वह्नि (vahni)
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शब्दसागरः
EnglishCapeller Eng
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Spoken Sanskrit
English वह्नि vahni fire
वह्नि vahni particular fire
वह्नि vahni draught animal
वह्नि vahni mystical name of the letter r
वह्नि vahni any one who conveys or is borne along
वह्नि vahni horse
वह्नि vahni any animal that draws or bears along
वह्नि vahni fire of digestion
वह्नि vahni team
Wilson
EnglishApte
Englishवह्निः [vahniḥ], [वह्-निः &Uṇ.* 4.53]
Fire
अतृणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति Subhāṣ.
The digestive faculty, gastric fluid.
Digestion, appetite.
A vehicle.
The marking-nut plant.
Lead-wort.
A sacrificer, priest.
A god in general.
An epithet of the Maruts.
Of Soma.
A horse.
A draught animal.
The number 'three'.
The mystical of the letter र्
रकार. -उत्पातः an igneous meteor. -कर
igniting.
stimulating digestion, stomachic. -करी Grislea Tomentosa (Mar. धायटी).-काष्ठम् a kind of agallochum. -कोणः the south-east quarter. -कोपः a conflagration.
गन्धः incense.
resin.
गर्भः a bamboo.
the Śamī tree
अग्नि- गर्भ. -दीपकः safflower. (-का) अजमोदा q. v. -धौत pure like fire. -नामन्
the marking nut plant.
lead-wort. -पतनम् self-immolation. -बीजम्
gold.
a citron tree.
of the mystical syllable रम्.-भोग्यम् clarified butter. -मन्थः, -मन्थनः Premna Spinosa (Mar. नरवेल). -मारकम् water. -मित्रः air, wind. -रेतस्
an epithet of Śiva.
gold. -लोह, -लोहक copper. -वधू
Svāhā, the wife of Agni.
The Svāhā Mantra. -वर्णम् the red water-lilly. -वल्लभः resin.
वीजम् gold.
the common lime. -शिखम्
saffron.
saffower
स्यात् कुसुम्भं वह्निशिखं वस्त्ररञ्जकमित्यपि Bhāva -शेखरम् saffron. -संस्कारः the religious rite of cremation. -सखः the wind. -संझकः the Chitraka tree. -साक्षिकम् fire being the witness. -सुतः chyle.
Apte 1890
Englishवह्निः [वह्-नि] 1 Fire
अतृणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति Subhāṣ.
2 The digestive faculty, gastric fluid.
3 Digestion, appetite.
4 A vehicle.
5 The marking-nut plant.
6 Lead-wort.
7 A sacrificer, priest.
8 A god in general.
9 An epithet of the Maruts.
10 Of Soma.
11 A horse.
Comp.
कर a. {1} igniting. {2} stimulating digestion, stomachic.
काष्ठं a kind of agallochum.
गंधः {1} incense. {2} resin.
गर्भः {1} a bamboo. {2} the Śamī tree
cf. अग्निगर्भ.
दपिकः safflower.
नामन् m. {1} the marking nut plant. {2} lead-wort.
भोग्यं clarified butter.
मित्रः air, wind.
रेतस् m. {1} an epithet of Śiva. {2} gold.
लोहं,
लोहकं copper.
वर्णं the red waterlily.
वल्लभः resin.
वीजं {1} gold. {2} the common lime.
शिखं {1} saffron. {2} safflower.
सखः the wind.
संज्ञकः the Citraka tree.
Monier Williams Cologne
Englishany one who conveys or is borne along (applied to a charioteer or rider, or to various gods, to Agni, Indra, Savitṛ, the Maruts ),
the conveyer or bearer of oblations to the gods (esp. said of Agni, ‘fire’, or of the three sacrificial fires See अग्नि),
Monier Williams 1872
Englishवह्नि, इस्, इस्, इ, bearing, carrying, bringing (Ved.)
luminous, bright (Ved.)
(इस्), m. one who bears an
oblation (to the gods), a sacrificer, priest (Ved.)
‘borne along, ’ an epithet of the Maruts (Ved.)
of
Soma (Ved.)
of the gods in general (Ved.)
fire
(= Agni)
a horse (Naigh. I. 14)
any vehicle
lead-wort, Plumbago Zeylanica
the marking-nut
plant
the fire of the stomach, digestive faculty,
gastric fluid
digestion, appetite.
—वह्नि-कर, अस्,
आ or ई, अम्, making fire, igniting, lighting
pro-
moting digestion, giving appetite, stomachic
(ई), f.,
N. of the tree Grislea Tomentosa.
—वह्नि-काष्ठ,
अम्, n. a kind of Agallochum used as incense.
—वह्-
नि-गन्ध, अस्, m. incense
resin.
—वह्नि-गर्भ,
अस्, m. a bamboo
a sort of Mimosa, Mimosa Suma.
—वह्नि-चक्रा, f. a kind of plant (= कलिकारी)।
—वह्नि-ज्वाला, f., N. of the plant Grislea Tomen-
tosa.
—वह्नि-तम, अस्, आ, अम्, Ved. most luminous,
brightest.
—वह्नि-तस्कर-पार्थिव, आस्, m. pl. fire,
robbers, and the king.
—वह्नि-दमनी, f., N. of
a plant.
—वह्नि-दाह-समुद्भव, अस्, आ, अम्,
produced by burning.
—वह्नि-दीपक, अस्, m. saf-
flower
(इका), f. = अज-मोदा.
—वह्नि-नामन्, आ,
m. ‘called after fire, ’ the marking-nut plant
lead-
wort.
—वह्नि-नी, f., N. of a plant, Nardostachys
Jatamansi.
—वह्नि-पुराण, N. of a Purāṇa.
—वह्नि-पुष्पी, f., N. of a plant (= धातकी)।
—वह्नि-भोग्य, अम्, n. ‘that which is to be con-
sumed by fire, ’ ghee or clarified butter.
—वह्नि-
मन्थ, अस्, m. the tree Premna Spinosa (the wood
of which is used to procure fire by attrition).
—वह्-
नि-मारक, अम्, n. fire-destroyer.
—वह्नि-मित्र,
अस्, m. ‘friend of fire, ’ air, wind.
—वह्नि-रेतस्, आस्,
m. ‘fire-semen, ’ an epithet of Śiva.
—वह्नि-लोह
or वह्नि-लोहक, अम्, n. ‘fire-like iron, ’ copper.
—वह्नि-वधू, ऊस्, f. the wife of Agni or Fire.
—वह्नि-वर्ण, अम्, n. ‘fire-coloured, ’ the red
water-lily.
—वह्नि-वल्लभ, अस्, m. ‘fire-beloved, ’
resin.
—वह्नि-वीज, अम्, n. ‘fire-seed, ’ gold
the
common lime (= निम्बूक)
= रं-वीज, i. e. the
mystical syllable रम् (repeated as the peculiar prayer
of fire in the Tantra system).
—वह्नि-शिख, अम्,
n. safflower, Carthamus Tinctorius
saffron
(आ), f.
a pot-herb, Echites Dichotoma
[cf. अग्नि-शिखा।]
—वह्नि-शिखर, अस्, m. the flower Celosia Cris-
tata or cock's comb.
—वह्नि-सख, अस्, m. ‘friend
of fire, ‘the wind
a kind of plant (= जीरक)।
—वह्नि-सञ्ज्ञक, अस्, m. = चित्रक, q. v.
Macdonell
Englishवह्नि váh-ni, drawer (of a car), steed 🞄(V.)
charioteer (said of various gods in V.)
🞄conveyer of offerings to the gods, esp.. Agni 🞄(V.)
fire, god of fire (C.): vahninā saṃskṛ, hallow by fire, burn solemnly: -kuṇḍa, 🞄n. cavity in the ground for the sacred fire
🞄-kṛt, producing conflagration
-kopa, 🞄raging conflagration
-mat, containing 🞄fire
-maya, consisting of fire
-loka, 🞄world of Agni
-vat, containing the word 🞄vahni
-śikhā, flame of fire
-saṃskāra, 🞄m. sacrament of fire, cremation
-sākṣikam, 🞄ad. so as to be witnessed by fire
-sāt-kṛ, 🞄burn
-sphuliṅga, spark of fire.
Benfey
EnglishHindi
Hindiआग
Apte Hindi
Hindiवह्निः
- वह् + निः
अग्नि
वह्निः
- -
"पाचनशक्ति, आमाशय का रस"
वह्निः
- -
"हाज़मा, भूख लगना"
वह्निः
- -
यान
वह्निः
- वह्+नि
अग्नि
वह्निः
- वह्+नि
जठराग्नि
वह्निः
- वह्+नि
पाचक अग्नि
वह्निः
- वह्+नि
सवारी
वह्निः
- वह्+नि
यजमान
वह्निः
- वह्+नि
भारवाही जन्तु
वह्निः
- वह्+नि
तीन की संख्या
L R Vaidya
Englishभूतसङ्ख्या
Sanskrit३, अग्नि, अनल, आज्यभुक्, आज्याश, उषर्बुध, काल, कृशानु, कृष्णवर्त्मन्, क्रम, गुण, गुप्ति, जगत्, ज्योति, ज्वलन, ज्वाल, तपन, तृतीय, त्रय, त्रिकटु, त्रिकाल, त्रिगत, त्रिगुण, त्रिजगत्, त्रिनेत्र, त्रिपदी, त्रैत, दह, दहन, दीप्ति, द्युति, धाम, नेत्र, पद, पावक, पुं, पुर, पुरुष, पुष्कर, ब्रह्मन्, भुवन, रत्न, राम, रुद्राक्ष, रोहित, लोक, लोचन, वचन, वह्नि, विक्रम, विष्णु, विष्णुक्रम, वृत्त, वैश्वानर, शक्ति, शिखा, शिखिन्, शिवनेत्र, शूल, सप्तार्चि, सहोदर, हरनयन, हरनेत्र, हव्यभुक्, हव्यवाहन, हव्याश, हुतभुज्, हुतवह, हुताश, हुताशन, होतृ
Anekartha-Dvani-Manjari
Sanskritवसु
पु
वसु, सूर्य, वह्नि, श्री, वासव, धरादि
वसुः सूर्यो वसुर्वह्निर्वसुः श्रीर्वासवो वसुः ।
वसु रत्नं वसु द्रव्यं वसवोऽष्टौ धरादयः ॥ २८ ॥
verse 1.1.1.28
page 0002
वाडव
पु
वाडव, वह्नि, विप्र
मध्याश्वमध्ययोः कश्यं वाडवो वह्निविप्रयोः ॥ ६ ॥
verse 3.1.1.6
page 0014
विभावसु
पु
विभावसु, वह्नि, सूर्य
उदयेऽधिगमे प्राप्तिर्वह्निसूर्यौ विभावसू ॥ २७ ॥
verse 3.1.1.27
page 0015
Schmidt Nachtrage zum Sanskrit Worterbuch
Germanअभिधानचिन्तामणिः
Sanskritवह्निर्बृहद्भानुहिरण्यरेतसौ धनंजयो हव्यहविर्हुताशनः ।
कृपीटयोनिर्दमुना विरोचनाशुशुक्षणी छागरथस्तनूनपात् ॥ १०९७ ॥
कृशानुवैश्वानरवीतिहोत्रा वृषाकपिः पावकचित्रभानू ।
अप्पित्तधूमध्वजकृष्णवर्त्मार्चिष्मच्छमीगर्भतमोघ्नशुक्राः ॥ १०९८ ॥
शोचिष्केशः शुचिहुतवहोषर्बुधाः सप्तमन्त्र-
ज्वालाजिह्वो ज्वलनशिखिनौ जागृविर्जातवेदाः ।
बर्हिःशुष्मानिलसखवसू रोहिताश्वाश्रयाशौ
बर्हिर्ज्योतिर्दहनबहुलौ हव्यवाहोऽनलोऽग्निः ॥ १०९९ ॥
विभावसुः सप्तोदर्चिः स्वाहाग्नेयी प्रियास्य च ।
वह्नि (पुं), बृहद्भानु (पुं), हिरण्यरेतस् (पुं), धनञ्जय (पुं), हव्याशन (पुं), हविराशन (पुं), हुताशन (पुं), कृपीटयोनि (पुं), दमुनस् (पुं), विरोचन (पुं), आशुशुक्षणि (पुं), छागरथ (पुं), तनूनपाद् (पुं), कृशानु (पुं), वैश्वानर (पुं), वीतिहोत्र (पुं), वृषाकपि (पुं), पावक (पुं), चित्रभानु (पुं), अप्पित्त (क्ली), धूमध्वज (पुं), कृष्णवर्त्मन् (पुं), अर्चिष्मत् (पुं), शमीगर्भ (पुं), तमोघ्न (पुं), शुक्र (पुं), शोचिष्केश (पुं), शुचि (पुं), हुतवह (पुं), उषर्बुध (पुं), सप्तजिह्व (पुं), मन्त्रजिह्व (पुं), ज्वालाजिह्व (पुं), ज्वलन (पुं), शिखिन् (पुं), जागृवि (पुं), जातवेदस् (पुं), बर्हिःशुष्मन् (पुं), अनिलसख (पुं), वसु (पुं), रोहिताश्व (पुं), आश्रयाश (पुं), बर्हिर्ज्योति (पुं), दहन (पुं), बहुल (पुं), हव्यवाह (पुं), अनल (पुं), अग्नि (पुं), विभावसु (पुं), सप्तार्चिस् (पुं), उदर्चिस् (पुं), स्वाहा (स्त्री), आग्नेयी (स्त्री)
अभिधानरत्नमाला
Sanskritसप्तार्चिस्
सप्तार्चिस्, बहुल, शिखिन्, हुतवह, वैश्वानर, अग्नि, वसु, वह्नि, वायुसख, सितेतरगति, स्वाहाप्रिय, पावक, अर्चिष्मत्, ज्वलन, कृशानु, अनल, धूमध्वज, हव्यवाह्, बर्हिर्ज्योतिस्, उषर्बुध, दहन, चित्रभानु, शुचि, कृपीटयोनि, दमुनस्, कृष्णवर्त्मन्, आशुशुक्षणि, विभावसु, अपांपित्त, जातवेदस्, तनूनपाद्, वीतिहोत्र, बृहद्भानु, आश्रयाश, धनञ्जय, हिरण्यरेतस्, तमोघ्न, रोहिताश्व, हुताशन
सप्तार्चिर्बहुलः शिखी हुतवहो वैश्वानरोऽग्निर्वसु-
र्वह्निर्वायुसखः सितेतरगतिः स्वाहाप्रियः पावकः ।
अर्चिष्मान् ज्वलनः कृशानुरनलो धूमध्वजो हव्यवाट्,
बर्हिर्ज्योतिरुषर्बुधश्च दहनः स्याच्चित्रभानुः शुचिः ॥ ६२ ॥
कृपीटयोनिर्दमुनाः कृष्णवर्त्माशुशुक्षणिः ।
विभावसुरपांपित्तं जातवेदास्तनूनपात् ॥ ६३ ॥
वीतिहोत्रो बृहद्भानुराश्रयाशो धनञ्जयः ।
हिरण्यरेतास्तमोघ्नो रोहिताश्वो हुताशनः ॥ ६४ ॥
verse 1.1.1.62
page 0009
नाममाला
Sanskritपवनसख, पवमानसख, वायुसख, वातसख, अनिलसख, मरुत्सख, समीरणसख, गन्धवाहसख, श्वसनसख, सदागतिसख, नभस्वत्सख, मातरिश्वसख, चरण्युसख, जवनसख, प्रभञ्जनसख, अग्नि, शिखिन्, वह्नि, पावक, आशुशुक्षणि, हिरण्यरेतस्, सप्तार्चिस्, जातवेदस्, तनूनपात्, स्वाहापति, हुताश, ज्वलन, दहन, अनल, वैश्वानर, कृशानु, रोहिताश्व, विभावसु, वृषाकपि, समीगर्भ, हव्यवाह, हुताशन
तत्सखाऽग्निः शिखी वह्निः पावकश्चाशुशुक्षणिः ।
हिरण्यरेता सप्तार्चिर्जातवेदास्तनूनपात् ॥ ६४ ॥
स्वाहापतिर्हुताशश्च ज्वलनो दहनोऽनलः ।
वैश्वानरः कृशानुश्च रोहिताश्वो विभावसुः ॥ ६५ ॥
वृषाकपिः समीगर्भो हव्यवाहो हुताशनः ।
verse 0.1.1.64
page 0034
Mahabharata
EnglishVahni^1 = Agni, q.v.
Vahni^2, an ancient king (an Asura?). § 673b (Bali-Vāsavasaṃv.): XII, 227, 8264 (among the ancient rulers of the earth).
Vahni^3, = Vishṇu (1000 names).
पुराणम्
Englishवह्नि १ / VAHNI I. An asura. It is mentioned in mahābhārata, śānti Parva, Chapter 227, Stanza 52 that this asura had been a lokapāla (indra, agni, yama and varuṇa were called lokapālas) in olden days.
वह्नि २ / VAHNI II. The son of the King turvasu. vahni had a son named bharga who became very famous. (bhāgavata, skandha 9
brahmāṇḍa purāṇa, 3: 74. 1).
वह्नि ३ / VAHNI III. One of the sons born to kṛṣṇa by mitravindā. (bhāgavata, skandha 10).
Vedic Reference
Englishशब्दकल्पद्रुमः
Sanskritवह्निः, (वहति धरति हव्यं देवार्थमिति ।वह + “वहिश्रिश्रुय्विति ।” उणा० ४ । ५१ ।इति निः ।) चित्रकः । भल्लातकः । (यथा, सुश्रुते चिकित्सितस्थाने ९ अध्याये ।“मञ्जिष्ठाक्षौ वासको देवदारुपथ्यावह्नी व्योषधात्री विडङ्गम् ॥
”)निम्बूकः । इति राजनिर्घण्टः ॥
रेफः । इतितन्त्रम् ॥
अग्निः । इत्यमरः ॥
* ॥
तस्य नामानियथा, --“ते जातवेदसः सर्व्वे कल्माषः कुसुमस्तथा ।दहनः शोषणश्चैव तर्पणश्च महाबलः ।पिटरः पतगः स्वर्णस्त्वगाधो भ्राज एव च ॥
”अन्यत्र तु नामान्तराण्युक्तानि यथा, --“जृम्भकोद्दीपकश्चैव विभ्रमभ्रमशोभनाः ।अवसथ्याहवनीयौ दक्षिणाग्निस्तथै व च ।अन्वाहार्य्यो गार्हपत्य इत्येते दश वह्नयः ॥
”अन्यैरन्यथोक्तानि यथा, --“भ्राजको रञ्जकश्चैव क्लेदकः स्नेहकस्तथा ।धारको बन्धकश्चैव द्रावकाख्यश्च सप्तधा ।व्यापकः पावकश्चैव श्लेष्मको दशमः स्मृतः ॥
”शरीरस्थवह्नेः स्थानानि यथा, --“वह्नयो दोषदूष्येषु संलीना दश देहिनः ॥
”दोषदूष्यौ यथा, --“वातपित्तकफा दोषा दूष्याः स्युः सप्त धातवः ॥
”इति सारदातिलकः ॥
तत्र निषिद्धकर्म्माणि यथा, --“नाशुद्धोऽग्निं परिचरेत् न देवान् कीर्त्तयेदृषीन् ।न चाग्निं लङ्घयेद्धीमान् नोपदध्यादधः क्वचित् ॥
न चैनं पादतः कुर्य्यात् मुखेन न धमेद्बुधः ।अग्नौ न निःक्षिपेदग्निं नाद्भिः प्रशमयेत्तथा ॥
न वह्निं मुखनिश्वासैर्ज्वालयेन्नाशुचिर्ब्बुधः ।स्वमग्निं नैव हस्तेन स्पृशेन्नापसु चिरं वसेत् ॥
नापक्षिपेन्नोपधमे न्न सूर्पेण च पाणिना ।मुखेनाग्निं समिन्नीतं मुखादग्निरजायत ॥
”इति कौर्म्मे उपविभागे १५ अध्यायः ॥
अस्योत्पत्तिर्यथा, --शौनक उवाच ।“सर्व्वं श्रुतं महाभाग परिपूर्णं मनो मम ।अधुना श्रीतुमिच्छामि वह्नेरुत्पत्तिमीप्सिताम् ॥
सूत उवाच ।एकदा सृष्टिकाले च ब्रह्मानन्तमहेश्वराः ।श्वेतद्बीपं ययुः सर्व्वे द्रष्टुं विष्णुं जगत्पतिम् ॥
परस्परञ्च संभाषां कृत्वा सिंहासनेषु च ।ऊषुः सर्व्वे सभामध्ये सुरम्ये पुरतो हरेः ॥
विष्णुगात्रोद्भवास्तत्र कामिन्यः कमलाकलाः ।तत्र नृत्यन्ति गायन्ति विष्णुगाथाश्च सुस्वरम् ॥
तासाञ्च कठिनां श्रोणिं कठिनं स्तनमण्डलम् ।सस्मितं मुखपद्मञ्च दृष्ट्वा ब्रह्मा स कामुकः ॥
मनो निवारणं कर्त्तुं न शशाक पितामहः ।वीर्य्यं पपात चच्छाद लज्जया वाससा विभुः ॥
तद्बीर्य्यं वस्त्रसहितं प्रतप्तं कामतापितः ।क्षीरोदे प्रेरयामास सङ्गीते विरते द्विज ॥
जलादुत्थाय पुरुषः प्रज्वलन् ब्रह्मतेजसा ।उवास ब्रह्मणः क्रोडे लज्जितस्य च संसदि ॥
एतस्मिन्नन्तरे रुष्टो जलादुत्थाय सत्वरः ।प्रणम्य वरुणो देवान् बालं नेतुं समुद्यतः ॥
बालो दधार ब्रह्माणं बाहुभ्याञ्च भयाद्रुदन् ।किञ्चिन्नोवाच जगतां विधाता लज्जया द्विज ॥
बालकस्य करे धृत्वा चकाराकर्षणं रुषा ।वरुणश्च सभामध्ये तं चिक्षेप प्रजापतिः ॥
पपात दूरतो देवो वरुणो दुर्ब्बलस्तथा ।मूर्च्छां संप्राप मृतवत् कोपदृष्ट्या विधेरहो ॥
चेतनं कारयामासामृतदृष्ट्या च शङ्करः ।संप्राप्य चेतनां तत्र तमुवाच जलेश्वरः ॥
वरुण उवाच ।बालो जले समुद्भूतो मम पुत्त्रोऽयमीप्सितः ।अहं गृहीत्वा यास्यामि ब्रह्मा मां ताडयेत्कथम् ॥
ब्रह्मोवाच ।बालकः शरणापन्नो मयि विष्णो महेश्वर ।कथं दास्यामि भीतञ्च रुदन्तं शरणागतम् ॥
शरणागतदीनार्त्तं यो नं रक्षेदपण्डितः ।पच्यते निरये तावद् यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥
उभयोर्व्वचनं श्रुत्वा प्रहस्य मधुसूदनः ।उवाच सर्व्वतत्त्वज्ञः सर्व्वेशश्च यथोचितम् ॥
भगवानुवाच ।दृष्ट्वा सुकामिनीश्रोणिं वीर्य्यं धातुः पपात तत् ।लज्जया प्रेरयामास क्षीरोदे निर्म्मले जले ॥
ततो वभूब बालश्च धर्म्मतो विधिपुत्त्रकः ।क्षेत्रजश्च सुतः शास्त्रे वरुणस्यापि गौणतः ॥
महादेव उवाच ।यो विद्यायोनिसम्बन्वो वेदेषु च निरूपितः ।शिष्ये पुत्त्रे च समता चेति वेदविदो विदुः ॥
मन्त्रं ददातु वरुणो विद्याञ्च बालकाय च ।पुत्त्रो विधातुर्व्वह्निश्च शिष्यश्च वरुणस्य च ॥
विष्णुर्ददातु बालाय दाहिकां शक्तिमुल्वणाम् ।सर्व्वदग्धो हुताशश्च निर्व्वाणो वरुणेन च ॥
विष्णुश्च दाहिकां शक्तिं ददौ तस्मै शिवाज्ञया ।मन्त्रं विद्याञ्च वरुणो रत्नमालां मनोहराम् ॥
क्रोडे कृत्वा च तं बालं चुचुम्ब मायया सुरः ॥
”इति ब्रह्मवैवर्त्ते श्रीकृष्णजन्मखण्डे वह्न्युत्पत्तिर्नाम१३० अध्यायः ॥
* ॥
तद्दाहनिवारणौषधानियथा, --“सामुद्रसैन्धवयवा विद्युद्दग्धा च मृत्तिका ।तयानुलिप्तं यद्वेश्म नाग्निना दह्यते नृप ! ॥
”इति मात्स्ये राजधर्म्मे राजरक्षानाम १९३ अः ॥
अग्निवैकृत्यं तच्छान्तिश्च यथा, --“अनग्निर्दीप्यते यत्र राष्ट्रे यस्य निरिन्धनः ।न दीप्यते चेन्धनवान् स राष्ट्रः पीड्यते नृपैः ॥
प्रज्वलेदप्सु मासं वा तथार्द्धञ्चापि किञ्चन ।प्रासादतोरणद्वारं नृपवेश्म सुरालयम् ॥
एतानि यत्र दह्यन्ते तत्र राजभयं भवेत् ।विद्युता वा प्रदह्यन्ते तत्रापि नृपतेर्भयम् ॥
धूमश्चानग्निजो यत्र तत्र विद्यान्महद्भयम् ।विनाग्निं विस्फुलिङ्गाश्च दृश्यन्ते यत्र कुत्रचित् ॥
त्रिरात्रोपोषितश्चात्र पुरोधाः सुसमाहितः ।समिद्भिः क्षीरवृक्षाणां सर्षपैस्तु घृतेन च ॥
दद्यात् सुवर्णञ्च तथा द्विजेभ्योगाश्चैव वस्त्राणि तथा भुवञ्च ।एवं कृते पापमुपैति नाशंयदग्निवैकृत्यभवं द्बिजेन्द्र ! ॥
”इति तत्रैवाद्भुतशान्तिरग्निवैकृत्यं नाम २०५अध्यायः ॥
* ॥
मुख्याग्नयो यथा, --“गाहपत्यो दक्षिणाग्निस्तथैवाहवनीयकः ।एतेऽग्नयस्त्रयो मुख्याः शेषाश्चोपसदस्त्रयः ॥
”इति वह्निपुराणे गणभेदनामाध्यायः ॥
* ॥
वह्निविप्रमध्यगमननिषेधो यथा, --“द्वौ विप्रौ वह्निविप्रौ च दम्पत्योर्गुरुशिष्ययोः ।हलाग्रे च न गन्तव्यं ब्रह्महत्या पदे पदे ॥
”इति कर्म्मलोचनः ॥
* ॥
अपि च ।“नाग्निब्राह्मणयोरन्तरा व्यपेयात् नाग्न्योर्नब्राह्मणयोर्न गुरुशिष्ययोरनुज्ञया तु व्यपेयात् ।इति तिथ्यादितत्त्वधृतवचनम् ॥
* ॥
अथ वह्नि-स्तम्भनम् ।“मानुषस्य वसां गृह्य जलौकां तत्र पेषयेत् ।हस्तौ तु लेपयेत्तेन अग्निस्तम्भनमुत्तमम् ॥
शाल्मलीरसमादाय स्वरमूत्रे निधाय तम् ।अग्न्यागारे क्षिपेत्तेन अग्निस्तम्भनमुत्तमम् ॥
वायसी उदरं गृह्य मण्डूकवसया सह ।गुडिकां कारयेत्तेन ततोऽग्निं प्रक्षिपेद्वशी ॥
एवमेतत्प्रयोगेण अग्निस्तम्भनमुत्तमम् ।मण्डोतकवचायुक्तं मरीचं नागरं तथा ॥
चर्व्वित्वा च इमं सद्यो जिह्वया ज्वलनंलिहेत् ॥
गोरोचना भृङ्गराजं चूर्णं कृत्वा घृतं समम् ।दिव्यस्तम्भश्च पीत्वा स्यान्मन्त्रेणानेन वै तथा ॥
”ओँ अग्निस्तम्भनं कुरु । इति गारुडे १८६अध्यायः ॥
(दैत्यविशेषः । यथा, महाभारते ।१२ । २२७ । ५० ।“वाणः कार्त्तस्वरो वह्निर्विश्वदंष्ट्रोऽथ नैरृतिः ॥
”मित्रविन्दागर्भजातः कृष्णस्य पुत्त्रविशेषः । यथा, भागवते । १० । ६१ । १६ ।“महांशः पावनो वह्निर्मित्रविन्दात्मजाःक्षुधिः ॥
”तुर्व्वसुपुत्त्रः । यथा, हरिवंशे । ३२ । ११७ ।“तुर्व्वसोस्तु सुतो वह्निर्गोभानुस्तस्य चात्मजः ॥
”कुकुरपुत्त्रः । यथा, भागवते । ९ । २४ । १९ ।“कुकुरस्य सुतो वह्निर्विलोमा तनयस्ततः ॥
”)
वाचस्पत्यम्
Sanskritवह्नि वह--नि । १ अग्नौ २ चित्रकवृक्षे अमरः ३ भल्ला-तके ४ निम्बूके राजनि० । तन्त्रोक्ते ५ रकारे च ।“वर्गाद्यं वह्निसंस्थम्” इति श्यामास्तोत्रम् ।वह्निभेदादिकं यथा“जृम्भको दापकश्चैव विभ्रमभ्रमशोभनाः । आव-सथ्याहवनीयो दक्षिणाग्निस्तथैव च । अन्वाहार्य्योगार्हपत्य इत्येते दश वह्नयः” । अन्यैरन्यथोक्तानि यथा“म्राजको रञ्जकश्चैव क्लेदकः स्नेहकस्तथा । धारकाबन्धकश्चैव द्रावकाख्यश्च सप्तमः । व्यापकः पावकश्चैवश्लेष्मको दशमः स्मृतः” । शरीरस्थवह्नेः नामानियथा “वह्नयो दोषदुष्येषु संलीना दश देहिनः” । दोष-दुष्याश्च यथा “वातपित्तकफा दोषाः दुष्या स्युः सप्त-ञ्जतवः” शा० ति० । “मुख्याग्नयो यथा “गार्हपत्योदक्षिणाग्निस्तथैवाहवनीयकः । एतेऽग्नयस्त्रयो मुख्याःशेषाश्चोपसदस्त्रयः” वह्नि० । तत्र निषिद्धकर्माणियथा “नाशुद्धोऽग्निं परिचरेत् न देवान् कीर्त्तयेदृषीन् ।न चाग्निं लङ्घयेद्धीमान् नोपदध्यादधः क्वचित् । न चैनंपादतः कुर्य्यात् मुखेन न धमेद्वुधः । अग्नौ न निःक्षि-पेदग्निं नाद्भिः प्रशमयेत्तथा । न वह्निं मुखनिश्वासै-र्ज्वालयेन्नाशुचिर्बुधः । स्वमग्निं नैव हस्तेन स्पृशेन्नाप्सुचिरं वसेत् । नापक्षिपेन्नोपधमेत् न सूर्पेण चपाणिना । मुखेनाग्निं समुन्नीतं मुखादग्निरजायत”कूर्मपु० १५ अ० । अग्निवैकृत्यं तस्य शान्तिश्च यथा“अनग्निर्दीप्यते यत्र राष्ट्रे यस्य निरिन्धनः । न दीप्यतेचेन्धनवान् स राष्ट्रः पीड्यते नृपैः । प्रज्वलेदप्सुमासं वा तथार्द्धञ्चापि किञ्चन । प्रासाद तोरणद्वारंनृपवेश्म सुरालयम् । एतानि यत्र दह्यन्ते तत्र राज-भयं भवेत् । विद्युता वा प्रदह्यन्ते तत्रापि नृपते-र्मयम् । धूमश्चानग्निजो यत्र तत्र विद्यान्महद्भवम् ।विनाग्निं विस्फुलिङ्गाश्च दृश्यन्ते यत्र कुत्रचित् ।त्रिरात्रोपोषितश्चात्र पुरोधाः सुसमाहितः । समिद्भिःक्षीरवृक्षष्णां सर्षपैस्तु घृतेन च । दद्यात् सुवर्णञ्च तथाद्विजेभ्यो गाश्चैव वस्त्राणि तथा भुवञ्च । एवं कृते पाप-मुपैति नाशं यदग्निवैकृत्यभवं द्विजेन्द्र”! वह्निपु० १०५ अ० ।६ तद्देवताके कृत्तिकानक्षत्रे ज्योतिपम् ।
Capeller
GermanGrassman
Germanváhni, a., m. [von vah], 1〉 a., fahrend, Wagen ziehend
daher 2〉 m., Zugthier, Zugvieh
insbesondere 3〉 m., Ross
4〉 a. m., fahrend, die Fahrenden als Beiname oder Bezeichnung der Götter, wobei theils an ihr Fahren zu den Opfern, theils an ihr Fahren in Streitwagen zu denken ist
so insbesondere 5〉 des Indra, 6〉 der Aśvinen, der Marutʼs, 7〉 des Savitar
8〉 wo es vom Soma gebraucht wird, ist dieser als der schnell dahin fahrende aufgefasst, und vielfach mit einem Rosse verglichen
9〉 a., darbringend (Opfergaben, Lieder) [vah 10]
namentlich 10〉 mit āsā́ verbunden
daher 11〉 m., Darbringer der Opfer- oder Liedergaben, und besonders 12〉 m., von Agni, als dem der die Opfergaben zu den Göttern führt [vah 8].
-e [V.] 8〉 {732, 5}.
-is [m.] 1〉 etaśás {776, 19}. — 2〉 {927, 11}
{404, 4} (neben dróṇias paśús). — 5〉 {208, 4}
{265, 1}(?)
{887, 9}(?). — 7〉 {229, 1}. — 8〉 {721, 6}
{732, 6}
{748, 2}
{801, 1}
{809, 34}
{160, 3} (putrás pit(a)rós)
{820, 10} (viśā́m 〰 ná viśpátis). — 9〉 hótā pāstiásya {317, 6}
vedhā́s {128, 4} (agnís). — 10〉 {76, 4} (huve)
von Agni: {452, 2}
{457, 9}
{532, 9}. — 11〉 {113, 17}
{184, 1}
{254, 1}. — 12〉 {239, 1}
{523, 5}
{837, 6}.
-is [m.] dreisilbig (váhanis) [Page1246] 5〉 {129, 5} (mit āsā́). — 11〉 {643, 3} (vindate vásu).
-is [f.] 1〉 gaús yuktā́ 〰 ráthānaam {703, 1}.
-im 3〉 {927, 10}. — 8〉 {777, 28}
{803, 1}
{808, 17}
{941, 3} (āsā́). — 9〉 hótāram {663, 20} (agním). — 11〉 {235, 1}. — 12〉 {60, 1}
{265, 2}
agním 〰 devā́s akṛṇvata {245, 4}
{532, 12}.
-aye 5〉 índrāya {212, 2}.
-es 8〉 {480, 1} (diviásya).
-ī [du.] 6〉 {589, 4} (vīḍúpāṇī)
{628, 12}.
-ayas 2〉 ajā́s anyásya (pūṣṇás) 〰 {498, 3}. — 3〉 {14, 6}
{215, 13} (ā́śiṣṭhās)
{240, 2} (saptájihvās)
{228, 3}
{623, 23}
{632, 15}. — 4〉 devā́sas {3, 9}. — 6〉 (marútas) {964, 1}. — 11〉 {20, 8}
{48, 11}
{433, 4}
{598, 4}
{626, 2}
{940, 2}.
-ibhis 4〉 devaís {44, 13}. — 6〉 {6, 5}
{473, 3}
{919, 9} (oder Rosse). — 11〉 {591, 5}.
-itamas aufs beste darbringend agnís {297, 4} neben yájiṣṭhas.
Burnouf
Frenchवह्नि वह्नि (वह्
sfx. नि) Agni, le feu [qui porte
l'offrande aux dieux], Vd.
Digestion
appétit.
Plumbago
zeylanica, bot.
वह्निकरी (कृ) grislea tomentosa, bot.
वह्निगन्ध encens, résine.
वह्निगर्भ bambou. -- F. [आ] mimosa sama, bot.
वह्निदीपक safranum ou carthame.
वह्निनामन् plumbago zeylanica, bot.
वह्निभोग्य (भुज्) le घृत ou beurre clarifié,
aliment du feu ou d'Agni.
वह्निमन्थ (मथ्) premna spinosa [dont le bois forme une
des 2 अरणी].
वह्निमारक (मृ au c.) eau.
वह्निमित्र le vent [ami du feu].
वह्निरेतस् Śiva [qui a pour semence le feu].
वह्निवधू l'épouse d'Agni.
वह्निपर्ण lotus rouge.
वह्निवल्लभ résine.
वह्निवीज or.
La syllabe रं रं, que l'on
répète dans une prière au feu du système तन्त्र।
वह्निशिख safran
safranum ou carthame. -- F. echites
dichotoma, bot.
वह्निशिखर celosia cristata.
Stchoupak
Frenchवह्नि-
(qui porte les offrandes) feu, Agni
d'un Daitya
d'un
fils de Kṛṣṇa
d'un singe
-तम- sup. qui transmet le mieux les
offrandes (aux dieux)
-मन्त्- a. qui contient du feu
-मत्त्व- nt.
fait de contenir du feu
-मय- -ई- a. qui consiste en feu, de la nature
du feu, igné, ignique
-सात्-कृ- consumer. brûler.
°कण- étincelle.
°कन्या- filles d'Agni.
°कुण्ड- nt. trou dans la terre destiné à recevoir le feu sacré.
°दैवत- a. dent Agni est la divinité.
°पतन- nt. fait de s'immoler dans le feu.
°प्रिया- épouse d'Agni, Svahā.
°भोज्य-द्रव्य- nt. ce qui sert à entretenir le feu.
°शिखा- flamme.
°संस्कार- crémation.
°साक्षिकम्- adv. ayant le feu pour témoin, en présence du feu.
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