प्रकृतिः (prakRtiH)
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Apte
Englishप्रकृतिः [prakṛtiḥ],
The natural condition or state of anything, nature, natural form (opp. विकृति which is a change or effect)
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया 7.2. प्रकृत्या यद्वक्रम् Ś1.9
उष्णत्वमग्न्यातपसंप्रयोगात् शैत्यं हि यत् सा प्रकृतिर्जलस्य 5.54
मरणं प्रकृतिः शरीरिणां विकृति- र्जीवितमुच्यते बुधैः 8.87
7.19
अपेहि रे अत्रभवान् प्रकृतिमापन्नः 2. 'has resumed his wonted nature'
प्रकृतिम् आपद् or प्रतिपद् or प्रकृतौ स्था 'to come to one's senses', 'regain one's consciousness.'
Natural disposition, temper, temperament, nature, constitution
प्रकृतिः खलु सा महीयसः सहते नान्यसमुन्नतिं यया 2.21
कथं गत एव आत्मनः प्रकृतिम् 7. 'natural character'
अपश्यत् पाण्डवश्रेष्ठो हर्षेण प्रकृतिं गतः * 39.66 (com. प्रकृतिं स्वास्थ्यम्)
so प्रकृतिकृपण, प्रकृतिसिद्ध
see below.
Make, form, figure
महानुभावप्रकृतिः 1.
Extraction, descent
गोपालप्रकृतिरार्यको$स्मि 7.
Origin, source, original or material cause, the material of which anything is made
नार्थानां प्रकृतिं वेत्सि * 4.49.1
प्रकृतिश्चोपादानकारणं च ब्रह्माभ्युपगन्तव्यम् Ś. B. (see the full discussion on Br. Sūt.1.4.23)
यामाहुः सर्वभूतप्रकृतिरिति 1.1
4.28.24.
(In Sāṅ. ) Nature (as distinguished from पुरुष, ) the original source of the material world, consisting of the three essential qualities सत्त्व, रजस् and तमस्. It is also mentioned as one of the four contentments
प्रकृत्युपादानकालभागाख्याः Sāṅ. 5.
(In ) The radical or crude form of a word to which case-terminations and other affixes are applied
प्रकृतिप्रत्यययोरिवानुबन्धः 13.19.
A model, pattern, standard, (especially in ritualistic works)
5.7.5.
A woman.
The personified will of the Supreme Spirit in the creation (identified with माया or illusion)
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् 9.1.
The male or female organ of generation.
A mother.
(In arith.) A coefficient, or multiplier.
(In anatomy) Temperament of the humours
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति 3.33.
An animal.
An artisan.
The Supreme Being
न ह्यस्ति सर्वभूतेषु दुःख- मस्मिन् कुतः सुखम् । एवं प्रकृतिभूतानां सर्वसंसर्गयायिनाम् ॥ * 12. 152.16.
Eight forms of the Supreme Being
भूमि- रापो$नलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृति- रष्टधा ॥ 7.4.
The way of life (जीवन)
सतां वै ददतो$न्नं च लोके$स्मिन् प्रकृतिर्ध्रुवा * 12.18.27. (pl. )
A king's ministers, the body of ministers or counsellors, ministry
अथानाथाः प्रकृतयो मातृबन्धुनिवासिनम् 12.12
1.48
अशुद्धप्रकृतौ राज्ञि जनता नानुरज्यते 31.
The subjects (of a king)
प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिवः 7.35
नृपतिः प्रकृतीरवेक्षितुम् 8.18, 1.
The constituent elements of the state (सप्ताङ्गानि), i. e. 1 the king
-2 the minister
-3 the allies
-4 treasure
-5 army
-6 territory
-7 fortresses
and the corporations of citizens (which is sometimes added to the 7)
स्वाम्यमात्य- सुहृत्कोशराष्ट्रदुर्गबलानि च Ak.
The various sovereigns to be considered in case of war
(for full explanation see Kull. on 7.155 and 157).
The eight primary elements out of which everything else is evolved according to the Sāṅkhyas
see Sāṅ. 3.
The five primary elements of creations (पञ्चमहाभूतानि)i. e. पृथ्वी, अप्, तेजस्, वायु and आकाश
प्रकृतिं ते भजिष्यन्ति नष्टप्रकृतयो मयि * 5.73.17. -अमित्रः an ordinary foe
प्रकृत्यमित्रानुत्थाप्य 2.4. -ईशः a king or magistrate. -कल्याण beautiful by nature.-कृपण naturally slow or unable to discern
5.-गुणः one of the three constituent qualities of nature
see गुण. -ज innate, inborn, natural. -तरल fickle by nature, naturally inconsistent
प्रकृतितरले का नः पीडा गते हतजीविते 3. -पाठः a list of verbal roots (धातुपाठ). -पुरुषः a minister, a functionary (of the state)
जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः 6.
a standard or model of a man. -षौ nature and spirit.-भाव natural, usual. (-वः) natural or original state. -भोजनम् usual food. -मण्डलम् the whole territory of kingdom
अधिगतं विधिवद्यदपालयत् प्रकृतिमण्डलमात्म- कुलोचितम् 9.2. -लयः absorption into the Prakṛiti, dissolution of the universe. -विकृतिः mutation of the original form. -श्रैष्ठ्यम् superiority of origin
1.3. -सिद्ध inborn, innate, natural
सुजनबन्धुजने- ष्वसहिष्णुता प्रकृतिसिद्धमिदं हि दुरात्मनाम् 2.52. -सुभग naturally lovely or agreeable. -स्थ
being in the natural state or condition, natural, genuine
दृष्ट्वा चाप्रकृतिस्थां ताम् 7.58.17.
inherent, innate, incidental to nature
रघुरप्यजयद् गुणत्रयं प्रकृतिस्थं समलोष्ट- काञ्चनः 8.21.
healthy, in good health.
recovered.
come to oneself.
stripped of everything, bare.
Apte 1890
Englishप्रकृतिः f. 1 The natural condition or state of anything, nature, natural form (opp. विकृति which is a change or effect)
प्रकृत्या यद्वक्रं Ś. 1. 9
उष्णत्वमग्न्यातपसंप्रयोगात् शैत्यं हि यत्सा प्रकृतिर्जलस्य R. 5. 54
मरणं प्रकृतिः शरीरिणां विकृतिर्जीवितमुच्यते बुधैः R. 8. 87
U. 7. 19
अपेहि रे अत्रभवान् प्रकृतिमापन्नः Ś. 2 ‘has resumed his wonted nature’
प्रकृतिमापट् or प्रतिपद् or प्रकृतौ स्था ‘to come to one's senses’, ‘regain one's consciousness’.
2 Natural disposition, temper, temperament, nature, constitution
प्रकृतिः खलु सा महीयसः सहते नान्यसमुन्नतिं यया Ki. 2. 21
कथं गत एव आत्मनः प्रकृतिं Ś. 7 ‘natural character’
so प्रकृतिकृपण, प्रकृतिसिद्ध see below.
3 Make, form, figure
महानुभावप्रकृतिः Māl. 1.
4 Extraction, descent
गोपालप्रकृतिरार्यकोस्मि Mk. 7.
5 Origin, source, original or material cause, the material of which anything is made
प्रकृतिश्चोपादानकारणं च ब्रह्याभ्युपगंतव्यं Ś. B. (see the full discussion on Br. Sūt. I. 4. 23)
यामाहुः सर्वभूतप्रकृतिरिति Ś. 1. 1.
6 (In Sān. phil.) Nature (as distinguished from पुरुष, ) the original source of the material world, consisting of the three essential qualities सत्त्व, रजस् and तमस्.
7 (In gram.) The radical or crude form of a word to which caseterminations and other affixes are applied
8 A model, pattern, standard, (especially in ritualistic works).
9 A woman.
10 The personified will of the Supreme Spirit in the creation (identified with माया or illusion)
Bg. 9. 10.
11 The male or female organ of generation.
12 A mother.
13 (In arith.) A co-efficient, or multiplier.
14 (In anatomy) Temperament of the humours.
15 An animal.
16 An artisan.
17 The Supreme Being.
pl. 1 A king's ministers, the body of ministers or counsellors, ministry
R. 12. 12
Pt. 1. 48, 301.
2 The subjects (of a king)
प्रवर्ततां प्रकृतिहिताय पार्थिवः Ś. 7. 35
नृपतिः प्रकृतीरवेक्षितुं R. 8. 18, 10.
3 The constituent elements of the state ( सप्तांगानि), i. e. 1. the king
2. the minister
3. the allies
4. treasure
5. army
6. territory
7. fortresses &c.
and the corporations of citizens (which is sometimes added to the 7)
स्वाम्यमात्यसुहृत्कोशराष्ट्रदुर्गबलानि च Ak.
4 The various sovereigns to be considered in case of war
(for full explanation see Kull. on Ms. 7. 155 and 157).
5 The eight primary elements out of which everything else is evolved according to the Sānkhyas
see Sāṅ. K. 3.
6 The five primary elements of creations ( पंचमहाभूतानि)
i. e. पृथ्वी, अप्, तेजस्, वायु, and आकाश.
Comp.
ईशः a king or magistrate.
कृपण a. naturally slow or unable to discern
Me. 5.
गुणः one of the three constituent qualities of nature
see गुण.
ज a. innate, inborn, natural.
तरल a. fickle by nature, naturally inconsistent
Amaru. 27.
पुरुषः a minister, a functionary (of the state)
Me. 6.
भाव a. natural, usual. (
वः) natural or original state.
मंडलं the whole territory or kingdom
R. 9. 2.
लयः absorption into the Prakṛti, dissolution of the universe.
सिद्ध a. inborn, innate, natural
Bh. 2. 52.
सुभग a. naturally lovely or agreeable.
स्थ a. {1} being in the natural state or condition, natural, genuine. {2} inherent, innate, incidental to nature
R. 8. 21. {3} healthy, in good health. {4} recovered. {5} come to oneself. {6} stripped of everything, bare.
Hindi
Hindiप्रकृति
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Apte Hindi
Hindiप्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
"किसी वस्तु की नैसर्गिक स्थिति, माया, जड़जगत्, स्वाभाविक रूप"
प्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
"नैसर्गिक स्वभाव, मिजाज, स्वभाव, आदत, रचना, वृत्ति"
प्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
"बनावट, रूप, आकृति"
प्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
"वंशानुक्रम, वंशपरंपरा"
प्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
"मूल, स्रोत, मौलिक या भौतिक कारण, उपादान कारण"
प्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
"प्रकृति , भौतिक सृष्टि का मूलस्रोत जिसमें तीन प्रधान गुण सन्निविष्ट है"
प्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
मूलधातु या शब्द जिसमें लकार और कारकों के प्रत्यय लगाए जाते हैं
प्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
"आदर्श, नमूना, मानक"
प्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
स्त्री
प्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
सृष्टि रचना में परमात्मा की मूर्त इच्छा
प्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
"स्त्री या पुरुष की जनेन्द्रिय, योनि, लिङ्ग"
प्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
माता
प्रकृतिः
"स्त्री* , ब* व*" - प्र+कृ+क्तिन्
"राजा के मन्त्री, मन्त्रिपरिषद्, मन्त्रालय"
प्रकृतिः
"स्त्री* , ब* व*" - प्र+कृ+क्तिन्
प्रजा
प्रकृतिः
"स्त्री* , ब* व*" - प्र+कृ+क्तिन्
"राज्य के संविधायी सात तत्त्व या अंग अर्थत् १. राजा, २. मन्त्री, ३. मित्रराष्ट्र, ४. कोष, ५. सेना, ६. प्रदेश, ७. गढ़ आदि, ८. नगरपालिका या निगम"
प्रकृतिः
"स्त्री* , ब* व*" - प्र+कृ+क्तिन्
अनेक प्रभु जो युद्ध के समय विचारणीय होते हैं
प्रकृतिः
"स्त्री* , ब* व*" - प्र+कृ+क्तिन्
"आठ प्रधान तत्त्व जिनसे सांख्यशास्त्रियों के अनुसार प्रत्येक वस्तु उत्पन्न होती है, "
प्रकृतिः
"स्त्री* , ब* व*" - प्र+कृ+क्तिन्
"सृष्टि के पांच प्रधान तत्त्व, पंच महाभूत अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश"
प्रकृतिः
- प्र+कृ+क्तिन्
परम पुरुष परमात्मा के आठ रूप
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Sanskrit प्रकृतिः, सृष्टिः
बहिर्लोकः यस्मिन् वृक्षक्षुपाः पशुपक्षिणः तथा च पर्वतादयः इत्यादयः निसर्गोद्भवाः भावाः समाख्यायन्ते।
"प्रकृतेः रक्षणार्थे सर्वैः प्रयतितव्यम्।"
क्लीबः, तृतीयप्रकृतिः, अपुंस्, उडुम्बरः, तूबरकः, पृष्ठशृङ्गी, वर्षवरः, पण्ड्रः, मुष्कशून्यः, पण्ड्रकः, स्त्रीस्वभावः, वृषाङ्कः, धर्षवरः, षण्ढः, धर्षः, वध्रिका, अक्षतः, अक्षतम्, प्रकृतिः
सः जनः यः न स्त्री न च पुमान्।
"अद्यतनकाले क्लीबाः अपि राजनीतौ भागं गृह्णन्ति।"
स्वभावः, प्रकृतिः, शीलः, शीलता, सहजम्, सहजः, सहजभावः, सहजशीलः
व्यक्तेः वस्तुनः वा मूलगुणः यः प्रायः नित्यं समानः अस्ति।
"सः प्रकृत्या एव लज्जाशीलः अस्ति।"
प्रकृतिः, माया
सा मूला शक्तिः यस्याः इदं जगत् उत्पद्यते।
"वृक्षविनाशात् प्रकृतिः असंतुलिता भवति।"
योनी, वराङ्गम्, उपस्थः, स्मरमन्दिरम्, रतिगृहम्, जन्मवर्त्म, अधरम्, अवाच्यदेशः, प्रकृतिः, अपथम्, स्मरकूपकः, अपदेशः, प्रकूतिः, पुष्पी, संसारमार्गकः, संसारमार्गः, गुह्यम्, स्मरागारम्, स्मरध्वजम्, रत्यङ्गम्, रतिकुहरम्, कलत्रम्, अधः, रतिमन्दिरम्, स्मरगृहम्, कन्दर्पकूपः, कन्दर्पसम्बाधः, कन्दर्पसन्धिः, स्त्रीचिह्नम्
स्त्रियः अवयवविशेषः।
"भूतानां चतुर्विधा योनिर्भवति।"
प्रकृतिः
एका स्त्री ।
"प्रकृत्याः उल्लेखः बौद्धसाहित्ये वर्तते"
प्रकृतिः
वृत्तविशेषः ।
"प्रकृतिः इति नामनी द्वौ वृत्तौ स्तः"
प्रकृतिः
देवतागणः ।
"प्रकृतेः उल्लेखः हरिवंशे वर्तते"
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskritप्रकृतिः, (प्रक्रियते कार्य्यादिकभनयेति ।प्र + कृ + क्तिन् ।) स्वभावः । (यथा चरकेविमानस्थाने प्रथमेऽध्याये ।“तत्र प्रकृतिरुच्यते स्वभावो यः स पुनराहा-रौषधद्रव्याणां स्वभाविको गुर्व्वादिगुणयोगः ।तद्यथा माषमुद्गयोः शूकरैणयोश्च ।”) योनिः ।लिङ्गम् ॥
स्वामी । अमात्यः । सुहृत् । कोषः ।राष्ट्रम् । दुर्गम् । बलम् । (यथा, मनौ । ९ । २९४ ।“स्वाम्यमात्यौ पुरं राष्ट्रं कोषदण्डौ सुहृत्तथा ।सप्त प्रकृतयो ह्येताः सप्ताङ्गं राज्यमुच्यते ॥
”धर्म्माध्यक्षादिसप्तप्रकृतयो यथा, --“धर्म्माध्यक्षो धनाध्यक्षः कोषाध्यक्षश्च भूपतिः ।दूतः पुरीधा दैवज्ञः सप्त प्रकृतयोऽभवन् ॥
”)पौराणां श्रेणयः । इत्यमरः । २ । ८ । १८ ॥
(यथा, मार्कण्डेये । १९ । २० ।“प्रणिपत्य ततस्तस्मै दत्तात्रेयाय सोऽर्ज्जुनः ।आनाप्य प्रकतीः सम्यगभिषेकमगृह्णत ॥
”स्वरूपावस्था । यथा, हितोपदेशे । २ । १९६ ।“स्वेदितो मर्द्दितश्चैव रज्जुभिः परिवेष्टितः ।सुक्तो द्वादशभिर्वर्षैः श्वपुच्छः प्रकृतिं गतः ॥
”)शिल्पी । इति हेमचन्द्रः ॥
शक्तिः । (यथा, --“प्रधानं प्रकृतिः शक्तिर्नित्याचातिकृतिस्तथा ।एतानि तस्या नामानि शिवमाश्रित्य याःस्थिताः ॥
”इति पूर्व्वखण्डे पञ्चमेऽध्याये शार्ङ्गधरेणोक्तम् ॥
)योषित् । इति शब्दरत्नावली ॥
परमात्मा । इतिधरणिः । पञ्चभूतानि । करणम् । गुह्यम् । जन्तुः ।एकविंशत्यक्षरपादच्छन्दोविशेषः । माता । इतिनानार्थरत्नमाला ॥
प्रत्ययात् प्रथमः । स चद्विधा धातुर्नाम च । इत्यजयपालः ॥
(प्रकर्षेणसृष्ट्यादिकं करोतीति । प्र + कृ + कर्त्तरिक्तिच् ।) भगवतो मायाख्या शक्तिः । सा चपरापरभेदेन द्विधा । यथा, --“भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
४ ॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।जीवभूतां महाबाहोः ययेदं धार्य्यते जगत् ॥
” ५ ॥
इति श्रीभगवद्गीतायां ७ अध्यायः ॥
“एवं श्रोतारमभिमुखीकृत्य इदानीं प्रकृतिद्वारासृष्ट्यादिकर्त्तृत्वेन ईश्वरतत्त्वं प्रतिज्ञातं निरू-पयिष्यन् परापरभेदेन प्रकृतिद्वयमाह भूमिरितिद्वाभ्याम् । भूम्यादीनि पञ्चभूतसूक्ष्माणि मनः-शब्देन तत्कारणभूतोऽहङ्कारः बुद्धिशब्देनतत्कारणं महत्तत्त्वं अहङ्कारशब्देन तत्-कारणमविद्या इत्येवमष्टधा भिन्ना । यद्वाभूम्यादिशब्दैः पञ्च महाभूतानि सूक्ष्मैः सहएकीकृत्य गृह्यन्ते । अहङ्कारशब्देनैवाहङ्कारंतेनैव तत्कार्य्याणि इन्द्रियाण्यपि गृह्यन्ते बुद्धि-रिति महत्तत्त्वम् । मनःशब्देन तु मनसैवोन्नेयंअव्यक्तस्वरूपं प्रधानमित्यनेन प्रकारेण मेप्रकृतिर्म्मायाख्या शक्तिरष्टधा भिन्ना विभागंप्राप्ता । चतुर्विंशतिभेदभिन्नाप्यष्टस्वेवान्तर्भाव-विवक्षयाष्टधा भिन्नेत्युक्तम् । तथा च क्षेत्राध्यायेइमामेव प्रकृतिं चतुर्विंशतितत्त्वात्मना प्रपञ्चयि-ष्यति ।‘महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।इन्द्रियाणि दशैकञ्च पञ्च चेन्द्रियगोचरा ॥
’इति ॥
४ ॥
अपरामिमां प्रकृतिमुपसंहरन् परां प्रकृति-माह अपरेयमिति । अष्टधा प्रकृतिरुक्ताइयमपरा निकृष्टा जडत्वात् परार्थत्वाच्च । इतःसकाशात् परां प्रकृष्टामन्यां जीवभूतां जीव-स्वरूपां मे प्रकृतिं जानीहि । परत्वे हेतुः ययाचेतनया क्षेत्रज्ञस्वरूपया स्वकर्म्मद्वारेणेदं जग-द्धार्य्यते ॥
” ५ ॥
इति तट्टीकायां श्रीधरस्वामी ॥
सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था । यथा, --“सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणत्रयमुदाहृतम् ।साम्यावस्थितिरेतेषां प्रकृतिः परिकीर्त्तिता ॥
केचित् प्रधानमित्याहुरव्यक्तमपरे जगुः ।एतदेव प्रजासृष्टिं करोति विकरोति च ॥
”इति मात्स्ये ३ अध्यायः ॥
तत्पर्य्यायः । प्रधानम् २ । इत्यमरः ॥
माया ३शक्तिः ४ चैतन्यम् ५ । इति राजनिर्घण्टः ॥
तस्या नामान्तराणि यथा, --“तमोऽव्यक्तं शिवो धाम रजो योनिः सनातनः ।प्रकृतिर्विकारः प्रलयः प्रधानं प्रभवाप्ययौ ॥
अनुद्रिक्तमनूनं वाप्यकम्पमचलं ध्रुवम् ।सदसच्चैव तत्सर्व्वमव्यक्तं त्रिगुणं स्मृतम् ।ज्ञेयानि नामधेयानि नरैरध्यात्मचिन्तकैः ॥
अव्यक्तनामानि गुणांश्च तत्त्वतोयो वेद सर्व्वाणि गतीश्च केवलाः ।विमुक्तदेहः प्रविभागतत्त्ववित्स मुच्यते सर्व्वगुणैर्निरामयः ॥
”इति महाभारते आश्वमेधिकपर्व्व ॥
* ॥
सा पञ्चविधा ।“गणेशजननी दुर्गा राधा लक्ष्मीः सरस्वती ।सावित्री च सृष्टिविधौ प्रकृतिः पञ्चमीस्मृता ॥
” * ॥
तस्या व्युत्पत्तिर्यथा, --“प्रकृष्टवाचकः प्रश्च कृतिश्च सृष्टिवाचकः ।सृष्टौ प्रकृष्टा या देवी प्रकृतिः सा प्रकीर्त्तिता ॥
गुणे प्रकृष्टे सत्त्वे च प्रशब्दो वर्त्तते श्रुतौ ।मध्यमे रजसि कृश्च तिशब्दस्तामसः स्मृतः ॥
त्रिगुणात्मस्वरूपा या सर्व्वशक्तिसमन्विता ।प्रधाना सृष्टिकरणे प्रकृतिस्तेन कथ्यते ॥
प्रथमे वर्त्तते प्रश्च कृतिश्च सृष्टिवाचकः ।सृष्टेराद्या च या देवी प्रकृतिः सा प्रकी-र्त्तिता ॥
” * ॥
तासां उत्पत्तिः स्वरूपश्च यथा, --“योगेनात्मा सृष्टिविधौ द्विधारूपो बभूव सः ।पुंमांश्च दक्षिणार्द्धाङ्गात् वामाङ्गात् प्रकृतिःस्मृता ॥
सा च ब्रह्मस्वरूपा च या या नित्या सनातनी ।यथात्मा च यथाशक्तिर्यथाग्नौ दाहिका स्मृता ॥
अतएव हि योगीन्द्रः स्त्रीपुंभेदं न मन्यते ।सर्व्वं ब्रह्ममयं ब्रह्मन् ! शश्वत् पश्यति नारद ! ॥
स्वेच्छामयं स्वेच्छया च श्रीकृष्णस्य सिसृक्षया ।साविर्बभूव सहसा मूलप्रकृतिरीश्वरी ।तदाज्ञया पञ्चविधा सृष्टिकर्म्मणि वेदतः ॥
”दुर्गाप्रकृतिर्यया, --“अथ भक्तानुरोधाद्वा भक्तानुग्रहविग्रहा ।गणेशमाता दुर्गा या शिवरूपा शिवप्रिया ॥
नारायणी विष्णुमाया पूर्णब्रह्मस्वरूपिणी ।ब्रह्मादिदेवैर्मुनिभिर्म्मनुभिः पूजिता स्तुता ॥
सर्व्वाधिष्ठातृदेवी सा सर्व्वरूपा सनातनी ।धर्म्मसत्यपुण्यकीर्त्तियशोमङ्गलदायिनी ॥
सुखमोक्षहर्षदात्री शोकार्त्तिदुर्गनाशिनी ।शरणागतदीनार्त्तपरित्राणपरायणा ॥
तेजःस्वरूपा परमा तदधिष्ठातृदेवता ।सर्व्वशक्तिस्वरूपा च शक्तिरीशस्य सन्ततम् ॥
सिद्धेश्वरी सिद्धरूपा सिद्धिदा सिद्धिदेश्वरी ।बुद्धिर्निद्रा क्षुत्पिपासा छाया तन्द्रा दयास्मृतिः ॥
जातिः शान्तिश्च क्षान्तिश्च कान्तिर्भ्रान्तिश्चचेतना ।तुष्टिः पुष्टिस्तथा लक्ष्मीर्व्वृत्तिर्माता तथैव च ॥
सर्व्वशक्तिस्वरूपा सा कृष्णस्य परमात्मनः ।उक्तः श्रुतौ श्रुतिगुणश्चातिस्वल्पं यथागमम् ॥
गुणोऽस्त्यनन्तोऽनन्ताया अपराञ्च निशामय ॥
” १लक्ष्मीप्रकृतिर्यथा, --“शृणु सत्त्वस्वरूपा या पद्मा च परमात्मनः ।सर्व्वसम्पत्स्वरूपा सा तदधिष्ठातृदेवता ॥
कान्ता दान्ता च शान्ता च सुशीला सर्व्व-मङ्गला ।लोभमोहकामरोषाहङ्कारपरिवर्ज्जिता ॥
भक्तानुरक्ता पत्युश्च सर्व्वाभ्यश्च पतिव्रता ।प्राणतुल्या भगवतः प्रेमपात्री प्रियंवदा ॥
सर्व्वशस्यात्मिका सर्व्वजीवनोपायरूपिणी ।महालक्ष्मीश्च वैकुण्ठे पाताले वरदा सती ॥
स्वर्गे च स्वर्गलक्ष्मीश्च मर्त्यानां गृहिणान्तथा ।सर्व्वप्राणिषु द्रव्येषु शोभारूपा मनोहरा ॥
प्रीतिरूपा पुण्यवतां प्रभारूपा नृपेषु च ।बाणिज्यरूपा बणिजां पापिनां कलहाङ्कुरा ॥
दयामयी भक्तिमतो भक्तानुग्रहकातरा ।चपले चपला भक्ता सम्पदे च धनाय च ॥
जगज्जीवं मृतं सर्व्वं यया देव्या विना मुने ! ।शक्तिर्द्बितीया कथिता वेदोक्ता सर्व्वसम्मता ॥
सर्व्वपूज्या सर्व्ववन्द्या चान्यां मत्तो निशा-मय ॥
” २ ॥
* ॥
सरस्वतीप्रकृतिर्यथा, --“वाग्बुद्धिविद्याज्ञानाधिदेवता परमात्मनः ।सर्व्वविद्या सर्व्वरूपा सा च देवी सरस्वती ॥
स्वबुद्धिकविता मेधा प्रतिभा स्मृतिदा सताम् ।नानाप्रकारसिद्धान्तभेदार्थकल्पनाप्रदा ॥
व्याख्या बोधस्वरूपा च सर्व्वसन्देहभञ्जिनी ।विचारकारिणी ग्रन्थकारिणी शक्तिरूपिणी ॥
स्वरसङ्गीतसन्धानतालकारणरूपिणी ।विषयज्ञानवाग्रूपा प्रतिविश्वेषु जीविनाम् ॥
व्याख्या मुद्राकरा शान्ता वीणापुस्तकधारिणी ।शृणु सत्त्वस्वरूपा च सुशीला श्रीहरिप्रिया ॥
हिमचन्दनकुन्देन्दुकुमुदान्भोजसन्निभा ।जपन्ती परमात्मानं श्रीकृष्णं रत्नमालया ॥
तपःस्वरूपा तपसां फलदात्री तपस्विनी ।बुद्धिविद्यास्वरूपा च सर्व्वसिद्धिप्रदा सदा ॥
यया विना च विश्वौघो मूको मृतसमः सदा ।देवी तृतीया गदिता श्रुत्युक्ता जगदम्बिका ॥
यथागमं यथाकिञ्चिदपरां संनिबोध मे ॥
” ३ ॥
* ॥
सावित्री प्रकृतिर्यथा, --“माता चतुर्णां वेदानां वेदज्ञानञ्च छन्दसाम् ।सन्ध्यावन्दनमन्त्राणां तन्त्राणाञ्च विचक्षणा ॥
द्विजातिजातिरूपा च जपरूपा तपस्विनी ।ब्रह्मण्यतेजोरूपा च सर्व्वसंस्कारकारिणी ॥
पवित्ररूपा सावित्री गायत्त्री ब्रह्मणः प्रिया ।तीर्थानि यस्याः संस्पर्शं दर्शं वाञ्छन्ति शुद्धये ॥
शुद्धस्फटिकसङ्काशा शुद्धसत्त्वस्वरूपिणी ।परमानन्दरूपा च परमा च सनातनी ॥
परब्रह्मस्वरूपा च निर्व्वाणपददायिनी ।ब्रह्मतेजोमयी शक्तिस्तदधिष्ठातृदेवता ॥
यत्पादरजसा पूतं जगत् सर्व्वञ्च नारद ! ।देषी चतुर्थी कथिता पञ्चमीं वर्णयामि ते ॥
” ४ ॥
राधाप्रकृतिर्यथा, --“प्रेमप्राणाधिका देवी या पञ्चप्राणरूपिणी ।प्राणाधिकप्रियतमा सर्व्वाभ्यः सुन्दरी वरा ॥
सर्व्वसौभाग्ययुक्ता च मानिनी गौरवान्विता ।वामार्द्धाङ्गस्वरूपा च गुणेन तेजसा समा ॥
परा वरा सारभूता परमाद्या सनातनी ।परमानन्दरूपा च धन्या मान्या च पूजिता ॥
रासक्रीडाधिदेवी च कृष्णस्य परमात्मनः ।रासमण्डलसंभूता रासमण्डलमण्डिता ॥
रासेश्वरी सुरसिका रासवासनिवासिनी ।गोलोकवासिनी देवी गोपीवेशविधायिका ॥
परमाह्लादरूपा च सन्तोषहर्षरूपिणी ।निर्गुणा च गुणाकारा निर्लिप्तात्मस्वरूपिणी ॥
निरीहा निरहङ्कारा भक्तानुग्रहविग्रहा ।वेदानुसारध्यानेन विज्ञाता सा विचक्षणैः ॥
दृष्टिदृष्टा लसद्वेशा सुरेन्द्रैर्मुनिपुड्गवैः ।वह्निशुद्धांशुकाधाना रत्नालङ्कारभूषिता ॥
कोटिचन्द्रप्रभाजुष्टपुष्टश्रीयुक्तविग्रहा ।श्रीकृष्णभक्तिदा सैव दात्री च सर्व्वसम्पदाम् ॥
अवतारे च वाराहे वृषभानुसुता च या ।यत्पादपद्मसंस्पर्शपवित्रा च वसुन्धरा ॥
ब्रह्मादिभिरदृष्टा या सर्व्वदृष्टा च भारते ।स्त्रीरत्नसारसंभूता कृष्णवक्षःस्थलोज्ज्वला ॥
यथा घने नवघने लोला सौदामिनी मुने ! ।षष्टिवर्षसहस्राणि प्रतप्तं ब्रह्मणा पुरा ॥
यत्पादपद्मनखरदृष्टये चात्मशुद्धये ।न च दृष्टापि स्वप्नेऽपि प्रत्यक्षस्यापि का कथा ॥
तेनैव तपसा दृष्टा भुवि वृन्दावने वने ।कथिता पञ्चमी देवी सा राधा परिकीर्त्तिता ॥
अंशरूपा कलारूपा कलांशांशसमुद्भवा ।प्रकृतिः प्रतिविश्वेषु देव्यश्च सर्व्वयोषितः ॥
परिपूर्णतमा पञ्चविधा देवी प्रकीर्त्तिता ।या याः प्रधानांशरूपा वर्णयामि निशामय ॥
” ५ ॥
गङ्गा यथा, --“प्रधानांशस्वरूपा या गङ्गा भुवनपावनी ।विष्णुविग्रहसंभूता हररूपा सनातनी ॥
पापिपापेन्धदाहाय ज्वलदिन्धनरूपिणी ।सुखस्पर्शस्नानपाने निर्व्वाणपददायिनी ॥
गोलोके स्थानप्रस्थानसुखसोपानरूपिणी ।पवित्ररूपा तीर्थानां सरिताञ्च परा वरा ॥
शम्भुमौलिजटामेरुमुक्तापंक्तिस्वरूपिणी ।तपःसन्तापिनी सद्यो भारते च तपस्विनाम् ॥
चन्द्रपद्मक्षीरनिभा शृणु सत्त्वस्वरूपिणी ।निर्म्मला निरहङ्कारा साध्वी नारायण-प्रिया ॥
” १ ॥
तुलसी यथा, --“प्रधानांशस्वरूपा च तुलसी विष्णुकामिनी ।विष्णुभूषणरूपा च विष्णुपादस्थिता सती ॥
तपःसङ्कल्पपूजादिसद्यःसम्पादिनी मुने ! ।सारभूता च पुष्पाणां पवित्रा पुण्यदा सदा ॥
दर्शनस्पर्शनाभ्याञ्च सद्योनिर्व्वाणदायिनी ।कलौ कलुषशुष्केध्मदाहायाग्निस्वरूपिणी ॥
यत्पादपद्मसंस्पर्शसद्यःपूा वसुन्धरा ।यत्स्पर्शदर्शं वाञ्छन्ति तीर्थानि चात्मशुद्धये ॥
यया विना च विश्वेषु सर्व्वकर्म्मातिनिष्फलम् ।मोक्षदा या मुमुक्षूणां कामिनां सर्व्वकामदा ॥
कल्पवृक्षस्वरूपा च भारते ब्रह्मरूपिणी ।त्राणाय भारतानाञ्च प्रजानां परदेवता ॥
” २ ॥
मनसा यथा, --“प्रधानांशस्वरूपा या मनसा कश्यपात्मजा ।शङ्करप्रियशिष्या च महाज्ञानविशारदा ॥
नागेश्वरस्यानन्तस्य भगिनी नागपूजिता ।नागेश्वरी नागमाता सुन्दरी नागवाहिनी ॥
नागेन्द्रगणयुक्ता सा नागभूषणभूषिता ।नागेन्द्रैर्व्वन्दिता सिद्धयोगिनी नागशायिनी ॥
विष्णुरूपा विष्णुभक्ता विष्णुपूजापरायणा ।तपःस्वरूपा तपसां फलदात्री तपस्विनी ॥
दिव्यं त्रिलक्षवर्षञ्च तपस्तप्तं यया हरेः ।तपस्विनीषु पूज्या च तपस्विना च भारते ॥
सर्पमन्त्राधिदेवी च ज्वलन्ती ब्रह्मतेजसा ।ब्रह्मस्वरूपा परमा ब्रह्मभावेन तत्परा ॥
जरत्कारुमुनेः पत्नी कृष्णांशस्य पतिव्रता ।आस्तीकस्य मुनेर्म्माता प्रवरस्य तपस्वि-नाम् ॥
” ३ ॥
षष्ठी यथा, --“प्रधानांशस्वरूपा या देवसेना च नारद ! ।मातृकासु पूज्यतमा सा च षष्ठी प्रकीर्त्तिता ॥
शिशूनां प्रतिविश्वेषु प्रतिपालनकारिणी ।तपस्विनी विष्णुभक्ता कार्त्तिकेयस्य कामिनी ।षष्ठांशरूपा प्रकृतेस्तेन षष्ठी प्रकीर्त्तिता ॥
पुत्त्रपौत्त्रप्रदात्री च धात्रीति जगतां सती ।सुन्दरी युवती रम्या सन्ततं भर्त्तुरन्तिके ॥
स्थाने शिशूनां परमा वृद्धरूपा च योगिनी ।पूजा द्वादशमासेषु यस्या विश्वेषु सन्ततम् ॥
पूजा च सूतिकागारे परा षष्ठदिने शिशोः ।एकविंशतिमे चैव पूजा कल्याणहेतुकी ॥
शश्वन्नियमिता चैषा नित्या काम्या हुतिः परा ।मातृरूपा दयारूपा शश्वद्रक्षणरूपिणी ॥
जले स्थले चान्तरीक्षे शिशूनां स्वप्नगोचरे ॥
” ४ ॥
मङ्गलचण्डी यथा, --“प्रधानांशस्वरूपा च देवी मङ्गलचण्डिका ।प्रकृतेर्मुख्यसंभूता सर्व्वमङ्गलदा सदा ॥
सृष्टौ मङ्गलरूपा च संहरे कोपरूपिणी ।तेन मङ्गलचण्डी सा पण्डितैः परिकीर्त्तिता ॥
प्रतिमङ्गलवारेषु प्रतिविश्वेषु वन्दिता ।पञ्चोपचारैर्योषिद्भिर्भक्त्या च परिपूजिता ॥
पुत्त्रपौत्त्रधनैश्वर्य्ययशोमङ्गलदायिनी ।लोकसन्तापपापार्त्तिदुःखदारिद्रनाशिनी ॥
परितुष्टा सर्व्ववाञ्छाप्रदात्री सर्व्वयोषिताम् ।रुष्टा क्षणेन संहर्त्तुं शक्ता विश्वं महेश्वरी ॥
” ५ ॥
काली यथा, --“प्रधानांशस्वरूपा च काली कमललोचना ।दुर्गाललाटसम्भूता रणे शुम्भनिशुम्भयोः ॥
दुर्गार्द्धांशस्वरूपा सा गुणेन तेजसा समा ।कोटिसूर्य्यप्रभाजुष्टपुष्टजाज्वल्यविग्रहा ॥
प्रधाना सर्व्वशक्तीनां वरा बलवती परा ।सर्व्वसिद्धिप्रदा देवी परमा सिद्धयोगिनी ॥
कृष्णभक्ता कृष्णतुल्या तेजसा विक्रमैर्गुणैः ।कृष्णभावनया शश्वत् कृष्णवर्णा सनातनी ॥
संहंर्त्तुं सर्व्वब्रह्माण्डं शक्ता निश्वासमात्रतः ।रणं दैत्यैः समं तस्याः क्रीडया लोकरक्षया ॥
धर्म्मार्थकाममोक्षाश्च दातुं शक्ता च पूजिता ।ब्रह्मादिभिः स्तूयमाना मुनिभिर्मनुभिर्नरैः ॥
” ६ ॥
वसुन्धराप्रकृतिर्यथा, --“प्रधानांशस्वरूपा च प्रकृतेश्च वसुन्धरा ।आधाररूपा सर्व्वेषां सर्व्वशस्यप्रसूतिका ॥
रत्नाकरा रत्नगर्भा सर्व्वरत्नाकरालया ।प्रजाभिश्च प्रजेशैश्च पूजिता वन्दिता सदा ॥
सर्व्वोपजीव्यरूपा च सर्व्वसम्पद्विधायिनी ।यया विना जगत् सर्व्वं निराधारं चराचरम् ॥
७ ॥
प्रकृतेश्च कला या यास्ता निबोध मुनीश्वर ! ।यस्य यस्य च याः पत्न्यस्ताः सर्व्वा वर्णयामि ते ॥
स्वाहा देवी वह्निपत्नी त्रिषु लोकेषु पूजिता ।यया विना हविर्दानं न ग्रहीतुं सुराः क्षमाः ॥
१दक्षिणा यज्ञपत्नी च दीक्षा सर्व्वत्र पूजिता ।यया विना च विश्वेषु सर्व्व कर्म्म च निष्फलम् ॥
२ ॥
स्वधा पितॄणां पत्नी च मुनिभिर्मनुभिर्नरैः ।पूजिता पितृदानञ्च निष्फलञ्च यया विना ॥
३ ॥
स्वस्तिदेवी वायुपत्नी प्रतिविश्वेषु पूजिता ।आदानञ्च प्रदानञ्च निष्फलञ्च यया विना ॥
४ ॥
पुष्टिर्गणपतेः पत्नी प्रतिविश्वेषु पूजिता ।यया विना परिक्षीणाः पुमांसो योषितोभवेत् ॥
५ ॥
अनन्तपत्नी तुष्टिश्च पूजिता वन्दिता भवे ।यया विना न सन्तुष्टाः सर्व्वे लोकाश्च सन्ततम् ॥
६ईशानपत्नी सम्पत्तिः पूजिता च सुरैर्नरैः ।सर्व्वलोका दरिद्राश्च विश्वेषु च यया विना ॥
७ ॥
धृतिः कपिलपत्नी च सर्व्वैः सर्व्वत्र पूजिता ।सर्व्वलोका अधैर्य्याः स्युर्ज्जगत्सु च यया विना ॥
८यमपत्नी क्षमा साध्वी सुशीला सर्व्वपूजिता ।समुन्मत्ताश्च रुष्टाश्च सर्व्वलोका यया विना ॥
९ ॥
कीडाधिष्ठातृदेवी च कामपत्नी रतिः सती ।केलिकौतुकहीनाश्च सर्व्वलोका यया विना ॥
१०सत्यपत्नी सती मुक्तिः पूजिता जगतां प्रिया ।यया विना भवे लोका बन्धुतारहिताः सदा ॥
११मोहपत्नी दया साध्वी पूजिता च जगत्प्रिया ।सर्व्वे लोकाश्च सर्व्वत्र निष्ठुराश्च यया विना ॥
१२पुण्यपत्नी प्रतिष्ठा सा पुण्यरूपातिपूजिता ।यया विना जगत् सर्व्वं जीवन्मृतपरं मुने ! ॥
१३सुकर्म्मपत्नी कीर्त्तिश्च धन्या मान्या च पूजिता ।यया विना जगत् सर्व्वं यशोहीनं मृतं यथा ॥
१४क्रिया उद्योगपत्नी च पूजिता सर्व्वसम्मता ।यथा विना जगत् सर्व्वमुच्छन्नमिव नारद ! ॥
१५ ॥
अधर्म्मपत्नी मिथ्या सा सर्व्वधूर्त्तैश्च पूजिता ।यया विना जगन्मुक्तमुच्छन्नं विधिनिर्म्मितम् ॥
सत्ये चादर्शना या च त्रेतायां सूक्ष्मरूपिणी ।अर्द्धावयवरूपा च द्वापरे संवृता भिया ॥
कलौ महाप्रमत्ता च सर्व्वत्र व्यापिका बलात् ।कपटेन समं भ्रात्रा भ्रमत्येव गृहे गृहे ॥
१६ ॥
शान्ति-१७ र्लज्जा १८ च भार्य्ये द्वे सुशीलस्यच पूजिता ।याभ्यां विना जगत् सर्व्वमुन्मत्तमिव नारद ! ॥
ज्ञानस्य भार्य्यास्तिस्रश्च बुद्धि-१९ र्मेधा २०स्मृति-२१ स्तथा ।याभिर्व्विना जगत् सर्व्वं मूढं मृतसमं तदा ॥
मूर्त्तिश्च धर्म्मपत्नी सा कान्तिरूपा मनोहरा ।परमा सा च विश्वौघा निराधारा यया विना ॥
सर्व्वत्र शोभारूपा सा लक्ष्मीर्मूर्त्तिमती सती ।श्रीरूपा मूर्त्तिरूपा च मान्या धन्या च पूजिता॥
२२ ॥
कालाग्निरुद्रपत्नी च निद्रा सा सिद्धयोगिनी ।सर्व्वलोकाः समाच्छन्ना मायायोगेनरात्रिषु ॥
२३ ॥
कालस्य तिस्रो भार्य्याश्च सन्ध्या-२४ रात्रि-२५दिनानि च २६ ।याभिर्व्विना विधात्रा च संख्यां कर्त्तुंन शक्यते ॥
क्षुत्-२७ पिपासे २८ मनोभार्य्ये धन्ये मान्येसुपूजिते ।याभ्यां व्याप्तं जगत् सर्व्वं युक्तचिन्तितमेव च ॥
प्रभा च २९ दाहिका ३० चैव द्वे भार्य्ये तेजस-स्तथा ।याभ्यां विना जगत् स्रष्टुं विधातापि नहीश्वरः ॥
कालकन्ये मृत्यु-३१ जरे ३२ प्रज्वरस्य प्रियेप्रिये ।याभ्यां जगत् समुच्छन्नं विधात्रा निर्म्मितं विधौ ॥
निद्राकन्या च तन्द्रा ३३ सा प्रीति-३४ रन्यासुखप्रिये ।याभ्यां व्याप्तं जगत् सर्व्वं विधिपुत्त्रविधेर्विधौ ॥
वैराग्यस्य हि जाये च श्रद्धा-३५ भक्ती ३६ चपूजिते ।याभ्यां शश्वज्जगत् सर्व्वं जीवन्मुक्तमिदं मुने ! ॥
अदिति-३७ र्द्देवमाता च सुरभी २८ च गवांप्रसूः ।दितिश्च ३९ दैत्यजननी कद्रुश्च ४० विनता ४१दनुः ४२ ॥
उपयुक्ताः सृष्टिविधौ एताश्च प्रकृतेः कलाः ॥
*कलाश्चान्याः सन्ति बह्व्यस्तासु काश्चिन्निबोध मे ॥
रोहिणी ४३ चन्द्रपत्नी च संज्ञा ४४ सूर्य्यस्यकामिनी ।शतरूपा ४५ मनोर्भार्य्या शचीन्द्रस्य च गेहिनी४६ ॥
तारा ४७ बृहस्पतेर्भार्य्या वशिष्ठस्य त्वरु-न्घती ४८ ।अहल्या ४९ गौतमस्त्री तु सानसूया ५० त्रिका-मिनी ॥
पितॄणां मानसी कन्या मेनका ५१ साम्बिका-प्रसूः ।लोपामुद्रा ५२ तथा भूती ५३ कुवेरकामिनीतथा ॥
वरुणानी ५४ यमस्त्री च वलेर्ब्बिन्ध्यावली ५५तथा ।कुन्ती च ५६ दयमन्ती च ५७ यशोदा ५८दैवकी ५९ सती ॥
गान्धारी ६० द्रौपदी ६१ सव्या ६२ सावित्री ६३सत्यवत्प्रिया ।वृषभानुप्रिया साध्वी राधामाता कलावती ६४ ॥
मन्दोदरी ६५ च कौशल्या ६६ सुभद्रा ६७कैटभी ६८ तथा ।रेवती ६९ सत्यभामा ७० च कालिन्दी ७१लक्ष्मणा ७२ तथा ॥
जाम्बवती ७३ नाग्नजिती ७४ मित्रबिन्दा ७५तथापरा ।लक्ष्मणा ७६ रुक्मिणी ७७ सीता ७८ स्वयं-लक्ष्मीः प्रकीर्त्तिता ॥
कला योजनगन्धा च ७९ व्यासमाता महासती ।बाणपुत्त्री तथोषा ८० च चित्रलेखा च ८१तत्सखी ॥
प्रभावती ८२ भानुमती ८३ तथा मायावती ८४ सती ।रेणुका ८५ च भृगोर्माता हलिमाता चरोहिणी ८६ ॥
एकानंशा ८७ च दुर्गांशा श्रीकृष्णभगिनी सती ।बह्व्यः सन्ति कलाश्चैव प्रकृतेरेव भारते ॥
या याश्च ग्रामदेव्यस्ताः सर्व्वाश्च प्रकृतेः कलाः ।कलांशांशसमुद्भूताः प्रतिविश्वेषु योषितः ॥
* ॥
योषितामपमानेन प्रकृतेश्च पराभवः ।ब्राह्मणी पूजिता येन पतिपुत्त्रवती सती ॥
प्रकृतिः पूजिता तेन वस्त्रालङ्कारचन्दनैः ।कुमारी चाष्टवर्षीया वस्त्रालङ्कारचन्दनैः ।पूजिता येन विप्रस्य प्रकृतिस्तेन पूजिता ॥
* ॥
सर्व्वाः प्रकृतिसम्भूता उत्तमाधममध्यमाः ।सत्वांशाश्चोत्तमा ज्ञेयाः सुशोलाश्च पतिव्रताः ॥
मध्यमा राजसाश्चांशास्ताश्च भोग्याः प्रकी-र्त्तिताः ।सुखसम्भोगवश्याश्च स्वकार्य्ये तत्पराः सदा ।अधमास्तामंसाश्चांशा अजातकुलसम्भवाः ॥
दुर्मुखाः कुलटा धूर्त्ताः स्वतन्त्राः कलहप्रियाः ।पृथिव्यां कुलटा याश्च स्वर्गे चाप्सरसां गणाः ॥
प्रकृतेस्तामसांशांशाः पुंश्चल्यः परिकीर्त्तिताः ।एवं निगदितं सर्व्वं प्रकृतेः परिकीर्त्तनम् ॥
* ॥
ताश्च सर्व्वाः पूजिताश्च पुण्यक्षेत्रे च भारते ।पूजिता सुरथेनादौ दुर्गा दुर्गतिनाशिनी ॥
द्वितीये रामचन्द्रेण रावणस्य वधार्थिना ॥
तत्पश्चाज्जगतां माता त्रिषु लोकेषु पूजिता ।जातादौ दक्षपत्न्याञ्च निहत्य दैत्यदानवान् ॥
ततो देहं परित्यज्य यज्ञे भर्त्तुश्च निन्दया ।जज्ञे हिमवतः पत्न्यां लेभे पशुपतिं पतिम् ॥
गणेशश्च स्वयं कृष्णः स्कन्दो विष्णुकलोद्भवः ।बभूवतुस्तौ तनयौ पश्चात्तस्याश्च शौनक ! ॥
लक्ष्मीर्म्मलयभूपेन प्रथमे परिपूजिता ।त्रिषु लोकेषु तत्पश्चाद्देवतामुनिमानवैः ॥
सावित्री चाश्वपतिना प्रथमे परिपूजिता ।तत्पश्चात्त्रिषु लोकेषु देवतामुनिमानवैः ॥
आदौ सरस्वती देवी ब्रह्मणा परिपूजिता ।तत्पश्चात्त्रिषु लोकेषु देवतामुनिमानवैः ॥
प्रथमे पूजिता राधा गोलोके रासमण्डले ।पौर्णमास्यां कार्त्तिकस्य कृष्णेन परमात्मना ॥
गोपिकाभिश्च गोपैश्च बालिकाभिश्च बालकैः ।गवां गणैः सुरभ्या च तत्पश्चान्मायया हरेः ॥
तदा ब्रह्मादिभिर्द्देर्वैर्मुनिभिर्मनुभिस्तथा ।पुष्पधूपादिभिर्भक्त्या पूजिता वन्दिता सदा ॥
पृथिव्यां प्रथमे देवी सुयज्ञेनैव पूजिता ।शङ्करेणोपदिष्टेन पुण्यक्षेत्रे च भारते ॥
त्रिषु लोकेषु तत्पश्चादाज्ञया परमात्मनः ।पुष्पधूपादिभिर्भक्त्या पूजिता मुनिभिः सुरैः ॥
कलया याः समुद्भूताः पूजितास्ताश्च भारते ।पूजिता ग्रामदेव्यश्च ग्रामे च नगरे मुने ! ॥
एवं ते कथितं सर्व्वं प्रकृतेश्चरितं शुभम् ।यथागमं लक्षणञ्च किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
”इति ब्रह्मवैवर्त्ते प्रकृतिखण्डे प्रकृतिचरितंनामानुक्रमः प्रथमोऽध्यायः ॥
* ॥
पुरुषनाम्नो-ऽग्रे प्रकृतेर्न्नाम्न उच्चार्य्यता यथा, --नारद उवाच ।“आदौ राधांसमुच्चार्य्य पश्चात्कृष्णं विदुर्ब्बुधाः ।निमित्तमस्य मां भक्तं वद भक्तजनप्रिय ! ॥
श्रीनारायण उवाच ।निमित्तमस्य त्रिविधं कथयामि निशामय ।जगन्माता च प्रकृतिः पुरुषश्च जगत्पिता ।गरीयसीति जगतां माता शतगुणैः पितुः ॥
राधाकृष्णेति गौरीशेत्येवं शब्दः श्रुतौ श्रुतः ।कृष्णराधेशगौरीति लोके न च कदा श्रुतः ॥
प्रसीद रोहिणीचन्द्र गृहाणार्घ्यामदं मम ।गृहाणार्घ्यं मया दत्तं संज्ञया सह भास्कर ! ॥
प्रसीद कमलाकान्त गृहाण मम पूजनम् ।इति दृष्टं सामवेदे कौथुमे मुनिसत्तम ! ॥
राशब्दोच्चारणादेव स्फीतो भवति माधवः ।धाशब्दोच्चारतः पश्चाद्धावत्येव ससम्भ्रमः ॥
आदौ पुरुषमुच्चार्य्य पश्चात् प्रकृतिमुच्चरेत् ।स भवेन्मातृगामी च वेदातिक्रमणे मुने ! ॥
”इति ब्रह्मवैवर्त्ते श्रीकृष्णजन्मखण्डे ५० अध्यायः ॥
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