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जर्ज (jarja)

 
शब्दसागरः
English
जर्ज r. 1st and 6th cls. (जर्जति)
1. To say. To blame, to reprove.
3. To
kill or hurt. उक्तौ भर्त्सने तुदा० पर० सक-सेट् पक्षे भ्वा०
Yates
English
जर्ज (श) जर्जति 6.
a. Idem.
Wilson
English
जर्ज r. 1st and 6th cls. (जर्जति)
1 To say.
2 To blame, to reprove.
3 To kill or hurt.
धातुपाठः (Krishnacharya)
Sanskrit
धातुः:
जर्ज्
मूलधातुः:
जर्ज
धात्वर्थः:
परिभाषण-हिंसा-तर्जनेषु
गणः:
तुदादिः
कर्मकत्वं:
सकर्मकः
इट्त्वं:
सेट्
उपग्रहः:
परस्मैपदी
रूपम्:
जर्जति
धातुप्रदीपः
Sanskrit
जर्जँ जर्ज
मानकरूपान्तरम् - चर्चँ
चर्च
मानकरूपान्तरम् - झर्झँ
झर्झ परिभाषण, सन्तर्जनयोः
- जर्जति जर्जन्ती चर्चति झर्झति चर्च झर्झ इत्येतौ तुदादवपि पठ्येते इह तु स्वरार्थं पठितौ अर्थानुरोधाच्चोष्मान्तवर्गेऽपि एते पठ्यन्ते ।। 716-718 ।।
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskrit
जर्ज्ज, वाच भर्त्से इति कविकल्पद्रुमः
(तुदां-परं-सकं-सेट् ।) श, जर्ज्जती जर्ज्जन्ती ।भर्त्सस्तर्ज्जनम् इति दुर्गादासः
वाचस्पत्यम्
Sanskrit
जर्ज उक्तौ भर्त्सने तु० प०
सक०
सेट् जर्जति अजर्जीत् जजर्ज जर्जरः
क्षीरतरङ्गिणी
Sanskrit
जर्जँ जर्ज
मानकरूपान्तरम् - झर्झँ
झर्झ
मानकरूपान्तरम् - चर्छँ
चर्छ परिभाषणे
- जर्जति जर्जरः, झर्झरः चर्च इति दुर्गः 19, 21
धातुवृत्तिः
Sanskrit
जर्जँ जर्ज
मानकरूपान्तरम् - चर्चँ
चर्च
मानकरूपान्तरम् - झर्झँ
झर्झ (अर्थः) परिभाषण, हिंसा, तर्जनेषु
( जर्जति चर्चति झर्झति झर्झरः ) बाहुलकादरः चर्चज्ञर्ज्ञयोस्तुदादो पठिष्यमाणयोरिह पाठः स्वरार्थ इति देवमैत्रेयपुरुषषकारेषु उष्मान्तेषु पाठोर्थानुरोधादिति मैत्रेयः चर्च अध्ययनइति चुरादौ 705
जर्जँ जर्ज
मानकरूपान्तरम् - चर्चँ
चर्च
मानकरूपान्तरम् - झर्झँ
झर्झ (अर्थः) परिभाषण, भर्त्सनयोः
( जर्जति जजर्ज चर्चति चर्त्तिका ) संज्ञायां क्वुन्, ण्वुल्वा ( झर्झति जझर्झ जर्जरः झर्झरः ) बाहुलकाद् रन्नन्तौ आद्यन्तावपि चान्तावित्येके चर्चतिझर्झत्योः शपि पाठः स्वरार्थ इत्युक्तम् 18-19-20
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“जर्ज परिभाषणहिंसातर्जनेषु”@} 2 जर्जकः-र्जिका, जर्जकः-र्जिका, जिजर्जिषकः-षिका, जाजर्जकः-र्जिका
जर्जिता-त्री, जर्जयिता-त्री, जिजर्जिषिता-त्री, जाजर्जिता-त्री
इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि चर्चधातुवत् 3 ज्ञेयानि।
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(५८८)
02
=>
(१-भ्वादिः-७१६। सक। सेट्। पर।)
03
=>
(५०५)
1 {@“जर्ज परिभाषणतर्जनयोः”@} 2 ‘परिभाषणसन्तर्जनयोः’ इति मा।
धा।
वृत्तिपाठः।
जर्जकः-र्जिकाः, जर्जकः-र्जिका, जिजर्जिषकः-षिका, जाजर्जकः-र्जिका
इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि भौवादिकचर्चधातुवत् 3 ज्ञेयानि।
शत्रन्तात् स्त्रियां ङीपि तु ‘आच्छीनद्योर्नुम्’ 4 इति नुम्विकल्पो भवति।
यथा जर्जती 5 -जर्जन्ती इति।।
6
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(५८९)
02
=>
(६-तुदादिः-१२९८। सक। सेट्। पर।)
03
=>
(५०५)
04
=>
(७-१-८०)
05
=>
[[C। ‘वृक्णव्याचरसोञ्छती फलगणानव्युच्छितायां निशि स्नान्ती नर्च्छति मिच्छिता सुजनता यस्मिन् हितं जर्जती।’ धा। का। २। ७३।]]
06
=>
[पृष्ठम्०५६०+ २६]