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जेहकः-हिका (jehakaH-hikA)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“जेहृ प्रयत्ने”@} 2 ‘जेहतिर्गत्यर्थोऽपि।’ इति मा।
धा।
वृत्तौ।
जेहकः-हिका, जेहकः-हिका, जिजेहिषकः-षिका, जेजेहकः-हिका
जेहिता-त्री, जेहयिता-त्री, जिजेहिषिता-त्री, जेजेहिता-त्री
जेहमानः, इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि भौवादिकगेपतिवत् 3 ज्ञेयानि।
क्विपि 4 झेट्-झेड्-जेहौ-जेहः इति रूपाणि।
जेहः 5।
जेढिः 6।
प्रासङ्गिक्यः
01
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(६२२)
02
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(१-भ्वादिः-६४४। अक। सेट्। आत्म।)
03
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(४२९)
04
=>
[[१। क्विपि, ‘हो ढः’ (८-२-३१) इति ढत्वे, ‘एकाचो बशो भष् झषन्तस्य स्ध्वोः (८-२-३७) इति भष्भावे, चर्त्वविकल्पे रूपद्वयम्।’]]
05
=>
[[B। ‘प्लीहायितासुरभरक्षतिवेहितोर्वीभैषज्यजेहपरया निजबाहयैव।।’ धा। का। १। ८१।]]
06
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[[२। क्तिनि, ढत्वधत्वष्टुत्वढलोपाः।]]