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जिग्लेविषकः-षिका (jigleviSakaH-SikA)

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“ग्लेवृ सेवने”@} 2 ग्लेवकः-विका, ग्लेवकः-विका, जिग्लेविषकः-षिका, जेग्लेवकः-विका
इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि कम्पनार्थकगेपृ धातुवत् 3 ज्ञेयानि।
ण्यति-ग्लेव्यम् 4।
क्विपि ऊठि वृद्धौ ग्लौः इति रूपमिति विशेषः।
प्रासङ्गिक्यः
01
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(४५०)
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(१-भ्वादिः-५०३। सक। सेट्। आत्म।)
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(४२९)
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[[आ। ‘सेव्यं सतां शङ्करगेव्यमब्जभूग्लेव्यं सुरैः पेव्यममेव्यमुन्मदैः।’ धा। का। १-६५।]]