जाङ्गुली (jAGgulI)
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Spoken Sanskrit
Englishजाङ्गुली - jAGgulI - - ridged gourd [ Luffa Acutangula - Bot. ]
जाङ्गुली - jAGgulI - - durgA
Shabdartha Kaustubha
Kannadaजाङ्गुली
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ವಿಷವಿದ್ಯೆ
निष्पत्तिः - > "अण्" (४-३-१२०) । "ङीप्" (४-१-१५)
व्युत्पत्तिः - > जाग्गुलस्य विषस्येदम्
विस्तारः - > "जाङ्गुली विषविद्यायाम्" - मेदि० ।
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Edgerton Buddhist Hybrid
Englishjāṅgulī, f. (Skt. Lex. id.
JM. jaṅguli, AMg. jaṅgolī, id.),
(1) the science and art of curing snake-bites: Śikṣ 〔142.1〕 °lyāṃ vidyāyāṃ udāhṛtāyāṃ, a snake-charm having been recited
but Transl., 〔p. 139, note 3〕, reads jāṅgulyā, allegedly ‘with Tib.’ (which is not cited), and renders when the snake charmer recites this spell against poison
there is a stem jāṅguli, m., snake-charmer, Skt. Lex., but this form being fem. would have to be taken as meaning by a female snake-charmer
(2) n. of a goddess: Sādh 〔177.14〕 etc.
in 〔249.5〕 a personified charm (vidyā) against poison (uttamā viṣanāśanī).
अभिधानचिन्तामणिपरिशिष्टम्
Sanskritगौतमी कौशिकी कृष्णा तामसी बाभ्रवी जया ॥ ४७ ॥
कालरात्रिर्महामाया भ्रामरी यादवी वरा ।
बर्हिध्वजा शूलधरा परमब्रह्मचारिणी ॥ ४८ ॥
अमोघा विन्ध्यनिलया षष्ठी कान्तारवासिनी ।
जाङ्गुली बदरीवासा वरदा कृष्णपिङ्गला ॥ ४९ ॥
p{0003}
दृषद्वतीन्द्रभगिनी प्रगल्भा रेवती तथा ।
महाविद्या सिनीवाली रक्तदन्त्येकपाटला ॥ ५० ॥
एकपर्णा बहुभुजा नन्दपुत्री महाजया ।
भद्रकाली महाकाली योगिनी गणनायिका ॥ ५१ ॥
हासा भीमा प्रकूष्माण्डी गदिनी वारुणी हिमा ।
अनन्ता विजया क्षेमा मानस्तोका कुहावती ॥ ५२ ॥
चारणा च पितृगणा स्कन्दमाता घनाञ्जनी ।
गान्धर्वी कर्वरी गार्गी सावित्री ब्रह्मचारिणी ॥ ५३ ॥
कोटिश्रीर्सन्दरावासा केशी मलयवासिनी ।
कालायनी विशालाक्षी किराती गोकुलोद्भवा ॥ ५४ ॥
एकानसी नारायणी शैला शाकंभरीश्वरी ।
प्रकीर्णकेशी कुण्डा च नीलवस्त्रोग्रचारिणी ॥ ५५ ॥
अष्टादशभुजा पौत्री शिवदूती यमस्वसा ।
सुनन्दा विकचा लम्बा जयन्ती नकुलाकुला ॥ ५६ ॥
विलङ्का नन्दिनी नन्दा नन्दयन्ती निरञ्जना ।
कालंजरी शतमुखी विकराली करालिका ॥ ५७ ॥
विरजाः पुरला जीरी बहुपुत्री कुलेश्वरी ।
कैटभी कालदमनी दर्दुरा कुलदेवता ॥ ५८ ॥
रौद्री कुन्द्रा महारौद्री कालंगमा महानिशा ।
बलदेवस्वसा पुत्री हीरी क्षेमंकरी प्रभा ॥ ५९ ॥
मारी हैमवती चापि गोला शिखरवासिनी ।
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शब्दकल्पद्रुमः
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