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ग्लै (glai)

 
शब्दसागरः
English
ग्लै r. 1st cl, ग्लायति 1. To be languid or weary, to be exhausted,
faded, &c.
2. To yawn, this root is sometimes considered to be
ग्ला. making ग्लायति as above, and in the causal form ग्लपयति or
ग्लापयति. भ्वा-पर-अक-अनिट्
Yates
English
ग्लै ग्लायति 1.
a. To be languid or
weary
to yawn.
Wilson
English
ग्लै r. 1st cl. (ग्लायति)
1 To be languid or weary, to be exhausted, faded, &c.
2 To yawn: this root is sometimes considered
to be ग्ला, making
ग्लायति as above, and in the causal form ग्लपयति or ग्लापयति.
Apte
English
ग्लै [glai], 1
P.
(ग्लायति, ग्लान)
To feel aversion or dislike, be unwilling or disinclined to do anything (with
inf.
).
To be fatigued or wearied, feel tired or exhausted.
To despond, sink in spirit, be dejected
ना$वकल्प्यमिदं ग्लायेद् यत् कृच्छ्रेषु भवानपि
Bk.*
19.17, 6.12.
To wane, fade, faint away.
Caus.
(ग्ल-ग्लपयति, but प्रग्लापयति)
To cause to fade away, wither up
ग्लपयति यथा शशाङ्कं तथा हि कुमुद्वतीं दिवसः
Ś.*
3.16
Ku.*
3.49.
To tire out, exhaust.
To injure, trouble, hurt.
To emaciate, waste
व्रतैः स्वमङ्गं ग्लपयन्त्यहर्निशम्
Ku.*
5.29
U.*
3.5.
Apte 1890
English
ग्लै {c1c} P. (ग्लायति, ग्लान) 1 To feel aversion or dislike, be unwilling or disinclined to do anything (with inf.).
2 To be fatigued or wearied, feel tired or exhausted.
3 To despond, sink in spirit, be dejected
Bk. 19. 17, 6. 12.
4 To wane, fade, faint away.
Caus. (ग्ल-ग्लापयति, but प्रग्लापयति) 1 To cause to fade away, wither up
Ś. 3. 18
Ku. 3. 49.
2 To tire out, exhaust.
3 To injure, trouble, hurt.
4 To emaciate, waste
Ku. 5. 29
U. 3. 5.
Monier Williams Cologne
English
ग्लै
cl.
1.
P.
ग्लायति (ep. also Ā. °ते
cl.
2.
P.
ग्लाति,
MBh.
iii, 13730
xiii, 7365
perf. जग्लौ,
Pāṇ.
vii, 4, 60,
Kāś.
2. जग्लिथ and °ग्लाथ,
Vop.
viii, 83
Ā. जग्ले,
Pāṇ.
vi, 1, 45
Pat.
&
Kāś.
aor.
अग्लासीत्,
Bhaṭṭ.
Subj. 2. sg. ग्लासीस्,
MBh.
iii, 1210
Prec. ग्लायात्, ग्लेय्°, ग्लासीष्ट,
Pāṇ.
vi, 4, 68,
Kāś.
),
to feel aversion or dislike, be averse or reluctant or unwilling or disinclined to do anything (dat. [ŚBr. ii, iii, ix
KātyŚr.
Lāṭy.
] or instr. [MBh. iii, 1210] or
abl.
[14541] or
inf.
[Pāṇ. iii, 4, 65])
to be languid or weary, feel tired, be exhausted, fade away, faint,
MBh.
Śāntiś.
Bhaṭṭ.
to be hard upon any one (acc. ),
MBh.
iii, 13730 :
Caus.
ग्लपयति (-ग्लापयति See अव-, प्र-, वि-
ep.
also Ā. °ते, xiii, 4694
aor.
2. sg. अजिग्लपस्,
Bhaṭṭ.
xv, 18),
to exhaust, tire, be hard upon, injure, cause to faint or perish,
MBh.
Śak.
iii, 14
Vikr.
VarBṛS.
Sāh.
(with मनस्) to make desponding,
MBh.
iii, v
(irreg.
Pot.
ग्लपेत्) to become cast down or desponding, 1650.
Monier Williams 1872
English
ग्लै ग्लै, cl. 1. P. (ep. also A.) ग्लायति, -ते,
जग्लौ, ग्लास्यति, अग्लासीत्, ग्लातुम्, to feel
aversion or dislike, to be averse or reluctant, be un-
willing, disinclined to do anything (with inf., e. g.
ग्लायति भोक्तुम्, he dislikes to eat)
to be languid
or weary, to feel tired, to be exhausted, to fade away,
lose one's strength, faint, despond, wane: Caus. P.
ग्लापयति or ग्लपयति (but the latter form never
used with prepositions), to make unwilling or averse,
to exhaust, tire
to injure
to cause to perish
(with
or without मनस्) to make desponding
to become
cast down or desponding.
Macdonell
English
ग्लै GLAI, Ⅰ. P. glā́ya (E. also Ā.) and Ⅱ. 🞄P. glā-ti, be loath or averse (with in. or 🞄d.)
be relaxed, exhausted, or vexed
repine: 🞄pp. glāná, wearied, exhausted
torpid
cs. 🞄glā̆paya, exhaust
exhaust
pain, distress
injure
🞄macerate
cause to wane: pp. glāpita, 🞄withered. pari, pp. exhausted. abhi-pari, 🞄pp. id..
Benfey
English
ग्लै ग्लै (akin to गल्), i. 1, ग्लाय
(in epic poetry ग्लाति instead of ग्लायति,
e. g. MBh. 3, 13730
cf. गै), Par. (in
epic poetry also Ātm. , MBh. 3, 16713).
1. To become exhausted, MBh. 5, 7178.
2. To decrease, MBh. 12, 7513.
3.
To repine, Man. 3, 98. Ptcple. of the
pf. pass. ग्लान,
1. Sad, MBh. 15, 132.
2. Wearied, MBh. 3, 14109,
n.
Ex-
haustion, MBh. 13, 3519. Caus. ग्लापय
and ग्लपय,
1. To macerate, Vikr.
d. 54.
2. To injure, Rājat. 1, 334.
3.
To pain, distress, MBh. 5, 1100 (ग्लपेत्,
instead of ग्लपयेत्, cf. गुप्)
13, 4694
(Ātm. ) -- With the prep. परि परि,
परिग्लान, Exhausted, MBh. 7, 8898. --
With अभिपरि अभि-परि, अभिपरिग्ला-
न, The same, MBh. 1, 4489. -- With
वि वि, Caus. ग्लापय, To afflict,
Bhāg. P. 3, 2, 22. -- Cf. probably O.H.G. kleini,
akin to ग्लान।
Apte Hindi
Hindi
ग्लै
"भ्वा* पर* , " - -
"विरक्ति या अरुचि अनुभव करना, काम करने को जी करना"
ग्लै
"भ्वा* पर* , " - -
"क्लान्त या श्रान्त होना, थका हुआ या अवसन्न अनुभव करना"
ग्लै
"भ्वा* पर* , " - -
"साहस छोड़ना, हतोत्साह होना, उदास होना"
ग्लै
"भ्वा* पर* , " - -
"क्षीण होना, मूर्छित होना"
ग्लै
पुं*
- -
"सुखा देना, शुष्क कर देना, चोट पहुँचाना, क्षति पहुँचाना"
ग्लै
पुं*
- -
थका देना
Shabdartha Kaustubha
Kannada
ग्लै - हर्षक्षये (भ्वा० पर० अक० अनि०) ग्लायति
पदविभागः - > धातुः
कन्नडार्थः - > ಗ್ಲಾನಿ ಹೊಂದು /ಕಳೆಗುಂದು
प्रयोगाः - > "जग्लौ दध्यौ वितस्तान क्षणं प्राण विव्यथे"
उल्लेखाः - > भट्टि० १४-६०
ग्लै - हर्षक्षये (भ्वा० पर० अक० अनि०) ग्लायति
पदविभागः - > धातुः
कन्नडार्थः - > ದಣಿ /ಆಯಾಸ ಪಡು
ग्लै - हर्षक्षये (भ्वा० पर० अक० अनि०) ग्लायति
पदविभागः - > धातुः
कन्नडार्थः - > ದುರ್ಬಲನಾಗು
ग्लै - हर्षक्षये (भ्वा० पर० अक० अनि०) ग्लायति
पदविभागः - > धातुः
कन्नडार्थः - > ಬಾಡು
ग्लै - हर्षक्षये (भ्वा० पर० अक० अनि०) ग्लायति
पदविभागः - > धातुः
कन्नडार्थः - > ಒಣಗು
L R Vaidya
English
glE {% vi. 1P (pp. ग्लान
pres. ग्लायति) %} 1. To feel aversion or dislike, to be disinclined to do anything
2. to languid or weary, to despond, Bt.vi.12
3. to fade away, to faint, Bt.vi.43
4. to decline. (caus. ग्लपयति or ग्लापयति.)
Bopp
Latin
ग्लै 1. P. (part. pass. ग्लान, gr. 611.)
1) fatigare, defati-
gare.
2) contristare, dolore afficere. Pass. ग्लाये.
SA. 3. 23.: सावित्र्या ग्लायमानायास् तिष्ठन्त्याश्च दि-
वानिशम्. - Caus. ग्लापयामि et ग्लपयामि (gr. 519.
520.) facere ut alqs defatigetur, contristetur. RAGH. 16.
38.: निदाघग्लपिताम् इवो ऽर्वीम्. (V. ग्लानि, ग्ला-
स्नु et cf. lat. lâbor quod a fatigatione nominatum esse
potest et formâ cum Caus. ग्लापयामि convenit, mutatâ
tenui in mediam et abjectâ initiali gutturali, sicut in las-
sus, si hoc cum ग्लास्नु q. v. cohaeret.)
c. परि i. q. simpl. परिग्लान languore confectus, exhau-
stus. N. 11. 25.: श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य परिग्लानस्य.
c. परि praef. अभि id. MAH. 1. 4489.: क्षुच्छ्रमाभिपरि-
ग्लान.
Kridanta Forms
Sanskrit
ग्लै (ग्लै॒ हर्षक्षये मित् अनुपसर्गाद्वा १९४५ - भ्वादिः - अनिट्)
ल्युट् = ग्लानम्
अनीयर् = ग्लानीयः - ग्लानीया
ण्वुल् = ग्लायकः - ग्लायिका
तुमुँन् = ग्लातुम्
तव्य = ग्लातव्यः - ग्लातव्या
तृच् = ग्लाता - ग्लात्री
क्त्वा = ग्लात्वा
ल्यप् = प्रग्लाय
क्तवतुँ = ग्लानवान् - ग्लानवती
क्त = ग्लानः - ग्लाना
शतृँ = ग्लायन् - ग्लायन्ती
धातुपाठः (Krishnacharya)
Sanskrit
धातुः:
ग्लै
मूलधातुः:
ग्लाय्
धात्वर्थः:
हर्षक्षये
गणः:
भ्वादिः
कर्मकत्वं:
अकर्मकः
इट्त्वं:
अनिट्
उपग्रहः:
परस्मैपदी
रूपम्:
ग्लायति
अनुबन्धादिविशेषः:
ऐकारान्तः
धातुप्रदीपः
Sanskrit
ग्लै हर्षक्षये
- ग्लायति ग्लाता ग्लायात्। ग्लेयात् ग्लानिः सुग्लः ग्लानः ।। 907 ।।
Wordnet
Sanskrit
Synonyms:
ग्लै, परिश्रम्, श्रम्, क्लम्, द्राघ्
verb
आयासेन बलक्षयानुकूलः व्यापारः।
"पुत्रम् अनु धावित्वा माता ग्लायति।"
Synonyms:
क्लम्, ग्लै
verb
बौद्धशारीरादिश्रमात्मकः व्यापारः।
"अतीव परिश्रमानन्तरमपि अहं क्लाम्यामि।"
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskrit
ग्लै, क्लमे इति कविकल्पद्रुमः
(भ्वां-परं-अकं-अनिट् ।) अन्तःस्थतृतीययुक्तः क्लमो हर्ष-क्षयः ग्लायति लोकः शोकात् अनुपसर्गस्यञौ ज्वल ह्वल ह्मल इत्यादिना वा ह्रस्वः ।ग्लपयति ग्लापयति सोपसर्गस्य तु प्रग्लाप-यति इति दुर्गादासः
(यथा, मनुः ९८ ।“श्रुत्वा स्पृष्ट्वा दृष्ट्वा भुक्त्रा घ्रात्वा यो नरः ।न हृष्यति ग्लायति वा विज्ञेयो जितेन्द्रियः
”)
वाचस्पत्यम्
Sanskrit
ग्लै क्लमे हर्षक्षये
भ्वा०
पर०
अक० अनिट् ग्लायतिआग्लासीत् जग्लौ जग्लिथ--जग्लाथ ग्लानिःग्लास्नुः ग्लानः ग्लेयम् णिचि ग्लपयति तेअजिग्लपत् ग्लानिशब्दे उदा० “मनो ग्लपयतेतीव्रम् विषं गन्धेन सर्वशः” भा० आनु० ४६९४ श्ली० ।“ग्लपयति यथा शशाङ्कम् तथा हि कुमुद्वतींदिवसः” शकु० “पतङ्गैर्ग्लपितावयम्” भट्टिः ।“बालस्य लक्ष्मीं ग्लपयन्तमिन्दोः” कुमा० “यत्त्वंवैराणि कोषञ्च सहदण्डमजिग्लपः” भट्टिः
क्षीरतरङ्गिणी
Sanskrit
ग्लै हर्षक्षये
- (अर्थविवरणम्) हर्षक्षयोऽत्र धात्वपचयः
ग्लायति वान्यस्य संयोगादेः (6468) इति लिङि एत्वम्-ग्लेयात्, ग्लायात् ग्लास्नावनुवमां (1556) इति वा मित्त्वम्- ग्लपयति, ग्लापयति संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः (8243) निष्ठानत्वम्-ग्लानः ग्लाजिस्थश्च क्स्नुः (32139) ग्लास्नुः ग्लानुदिभ्यां डौ (उ0 264) ग्लौश्चन्द्रः ग्लाज्याहाभ्यो निः (3395 वा0) ग्लानिः शकधृषज्ञाग्ला (3465) इति तुमुन्-ग्लायति भोक्तुम् 873
धातुवृत्तिः
Sanskrit
ग्लै
मानकरूपान्तरम् - म्लै
म्लै (अर्थः) हर्षक्षये
(अर्थविवरणम्) हर्षक्षयो धातुक्षयः
( ग्लास्यति जग्लौ जग्लतुः जग्लाथ जग्लिथ जग्लौ जग्लिव जग्लिम ग्लाता ग्लास्यति ग्लायतु अग्लायत् ग्लायेत् ) आशिषि ( ग्लायात् ग्लायेत् ) ( सूत्रम्) वान्यस्य संयोगादेः (इति सूत्रम्) इति घुमास्थादेरन्यस्य संयोगादेरार्द्धधातुके क्ङिति लिङि वा एत्वम् ( अग्लासयीत् ) सगिटौ ( जिग्लासति जाग्लायते गाग्लेति जाग्लीतः ) ( सूत्रम्) इल्यघोः (इति सूत्रम्) इति क्ङिति सार्वधातुके श्नाप्रत्यस्य चाघोरभ्यस्तस्य चकारस्य ईकारविधानादीत्वं लोटि हेरपित्त्वात् ङित्वादीत्वं, ( जाग्लीहि अजिग्लपत्प्रग्लापयति ) ( सूत्रम्) ग्लास्त्रावनुवमां (इति सूत्रम्) इति अनुपसर्गस्य वा मित्वादीत्वं, ( जाग्लीहि अजिग्लपत्प्रग्लापयति ) ( सूत्रम्) ग्लास्त्रावनुवमां (इति सूत्रम्) इति अनुपसर्गस्य वा मित्त्वमुक्तम् सुग्लायतीति ( सुग्लः ) "आदेच'' इत्यात्वं प्रागेव प्रत्ययोत्पत्तेरनैमित्तिकमिति "आतश्चोपसर्गे'' इति उपसृष्टादाकारान्तात् विहितः को भवति ( ग्लानः ) "संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः''इति निष्ठानत्वम् ( ग्लास्नुः )"ग्लाजिस्थश्च क्स्नुः'' ( सुग्लानं भवता ) ( सूत्रम्) आतो युच (इति सूत्रम्) इति ईषदादिषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषूपपदेषु युच् स्त्रियां ( ग्लानिः ) "ग्लाज्याहात्वरिभ्यो निः'' ( ग्लौः) "ग्लानुदीभ्यां डौः, डित्त्वात् टिलोपः "च्विरव्यम्'' एषां च्वयन्तानामेवाव्ययत्वमिति नियमात् "कृन्मेजन्तः'' इत्यव्ययत्वाभावत् ( ग्लावौ ग्लावः ) इत्यादि यथासम्भवं नेयम् ग्लै गात्रविमान इति क्क चित्पठ्यते, गात्रविमानः कानिहानिः 888
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“ग्लै हर्षक्षये”@} 2 हर्षक्षयः = धातुक्षयः।
3 ग्लायकः-यिका, 4 ग्लपकः-ग्लापकः-प्रग्लापकः-पिका, 5 जिग्लासकः-सिका, जाग्लायक-यिका
6 ग्लाता-त्री, ग्लपयिता-ग्लापयिता-त्री, जिग्लासिता-त्री, जाग्लायिता-त्री
7 ग्लायन् 8 -न्ती, ग्लपयन्-ग्लापयन्-न्ती, जिग्लासन्-न्ती
-- ग्लास्यन्-न्ती-ती, ग्लपयिष्यन्-ग्लापयिष्यन्-न्ती-ती, जिग्लासिष्यन्-न्ती-ती
-- -- ग्लपयमानः-ग्लापयमानः, -- जाग्लायमानः
-- ग्लपयिष्यमाणः-ग्लापयिष्यमाणः, -- जाग्लायिष्यमाणः
सुग्लाः-सुग्लौ-सुग्लाः
-- -- 9 ग्लानः- 10 ग्लानम्-ग्लानवान्, 11 ग्लपितः-ग्लापितः, जिग्लासितः, जाग्लायितः-तवान्
12 सुग्लः, प्रग्लः 13, 14 ग्लायः, 15 ग्लास्नुः 16 ग्लपः-ग्लापः, जिग्लासुः, 17 जाग्लः
18 ग्लातव्यम्, ग्लपयितव्यम्-ग्लापयितव्यम्, जिग्लासितव्यम्, जाग्लायितव्यम्
19 प्रणिग्लानीयम्-प्रनिग्लानीयम्, ग्लपनीयम्-ग्लापनीयम्, जिग्लासनीयम्, जाग्लायनीयम्
20 ग्लेयम्, ग्लप्यम्-ग्लाप्यम्, जिग्लास्यम्, जाग्लाय्यम्
21 ईषद्ग्लानः-दुर्ग्लानः-सुग्लानः
-- -- ग्लायमानः, ग्लप्यमानः-ग्लाप्यमानः-प्रग्लाप्यमानः, जिग्लास्यमानः, जाग्लाय्यमानः
ग्लायः, ग्लपः-ग्लापः, जिग्लासः, जाग्लायः
ग्लातुम्, ग्लपयितुम्-ग्लापयितुम्, जिग्लासितुम्, जाग्लायितुम्
22 ग्लानिः, 23 प्रग्ला, ग्लपना-ग्लापना, जिग्लासिषा, जाग्लाया
ग्लानम्, ग्लपनम्-ग्लापनम्, जिग्लासनम्, जाग्लायनम्
ग्लात्वा, ग्लपयित्वा-ग्लापयित्वा, जिग्लासित्वा, जाग्लायित्वा
प्राग्लाय, 24 प्रग्लाप्य, प्रजिग्लास्य, प्रजाग्लाय्य
ग्लायम् २, ग्लात्वा २, 25 ग्लपम् -ग्लापम् २, ग्लपयित्वा -ग्लापयित्वा २, जिग्लासम् २, जिग्लासित्वा २, जाग्लायम्
जाग्लायित्वा २। 26 ग्लौः।
27
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(४५२)
02
=>
(१-भ्वादिः-९०३। अक। अनि। पर।)
03
=>
[[१। ‘आदेच उपदेशेऽशिति’ (६-१-४५) इत्यनेनानैमित्तिके आत्वे, ‘आतो युक् चिण्कृतोः’ (७-३-३३) इति युगागमः। एवं घञि णमुल्यपि ज्ञेयम्।]]
04
=>
[[२। अनैमित्तिके आत्त्वे, ‘अर्तिह्रीव्लीरीक्नूयीक्ष्माय्यातां--’ (७-३-३६) इति पुगागमे ‘ग्लास्नावनुवमां च’ (गणसूत्रम्-भ्वादिः) इत्यनेनानुपसृष्टस्य ग्लाधातोर्मित्त्वं- वैकल्पिकम्। मित्त्वपक्षे, ‘मितां ह्रस्वः’ (६-४-९२) इति णौ उपधाह्रस्वः। एवं ण्यन्ते सर्वत्र बोध्यम्। उपसर्गसमभिव्याहारे तु मित्त्वं
\n\n तेन ‘प्रग्लापकः’ इत्येव।]]
05
=>
[[३। धातोरस्यानुदात्तत्वात्, ‘एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्’ (७-२-१०) इत्यनेन सनः इडभावे, ‘सन्यङोः’ (६-१-९) इति द्वित्वे, अभ्यासे, ‘सन्यतः’ (७-४-७९) इतीत्त्वम्। एवं सन्नन्ते सर्वत्र ज्ञेयम्।]]
06
=>
[पृष्ठम्०४४६+ २६]
07
=>
[[१। शित्परकत्वेनात्वाभावे, ‘एचोऽयवायावः’ (६-१-७८) इत्यायादेशः।]]
08
=>
[[आ। ‘ततो रावणमाख्याय द्विषन्तं पततां वरः। व्रणवेदनया ग्लायन् ममार गिरिकन्दरे।।’ भ। का। ६-४३।]]
09
=>
[[२। ‘संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः’ (८-२-४३) इति निष्ठातकारस्य नकारः।]]
10
=>
[[B। ‘धयन् दृशा ग्लानरुचिं कृष्णं म्लानिं त्यजन् द्यानमले जलान्ते।’ धा। का। २-३०।]]
11
=>
[[C। ‘आजिघ्रैः पुष्पगन्धानां पतङ्गैर्ग्लपिता वयम्।।’ भ। का। ६-७८।]]
12
=>
[[३। ‘आतश्चोपसर्गे’ (३-१-१३६) इति कर्तरि कप्रत्ययः। ‘आतो लोप इटि च’ (६-४-६४) इत्याकारलोपः।]]
13
=>
[[ड्। ‘अज्ञो यो यस्य वा नास्ति प्रियः प्रग्लो भवेन्न सः।।’ भ। का। ६। ७७।]]
14
=>
[[४। ‘श्याऽऽद्व्यधाश्रु--’ (३-१-१४१) इति कर्तरि णप्रत्यये युगागमः।]]
15
=>
[[५। ‘ग्लाजिस्थश्च ग्स्नुः’ (३-२-१३९) इति तच्छीलादिषु कर्तृषु ग्स्नुप्रत्ययः। ‘श्रयुकः क्किति’ (७-२-११) इति इण्णिषेधः।]]
16
=>
[[E। ‘तान् विलोक्यासहिष्णुः सन् विललापोन्मदिष्णुवत्। वसन् माल्यवति ग्लास्नू रामो जिष्णुरधृष्णुवत्।।’ भ। का। :७। ४।]]
17
=>
[[६। ‘न धातुलोप आर्धधातुके’ (१-१-४) इति सूत्रस्य भाष्यकृता प्रत्याख्यानपक्षे, पृथगल्लोपे, ‘यङोऽचि च’ (२-४-७४) इत्यनेन यकारस्य लुकि, अकारस्य लुकि, अकारस्य स्थानिवद्भावेन अजाद्यार्धधातुकङित्परकत्वात् ‘आतो लोप इटि च’ (६-४-६४) इत्याकारलोपे ‘जाग्लः’ इति रूपम्। साम्भावनिकस्य ङित्त्व- स्यातिदेशलभ्यत्वादेव ‘यातिः’ इत्यत्र यङन्तात् क्तिचि अल्लोपस्य स्थानिवद्भा- वादुत्तरखण्डे आकारलोपो भवतीति बोध्यम्। ‘यङोऽचि च’ (२-४-७२) इत्यनेना- नैमित्तिके लुकि तु आकारलोपाभावे जाग्लाः इत्येव।]]
18
=>
[पृष्ठम्०४४७+ १८]
19
=>
[[१। ‘शेषे विभाषाऽकस्वादावषान्त उपदेशे’ (८-४-१८) इति णत्वविकल्पः।]]
20
=>
[[२। आत्वे, ‘ईद्यति’ (६-४-६५) इत्याकारस्य ईकारे गुणः।]]
21
=>
[[३। ‘आतो युच्’ (३-३-१२८) इति ईषदाद्युपपदेषु खलपवादो युच्।]]
22
=>
[[४। ‘ग्लाम्लाज्याहाभ्यो निः (वा। ३-३-९५) इति स्त्र्यधिकारे क्तिनपवादो नि- प्रत्ययः।]]
23
=>
[[५। ‘आतश्चोपसर्गे’ (३-३-१०६) इति स्त्रियामङ्।]]
24
=>
[[६। उपसृष्टस्य धातोः मित्त्वाभावात् ‘मितां ह्रस्वः’ (६-४-९२) इति ह्रस्वो न।]]
25
=>
[[७। मित्त्वपक्षे, ‘चिण्णमुलोः--’ (६-४-९३) इति णमुल्परे णौ दीर्घविकल्पः।]]
26
=>
[[८। ‘ग्लानुदिभ्यां डौः’ (द। उ। २-१२) इति डौप्रत्ययः। ग्लौः = चन्द्रः। ग्लायतीति ग्लौः।]]
27
=>
[पृष्ठम्०४४८+ २९]
Burnouf
French
*ग्लै ग्लै। ग्लामि 2 et ग्लायामि 1
p.
जग्लौ
f2. ग्लास्यामि
a1. अग्लासम्
pp. ग्लान।
Etre las, fatigué, abattu
au fig. être abattu par la tristesse:
ग्लायति हृष्यलि il n'éprouve ni abattement ni
allégresse.