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व्रजति (vrajati)

 
Spoken Sanskrit
English
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - depart from
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - walk
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - go in order to
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - attack
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - pass away
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - go
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - proceed
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - withdraw
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - go to
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - attain to
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - retire
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - go abroad
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - wander
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - go to any state or condition
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - be going to
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - travel
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - go against
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - move
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - have sexual intercourse with
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - become
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - undergo
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - go away
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - have sexual intercourse with
व्रजति { व्रज् } - vrajati { vraj } - verb - obtain
अधः व्रजति - adhaH vrajati -
sent.
- sink down to Hell
अधः व्रजति - adhaH vrajati -
sent.
- be digested or absorbed into [ as food ]
अन्तं व्रजति - antaM vrajati -
sent.
- come to the end of
जीवन् व्रजति - jIvan vrajati -
sent.
- escape alive
सुखं व्रजति - sukhaM vrajati -
sent.
- feel well or nice
अन्यतः व्रजति - anyataH vrajati -
sent.
- go elsewhere
विनाशं व्रजति - vinAzaM vrajati -
sent.
- be destroyed
शरणं व्रजति - zaraNaM vrajati -
sent.
- take refuge with
धुर्यैः व्रजति - dhuryaiH vrajati -
sent.
- travel by beast of burden
निर्वृतिं व्रजति - nirvRtiM vrajati -
sent.
- become happy
पादाभ्यां व्रजति - pAdAbhyAM vrajati - verb - go on foot
उपानद्भ्यां व्रजति - upAnadbhyAM vrajati -
sent.
- go wearing shoes
धातुपाठः (Krishnacharya)
Sanskrit
धातुः:
व्रज्
मूलधातुः:
व्रज
धात्वर्थः:
गतौ
गणः:
भ्वादिः
कर्मकत्वं:
सकर्मकः
इट्त्वं:
सेट्
उपग्रहः:
परस्मैपदी
रूपम्:
व्रजति
Akhyata Chandrika
Sanskrit
गतौ
2.3.32
प्रतिष्ठते अञ्चति अयते व्रजति अयति गच्छति ऋणोति अटति याति एति सरति इयर्ति सर्पति हम्मति द्रमति अङ्गति इङ्गति अमति मीमति जिह्रीते कङ्कते नक्षति ईखति ऋच्छति वभ्रति श्वङ्कते त्रौकते वस्कते अंहते टीकते अभ्रति मस्कते लङ्घते शोणति अङ्घते त्रङ्कते अर्दति पयते वयते विच्छायति पन्थयति ईजते चरण्यति स्रङ्कते घटते श्वञ्चते रङ्गति श्वचते लङ्गति ईर्ते ध्वजति ध्वञ्जति चरति धञ्जति शवति अण्ठते ग्लुञ्चति इष्यति वञ्चति म्रोचति म्लोचति अजति त्वञ्चति फणति द्रवते गाते पद्यते विच्छति पथति क्रमति पतयते रिण्वति रण्वति स्रवति श्यायते धन्वति अञ्चते सलति शुनति छङ्गयति श्वर्तयति रेवते ससर्ति एषते(छ) नेषते(छ) अन्ये[as]
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“लूञ् छेदने”@} 2 प्वादिः, ल्वादिश्च।
लावकः-विका, लावकः-विका, लुलूषकः-षिका, लोलूयकः-यिका
लविता-त्री, लावयिता-त्री, लुलूषिता-त्री, लोलूयिता-त्री
लुनन्-ती, लावयन्-न्ती, लुलूषन्-न्ती
-- लविष्यन्-न्ती-ती, लावयिष्यन्-न्ती-ती, लुलूषिष्यन्-न्ती-ती
-- लुनानः, लावयमानः, लुलूषमाणः, लोलूयमानः
लविष्यमाणः, लावयिष्यमाणः, लुलूषिष्यमाणः, लोलूयिष्यमाणः
कंसलूः-ल्वौ-ल्वः
-- -- -- 3 विपक्षलावः, 4 5 सकृल्लूः, 6 लुलुवुषः पश्य, लुलविवान्, 7 शत्रुलावो व्रजति, 8 लोलूया 9, 10 लवकः, 11 12 लूत्वा, 13 लूनः, 14 लूनिः, 15 अभिलावः, 16 17 खङ्गलावं 18 19 खङ्गेन लावं वा, 20 लवित्रम् 21 22 लवः, 23 लवणः, 24 लिलावयिषुः, लिलावयिषा, 25 लवाणकम्, 26 लुवा, 27 लोम, 28 त्रप्रत्यये रूपमेवम्
छन्दसि विषये।
लुनाति लूयते वा लोत्रम् = शरीरम्।]] लोत्रम्, इत्यादीनि सर्वाण्यपि रूपाणि क्रैयादिकपुनातिवत् 29 ज्ञेयानि।
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१५१६)
02
=>
(९-क्र्यादिः-१४८३। सक। सेट्। उभ।)
03
=>
[[आ। ‘विपक्षलावस्य निजस्य शत्रोः अह्नाय भूत्वा लवको बहूनि।’ वा। वि। २-३९।]]
04
=>
[[१। ‘कर्मण्यण्’ (३-२-१) इत्यण्प्रत्ययः।]]
05
=>
[[२। ‘क्विप् च’ (३-२-७६) इति सोपपदात् कर्तरि क्विप्।]]
06
=>
[[३। कर्तरि क्वसुप्रत्ययः। काशिकायां (६-४-२२) प्रत्युदाहृतत्वात् भाषायामपि धातोरस्मात् क्वसुरिति ज्ञेयम्। अत्र ‘न शसदद--’ (६-४-१२६) इत्यादिना एत्वाभ्यासलोपौ न।]]
07
=>
[[४। क्रियार्थक्रियायामुपपदे ‘अण् कर्मणि च’ (३-३-१२) इति भविष्यत्यर्थेऽण्प्रत्ययः।]]
08
=>
[[B। ‘तस्याः सासद्यमानाया लोलूयावान् रघूत्तमः।’ भ। का। ४-३१।]]
09
=>
[[५। यङन्तात् ‘अ प्रत्ययात्’ (३-३-१०२) इत्यकारप्रत्ययः। स्त्रियां टाप् भवति।]]
10
=>
[[६। ‘प्रुसृल्वः समभिहारे वुन्’ (३-१-१४९) इति कर्तरि वुन्प्रत्ययः। समभिहारो नाम (लक्षणया) साधुकारित्वम्
\n\n अतश्च यः सकृदपि सुष्ठु करोति उच्यते लवक इति।]]
11
=>
[[C। ‘लवकौ शत्रुशक्त्रीनामृष्यमूकमगच्छताम्।।’ भ। का। ६-८६।]]
12
=>
[[७। ‘श्रयुकः क्किति’ (७-२-११) इतीण्निषेधः। एवमेव क्तक्तिन्प्रभृतिष्वपि इण्निषेधो बोध्यः।]]
13
=>
[[८। ‘ल्वादिभ्यः’ (८-२-४४) इति निष्ठातकारस्य नकारः।]]
14
=>
[[९। ‘ॠल्वादिभ्यः क्तिन् निष्ठावद् वक्तव्यः’ (वा। ३-३-१०८) इति तकारस्य नकारः।]]
15
=>
[[१०। ‘निरभ्योः पूल्वोः’ (३-३-२८) इति अभिपूर्वकात् भावे घञ्। अप्प्रत्ययापवादः।]]
16
=>
[[ड्। ‘वनाभिलावान् कुर्वन्तः स्वेच्छया चारुविक्रमाः।।’ भ। का। ३-७७।]]
17
=>
[[११। ‘हिंसार्थानां समानकर्मकाणाम्’ (३-४-४८) इति तृतीयान्त उपपदे णमुल्।]]
18
=>
[पृष्ठम्११७७+ ३३]
19
=>
(रिपुं मारयति)
20
=>
[[१। ‘अर्तिलूधू--’ (३-२-१८४) इति करणे इत्रप्रत्ययः। केचित्तु लुवित्रमिति रूपमाहुः। तन्मते गुणाभावश्चिन्त्यः। कल्पसूत्रप्रयोगास्तु छान्दसत्वेन साधवः।]]
21
=>
[[आ। ‘वयं शत्रुलवित्रेषोर्दूता रामस्य भूपतेः।।’ भ। का। ७-८७।]]
22
=>
[[२। ‘ऋदोरप्’ (३-३-५७) इति अप्प्रत्ययः। घञोऽपवादः।]]
23
=>
[[३। नन्द्यादित्वात् शुद्धादपि धातोः कर्तरि ल्युप्रत्यये, तत्रैव (३-१-१३४) गणे पाठात् णत्वमिति ज्ञेयम्। लवणः--एतन्नामकोऽसुरः। लवणम् इति तु अविवक्षित- प्रकृतिप्रत्ययार्थः शब्दः रसविशेषे रूढो लुडन्तः।]]
24
=>
[[B। ‘दुर्जयो लवणः शूली विशूलः प्रार्थ्यतामिति।।’ रघुवंशे १५-५।]]
25
=>
[[४। ‘आणको लूञ्--’ (द। उ। ३-२७) इति आणकप्रत्ययः। लवाणकम् = दात्रम्।]]
26
=>
[[५। औणादिके (द। उ। ६-५१) कनिन्प्रत्यये रूपमेवम्।]]
27
=>
[[६। औणादिके (द। उ। ६-७९) मनिन्प्रत्यये लकारस्य रत्वं विकल्पेन निपात्यते
\n\n लो(रो)म = केशाः। ‘रुहे रुचेश्च रौतेश्च रुदिरुध्यो रुषेरपि। षण्णामेव धातूनां रोमशब्दं निपातयेत्।।’ इति (क्वाचित्कः) श्वेतवनवासिग्रन्थः।]]
28
=>
[[७। औणादिके [द। उ। ८-९०]
29
=>
(१०३५)