दनन्तत्र तस्यास्तीरेमहद्वनम्” कालिकापु० ।तत्रैव स्थानान्तरे प्रधानसप्तनदीप्रादुर्भावकथा यथा“एवं विबाह्य विधिवत् सौवर्णे मानसाचले अरुन्धतींवशिष्ठस्तु मोदमाप तया सह तत्र यत् पतितंतोयं मानसाचल कन्दरे विवाहावभृथार्थाय शान्त्यर्थंबहुधा कृतम् व्रह्मविष्णुमहादेवपाणिभिः समुदी-रितम् तत्तोयं सप्तधा भूत्वा पतितं मानसाचलात् ।हेमाद्रेः कन्दरे सानौ सरस्याञ्च पृथक् पृथक् तत्तोयंपतितं सिप्रे देवभोग्ये सरोवरे तेन सिप्रा नदीजाता विष्णुना प्रेरिता क्षितिम् महाकोशीप्रपाते चयद्वारि पतितन्तु तैः कोशिकी नाम सा जाता विश्वामि-त्रावतारिता उमाक्षेत्रेयत् पतितं तोयं तेन महानदी ।कावेरी नाम सा जाता तदा कौवेरसंसृतत् महाकालेकरःश्रेष्ठे पतितं तज्जलं गिरेः हिमाद्रेः पार्श्वभागेतु दक्षिणे शम्भुसन्निधौ गोमद्भिर्नाम तैर्जाता नदीगोमत्युदीरिता मैनाको नाम यः पुत्रः शैलराजस्यच प्रियः यस्तु तस्मिन् समुतपन्नो मेनकोदरतः पुरा ।यत्तत्र पतितं तीयं तस्माज्जाता महानदी देवि-काख्या महादेवप्रेरिता सागरं प्रति तत्तोयंसङ्गतं हंसेरितं बण्डवसन्निधौ तेनाभूत् सरयू-र्नाम्ना नदी पुण्यतमा शुभा यान्यम्भांसि महापार्श्वे खाण्डवारण्यसन्निधौ हिमवत्कन्दरे याम्येइरावद्व्यूहमध्यतः इरावती नाम नदी तैस्तुजाता सरिद्वरा एताः सर्वाः स्नानपानात् स्मरणै-र्जाह्नवी यथा फलं ददति मर्त्यानां दक्षिणोदधिगाःलदा धर्माग्रकाममोक्षाणां वीजभूताः सदा ताः ।महानद्यस्तु सप्तैताः सर्वदा देवभोगदाः एवं नद्यःसप्त जाताः सदा पुण्यतमोदकाः अरुन्धत्या वशिष्ठस्यविवाहे देवसन्निधौ” इतिनद्यादीनां रूपद्वयं यथा “नद्यश्च पर्वताः सर्वे द्विरूपाश्चखभावतः तोयं नदीनां रूपन्तु शरीरमपरन्तथा ।स्थावरं पर्वतानान्तु रूपं कायस्तथाऽपरः शुक्तीना-मथ कम्बूनां तथैवान्तर्गता तनुः बहिरस्थिस्वरूपन्तुसर्वदैव प्रवर्तते एवं जलं स्थावरत्वं नदी पर्वतयोस्तथा ।अन्तर्वसति कायस्तु सततं नोपलभ्यते आप्याय्यते स्थाव-रेण शरीरं पर्वतस्य तु तथा नदीनां कायस्तु तोये-नाप्याय्यते सदा नदीनां कामरूपित्वं पर्वतानां तथैवच जगत्स्थित्यै पुरा विष्णुः कल्पयामास यत्नतः ।तोयहानौ नदीदुःखं जायते सततं द्विजाः! विशीर्णेस्थावरे दुःखं जायते गिरिकायगम्” कालिकापु० २२ अ०नदीभेदे जलगुणा राजनिघण्टौ उक्ता यथा“सर्वा गुर्वी प्राङ्मुखी वाहिनी स्याल्लध्वी पश्चाद्वाहिनीनिश्चयेन देशे देशे तद्गुणा सा विशेषान्नैषाधत्ते गौरवंलाघवञ्च प्रायो मृदुवहा गुर्व्यो लघ्य्वः शीघ्रवहाःस्मृताः नद्यः पाषाणसिकतावाहिन्यो विमलोदकाः ।हिमवतप्रभवा याश्च जलं तास्वमृतीपमम् विन्ध्यात्प्राची प्राच्यवाची प्रतोची या चोदीची स्यान्नदी साक्रमेण वातारोधं श्लेष्मपित्तार्त्तिकोपं पित्तोद्रेकंपथ्यपाकञ्च धत्ते पारिपात्रभवा याश्च विन्ध्याख्यप्रभ-वाश्च याः शिरोहृद्रोगकुष्ठानां ता हेतुः ह्लीपदस्य च” ।“वनस्पतीनां सरसां नदीनाम्” मट्टिः
Capeller
German
नदी॑
f.
s. नद.
Grassman
German
1. nadī́, m., Rufer, Anrufer (?) [von nad].
-ī́naam {428, 2} kás vām sácā́.
2. nadī́, f., 1〉 der Fluss, als der rauschende [von nad, vgl. nadá]
2〉 auch übertragen auf die Wasserströme, die sich mit dem Soma mischen oder in die oder mit denen er strömt
3〉 auf die Wasserfluthen, welche in den Wolken von den Dämonen verschlossen sind, und von Indra gelöst werden
4〉 auf die strömende Fluth des Regens
5〉 auf das Dunstmeer, in welchem der áhis budhnías haust ({550, 16}), oder den Aether, als dessen Pfad (pā́thas) oder Schmuck (péśas) Varuna erscheint
6〉 du., die Wasserfluthen des Himmels und der Erde, zwischen denen die Winde gehen
7〉 oft werden die Ströme als Göttinnen aufgefasst.
-íam 4〉 {131, 5}.
-ías [G.] 1〉 {576, 7} pravrājé cid gādhám asti. 2〉 upahvaré aṃśumátyās {705, 14}.
-ī́ [du.] 6〉 {135, 9}.
-íā [du.] 1〉 {230, 5}.
-ías [N. pl.] 1〉 {102, 2} (saptá)
{312, 21}
{401, 5}
{409, 7}. {158, 5}
{226, 3}
{399, 2}
{921, 7}. 2〉 {804, 4} (saptá)
{854, 4} (bildlich). 4〉 {62, 6}
{181, 6}(?). 7〉 {396, 12} (vṛ́ṣṇas pátnīs)
{400, 6}. [Page707]
-ías [N. pl.], -ī́s zu sprechen 1〉 {566, 4}.
-ías [A. pl.] 1〉 {54, 1}
{55, 2} (samudríyas)
{130, 5}
{351, 6}
{890, 8} (saptá). 2〉 {798, 8}. 3〉 {54, 10}. 7〉 {267, 4}.
-ías [A. pl.], -ī́s zu sprechen 2〉 bildlich {721, 4}.
-ī́bhis 7〉 {395, 19} (neben urváśī).
-ī́naam 1〉 vṛjáne {406, 7}
samgathé {626, 28}
vā́hiṣṭhā {646, 18}
asuríā {612, 1}. 7〉 śárma {651, 10}.
-ī́nām 1〉 khā́ni {206, 3}
pārám {705, 11}
ékā {611, 2}
árṇāṃsi {603, 1}. 3〉 práyāṃsi {210, 2}
paridhím {267, 6}
kṣódas {458, 12}
apás {471, 3}
árṇāṃsi {513, 3}
śáraṇe {965, 6}. 5〉 budhné {550, 16}
pā́thas {550, 10}
péśas {550, 11}. 7〉 sumatím {267, 12}.
-ī́ṣu 1〉 {566, 3}
{622, 2}. 2〉 {653, 12}
{765, 4}
{775, 17}
{780, 6}
{788, 1}
{800, 5}
{819, 13}.
-ītame [V.] 7〉 sarasvati (o beste der Fluthen) {232, 16}.
Burnouf
French
नदी नदी
f.
rivière, cours d'eau.
-- नदीतमा
(sup.) la plus sonore des rivières, la Sarasvatī, Vd.
नदीकान्त
m.
la mer.
Nom de plusieurs végétaux.
नदीकूल
n.
rive d'un fleuve, bord de l'eau.
नदीकूलप्रिय
m.
le rotin ou calamus rotang, bot.
नदीज a. (जन्) aquatique. -- S.
m.
pentaptera arjuna,
bot. -- S.
n.
lotus.
Antimoine.
नदिन
m.
(sfx. इन) l'Océan.
Varuṇa.
नदीमातृक a. (मातृ) qui a pour mère une
rivière.
Arrosé par des eaux courantes.
नदीवङ्क
m.
détour ou bras de rivière.
नदीष्ण a. (स्ना) qui se baigne dans une rivière.
नदीसर्ज
m.
pentaptera arjuna, bot.
नदेयी
f.
(sfx. एय) premna herbacea, bot.
Stchoupak
French
नदी-
f.
rivière, courant
Rivière personnifiée sous une forme
féminine
(gramm. ) féminins du type नदी।
°कूल- °तीर- nt. bord de rivière.
°ज- a. ou provenant d'une rivière (dit de chevaux)
m.
ép. de
Bhīṣma.
°नद-
m.
pl.
ou nt. sg. rivières et fleuves, grandes et petites
rivières.
°पङ्क- nt. (m. ) rivage marécageux, vase de rivière.
°पति-
m.
seigneur ou époux des rivières, océan.
°पूर-
m.
débordement d'une rivière.
°मातृक- a. arrosé de rivières.
°मार्ग-
m.
cours ou lit de la rivière.
°मुख- nt. embouchure de rivière
sorte de céréale.
°वप्र-
m.
ou nt. bord élevé d'une rivière.
°ष्ण- ag. qui a l'habitude de se baigner dans une rivière, qui la
connaît à fond
versé dans, habile à (loc.).
नदीश-
m.
= °पति-।