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जॄ (jRR)

 
शब्दसागरः
English
जॄ r. 1st cl. (जरति) 4th cl. (जीर्य्यति) 9th cl. (जृणाति) and 10th cl. (जरयति-
ते)
1. To grow old, to be or become old or decayed.
2. To be con-
sumed, to perish.
3. To be digested.
E.
भ्वा-अक-सेट् दिवा-प-अक-सेट्
इदित् क्य्रादि-प्वादि-अक-सेट् पक्षे चुरा-उभ०
Yates
English
जॄ जरति 1.
a. (य) जीर्य्यति 4.
a.
(ग) जृणाति 9.
a. (क) जारयति
10.
a. To grow old, become de-
cayed, or obsolete.
Wilson
English
जॄ r. 1st cl. (जरति) 4th cl. (जोर्य्यते) 9th cl. (जृणाति)
and 10th cl. (जारयति) To grow old, to be or become old or decayed.
Apte
English
जॄ [j]ॄ, I. 1, 4, 9
P.
, 1
U.
(जरति, जीर्यति, जृणाति, जारयति- ते, जजार, जारयामास, अजरत्, अजारीत्, अजीजरत्, जरि-री-तुम्, जीर्ण or जारित)
To grow old, wear out, wither away, decay
जीर्यन्ते जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः जीर्यतश्चक्षुषी श्रोत्रे तृष्णैका तरुणायते
Pt.*
5.16
Bk.*
9.41.
To perish, be consumed (fig. also)
अजारीदिव प्रज्ञा बलं शोकात्तथा$- जरत्
Bk.*
6.3
जेरुराशा दशास्यस्य 14.112.
To be dissolved or digested
जीर्णमन्नं प्रशंसीयात् Chāṇ.79
उदरे चाजरन्नन्ये
Bk.*
15.15.
To break up or fall to pieces.Caus. (ज-जा-रयति)
To make old, wear out, consume.
To cause to be digested
to digest. -II.
Ā. (जरते)
Ved.
To move, approach, come near.
To crackle (as fire).
To roar.
To call out to, invoke, praise.
Apte 1890
English
जॄ {vI.v} {c1c} {c4c} {c9c} P., {c10c} U. (जरति, जीर्यति, जृणाति, जारयति-ते, जजार, जारयामास, अजरत् अजारीत्, अजीजरत्, -जरि-री-तुं, जीर्ण or जारित) 1 To grow old, wear out, wither away, decay
जीर्यंते जीर्यतः केशा दंता जीर्यंति जीर्यतः जीर्यतश्चक्षुषी श्रोत्रे तृष्णैका तरुणायते Pt. 5. 16
Bk. 9. 41.
2 To perish, be consumed (fig. also)
अजारीदिव प्रज्ञा बलं शोकात्तथाऽजरत् Bk. 6. 30
जेरुराशा दशास्यस्य 14. 112.
3 To be dissolved or digested
जीर्णमन्नं प्रशंसीयात् Chāṇ. 79
उदरे चाजरन्नन्ये Bk. 15. 150.
4 To break up or fall to pieces.
Caus. (ज-जा-र यति) 1 To make old, wear out, consume.
2 To cause to be digested
to digest. {vII.v} {c1c} A. (जरते) Ved. 1 To move, approach, come near.
2 To crackle (as fire).
3 To roar.
4 To call out to, invoke, praise.
Monier Williams Cologne
English
1. जॄ (cf. जुर्)
cl.
1.
P.
(3.
pl.
ज॑रन्ति
Impv.
2.
du.
ज॑रतम्
p.
ज॑रत् See
s.v.
)
to make old or decrepit,
RV.
vi, 24, 7
to cause to grow old, vii, 67, 10
(√ 1. जृ) to humiliate,
L.
:
cl.
4.
P.
जी॑र्यति (AV.
&c.
also Ā. °ते
p.
जीर्यत्, rarely °यमाण
once
cl.
1. Ā. Subj. 3.
pl.
जरन्त,
RV.
x, 31, 7
cl.
9. जृणाति,
Dhātup.
xxxi, 24
cl.
10. जारयति, xxxiv, 9
pf. जजा॑र,
AV.
x, 8, 26
&c.
once जागार, v, 19, 10
3.
pl.
जजरुर् and जेरुर्,
Pāṇ.
vi, 4, 124
aor.
अजरत् and अजारीत्, iii, 1, 38
Subj. 3.
pl.
जारिषुर्,
RV.
fut. 1st जरिता and °रीता,
Vop.
xi, 2
ind.
p.
°रित्वा and °रीत्वा,
Pāṇ.
vii, 2, 55)
to grow old, become decrepit, decay, wear out, wither, be consumed, break up, perish,
RV.
AV.
&c.
to be dissolved or digested,
Yājñ.
ii, 111
MBh.
i, 1331
Suśr.
VarBṛS.
Bhaṭṭ.
:
Caus.
जरयति (ep. also Ā. °ते
p.
°र॑यत्,
RV.
[once, जर्°, i, 124, 10]
&c.
)
to make old, wear out, consume,
RV.
TS.
iv
KaṭhUp.
MBh.
&c.
to digest,
MBh.
R.
Car.
i, 21
to cause to be digested,
MBh.
xii
R.
BhP.
2. जॄ (= गॄ)
cl.
1. Ā. ज॑रते (p. ज॑रमाण) to crackle (as fire),
RV.
(Naigh. iii, 14) to call out to, address, invoke, praise,
RV.
cf.
γῆρυς.
Monier Williams 1872
English
जॄ 1. जॄ, cl. 4. 9. 1. P. जीर्यति, जृणाति, जर-
ति, जजार, जरिष्यति and जरीष्यति, अजारीत्
and अजरत्, जरितुम् and जरीतुम्, to grow old,
become decrepit, decay, wear out, wither
to be
consumed, perish
to break up or fall to pieces
to
be dissolved or digested
(cl. 1. P.) to make old or de-
crepit
to cause to grow old
cl. 10. P. जारयति,
यितुम्, to become old: Caus. P. जरयति, -यितुम्,
to make old, wear out, consume, cause to be con-
sumed
to cause to be digested
to digest: Desid.
जिजरिषति, जिजरीषति, जिजीर्षति: Intens. जेजीर्-
यते, जाजर्ति
[cf. Hib. crionaim, ‘I dry, wither
criona, ‘old, ancient:’ Gr. γέρων, γεραιός, γραῦς,
γῆρας: Lat. grânum for gârnum: Goth. kaurn:
Germ. Korn: Lith. girna.]
जॄ 2. जॄ, cl. 1. A., Ved. जरते, &c., to
move, approach, come near.
जॄ 3. जॄ, cl. 1. A., Ved. जरते, to crackle
(as fire)
to roar
to call out to, address, in-
voke, praise.
Macdonell
English
जॄ JṜ, Ⅰ. P. jára, (V.) make old, wear 🞄out
Ⅳ. P. (Ā. rare) jī́rya, grow old or 🞄frail, decay, be worn out, pass away, dissolve, 🞄be digested: pp. jīrṇá, old, decrepit
decayed
🞄worn out, faded, withered
rotten, 🞄tumble-down
digested
cs. jaráya, cause to 🞄grow old, wear out.
Benfey
English
जॄ जॄ, i. 1, Par., i. 4, Par. (also Ātm. ,
MBh. 13, 367). ii. 9, जृणा, णी, Par.
1.
To grow old, MBh. 3, 13860.
2. To be
digested, Suśr. 1, 70, 18. -- Ptcple. of
the pres. जरन्त्,
f.
रती, Old, Rājat. 6,
172. Ptcple. of the pf. pass. जीर्ण,
1. Old, decayed, Bhāg. P. 1, 13, 22
Rām. 3, 11, 9.
2. Tumbled down,
Man. 4, 46.
3. Rotten, MBh. 3, 678.
4. Faded, Śāk. d. 170.
5. Destroyed,
MBh. 3, 1939.
n.
Old age, Rājat. 3, 316.
Comp.
अ-,
n.
indigestion, Man. 4,
121. Caus. and i. 10,
I. जरय, To
cause to wax old, Chr. 287, 5 = Rigv. i.
48, 5
Chr. 295, 10 = Rigv. 1, 92, 10
MBh. 7, 5967 (Ātm. ).
2. To consume,
Bhāg. P. 3, 25, 33.
3. To overpower,
MBh. 3, 1939.
4. To digest, Rām. 5,
84, 12.
II. जारय। -- With the prep.
निस् निस्, To grind, Bhāg. P. 6, 12, 29.
-- With परि परि,
1. To wear out,
MBh. 4, 332.
2. To fade, Suśr. 1, 224, 20.
3. To wax old, MBh. 1, 5139.
4. To
be digested, Suśr. 2, 178, 14. -- With
प्र प्र, To be digested, Suśr. 1, 239, 1.
-- Cf. γέρων (= जरन्त्) γεραιός, γραῦς, γραΐς, γῆρας, γῦρις, γίγαρτον, γαργαλίζω, γαγγαλίζω
Lat. granum
Goth. kaurn,
ga-krôtôn
O.H.G. korn, kern
Goth.
qvairnu
A.S. cweorn, cwyrn.
Shabdartha Kaustubha
Kannada
जॄ - वयोहानौ (क्र्या० पर० अक० से०) जृणाति
पदविभागः - > धातुः
कन्नडार्थः - > ಮುದಿಯಾಗು /ಮುದುಕನಾಗು /ವಯಸ್ಸನ್ನು ಕಳೆ /ಜೀವಿತಕಾಲವನ್ನು ಕಳೆದುಕೊ
जॄ - वयोहानौ (चुरा० उभ० अक० से) जारयति -ते
पदविभागः - > धातुः
कन्नडार्थः - > ಮುದಿಯಾಗು /ಮುದುಕನಾಗು /ವಯಸ್ಸನ್ನು ಕಳೆ /ಜೀವಿತಕಾಲವನ್ನು ಕಳೆದುಕೊ
L R Vaidya
English
jF {% vi. 4P or 9P, 10U (pp. जीर्ण
pres. जीर्यति, जृणाति, जरयति-ते) %} 1. To grow old, to decay, to wear out, Bt.ix.41
2. to be consumed, to perish, जेरुराशा दशास्यस्य Bt.xiv.112
3. to be digested, उदरे चाजरत्रन्ये तस्य पातालसंनिभे Bt.xv.50.
Bopp
Latin
जॄ 1. 4. 9. 10. P. जरामि, जीर्यामि (gr. 330.), जृणामि (gr.
385.), जारयामि.
1) conteri, consumi, confici, praeser-
tim aetate. K.: जृणाति जरया जनः
Part. pass. जीर्ण
senex, vetus, decrepitus. BH. 2. 22.: वासांसि जीर्णानि
R. Schl. II. 2. 6.: जीर्णस्या ऽस्य शरीरस्य विश्रान्तिम्
अभिरोचये.
2) concoquere, digerere. HIT. 5. 14.: अजीर्णे
भोजनम् विषम्. - Caus. जरयामि et जारयामि conco-
quere, digerere. MAH. 1. 2240.: जरयामास तद् (वि-
षम्) वीरः सहा ऽन्नेन. (V. जरत्, जरा, जरित et cf. झॄ,
जूर्, ज्री, जिरि, चूर्ण्, गूर्, 2. कॄ, शॄ
hib. crionaim «I
dry, wither, fade, dwindle», criona «old, ancient, pru-
dent, sage» = जीर्ण
v. जरत्
fortasse lat. aeger huc
pertinet, ita ut ae sit praepositio, quam ad अधि q. v. vel
अति retulerim, ejectâ consonante
slav. ЗϱѢЮ ζrjejû
maturesco, russ. зерно erno granum a conterendo
dictum et formâ cum part. जीर्ण cohaerere videtur
lat.
grânum fortasse per metathesin e gârnum = जीर्ण, quod
ipsum e जार्ण, attenuato in ई, v. gr. 308., Vocalismus
p. 214.
goth. kaurn, Th. kaurna pro kurna (gr. comp.
519.) e karna
nostrum Korn
lith. girna lapis molae
manuariae, girnôs pl. mola manuaria
russ. жерновъ
schernov lapis molaris
goth. qvairnus mola, germ. med.
quirn, kurn, id.
cf. Pott. p. 228.)
Kridanta Forms
Sanskrit
जॄ (जॄ꣡ष् वयोहानौ मित् १९३८ - दिवादिः - सेट्)
ल्युट् = जरणम्
अनीयर् = जरणीयः - जरणीया
ण्वुल् = जारकः - जारिका
तुमुँन् = जरितुम् / जरीतुम्
तव्य = जरितव्यः / जरीतव्यः - जरितव्या / जरीतव्या
तृच् = जरिता / जरीता - जरित्री / जरीत्री
क्त्वा = जरित्वा / जरीत्वा
ल्यप् = प्रजीर्य
क्तवतुँ = जीर्णवान् - जीर्णवती
क्त = जीर्णः - जीर्णा
शतृँ = जीर्यन् - जीर्यन्ती
जॄ (जॄ꣡ वयोहानौ मित् १९३८ - क्र्यादिः - सेट्)
ल्युट् = जरणम्
अनीयर् = जरणीयः - जरणीया
ण्वुल् = जारकः - जारिका
तुमुँन् = जरितुम् / जरीतुम्
तव्य = जरितव्यः / जरीतव्यः - जरितव्या / जरीतव्या
तृच् = जरिता / जरीता - जरित्री / जरीत्री
क्त्वा = जरित्वा / जरीत्वा
ल्यप् = प्रजीर्य
क्तवतुँ = जीर्णवान् - जीर्णवती
क्त = जीर्णः - जीर्णा
शतृँ = जृणन् - जृणती
जॄ (जॄ꣡ वयोहानौ - चुरादिः - सेट्)
ल्युट् = जारणम् / जरणम्
अनीयर् = जारणीयः / जरणीयः - जारणीया / जरणीया
ण्वुल् = जारकः - जारिका
तुमुँन् = जारयितुम् / जरितुम् / जरीतुम्
तव्य = जारयितव्यः / जरितव्यः / जरीतव्यः - जारयितव्या / जरितव्या / जरीतव्या
तृच् = जारयिता / जरिता / जरीता - जारयित्री / जरित्री / जरीत्री
क्त्वा = जारयित्वा / जरित्वा / जरीत्वा
ल्यप् = प्रजार्य / प्रजीर्य
क्तवतुँ = जारितवान् / जीर्णवान् - जारितवती / जीर्णवती
क्त = जारितः / जीर्णः - जारिता / जीर्णा
शतृँ = जारयन् / जरन् - जारयन्ती / जरन्ती
शानच् = जारयमाणः / जरमाणः - जारयमाणा / जरमाणा
धातुपाठः (Krishnacharya)
Sanskrit
धातुः:
जॄ
मूलधातुः:
धात्वर्थः:
वयोहानौ
गणः:
क्र्यादिः
कर्मकत्वं:
अकर्मकः
इट्त्वं:
सेट्
उपग्रहः:
परस्मैपदी
रूपम्:
जृणाति
अनुबन्धादिविशेषः:
ॠकारान्तः
धातुः:
जॄ
मूलधातुः:
धात्वर्थः:
वयोहानौ
गणः:
चुरादिः
कर्मकत्वं:
अकर्मकः
इट्त्वं:
सेट्
उपग्रहः:
उभयपदी
रूपम्:
जारयति-ते, जरति
अनुबन्धादिविशेषः:
ॠकारान्तः
धातुः:
जॄ
मूलधातुः:
जॄष्
धात्वर्थः:
वयोहानौ
गणः:
दिवादिः
कर्मकत्वं:
अकर्मकः
इट्त्वं:
सेट्
उपग्रहः:
परस्मैपदी
रूपम्:
जीर्यति
धातुप्रदीपः
Sanskrit
जॄ वयोहानौ
- जृणाति जजार जजरतुः जेरतुः जीर्णम् जीर्णिः 22
जॄ वयोहानौ
- जारयति जरति अन्यत्र जीर्य्यति जृणाति 259
Wordnet
Sanskrit
Synonyms:
परिम्लै, जॄ, परिशुष्, पै, प्रग्लै, प्रतिशुष्, प्रम्लै, विम्लै, विशुष्, शुष्
verb
पुष्प-पत्र-क्षुपादीनां उच्छुष्कीभवनानुकूलः व्यापारः।
"अत्युष्णतया केचन क्षुपाः पर्यम्लायन्।"
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskrit
जॄ, इर् ज्याने इति कविकल्पद्रुमः
(दिवां-परं-अकं-अनिट् ।) इर्, अजरत् अजा-रीत् ष, जरा म, जरयति य, जीर्य्यति ।ज्यानं गतबहुवयोभावः इति दुर्गादासः
जॄ, गि कि ज्याने इति कविकल्पद्रुमः
(क्र्यां-चुरांपक्षे भ्वां-च-परं-अकं-नेट् ।) गि, जॄणातिजीर्णः जीर्णिः कि, जारयति जरति इतिदुर्गादासः
वाचस्पत्यम्
Sanskrit
जॄ जरायां दिवा०
पर०
अक० सेट् जीर्य्यति इरित् ।अजरत् अजारीत् जीर्णः षित् जरा घटादि० ।जरयति “या जीर्य्यति जीर्य्यतः” नीतभा० जीर्य्यतेरतृन् जरन् जजार जरीता जीर्णः “जरि-तॄणां सतां भुवां सूतये” बामदेव्यगानमन्त्रः
जॄ जरायां वा चुरा०
उभ०
पक्षे क्य्रादि० प्वादि० अक० सेट् ।घटा० जरयति ते अजीजरत् जृणाति इरत्अजरत्--अजारीत्
क्षीरतरङ्गिणी
Sanskrit
जॄ वयोहानौ
- जृणाति जीर्णः जीर्णिः दिवादौ (420) जीर्यति 22
जॄ वयोहनौ
- जारयति, जरति, जारणा दिवादौ (420) जीर्यति, जीर्णः क्र्य्यादौ (923) जृणाति ज्रि इति नन्दी-ज्राययति, ज्रयति, क्र्य्यादौ ज्रिणाति 261
धातुवृत्तिः
Sanskrit
जॄ (अर्थः) वयोहानौ
श्नाविषये ( जॄणाति ) इत्यादि अन्यत्र जार्यतिवत् यथा तु भाष्यवार्तिकवृत्तिन्यासपदमज्जर्यादि तथायं धातुर्नास्तीति प्रतीयतइति जीर्यतावुपपादितम् आत्रेयमैत्रेयदैवचपुरुषकारादिषु दर्शनादिहास्माभिर्लिखितः 22
जॄ (अर्थः) वयोहानौ
(जारयति जरति जरिता जरीता) "वॄतो वा'' इत्यादि जीर्यते जृणातिवत् ज्रि इति नन्दी ज्राययति ज्रयति क्रैयादिकोऽप्येवमिति सः, ज्रिणाति 274
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“जॄ वयोहानौ”@} 2 प्वादिः, ल्वादिश्च।
‘जृणाति जीर्यति जरत्येकार्थे जारयत्यपि।’ 3 इति देवः।
दिवादौ ‘जॄष् वयोहानौ’, क्र्यादौ चुरादौ ‘जॄ वयोहानौ’ इति समानार्थास्त्रयो धातवः पठ्यन्ते।
त्रयोऽप्येते प्रामाणिका इति प्रतिभाति।
अत एव, देवश्लोके 4 त्रयाणामनुवादः सङ्गच्छते।
मैत्रेयरक्षितक्षीर- स्वामिनावपि एवमभ्युपगमेऽनुकूलौ।
अत एव सिद्धान्तकौमुद्याम्, ‘जनीजॄष्क्नसुरञ्जोऽमन्ताश्च’ 5 इत्यत्र, ‘षित्त्वनिर्देशाज्जीर्यते- र्ग्रहणम्, जृणातेस्तु जारयति’ इत्युक्तं सङ्गच्छते।
एवमभ्युपगमे ‘निरनु- बन्धकग्रहणे सानुबन्धकस्य’ 6 इति वचनेन, ‘जॄस्तम्भु--’ 7 इत्यादिषु जीर्यतेरग्रहणं स्यादिति तु शङ्क्यम्।
‘ज्ञापक- सिद्धं सर्वत्र’ 8 इति न्यायेन तस्यापि ग्रहणसिद्धेः।
षितो जीर्यतेः जरकः, जरयन्, जरा, जरीत्वा-जरित्वा, जरम् -जारम् २, इत्यादीनि रूपाणि भवन्ति।
जृणातेस्तु जारकः, जारयन्, जीर्णिः, जरीत्वा-जरित्वा, जारम् २, इत्यादीनि रूपाणि भवन्ति, इति विशेषः।
चौरादिकस्य जारयतेराधृषीयत्वेन, णिजभावपक्षे क्रैयादिकघातुवत् सर्वाण्यपि रूपाणि भवन्ति।
शतरि तु जरन् इति विशेषः।
माधवीयधातुवृत्तौ तु, भाष्यवार्तिकवृत्तिन्यासपदमञ्जर्यादिपर्यालोचनायां जृणातेः पाठोऽप्रामा- णिक इत्युक्तम्।
तदुपष्टम्भकवृत्तिन्यासादिग्रन्थस्यानुपलम्भेन सुधियस्तत्त्वमत्र निर्णयन्तु।
‘दारजारौ कर्तरि, णिलुक् च’ 9 इत्यत्रोद्योते ‘ननु जृणातिरपि क्र्यादौ पठ्यते
अत एव तद्व्यावृत्तये ‘जनीजॄष्--’ 10 इत्यत्र षकारोच्चारणम्।
एवञ्च तस्यामित्त्वेन तस्माद् घञि णिलोपे- नापि सिद्धे जारयतीति चेन्न--मितो जर इति रूपव्यावृत्त्यर्थत्वात्।’ इति नागेशोपाध्यायानामुक्तिः जृणातेरभ्युपगमेऽनुकूला दृश्यते।
11 जारकः-रिका, 12 जारकः-रिका, 13 जिजरीषकः-जिजरिषकः-जिजीर्षकः-र्षिका, 14 जेजिरकः-रिका
15 जरीता-जरिता-त्री, जारयिता-त्री, जिजरीषिता-जिजरिषिता-जिजीर्षिता-त्री, जेजिरिता-त्री
16 जृणन् 17 -ती, जारयन्-न्ती, जिजरीषन्-जिजरिषन्-जिजीर्षन्-न्ती
-- जरीष्यन्-जरिष्यन्-न्ती-ती, जारयिष्यन्-न्ती-ती, जिजरीषिष्यन्-जिजरि-षिष्यन्-जिजीर्षिष्यन्-न्ती-ती
-- -- जारयमाणः, जारयिष्यमाणः, -- 18 जेजीर्यमाणः
जेजिरिष्यमाणः
19 जीः-जिरौ-जिरः
-- -- -- 20 जीर्णम्-जीर्णः-जीर्णवान्, जारितः, जिजरीषितः-जिजरिषितः-जिजीर्षितः
जेजिरितः-तवान्
21 जरः, 22 जजीर्वान्-जेरिवान्, जारः, जिजरीषुः-जिजरिषुः-जिजीर्षुः, जेजिरः
जरीतव्यम्-जरितव्यम्, जारयितव्यम्, जिजरीषितव्यम्-जिजरिषितव्यम्-जिजीर्षितव्यम्, जेजिरितव्यम्
जरणीयम्, जारणीयम्, जिजरीषणीयम्-जिजरिषणीयम्-जिजीर्षणीयम्-जेजिरणीयम्
जार्यम्, जार्यम्, जिजरीष्यम्-जिजरिष्यम्-जिजीर्ष्यम्, जेजीर्यम्
ईषज्जरः-दुर्जरः-सुजरः
-- -- -- 23 जीर्यमाणः, जार्यमाणः, जिजरीष्यमाणः-जिजरिष्यमाणः-जिजीर्ष्यमाणः
जेजीर्यमाणः, जारः, जारः, जिजरीषः-जिजरिषः-जिजीर्षः, जेजिरः
जरीतुम्-जरितुम्, जारयितुम्, जिजरीषितुम्-जिजरिषितुम्-जिजीर्षितुम्, जेजिरितुम्
24 जीर्णिः, जारणा, जिजरीषा-जिजरिषा-जिजीर्षा, जेजिरा
जरणम्, जारणम्, जिजरीषणम्-जिजरिषणम्-जिजीर्षणम्, जेजिरणम्
25 जरीत्वा- 26 जरित्वा, जारयित्वा, जिजरीषित्वा-जिजरिषित्वा-जिजीर्षित्वा, जेजिरित्वा
प्रजीर्य, प्रजार्य, प्रजिजरीष्य-प्रजिजरिष्य-प्रजिजीर्ष्य, प्रजेजीर्य
जारम् जरीत्वा जरित्वा जारम् जारयित्वा जिजरीषम् जिजरिषम् जिजीर्षम् जिजरीषित्वा जिजरिषित्वा जिजीर्षित्वा जेजिरम्
जेजिरित्वा २। 27
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(६१८)
02
=>
(९-क्र्यादिः-१४९४। अक। सेट्। पर।)
03
=>
(श्लो। ३९)
04
=>
(३९)
05
=>
(ग। सू। भ्वादिः)
06
=>
(परिभाषा-८२)
07
=>
(३-१-५८)
08
=>
(परिभाषा-१२६)
09
=>
(वा। ३-३-२०)
10
=>
(ग। सू। भ्वादौ)
11
=>
[पृष्ठम्०५८३+ २२]
12
=>
[[१। ‘जनीजॄष्--’ (ग। सू। भ्वादौ) इत्यत्र षित्करणेनास्य मित्संज्ञाभावात् ‘मितां ह्रस्वः’ (६-४-९२) इत्युपधाह्रस्वो न। एवं ण्यन्ते सर्वत्र बोध्यम्।]]
13
=>
[[२। ‘इट् सनि वा’ (७-२-४१) इतीड्विकल्पः। इट्पक्षे ‘वॄतो वा’ (७-२-३८) इति दीर्घविकल्पः। इडभावपक्षे ‘इको झल्’ (१-२-९) इति सनः कित्त्वेन गुणाभावे ‘ऋत इद्धातोः’ (७-१-१००) इतीत्त्वे रपरत्वे, ‘हलि च’ (८-२-७७) इति दीर्घे रूपम्। एवं सन्नन्ते सवर्त्र रूपत्रयं बोध्यम्।]]
14
=>
[[३। यङि ‘ॠत इद्धातोः’ (७-१-१००) इतीत्त्वे, द्वित्वे, अभ्यासगुणेच, यकाराकार- योर्लोपे रूपमेवं भवति। एवं यङन्ते सर्वत्र ज्ञेयम्।]]
15
=>
[[४। ‘वॄतो वा’ (७-२-३८) इति इटो दीर्घविकल्पः।]]
16
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[[५। ‘क्र्यादिभ्यः श्ना’ (३-१-८१) इति श्ना विकरणप्रत्ययः। ‘श्नाऽभ्यस्तयोरातः’ (६-४-११२) इत्याकारलोपे, ‘ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम्’ (वा। ८-४-१) इति णत्वे, ‘प्वादीनां ह्रस्वः’ (७-३-८०) इति ह्रस्वे रूपम्।]]
17
=>
[[आ। ‘त्वामेष सम्प्रति मृणामि दृणामि नागं नो चेज्जृणत्तम नरानकृणन्नृणीहि।।’ धा। का। ३। ७।]]
18
=>
[[६। इत्वे रपरत्वे ‘हलि च’ (८-२-७७) इति दीर्घे रूपम्। एवम्, यकि, यति, ल्यपि दीर्घो बोध्यः।]]
19
=>
[[७। क्विपि, इत्वे रपरत्वे, ‘र्वोरुपधाया दीर्घ इकः’ (८-२-७६) इति दीर्घः।]]
20
=>
[[८। ‘श्रयुकः क्किति’ (७-२-११) इति इण्णिषेधः। इत्वरपरत्वयोः, ‘रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य दः’ (८-२-४२) इति निष्ठानत्वे, णत्वे रूपम्।]]
21
=>
[पृष्ठम्०५८४+ १८]
22
=>
[[१। ‘छान्दसः क्वसुः क्वचिद् भाषायां भवति।’ इति न्यायेन लिटः क्वस्वादेशे द्वित्वे, ‘वा जॄभ्रमुत्रसाम्’ (६-४-१२४) इत्येत्वाभ्यासलोपविकल्पे रूपद्वयं भवति।]]
23
=>
[[२। भावे यकि इत्वरपरत्वयोः ‘हलि च’ (८-२-७७) इति दीर्घे णत्वे रूपम्।]]
24
=>
[[३। ‘ऋल्वादिभ्यः क्तिन् निष्ठावद्वाच्यः’ (वा। ८-२-४२) इति क्तिनस्तकारस्य नत्वे णत्वे रूपम्।]]
25
=>
[[४। ‘श्र्युकः क्किति’ (७-२-११) इति इण्णिषेधे प्राप्ते, ‘जॄव्रश्च्योः क्त्व’ (७-२-५५) इति नित्यमिट्। दीर्घविकल्पः।]]
26
=>
[[आ। ‘जरित्वेव जवेनान्ये निपेतुस्तस्य शाखिनः।’ भ। का। ९। ४१।]]
27
=>
[पृष्ठम्०५८५+ २६]
Capeller
German
जॄ s. 1. जर्.
Burnouf
French
*जॄ जॄ. जरामि et जरे 1, जीर्यामि 4,
जृणामि 9, et जारयामि 10
p. जजार, 3p. pl.
जजरुस् et जेरुस्
f1. जरिलास्मि et
जरीतास्मि
f2. जरिष्यामि et जरीष्यामि
a1.
अजरिषम्
a2. अजरम्
gér. जरित्वा et
जरीत्वा
ppr.
जरत् et vd. जुरत्
pp.
जीर्ण
ppf. vd. जुजुर्वस्। Vieillir, devenir vieux
Etre
affaibli, être abattu. s'user: सौहृदानि जीर्यन्ते
कालेन les amitiés s'usent avec le temps
जीर्यति बलम्
la force s'épuise
वस्त्राणि जीर्णानि vêtements usés
être faible: जिर्णं दनुस् are fragile.
Digérer:
जठरे भोजनम् des aliments dans son estomac.
Etre
accablé [dans la bataille], être tué.
Actt. rendre vieux, Vd.
*जॄ जॄ ou जृ, usité dans le Veda pour
गृ।
Stchoupak
French
जॄ-
{%jīryati -te
jarayati -te
jīrṇa- %} -- vieillir, s'user
caus. digérer, consumer, user.