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ध्वजिनी (dhvajinI)

 
Spoken Sanskrit
English
ध्वजिनी - dhvajinI -
f.
- bannered host
ध्वजिनी - dhvajinI -
f.
- army
Monier Williams Cologne
English
ध्वजिनी
f.
‘a bannered host’, an army,
MBh.
Kāv.
&c.
Macdonell
English
ध्वजिनी dhvajin-ī,
f.
army.
Apte Hindi
Hindi
ध्वजिनी
स्त्री*
- -
सेना
Shabdartha Kaustubha
Kannada
ध्वजिनी
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ध्वजिन् ಪದದ ಸ್ತ್ರೀಲಿಂಗ ರೂಪ
निष्पत्तिः - > स्त्रियां "ङीप्" (४-१-५)
ध्वजिनी
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಸೈನ್ಯ /ದಂಡು /ಪಡೆ
निष्पत्तिः - > "इनिः" (५-२-११५) "ङीप्" (४-१-५)
व्युत्पत्तिः - > ध्वजोऽस्या अस्ति
प्रयोगाः - > "ययौ समीपं ध्वजिनीमुपेयुषः प्रसन्नरूपस्य विरुपचक्षुषः"
उल्लेखाः - > किरा० १४-२६
L R Vaidya
English
Dvajin {% (I) a. (f. नी) %} Having the mark of a liquor-vessel, M.xi.92.
DvajinI {% f. %} An army, R.vii.40.
Bopp
Latin
ध्वजिनी f. (a praec. signo fem. ई) exercitus. DR. 5. 15.
अभिधानचिन्तामणिः
Sanskrit
--source--
वाहिनी पृतना सेना बलं सैन्यमनीकिनी ७४५
कटकं ध्वजिनी तन्त्रं दण्डोऽनीकं पताकिनी
वरूथिना चमूश्चक्रं स्कन्धवारोऽस्य तु स्थितिः ७४६
शिबिरं रचना तु स्याद्व्यूहो दण्डादिको युधि
-wordlist-
वाहिनी (स्त्री), पृतना (स्त्री), सेना (स्त्री), बल (क्ली), सैन्य (क्ली), अनीकिनी (स्त्री), कटक (क्ली), ध्वजिनी (स्त्री), तन्त्र (क्ली), दण्ड (पुं), अनीक (क्ली), पताकिनी (स्त्री), वरूथिनी (स्त्री), चमू (स्त्री), चक्र (पुंक्ली), स्कन्धावार (पुं), शिबिर (क्ली), व्यूह (पुं)
अभिधानरत्नमाला
Sanskrit
पृतना
पृतना, सेना, ध्वजिनी, पताकिनी, वाहिनी, बल, सैन्य, चक्र, चमू, वरूथिनी, अनीकिनी, अनीक
पृतना सेना ध्वजिनी पताकिनी वाहिनी बलं सैन्यम्
चक्रं चमूर्वरूथिन्यनीकिनी स्यादनीकं ४५७
verse 2.1.1.457
page 0053
नाममाला
Sanskrit
अक्षौहिणी, बल, अनीक, वाहिनी, साधन, चमू, ध्वजिनी, पृतना, सेना, सैन्य, दण्ड, वरूथिनी
अक्षौहिणी बलानीकं वाहिनी साधनं चमूः
ध्वजिनी पृतना सेना सैन्यं दण्डो वरूथिनी ८६
verse 0.1.1.86
page 0044
पुराणम्
English
ध्वजिनी / DHVAJINĪ. A country in ancient india. (M.B. bhīṣma Parva, Chapter 83).
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskrit
ध्वजिनी,
स्त्री,
(ध्वजोऽस्त्यस्याः ध्वज + इनिः ।ङीप् ।) सेना इत्यमरः ७८
(यथा, रघुः ४० ।“मत्स्यध्वजा वायुवशाद्विदीर्णै-र्मुखैः प्रवृद्धध्वजिनीरजांसि ।बभुः पिबन्तः परमार्थमत्स्याःपर्य्याविलानीव नवोदकानि
”)