मन्मथ (manmatha)
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शब्दसागरः
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Spoken Sanskrit
Englishमन्मथ - manmatha - - 29th year in a 60 years' cycle of Jupiter
मन्मथ - manmatha - - amorous passion or desire
मन्मथ - manmatha - - love or the god of love
मन्मथ - manmatha - - love
मन्मथ - manmatha - - wood apple [ Feronia Elephantum - Bot. ]
मन्मथ - manmatha - - god of love
Wilson
EnglishApte
Englishमन्मथः [manmathḥ], 1 Cupid, the god of love
मन्मथो मां मथ्नन्निज- नाम सान्वयं करोति 1
75
न मन्मथस्त्वं स हि नास्ति- मूर्तिः 8.29.
Love, passion
प्रबोध्यते सुप्त इवाद्य मान्मथः 1.8
so परोक्षमन्मथः जनः 2.19.
The wood apple.
of a संवत्सर. -था of Dākṣāyaṇī.a. Enchanting, attractive
साक्षान्मन्मथमन्मथः 1.32.2. -आनन्दः a kind of mango tree.
आलयः the mango tree.
pudendum muliebre.-कर exciting love. -बन्धुः the moon. -युद्धम् amorous strife, sexual union, copulation. -लेखः a love letter
क्लान्तो मन्मथलेख एष नलिनीपत्रे नखैरर्पितः 3.26.
Apte 1890
Englishमन्मथः 1 Cupid, the god of love
मन्मथो मां मथ्नन्निजनाम सान्वयं करोति Dk. 21
Me. 73.
2 Love, passion प्रबोध्यते सुप्त इवाद्य मन्मथः Rs. 1. 8 so परोक्षमन्मथः जनः Ś. 2. 18.
3 The wood apple.
था N. of Dākshāyaṇī.
Comp.
आनंदः a kind of mango tree.
आलयः {1} the mango tree. {2} pudendum muliebre.
कर a. exciting love.
युद्धं amorous strife, sexual union, copulation.
लेखः a love letter
Ś. 3. 26.
Monier Williams Cologne
EnglishMonier Williams 1872
Englishमन्मथ मन्मथ, अस्, m. (probably an in-
tensive form fr. rt. 1. मथ् or मन्थ्, according to
others fr. मन् = मनस् + मथ, ‘agitating’), love,
the god of love, amorous passion or desire, (प-
रोक्ष-मन्मथो जनः, people who know nothing
of love)
the elephant or wood-apple, Feronia Ele-
phantum
epithet of the twenty-ninth (third) year
in a sixty years’ cycle of Jupiter
N. of a physician
(written at full श्री-नर-वैद्य-मन्मथ)
(आ),
f., N. of Dākṣāyaṇī.
—मन्मथ-कर, अस्, ई,
अम्, causing or exciting love
(अस्), m. epithet of a
being attending on Skanda.
—मन्मथ-युद्ध,
अम्, n. strife of love, amorous strife or contest.
—मन्मथ-लेख, अस्, m. a love-letter.
—मन्-
मथानन्द (°थ-आन्°), अस्, m. ‘love's joy, ’ N.
of a kind of mango (= महाराज-चूत).
—मन्-
मथालय (°थ-आल्°), अस्, m. ‘love's abode, ’ the
mango tree.
—मन्मथेश्वर-तीर्थ (°थ-ईश्°),
अम्, n. ‘Tīrtha of the lord of love, ’ N. of a sacred
bathing-place.
—मन्मथोद्दीपन (°थ-उद्°),
अम्, n. the act of kindling or inflaming love.
Macdonell
EnglishBenfey
EnglishHindi
Hindiप्यार, देवता कामदेव की
Apte Hindi
Hindiमन्मथः
- "मन् + क्विप्, मथ् + अच्, ष* त*"
"कामदेव, प्रेम का देवता"
मन्मथः
- -
"प्रेम, प्रणयोन्माद"
मन्मथः
- -
कैथ
Shabdartha Kaustubha
Kannadaमन्मथ
पदविभागः - > पुल्लिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಮದನ /ಕಾಮದೇವ
निष्पत्तिः - > मन्थ (विलोडने) - "अच्" (३-१-१३४)
व्युत्पत्तिः - > मनो मथ्नाति
प्रयोगाः - > "मधुश्च ते मन्मथ साहचर्यादसावनुक्तोऽपि सहाय एव"
उल्लेखाः - > कुमा० ३-२१
विस्तारः - > "मनो मथ्नाति सर्वेषां पञ्चबाणेन कामिनाम् । तन्नाम मन्मथस्तेन प्रवदन्ति मनीषिणः ॥"
मन्मथ
पदविभागः - > पुल्लिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಕಾಮಚಿಂತೆ /ಮನೋವಿಕಾರ
प्रयोगाः - > "क्व वयं क्व परोक्षमन्मथो मृगशावैः सममेधितो जनः"
उल्लेखाः - > शाकु० २-१८
मन्मथ
पदविभागः - > पुल्लिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಕಪಿತ್ಥ ವೃಕ್ಷ /ಬೇಲದ ಮರ
L R Vaidya
EnglishBopp
LatinAufrecht Catalogus Catalogorum
EnglishLanman
EnglishSchmidt Nachtrage zum Sanskrit Worterbuch
Germanअभिधानचिन्तामणिः
Sanskritमदनो जराभीररुनङ्गमन्मथौ कमनः कलाकेलिरनन्यजोऽङ्गजः ।
मधुदीपमारौ मधुसारथिः स्मरो विषमायुधो दर्पककामहृच्छयाः ॥ २२७ ॥
प्रद्युम्नः श्रीनन्दनश्च कंदर्पः पुष्पकेतनः ।
पुष्पाण्यस्येषुचापास्त्राण्यरी शंवरशूर्पको ॥ २२८ ॥
केतनं मीनमकरौ बाणाः पञ्च रतिः प्रिया ।
मनःशृङ्गारसंकल्पात्मानो योनिः सुहृन्मधुः ॥ २२९ ॥
मदन (पुं), जराभीरु (पुं), अनङ्ग (पुं), मन्मथ (पुं), कमन (पुं), कलाकेलि (पुं), अनन्यज (पुं), अङ्गज (पुं), मधुदीप (पुं), मार (पुं), मधुसारथि (पुं), स्मर (पुं), विषमायुध (पुं), दर्पक (पुं), काम (पुं), हृच्छय (पुं), प्रद्युम्न (पुं), श्रीनन्दन (पुं), कन्दर्प (पुं), पुष्पकेतन (पुं), पुष्पेषु (पुं), कुसुमबाण (पुं), पुष्पचाप (पुं), कुसुमधन्वन् (पुं), पुष्पास्त्र (पुं), कुसुमायुध (पुं), मीनकेतन (पुं), मकरकेतन (पुं), मीनध्वज (पुं), मकरध्वज (पुं), झषकेतन (पुं), झषध्वज (पुं), पञ्चबाण (पुं), विषमेषु (पुं), मनोयोनि (पुं), चेतोभव (पुं), शृङ्गारयोनि (पुं), शृङ्गारजन्मन् (पुं), सङ्कल्पयोनि (पुं), स्मृतिभू (पुं), आत्मयोनि (पुं), आत्मभू (पुं), मधुसुहृद् (पुं), चैत्रसख (पुं), कामारि (पुं), शंवर (पुं), शूर्पक (पुं), कामकेतन (क्ली), मीन (पुं), मकर (पुं), कामप्रिया (स्त्री), रति (स्त्री), मधु (पुं), कामसुहृद् (पुं)
अभिधानरत्नमाला
Sanskritप्रद्युम्न
प्रद्युम्न, मकरध्वज, मनसिज, सङ्कल्पजन्मन्, अङ्गज, पञ्चेषु, कुसुमायुध, मदन, मार, स्मर, मन्मथ, काम, शम्बरसूदन, मधुसख, शृङ्गारयोनि, दर्पक, शूर्पकाराति, अनङ्ग, विषमायुध, आत्मभू, मनसिशय, पुष्पधन्वन्, मनोभव, मापत्य, इरज
प्रद्युम्नो मकरध्वजो मनसिजः सङ्कल्पजन्माङ्गजः,
पञ्चेषुः कुसुमायुधश्च मदनो मारः स्मरो मन्मथः ।
कन्दर्पो झषकेतनो रतिपतिः श्रीनन्दनो हृच्छयः,
कामः शम्बरसूदनो मधुसखः शृङ्गारयोनिः स्मृतः ॥ ३२ ॥
दर्पकः शूर्पकारातिरनङ्गो विषमायुधः ।
आत्मभूर्मनसिशयः पुष्पधन्वा मनोभवः ॥ ३३ ॥
मापत्यमिरजश्चैव कामपत्नी रतिः स्मृता ।
verse 1.1.1.32
page 0005
नाममाला
Sanskritकृष्णसुत, कृष्णपुत्र, कृष्णसूनु, कृष्णापत्य, कृष्णतुक्, कृष्णतोक, कृष्णात्मज, कृष्णप्रजा, कृष्णोद्वह, कृष्णतनय, कृष्णपोत, कृष्णदारक, कृष्णनन्दन, कृष्णार्भक, कृष्णस्तनन्धय, कृष्णोत्तानशय, दामोदरसुत, दामोदरपुत्र, दामोदरसूनु, दामोदरापत्य, दामोदरतुक्, दामोदरतोक, दामोदरात्मज, दामोदरप्रजा, दामोदरोद्वह, दामोदरतनय, दामोदरपोत, दामोदरदारक, दामोदरनन्दन, दामोदरार्भक, दामोदरस्तनन्धय, दामोदरोत्तानशय, विष्णुसुत, विष्णुपुत्र, विष्णुसूनु, विष्ण्वपत्य, विष्णुतुक्, विष्णुतोक, विष्ण्वात्मज, विष्णुप्रजा, विष्णूद्वह, विष्णुतनय, विष्णुपोत, विष्णुदारक, विष्णुनन्दन, विष्ण्वर्भक, विष्णुस्तनन्धय, विष्णूत्तानशय, उपेन्द्रसुत, उपेन्द्रपुत्र, उपेन्द्रसूनु, उपेन्द्रापत्य, उपेन्द्रतुक्, उपेन्द्रतोक, उपेन्द्रात्मज, उपेन्द्रप्रजा, उपेन्द्रोद्वह, उपेन्द्रतनय, उपेन्द्रपोत, उपेन्द्रदारक, उपेन्द्रनन्दन, उपेन्द्रार्भक, उपेन्द्रस्तनन्धय, उपेन्द्रोत्तानशय, पुरुषोत्तमसुत, पुरुषोत्तमपुत्र, पुरुषोत्तमसूनु, पुरुषोत्तमापत्य, पुरुषोत्तमतुक्, पुरुषोत्तमतोक, पुरुषोत्तमात्मज, पुरुषोत्तमप्रजा, पुरुषोत्तमोद्वह, पुरुषोत्तमतनय, पुरुषोत्तमपोत, पुरुषोत्तमदारक, पुरुषोत्तमनन्दन, पुरुषोत्तमार्भक, पुरुषोत्तमस्तनन्धय, पुरुषोत्तमोत्तानशय, केशवसुत, केशवपुत्र, केशवसूनु, केशवापत्य, केशवतुक्, केशवतोक, केशवात्मज, केशवप्रजा, केशवोद्वह, केशवतनय, केशवपोत, केशवदारक, केशवनन्दन, केशवार्भक, केशवस्तनन्धय, केशवोत्तानशय, हृषीकेशसुत, हृषीकेशपुत्र, हृषीकेशसूनु, हृषीकेशापत्य, हृषीकेशतुक्, हृषीकेशतोक, हृषीकेशात्मज, हृषीकेशप्रजा, हृषीकेशोद्वह, हृषीकेशतनय, हृषीकेशपोत, हृषीकेशदारक, हृषीकेशनन्दन, हृषीकेशार्भक, हृषीकेशस्तनन्धय, हृषीकेशोत्तानशय, शार्ङ्गिसुत, शार्ङ्गिपुत्र, शार्ङ्गिसूनु, शार्ङ्ग्यपत्य, शार्ङ्गितुक्, शार्ङ्गितोक, शार्ङ्ग्यात्मज, शार्ङ्गिप्रजा, शार्ङ्ग्युद्वह, शार्ङ्गितनय, शार्ङ्गिपोत, शार्ङ्गिदारक, शार्ङ्गिनन्दन, शार्ङ्ग्यर्भक, शार्ङ्गिस्तनन्धय, शार्ङ्ग्युत्तानशय, नारायणसुत, नारायणपुत्र, नारायणसूनु, नारायणापत्य, नारायणतुक्, नारायणतोक, नारायणात्मज, नारायणप्रजा, नारायणोद्वह, नारायणतनय, नारायणपोत, नारायणदारक, नारायणनन्दन, नारायणार्भक, नारायणस्तनन्धय, नारायणोत्तानशय, हरिसुत, हरिपुत्र, हरिसूनु, हर्यपत्य, हरितुक्, हरितोक, हर्यात्मज, हरिप्रजा, हर्युद्वह, हरितनय, हरिपोत, हरिदारक, हरिनन्दन, हर्यर्भक, हरिस्तनन्धय, हर्युत्तानशय, केशीसूदनसुत, केशीसूदनपुत्र, केशीसूदनसूनु, केशीसूदनापत्य, केशीसूदनतुक्, केशीसूदनतोक, केशीसूदनात्मज, केशीसूदनप्रजा, केशीसूदनोद्वह, केशीसूदनतनय, केशीसूदनपोत, केशीसूदनदारक, केशीसूदननन्दन, केशीसूदनार्भक, केशीसूदनस्तनन्धय, केशीसूदनोत्तानशय, मधुसूदनसुत, मधुसूदनपुत्र, मधुसूदनसूनु, मधुसूदनापत्य, मधुसूदनतुक्, मधुसूदनतोक, मधुसूदनात्मज, मधुसूदनप्रजा, मधुसूदनोद्वह, मधुसूदनतनय, मधुसूदनपोत, मधुसूदनदारक, मधुसूदननन्दन, मधुसूदनार्भक, मधुसूदनस्तनन्धय, मधुसूदनोत्तानशय, बलिसूदनसुत, बलिसूदनपुत्र, बलिसूदनसूनु, बलिसूदनापत्य, बलिसूदनतुक्, बलिसूदनतोक, बलिसूदनात्मज, बलिसूदनप्रजा, बलिसूदनोद्वह, बलिसूदनतनय, बलिसूदनपोत, बलिसूदनदारक, बलिसूदननन्दन, बलिसूदनार्भक, बलिसूदनस्तनन्धय, बलिसूदनोत्तानशय, बाणसूदनसुत, बाणसूदनपुत्र, बाणसूदनसूनु, बाणसूदनापत्य, बाणसूदनतुक्, बाणसूदनतोक, बाणसूदनात्मज, बाणसूदनप्रजा, बाणसूदनोद्वह, बाणसूदनतनय, बाणसूदनपोत, बाणसूदनदारक, बाणसूदननन्दन, बाणसूदनार्भक, बाणसूदनस्तनन्धय, बाणसूदनोत्तानशय, हिरण्यकशिपुसूदनसुत, हिरण्यकशिपुसूदनपुत्र, हिरण्यकशिपुसूदनसूनु, हिरण्यकशिपुसूदनापत्य, हिरण्यकशिपुसूदनतुक्, हिरण्यकशिपुसूदनतोक, हिरण्यकशिपुसूदनात्मज, हिरण्यकशिपुसूदनप्रजा, हिरण्यकशिपुसूदनोद्वह, हिरण्यकशिपुसूदनतनय, हिरण्यकशिपुसूदनपोत, हिरण्यकशिपुसूदनदारक, हिरण्यकशिपुसूदननन्दन, हिरण्यकशिपुसूदनार्भक, हिरण्यकशिपुसूदनस्तनन्धय, हिरण्यकशिपुसूदनोत्तानशय, मुरसूदनसुत, मुरसूदनपुत्र, मुरसूदनसूनु, मुरसूदनापत्य, मुरसूदनतुक्, मुरसूदनतोक, मुरसूदनात्मज, मुरसूदनप्रजा, मुरसूदनोद्वह, मुरसूदनतनय, मुरसूदनपोत, मुरसूदनदारक, मुरसूदननन्दन, मुरसूदनार्भक, मुरसूदनस्तनन्धय, मुरसूदनोत्तानशय, शौरिसुत, शौरिपुत्र, शौरिसूनु, शौर्यपत्य, शौरितुक्, शौरितोक, शौर्यात्मज, शौरिप्रजा, शौर्युद्वह, शौरितनय, शौरिपोत, शौरिदारक, शौरिनन्दन, शौर्यर्भक, शौरिस्तनन्धय, शौर्युत्तानशय, पद्मनाभसुत, पद्मनाभपुत्र, पद्मनाभसूनु, पद्मनाभापत्य, पद्मनाभतुक्, पद्मनाभतोक, पद्मनाभात्मज, पद्मनाभप्रजा, पद्मनाभोद्वह, पद्मनाभतनय, पद्मनाभपोत, पद्मनाभदारक, पद्मनाभनन्दन, पद्मनाभर्भक, पद्मनाभस्तनन्धय, पद्मनाभोत्तानशय, अधोक्षजसुत, अधोक्षजपुत्र, अधोक्षजसूनु, अधोक्षजापत्य, अधोक्षजतुक्, अधोक्षजतोक, अधोक्षजात्मज, अधोक्षजप्रजा, अधोक्षजोद्वह, अधोक्षजतनय, अधोक्षजपोत, अधोक्षजदारक, अधोक्षजनन्दन, अधोक्षजार्भक, अधोक्षजस्तनन्धय, अधोक्षजोत्तानशय, गोविन्दसुत, गोविन्दपुत्र, गोविन्दसूनु, गोविन्दापत्य, गोविन्दतुक्, गोविन्दतोक, गोविन्दात्मज, गोविन्दप्रजा, गोविन्दोद्वह, गोविन्दतनय, गोविन्दपोत, गोविन्ददारक, गोविन्दनन्दन, गोविन्दार्भक, गोविन्दस्तनन्धय, गोविन्दोत्तानशय, वासुदेवसुत, वासुदेवपुत्र, वासुदेवसूनु, वासुदेवापत्य, वासुदेवतुक्, वासुदेवतोक, वासुदेवात्मज, वासुदेवप्रजा, वासुदेवोद्वह, वासुदेवतनय, वासुदेवपोत, वासुदेवदारक, वासुदेवनन्दन, वासुदेवार्भक, वासुदेवस्तनन्धय, वासुदेवोत्तानशय, मन्मथ, काम, सूर्पकाराति, अनन्यज, विदेह, अकाय, अनङ्ग, अनपघन, अवपुर्, असंहनन, अकलेवर, अमूर्ति, मदन, मकरध्वज
तत्पुत्रो मन्मथः कामः सूर्पकारातिरनन्यजः ।
कायपर्यायरहितो मदनो मकरध्वजः ॥ ७७ ॥
verse 0.1.1.77
page 0039
वैजयन्तीकोषः
SanskritWord: मन्मथः
Root: मन्मथ
Gender: पुं
Number: all
अर्थः ⇒ कामदेवः
Meaning(s):
⇒ God of love
Shloka(s):
1|1|27|1 ► प्रद्युम्नो मन्मथः कामो मारो मनसिजः स्मरः। (स्वर्गकाण्डः/आदिदेवाध्यायः)
1|1|27|2 ► कन्दर्पो दर्पकोऽनङ्गो मीनाङ्को मकरध्वजः॥ (स्वर्गकाण्डः/आदिदेवाध्यायः)
1|1|28|1 ► पुष्पधन्वा रतिपतिः शंबरारिरनन्यजः। (स्वर्गकाण्डः/आदिदेवाध्यायः)
1|1|28|2 ► शूर्पकारिर्मधुसखः पञ्चेषुर्विषमायुधः॥ (स्वर्गकाण्डः/आदिदेवाध्यायः)
1|1|29|1 ► बन्धुर्वामो जराभीरुर्हृच्छयो मधुसारथिः। (स्वर्गकाण्डः/आदिदेवाध्यायः)
1|1|29|2 ► ब्रह्मसूरनिरुद्धः स्यादृश्यकेतुरूषापतिः॥ (स्वर्गकाण्डः/आदिदेवाध्यायः)
Synonym(s):
➠ 1|1|27|1 ⇢ प्रद्युम्नः (प्रद्युम्न) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|27|1 ⇢ मन्मथः (मन्मथ) (पुं) ⇒ God of love ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|27|1 ⇢ कामः (काम) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|27|1 ⇢ मारः (मार) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|27|1 ⇢ मनसिजः (मनसिज) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|27|1 ⇢ स्मरः (स्मर) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|27|2 ⇢ कन्दर्पः (कन्दर्प) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|27|2 ⇢ दर्पकः (दर्पक) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|27|2 ⇢ अनङ्गः (अनङ्ग) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|27|2 ⇢ मीनाङ्कः (मीनाङ्क) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|27|2 ⇢ मकरध्वजः (मकरध्वज) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|28|1 ⇢ पुष्पधन्वा (पुष्पधन्वन्) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|28|1 ⇢ रतिपतिः (रतिपति) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|28|1 ⇢ शम्बरारिः (शम्बरारि) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|28|1 ⇢ अनन्यजः (अनन्यज) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|28|2 ⇢ शूर्पकारिः (शूर्पकारि) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|28|2 ⇢ मधुसखः (मधुसख) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|28|2 ⇢ पञ्चेषुः (पञ्चेषु) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|28|2 ⇢ विषमायुधः (विषमायुध) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|29|1 ⇢ बन्धुः (बन्धु) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|29|1 ⇢ वामः (वाम) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|29|1 ⇢ जराभीरुः (जराभीरु) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|29|1 ⇢ हृच्छयः (हृच्छय) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|29|1 ⇢ मधुसारथिः (मधुसारथि) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
➠ 1|1|29|2 ⇢ ब्रह्मसूः (ब्रह्मसू) (पुं) ⇒ Epithet of Manmatha ⇒ कामदेवः
Related word(s):
परा_अपरासंबन्धः ➡ देवः
जन्य_जनकसंबन्धः ➡ अनिरुद्धः
जातिः ➡ देवता
Mahabharata
EnglishManmatha = Kāma, q.v.
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskritमन्मथः, (मनो मथ्नाति विकरोतीति । मन्थ् +पचाद्यच् । पृषोदरादित्वात् साधुः । अस्यनामनिरुक्तिर्यथा, ब्रह्मवैवर्त्ते । १ । ४ । ७ ।“मनो मथ्नाति सर्व्वेषां पञ्चबाणेन कामिनाम् ।तन्नाम मन्मथस्तेन प्रवदन्ति मनीषिणः ॥
”)कामदेवः । (यथा, नैषधचरिते । ८ । २९ ।“न मन्मथस्त्वं स हि नास्तिमूर्त्तिः ॥
”)कपित्थवृक्षः । इत्यमरः । १ । ४ । २१ ॥
काम-चिन्ता । इति मेदिनी । थे, २२ ॥
* ॥
काम-देवस्योत्पत्तिर्यथा, --“एवं चिन्तयतस्तस्य ब्रह्मणो मुनिसत्तमाः ।मनसः पुरुषो वल्गुराविर्भूतो विनिःसृतः ॥
काञ्चनीचूर्णपीताभः पीनोन्नतसुनासिकः ।सुवृत्तोरुकटीजङ्घो नीलावल्लितकेशकः ॥
लग्नभ्रूयुगलो लोलः पूर्णचन्द्रनिभाननः ।कपाटविस्तीर्णहृदि रोमराजीविराजितः ॥
शुभ्रमातङ्गकरवत्पीननिस्तलबाहुकः ।आरक्तपाणिनयनमुखपादकरोद्भवः ॥
क्षीणमध्यश्चारुदन्तः प्रमत्तगजकन्धरः ।प्रफुल्लपद्मपत्राक्षः केशरघ्राणतर्पणः ॥
कम्बुग्रीवो मीनकेतुः प्रांशुर्मकरवाहनः ।पञ्चपुष्पायुधो योगी पुष्पकोदण्डमण्डितः ॥
कान्तः कटाक्षपातेन भ्रामयन्नयनद्वयम् ।सुगन्धिमारुताभ्रान्तं शृङ्गाररससेवितम् ॥
वीक्ष्य तं तादृशं दक्षप्रमुखा मानसाश्च ते ।मरीच्याद्या दश ततो विस्मयाविष्टचेतसः ॥
औत्सुक्यं परमं जग्मुरापुर्व्वैकारिकं मनः ।स चापि वेधसं वीक्ष्य स्रष्टारं जगतां पतिम् ।प्रणम्य पुरुषः प्राह विनयानतकन्धरः ॥
श्रीपुरुष उवाच ।किं करिष्याम्यहं कर्म्म ब्रह्मंस्तत्र नियोजय ।मानाय्ये पुरुषो यस्मादुचिते शोभिते विधे ॥
अभिधानञ्च यद्योग्यं स्थानं पत्नी च या मम ।तन्मे कुरुव्व लोकेश ! स्रष्टा त्वं जगतां यतः ॥
मार्कण्डेय उवाच ।एवं तस्य वचः श्रुत्वा पुरुषस्य महात्मनः ।क्षणं न किञ्चित् प्रोवाच स्वसृष्टावपि विस्मितः ॥
ततो मनः सुसंयम्य सम्यगुत्सृज्य विस्मयम् ।उवाच पुरुषं ब्रह्मा तत्कर्म्मोद्देशमावहन् ॥
ब्रह्मोवाच ।अनेन चारुरूपेण पुष्पबाणैश्च पञ्चभिः ।मोहयन् पुरुषांस्त्रींश्च कुरु सृष्टिं सनातनीम् ॥
न देवा न च गन्धर्व्वा न किन्नरमहोरगाः ।नासुरा न च दैत्या वा न विद्याधरराक्षसाः ॥
न यक्षा न पिशाचाश्च न भूता न विनायकाः ।न गुह्यका न सिद्धाश्च न मनुष्या न पक्षिणः ॥
पशवो न मृगाः कीटाः पतङ्गा जलजाश्च ये ।न ते सर्व्वे भविष्यन्ति न लक्ष्या ये शरस्य ते ॥
अहं वा वासुदेवो वा स्थाणुर्वा पुरुषोत्तम ! ।भविष्यामस्तव वशे किमन्यैः प्राणधारिभिः ॥
प्रच्छन्नरूपी जन्तूनां प्रविशन् हृदये सदा ।सुखहेतुः स्वयं भूत्वा कुरु सृष्टिं सनातनीम् ॥
त्वत्पुष्पबाणस्य सदा मुख्यं लक्ष्यं मनोऽस्तु च ।सर्व्वेषां प्राणिनां नित्यं मदमोदकरो भवान् ॥
इति ते कर्म्म कथितं सृष्टिप्रावर्त्तकं पुनः ।नामानि च गदिष्यामि यत्ते योग्यं भवि-ष्यति ॥
मार्कण्डेय उवाच ।इत्युक्त्वाथ सुरश्रेष्ठो मानसानां मुखानि च ।आलोक्य चासने पद्मे सूपविष्टोऽभवत् क्षणात् ॥
”इति कालिकापुराणे कामप्रादुर्भावो नाम १अध्यायः ॥
मार्कण्डेय उवाच ।“ततस्ते मुनयः सर्व्वे तदभिप्रायवेदिनः ।चक्रुस्तदुचितं नाम मरीच्यत्रिमुखास्तदा ॥
मुखावलोकनादेव ज्ञात्वा वृत्तान्तमन्यतः ।दक्षादयश्च स्रष्टारः स्थानं पत्नीञ्च ते ददुः ॥
ततो निश्चित्य नामानि मरीचिप्रमुखा द्बिजाः ।ऊचुः सङ्गतमेतस्मै पुरुषाय द्बिजोत्तमाः ॥
ऋषय ऊचुः ।यस्मात् प्रमथ्य चेतस्त्वं जातोऽस्माकं तथा विधेः ।तस्मान्मन्मथनान्मा त्वं लोके गेयो भविष्यसि ॥
जगत्सु कामरूपस्त्वं त्वत्समो न हि विद्यते ।अतस्त्वं कामनाम्नापि ख्यातो भव मनोभव ! ॥
मदनान्मदनाख्यस्त्वं शम्भोर्दर्पात् सदर्पकः ।तथा कन्दर्पनाम्नापि लोके ख्यातो भविष्यसि ॥
त्वदाशुगानां यद्बीर्य्यं तद्वीर्य्यं न भविष्यति ।वैष्णवानाञ्च रौद्राणां ब्रह्मास्त्राणाञ्च तादृशम् ॥
स्वर्गो मर्त्यश्च पातालं ब्रह्मलोकः सनातनः ।अवस्थानानि सर्व्वाणि सर्व्वव्यापी भवान् यतः ॥
किंवा चापि विशेषेण सामान्ये नास्ति ते समः ।यत्र यत्र भवेत् प्राणी शाद्बलास्तरवोऽथवा ॥
तत्र तत्र तव स्थानमस्त्वाब्रह्मसदोदयम् ।दक्षोऽयं भवतः पत्नीं स्वयं दास्यति शोभ-नाम् ॥
”इति कालिकापुराणे २ अध्यायः ॥
वाचस्पत्यम्
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