| YouTube Channel

पृथिवी (pRthivI)

 
शब्दसागरः
English
पृथिवी
f.
(-वी) The earth.
E.
प्रथ् to be famous, Unādi
aff.
षिवन्, fem.
aff.
ङीप्, and the vowel substituted for the semi-vowel
also with
the anti-penultimate vowel changed to अ, पृथवी
or dropped alto-
gether, पृथ्वी
or without the fem.
aff.
पृथिवि
Capeller Eng
English
पृथिवी॑
f.
the earth (lit. the wide one, often
personif. )
land, country, realm.
Yates
English
पृथिवी (वी) 3.
f.
The earth.
Spoken Sanskrit
English
पृथिवी - pRthivI -
f.
- earth
पृथ्वी - pRthvI -
f.
- earth
मही - mahI -
f.
- earth
मृत्तिका - mRttikA -
f.
- earth
भूमि - bhUmi -
f.
- earth
भुवन - bhuvana -
n.
- earth
पार्थिव - pArthiva -
adj.
- earthly
ऐहिकी - aihikI -
adj.
f.
- earthly
ऐहिकः - aihikaH -
adj.
m.
- earthly
मृत्कला - mRtkalA -
f.
- earthwork
किञ्चुलुक - kiJculuka -
m.
- earthworm
भूकम्प - bhUkampa -
m.
- earthquake
मृद्घट - mRdghaTa -
m.
- earthenpot
मृत्तिकपात्र - mRttikapAtra -
n.
- earthenpot
मृद्भाण्ड - mRdbhANDa -
n.
- earthenware
गिरिकर्णिका - girikarNikA - earth
पुरीष्य - purISya -
adj.
- earth
उर्वी - urvI -
f.
- earth
क्ष्मा - kSmA -
f.
- earth
धरा - dharA -
f.
- earth
पृथिवी - pRthivI -
f.
- earth
पृथिवी - pRthivI -
f.
- soil
पृथिवी - pRthivI -
f.
- earth or wide world
पृथिवी - pRthivI -
f.
- earth regarded as one of the elements
पृथिवी - pRthivI -
f.
- ground
पृथिवी - pRthivI -
f.
- land
Wilson
English
पृथिवी
f.
(-वी) The earth.
E.
प्रथ to be famous, Uṇādi
aff.
षिवन्, fem.
aff.
ङीप्, and the
vowel substituted for the semivowel
also with the antepenultimate vowel changed
to अ, पृथवी
or dropped altogether, पृथ्वी
or without the fem.
aff.
पृथिवि.
Apte
English
पृथिवी [pṛthivī], [cf.
Uṇ.*
1.184]
The earth
(sometimes written पृथिवि also). पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्.
Ground, soil.
The earth considered as one of the nine substances or five primary elements.
Comp.
-इन्द्रः, -ईशः, -क्षित्
m.
, -पालः, -पालकः, -भुज्
m.
, -भुजः, -शुक्रः a king. -कम्पः an earthquake. -तलम् the surface of the earth.
पतिः a king.
Yama, the god of death. -भृत्
m.
a mountain. -मण्डलः, -लम् the circuit of the earth. -रुहः a tree
पवमानः पृथिवीरुहानिव
R.*
8.9. -लोकः terrestrial world, the earth.
Apte 1890
English
पृथिवी [cf. Uṇ. 1. 184] 1 The earth
(sometimes written पृथिवि also)
2 Ground, soil.
3 The earth considered as one of the nine substances or five primary elements.
Comp.
इंद्रः,
ईशः,
क्षित् m.,
पालः,
पालकः,
भुज् m.,
भुजः,
शुक्रः a king.
तलं the surface of the earth.
पतिः {1} a king. {2} Yama, the god of death.
भंडलः,
लं the circuit of the earth.
रुहः a tree: पवमानः पृथिवीरुहानिव R. 8. 9.
लोकः terrestrial world, the earth.
Monier Williams Cologne
English
पृथिवी॑
f.
(= पृथ्वी
f.
of पृथु) the earth or wide world (‘the broad and extended One’, personified as देवी and often invoked together with the sky [cf. 3. दिव् and द्यावा-पृथिवी,
RTL.
182]
according to,
VP.
daughter of पृथु
the Veda makes 3 earths, one called भूमि, inhabited by men, and 2 under it
there is also an earth between the world of men and the circumambient ocean [ŚBr. ] and one extending through the 3 worlds [Naigh. ]),
RV.
&c.
&c.
land, ground, soil, ib.
earth regarded as one of the elements,
Prab.
Suśr.
=
अन्तरिक्ष,
Naigh.
i, 3
Monier Williams 1872
English
पृथिवी, f. (for पृथ्वी, f. of पृथु below),
‘the wide (world), the earth, Earth personified (as
the mother of all beings, and often invoked together
with the Sky
in the Veda there are three earths
enumerated corresponding with the three heavens,
that on which mankind lives being called भूमि
in the Viṣṇu-Purāṇa said to be the daughter of
Pṛthu)
land, ground, soil
earth regarded as one
of the elements
(according to Naigh. I. 3) = अन्त-
रिक्ष, sky
पृथिव्या व्रतम् or पृथिव्याः सं-
सर्पम्, N. of a Sāman. [पृथिवी is sometimes
shortened into पृथिवि, especially in comps.]
—पृ-
थिवि-त्व, अम्, n. the state of the earth.
—पृ-
थिवि-दा, आस्, आस्, अम्, Ved. earth-giving.
—पृथिवि-
भाग, अस्, आ, अम्, Ved. having the earth as a share,
one to whom the earth is allotted, entitled to the
earth.
—पृथिवि-लोक, अस्, m., Ved. the earth re-
garded as a world, the terrestrial world.
—पृथिवि-
षद् or पृथिवि-सद्, त्, त्, त्, sitting on the ground.
—पृथिवि-ष्ठ, अस्, आ, अम्, Ved. standing on the
ground, stepping firmly (said of a horse
Sāy. =
पृथिव्यां सु-प्रतिष्ठितः).
—पृथिवी-कम्प,
अस्, m. an earthquake.
—पृथिवी-क्षित्, त्, त्, त्,
dwelling on earth (Ved.)
reigning over the earth
(त्), m. a prince, king, sovereign.
—पृथिवी-चन्द्र,
अस्, m. ‘earth-moon, N. of a prince of the Tri-
gartas.
—पृथिवीञ्-जय, अस्, आ, अम्, conquering
the earth
(अस्), m. a prince, king, sovereign.
—पृ-
थिवी-तल, अम्, n. the surface of the earth, ground,
bare ground, the very earth.
—पृथिवी-तीर्थ, अम्,
n., N. of a Tīrtha.
—पृथिवी-धरण, अम्, n. a
prop or support of the earth.
—पृथिवी-पति, इस्, m.
‘lord of the earth, a prince, king, sovereign
an
epithet of Yama the regent of the dead
a kind of
drug (= ऋषभ).
—पृथिवी-परिपालक, अस्, m.
‘guardian of the earth, a prince, king, sovereign.
—पृथिवी-पार्वतक, अस् or अम्, m. or n. (?),
rock-oil, petroleum (?).
—पृथिवी-पाल, अस्, m.
‘guardian of the earth, a king, sovereign, ruler.
—पृथिवी-भुज्, क्, m. ‘earth-enjoying, a prince,
sovereign.
—पृथिवी-मण्ड, अस् or अम्, m. or n. (?),
the scum of the earth.
—पृथिवी-मण्डल, अस्,
अम्, m. n. the circuit of the earth.
—पृथिवी-
मय, अस्, ई, अम्, made of earth, earthen.
—पृ-
थिवी-रस, अस्, m. the sap of the earth.
—पृथिवी-
राज्य, अम्, n. the sovereignty of the earth.
—पृ-
थिवी-रुह, अस्, m. ‘earth-growing, a plant, tree.
—पृथिवी-लोक, अस्, m. the earth considered as a
world, the terrestrial world
[cf. पृथिवि-लोक।]
—पृथिवीश (°वि-ईश°), अस्, m. ‘lord of the earth,
a prince, king, sovereign.
—पृथिवी-शक्र, अस्, m.
‘the Indra of the earth, a king.
—पृथिव्य्-आपीड,
अस्, m., N. of two princes of Kaśmīra.
पृथिवी पृथिवी। See p. 594, col. 3.
Macdonell
English
पृथिवी pṛth-i-v-ī́,
f.
[= pṛthu‿ī] the (wide) 🞄earth, orbis terrarum (three earths are spoken 🞄of)
Earth (personified)
land, realm
ground
🞄earth (as an element).
Benfey
English
पृथिवी पृथिवी, i. e. पृथ्वी,
f.
of
पृथु।
1. The earth personified, Man.
2, 225.
2. Earth as an element, Prab.
27, 19.
Apte Hindi
Hindi
पृथिवी
स्त्री*
- "प्रथ्+षिंवन्, संप्रसारणम्"
पृथ्वी
Shabdartha Kaustubha
Kannada
पृथिवी
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಧರೆ /ಭೂಮಿ /ಮನುಷ್ಯರ ವಾಸಸ್ಥಾನ
निष्पत्तिः - > प्रथ (प्रख्याने) - "षिवन्" (उ० १-१४८) सम्प्रसारणञ्च
प्रयोगाः - > "नासाविरोकपवनोल्लसितं तनीयो रोमाञ्चतामिव जगाम रजःपृथिव्याः"
उल्लेखाः - > माघ० ५-५४
पृथिवी
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > (ನ್ಯಾಯಮತದಲ್ಲಿ)ನವದ್ರವ್ಯಗಳಲ್ಲೊಂದು
प्रयोगाः - > "पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि नवैव (द्रव्याणि)"
उल्लेखाः - > त० सं०
पृथिवी
पदविभागः - > स्त्रीलिङ्गः
कन्नडार्थः - > ಪಂಚಮಹಾಭೂತಗಳಲ್ಲೊಂದು
L R Vaidya
English
pfTivI {% f. %} The earth
(the word is sometimes written पृथिवि also).
भूतसङ्ख्या
Sanskrit
१, अंशुमान्, अचला, अब्ज, अमृतांशु, अवनि, आदि, आस्य, इन्दु, इला, उडुपति, उर्वरा, उर्वी, ऋक्षेश, एक, एणधर, औषधीश, क, कलाधर, कलि, कु, कुमुदाकरप्रिय, क्षपाकर, क्षमा, क्षिति, क्षोणि, क्षोणी, क्षमा, गो, गोत्र, गोत्रा, ग्लौ, चन्द्र, चन्द्रमस्, जगती, जैवातृक, ज्या, तनु, दाक्षायणीप्राणेश, धरणी, धरा, धरित्री, नायक, निशाकर, निशेश, पितामह, पृथिवी, पृथ्वी, प्रालेयांशु, ब्रह्मा, भुवन्यु, भू, भूमि, मही, मुख, मृगलाञ्छन, मृगाङ्क, मेदिनी, रजनीकर, रजनीश, रात्रिप, रात्रीश, रुग्ण, रूप, लपन, वक्त्र, वदन, वसुधा, वसुन्धरा, वाक्, विधु, विरञ्चि, विश्वम्भरा, शशधर, शशभृत्, शशलाञ्छन, शशाङ्क, शशि, शशी, शीतकर, शीतकिरण, शीतद्युति, शीतमयूख, शीतरश्मि, शीतांशु, शुभ्रभानु, श्वेत, श्वेतांशु, सितरश्मि, सुधांशु, सोम, स्थिरा, हरिणधृत्, हरिणाङ्क, हिमकर, हिमगु, हिमरश्मि, हिमांशु
Bopp
Latin
पृथिवी f. (v. पृथ्वी) terra.
Edgerton Buddhist Hybrid
English
Pṛthivī, or Pṛthvī, n. of a devakumārikā in the northern quarter: Pṛthivī Padumāvatī Mv 〔iii.309.8〕 (vs) = Pṛthvī Padmāvatī tathā LV 〔391.3〕
note how LV Sanskritizes and then patches the meter! Both without v.l.
Indian Epigraphical Glossary
English
pṛthivī, cf. Prakrit sava-puṭhaviyaṃ (CII, Vol. I, p. 87, text
line 7)
used to indicate the dominions of the Maurya emperor
Aśoka, versions other than Dhauli (Rock Edict V) having
sarvatra vijite (i. e. ‘everywhere within the dominions’) in its
place. Cf. Jambudvīpa.
Lanman
English
pṛthivī́, f. the earth as the wide and
broad. [fem. to pṛthú, 344^2, and standing
for pṛthvī, as the metre shows it is to be
pronounced at 92^10: for mg, cf. mah-ī́,
s. v. máh.]
Wordnet
Sanskrit
Synonyms:
पृथिवी, भूः, भूमिः, अचला, अनन्ता, रसा, विश्वम्भरा, स्थिरा, धरा, धरित्री, धरणी, क्षौणी, ज्या, काश्यपी, क्षितिः, सर्वसहा, वसुमती, वसुधा, उर्वी, वसुन्धरा, गोत्रा, कुः, पृथ्वी, क्ष्मा, अवनिः, मेदिनी, मही, धरणी, क्षोणिः, क्षौणिः, क्षमा, अवनी, महिः, रत्नगर्भा, सागराम्बरा, अब्धिमेखला, भूतधात्री, रत्नावती, देहिनी, पारा, विपुला, मध्यमलोकवर्त्मा, धारणी, गन्धवती, महाकान्ता, खण्डनी, गिरिकर्णिका, धारयित्री, धात्री, अचलकीला, गौः, अब्धिद्वीपा, इडा, इडिका, इला, इलिका, इरा, आदिमा, ईला, वरा, आद्या, जगती, पृथुः, भुवनमाता, निश्चला, श्यामा
noun
मर्त्याद्यधिष्ठानभूता।
"पृथिवी पञ्चमम् भूतम्"
Sanskrit Tibetan
Tibetan
sa
१) अवनि २) इरा ३) क्षिति ४) क्ष्मा ५) गो ६) ज्ञानभूमि ७) ° त्व ८) धरणी ९) पांशु १०) पृथिवी ११) भू १२) भूरधात्री १३) भूमि १४) मही १५) मृत्तिका १६) मृद् १७) मेदिनी १८) वसुन्धरा १९) वसुमती २०) शाला २१)
sa 'di
पृथिवी
sa gzhi
१) उर्वी २) कुट्टिम ३) चराचर ४) धरणी ५) पृथिवी ६) भृवन ७) भू ८) भूमि ९) भूमितल १०) मही ११) लिक १२) वसुंधरा १३) सर्वसहा
अभिधानचिन्तामणिः
Sanskrit
--source--
भूर्भूमिः पृथिवी पृथ्वी वसुधोर्वी वसुंधरा
धात्री धरित्री धरणी विश्वा विश्वंभरा धरा ९३५
क्षितिः क्षोणी क्षमानन्ता ज्या कुर्वसुमती मही
गौर्गोत्रा भूतधात्री क्ष्मा गन्धमाताचलावनिः ९३६
सर्वंसहा रत्नगर्भा जगती मेदिनी रसा
काश्यपी पर्वताधारा स्थिरेला रत्नबीजसूः ९३७
विपुला सागराच्चाग्रे स्युर्नेमीमेखलाम्बराः
-wordlist-
भू (स्त्री), भूमि (स्त्री), पृथिवी (स्त्री), पृथ्वी (स्त्री), वसुधा (स्त्री), उर्वी (स्त्री), वसुन्धरा (स्त्री), धात्री (स्त्री), धरित्री (स्त्री), धरणी (स्त्री), विश्वा (स्त्री), विश्वम्भरा (स्त्री), धरा (स्त्री), क्षिति (स्त्री), क्षोणी (स्त्री), क्षमा (स्त्री), अनन्ता (स्त्री), ज्या (स्त्री), कु (स्त्री), वसुमती (स्त्री), मही (स्त्री), गो (स्त्री), गोत्रा (स्त्री), भूतधात्री (स्त्री), क्ष्मा (स्त्री), गन्धमाता (स्त्री), अचला (स्त्री), अवनि (स्त्री), सर्वंसहा (स्त्री), रत्नगर्भा (स्त्री), जगती (स्त्री), मेदिनी (स्त्री), रसा (स्त्री), काश्यपी (स्त्री), पर्वताधारा (स्त्री), स्थिरा (स्त्री), इला (स्त्री), रत्नसू (स्त्री), बीजसू (स्त्री), विपुला (स्त्री), सागरनेमी (स्त्री), सागरमेखला (स्त्री), सागराम्बरा (स्त्री)
अभिधानरत्नमाला
Sanskrit
भू
भू, भूमि, वसुधा, अवनि, वसुमती, धात्री, धरित्री, धरा, गो, गोत्रा, जगती, रसा, क्षिति, इला, क्षोणी, क्षमा, क्ष्मा, अचला, कु, पृथ्वी, पृथिवी, स्थिरा, धरणी, विश्वम्भरा, मेदिनी, ज्या, अनन्ता, विपुला, समुद्रवसना, सर्वंसहा, ऊर्वी, मही, काश्यपी, भूतधात्री, रत्नगर्भा, वसुन्धरा, धराधारा
भूर्भूमिर्वसुधावनिर्वसुमती धात्री धरित्री धरा,
गौर्गोत्रा जगती रसा क्षितिरिला क्षोणी क्षमा क्ष्माचला
कुः पृथ्वी पृथिवी स्थिरा धरणी विश्वम्भरा मेदिनी,
ज्यानन्ता विपुला समुद्रवसना सर्वंसहोर्वी मही १५६
काश्यपी भूतधात्री रत्नगर्भा वसुन्धरा
धराधारा विज्ञेया तद्विशेषान्निबोधत १५७
verse 2.1.1.156
page 0020
नाममाला
Sanskrit
भूमि, भू, पृथिवी, पृथ्वी, गह्वरी, मेदिनी, मही, धरा, वसुमती, धात्री, क्षमा, विश्वम्भरा, अवनि, वसुधा, धरणी, क्षोणी, क्ष्मा, धरित्री, क्षिति, कुम्भिनी, इला, उर्वरा, उर्वी, जगती, गो, वसुन्धरा
भूमिर्भूः पृथिवी पृथ्वी गह्वरी मेदिनी मही
धरा वसुमती धात्री क्षमा विश्वम्भराऽवनिः
वसुधा धरणी क्षोणी क्ष्मा धरित्री क्षितिश्च कुः
कुम्भिनीलोर्वरा चोर्वी जगती गौर्वसुन्धरा
verse 0.1.1.5
page 0004
एकाक्षरनाममाला
Sanskrit
ट, पृथिवी, ध्वनि, वायु, करङ्क
टः पृथिव्यां ध्वनौ वायौ करके टं पुनर्भुवि
चकोरेऽब्दे तथा ठस्तु घेण्टे शून्ये बृहद्वनौ २०
verse 1.1.1.20
page 0120
Mahabharata
English
*Pṛthivī (“Earth, personified): II, 458
III, 147 (identified with Sūrya (the sun)), 481 (identified with Kṛshṇa), (10939)
VII, 1283
IX, 2514
XI, 214, 217
XII, 421 (devīṃ), 1788, (1790), 1803, 2238, 13424 (mātaraṃ)
XIII, 369 (prīṇāti mātaraṃ yena Pºī tena pūjitā), 1540, (1541), 1545, (2131), 4096 (devī…Vasumatī), 4350 (Vaishṇavī Kāśyapī), 4652 (Vāsudevasya saṃvādaṃ Pºyāś caiva), 4653, (4655), 7235, 7238 (Kāśyapī). Cf. Pṛthvī.
Vedic Reference
English
Pṛthivī denotes the ‘earth’ as the ‘broad’ one in the Rigveda^1
and later, ^2 being often personified as a deity^3 both alone and
with Div, ‘heaven, as Dyāvā-Pṛthivī.^4 Mention is often made
of three earths, ^5 of which the world on which we live is the
highest.^6 The earth is girdled by the ocean, according to the
Aitareya Brāhmaṇa.^7 The Nirukta^8 places one of the three
earths in each of the worlds into which the universe is divided
(see Div). In the Śatapatha Brāhmaṇa^9 the earth is called
the ‘firstborn of being, and its riches (vitta) are referred to
^10
hence in a late passage of the Śāṅkhāyana Āraṇyaka^11 the
earth is styled vasu-matī, ‘full of wealth.’ The word also occurs
in the Rigveda, ^12 though rarely, in the form of Pṛthvī.^13
1) Rv. vii. 7, 2, 5
99, 3
v. 85, 1, 5
viii. 89, 5, etc.
2) Av. xii. 1, 1 et seq.
Vājasaneyi
Saṃhitā, xi. 53, etc.
3) Rv. iv. 3, 5
51, 11
v. 49, 5
84, 1 et seq.
vi. 50, 13, 14
vii. 34, 23,
etc.
Vājasaneyi Saṃhitā, xii. 103, etc.
4) Rv. iv. 56, 1
vii. 53, 1, etc. See
Macdonell, Vedic Mythology, pp. 20, 21,
123, 126.
5) Rv. i. 34, 8
iv. 53, 5
vii. 104, 11
Av. iv. 20, 2
Vājasaneyi Saṃhitā,
v. 9, etc.
6) Av. vi. 21, 1
xix. 27, 3
32, 4
53, 5
Śatapatha Brāhmaṇa, iii. 5, 1,
31
v. 1, 5, 21.
7) viii. 20. This idea is not found
in the Saṃhitās, Macdonell, op. cit.,
p. 9.
8) ix. 31
xi. 36
xii. 30
Naighaṇṭuka,
v. 3, 5, 6. Cf. Bruce, Journal of the
Royal Asiatic Society, 19, 321 et seq.
9) xiv. 1, 2, 10.
10) Śatapatha Brāhmaṇa, xi. 5,
6, 3.
11) xiii. 1.
12) vi. 12, 5
x. 187, 2. Cf. Macdonell,
op. cit., 34.
13) The regular adjectival feminine
form of pṛthu, ‘broad.’
शब्दकल्पद्रुमः
Sanskrit
पृथिवी,
स्त्री,
(प्रथते विस्तारं यातीति प्रथ +“प्रथेः षिवन् संप्रसारणञ्च ।” उणा० १५० ।इति षिवन् सम्प्रसारणञ्च ङीष् ।) मर्त्त्याद्यधि-ष्ठानभूता तत्पर्य्यायः भूः भूमिः अचला४ अनन्ता रसा विश्वम्भरा स्थिरा ८धरा धरित्री १० धरणी ११ क्षौणी १२ ज्या१३ काश्यपी १४ क्षितिः १५ सर्व्वंसहा १६वसुमती १७ वसुधा १८ उर्व्वी १९ वसुन्धरा२० गोत्रा २१ कुः २२ पृथ्वी २३ क्ष्मा २४अवनिः २५ मेदिनी २६ मही इत्यमरः ।१ --
भूर् २८ भूमी २९ धरणिः ३०क्षोणिः ३१ क्षोणी ३२ क्षौणिः ३३ क्षमा ३४अवनी ३५ महिः ३६ रत्नगर्भा ३७ सागराम्बरा३८ अब्धिमेखला ३९ भूतधात्री ४० रत्नावती ४१देहिनी ४२ पारा ४३ विपुला ४४ मध्यमलोक-वर्त्मा ४५ इति भरतः
धरणीधरा ४६धारणी ४७ महाकान्ता ४८ जगद्वहा ४९गन्धवती ५० खण्डनी ५१ गिरिकर्णिका ५२धारयित्री ५३ धात्री ५४ सागरमेखला ५५सहा ५६ अचलकीला ५७ गौः ५८ अब्धिद्बीपा५९ द्विरा ६० इडा ६१ इडिका ६२ इला ६३इलिका ६४ इति शब्दरत्नावली
उदधि-वस्त्रा ६५ इरा ६६ आदिमा ६७ ईला ६८वरा ६९ उर्व्वरा ७० आद्या ७१ जगती ७२पृथुः ७३ भुवनमाता ७४ निश्चला ७५ बीज-प्रसूः ७६ श्यामा ७७ क्रोडकान्ता ७८ इतिराजनिर्घण्टः
खगवती ७९ अदितिः ८० ।इति जटाधरः
*
(पृथवी ८१ इतिशब्दार्णषः
) न्यायमते अस्या धर्म्मः रूप-द्रवत्वप्रत्यक्षयोगित्वम् इयं गुर्व्वी रसयुक्ता ।अस्या द्रवत्वं नैमित्तिकम् अस्या गुणाः ।स्पर्शः संख्या परिमितिः पृथक्त्वम् ४संयोगः विभागः परत्वम् अपरत्वम् ८वेगः द्रवत्वम् १० गुरुत्वम् ११ रूपम् १२रसः १३ गन्धः १४ इयं गन्धकारणं नाना-रूपवती षड्रसयुक्ता गन्धस्तु द्बिविधः सौरभंअसौरभम् तस्याः स्पर्शः अनुष्णाशीत-पाकजः सा द्विविधा नित्या अनित्या पर-माणुस्वरूपा नित्या सावयवा अनित्या सात्रिविधा देहेन्द्रियविषयरूपा देहरूपा योनि-जादिः इन्द्रियात्मिका घ्राणरूपा विषयात्मिकाद्व्यणुकादिब्रह्माण्डपर्य्यन्ता यथा, --“रूपद्रवत्वप्रत्यक्षयोगि स्यात् प्रथमत्रिकम् ।गुरुणी द्वे रसवती द्बयोर्नैमित्तिको द्रवः
”“स्पर्शादयोऽष्टौ वेगश्च द्रवत्वञ्च गुरुत्वकम् ।रूपं रसस्तथा स्नेहो वारिण्येते चतुर्द्दश
स्नेहहीना गन्ध युता क्षितावेते चतुर्द्दश ।तत्र क्षितिर्गन्ध हेतुर्नानारूपवती मता
षड्विधस्तु रसस्तत्र गन्धोऽपि द्विविधो मतः ।स्पर्शस्तु तस्या विज्ञेयो ह्यनुष्णाशीतपाकजः
नित्यानित्या सा द्वेधा नित्या स्यादणुलक्षणा ।अनित्या तु तदन्या स्यात् सैवावयवयोगिनी
सा त्रिधा भवेद्देह इन्द्रियं विषयस्तथा ।योनिजादिर्भवेद्देहमिन्द्रियं घ्राणलक्षणम्
विषयो द्व्यणुकादिस्तु ब्रह्माण्डान्त उदाहृतः
”इति भाषापरिच्छेदे २८ -- ३८
तस्या अध्यात्मादि यथा, --“पृथिवी पञ्चमं भूतं ध्राणश्चाध्यात्ममुच्यते ।अधिभूतं तथा गन्धो वायुस्तत्राधिदैवतम्
”इति महाभारते आश्वमेधिकपर्व्व
(यथा, मार्कण्डेये ५४ ।“शतार्द्धकोटिविस्तारो पृथिवी कृत्स्नशोद्बिज ! ।तस्या हि स्थानमखिलं कथयामि शृणुष्व तत्
”)तस्या उत्पत्तिकारणं यथा, --“श्रूयतां वसुधाजन्म सर्व्वमङ्गलकारणम् ।विघ्ननिघ्नकरं पापनाशनं पुण्यवर्द्धनम्
अहो केचिद्वदन्तीति मधुकैटभमेदसा ।बभूव वसुधाजन्म तदविरुद्धमतं शृणु
ऊचतुस्तौ पुरा विष्णुं तुष्टौ युद्धेन तेजसा ।आवां वध यत्रोर्व्वी पाथसा संवृतेति
तयोर्जीवनकालेन प्रत्यक्षा साभवत् स्फुटम् ।ततो बभूव मेदश्च मरणस्यान्तरन्तयोः
मेदिनीति विख्यातेत्युक्ता यैस्तन्मतं शृणु ।जलधौता कृशा पूर्व्वं बर्द्धिता मेदसा यतः
कथयामि तज्जन्म सार्थकं सर्व्वसम्मतम् ।पुरा श्रुतं यत् श्रुत्युक्तं धर्म्मवक्त्राच्च पुष्करे
महाविराट्शरीरस्य जलस्थस्य चिरं स्फुटम् ।मलो बभूव कालेन सर्व्वाङ्गव्यापको ध्रुवम्
प्रविष्टः सर्व्वेषां तल्लोम्नां विवरेषु ।कालेन महता तस्माद्बभूव वसुधा मुने !
प्रत्येकं प्रतिलोम्नाञ्च कूपेषु सा स्थिरा स्थिता ।आविर्भूता तिरोभूता सा जले पुनः पुनः
आविर्भूता सृष्टिकाले तज्जलोपर्य्यवस्थिता ।प्रलये तिरोभूता जलाभ्यन्तरवस्थिता
प्रतिविश्वेषु वसुधा शैलकाननसंयुता ।सप्तसागरसंयुक्ता सप्तद्बीपमिता सती
हिमाद्रिमेरुसंयुक्ता ग्रहचन्द्रार्कसंयुता ।ब्रह्मविष्णुशिवाद्यैश्च सुरैर्लोकैस्तदालये
पुण्यतीर्थसमायुक्ता पुण्यभारतसंयुता ।पातालसप्ततदधस्तदूर्द्धे ब्रह्मलोककः
ब्रह्मलोकश्च तत्रैव सर्व्वविश्वञ्च तत्र वै ।एवं सर्व्वाणि विश्वानि पृथिव्यां निर्म्मितानि ।ऊर्द्ध्वौ गोलोकवैकुण्ठौ नित्यौ विश्वपरौ तौ
नश्वराणि विश्वानि सर्व्वाणि कृत्रिमाणि ।प्रलये प्राकृते ब्रह्मन् ! ब्रह्मणश्च निपातने ।महाविराडादिसृष्टौ सृष्टः कृष्णेन चात्मना
नित्यैः स्थिता प्रलये काष्ठाकाशेश्वरैः सह ।क्षित्यधिष्ठातृदेवी सा वाराहे पूजिता सुरैः
सुनिभिर्मनुभिर्विप्रैर्गन्धर्व्वादिभिरेव ।विष्णोर्व्वराहरूपस्य पत्नी सा श्रुतिसम्मता ।तत्पुत्त्रो मङ्गलो ज्ञेयो घण्टेशो मङ्गलात्मजः
नारद उवाच ।पूजिता केन रूपेण वाराहे सुरैर्मही ।वराहेण वाराही सर्व्वैः सर्व्वाश्रया सती
तस्याः पूजाविधानञ्चाप्यधश्चोद्धरणक्रमम् ।मङ्गलं मङ्गलस्यापि जन्म व्यासं वद प्रभो !
श्रीनारायणं उवाच ।वाराहे वराहश्च ब्रह्मणा संस्तुतः पुरा ।उद्दधार महीं हत्वा हिरण्याक्षं रसातलात्
जले तां स्थापयामास पद्मपत्रं यथा ह्रदे ।तत्रैव निर्म्ममे ब्रह्मा सर्व्वं विश्वं मनोहरम्
दृष्ट्वा तदधिदेवीञ्च सकामां कामुको हरिः ।वराहरूपी भगवान् कोटिसूर्य्यसमप्रभः
कृत्वा रतिकरीं शय्यां मूर्त्तिञ्च सुमनोहराम् ।क्रीडाञ्चकार रहसि दिव्यं वर्षमहर्निशम्
सुखसम्भोगसंस्पर्शात् मूर्च्छां संप्राप सुन्दर ।विदग्धाया विदग्धेन सङ्गमोऽतिसुखप्रदः
विष्णुस्तदङ्गसंस्पर्शात् बुबुधे दिवानिशम् ।वर्षान्ते चेतनां प्राप्य कामी तत्याज कामुकीम्
पूर्व्वरूपञ्च वाराहं दधार चावलीलया ।पूजाञ्चकार भक्त्या ध्यात्वा धरणीं सतीम्
धूपैर्दीपैश्च र्नैवेद्यैः सिन्दूरैरनुलेपनैः ।वस्त्रैः पुष्पैश्च वलिभिः संपूज्योवाच तां हरिः
श्रीमहावराह उवाच ।सर्व्वाधारा भव शुभे ! सर्व्वैः संपूजिता सुखम् ।मुनिभिर्मनुभिर्देवैः सिद्धैश्च मानवादिभिः
अम्बुवाचीत्यागदिने गृहारम्भप्रवेशने ।वापीतडागारम्भे गृहे कृषिकर्षणे
तव पूजां करिष्यन्ति मद्वरेण सुरादयः ।मूढा ये करिष्यन्ति यास्यन्ति नरकञ्च ते
वसुधोवाच ।वहामि सर्व्वं वाराहरूपेणाहं तवाज्ञया ।लीलामात्रेण भगवन् ! विश्वञ्च सचराचरम्
मुक्तां शुक्तिं हरेरर्च्चां शिवलिङ्गं शिलां तथा ।शङ्खं प्रदीपं मन्त्रञ्च माणिक्यं हीरकं मणिम्
यज्ञसूत्रञ्च पुष्पञ्च पुस्तकं तुलसीदलम् ।जपमालां पुष्पमालां कर्पूरञ्च सुवर्णकम्
गोरोचनां चन्दनञ्च शालग्रामजलं विना ।एतान् वोढुमशक्ताहं क्लिष्टा भगवन् !शृणु
श्रीभगवानुवाच ।द्रव्याण्येतानि मूढा ये अर्पयिष्यन्ति सुन्दरि ! ।ते यास्यन्ति कालसूत्रं दिव्यं वर्षशतं त्वयि
इत्येवमुक्त्वा भगवान् विरराम नारद ! ।बभूव तेन गर्भेण तेजस्वी मङ्गलग्रहः
पूजां चक्रुः पृथिव्याश्च ते सर्व्वे चाज्ञया हरेः ।काण्वशाखोक्तध्यानेन तुष्टुबुः स्तवनेन
ददुर्मूलेन मन्त्रेण नैवेद्यादिकमेव ।संस्तुता विष्णुलोकेषु पूजिता सा बभूव
नारद उवाच ।किं ध्यानं स्तवनन्तस्या मूलमन्त्रञ्च किं वद ।गूढं सर्व्वपुराणेषु श्रोतुं कौतूहलं मम
श्रीनारायण उवाच ।आदौ पृथिवी देवी वराहेण पूजिता ।ततः सर्व्वैर्मुनीन्द्रैश्च मनुभिर्मानवादिभिः ।ध्यानञ्च स्तवनं मन्त्रं शृणु वक्ष्यामि नारद !
*
ओँ श्रीं ह्रीं क्लीं वसुन्धरायै स्वाहा ।इत्यनेनैव मन्त्रेण पूजिता विष्णुना पुरा
श्वेतचम्पकवर्णाभां शतचन्द्रसमप्रभाम् ।चन्दनोक्षितसर्व्वाङ्गां रत्नभूषणभूषिताम्
रत्नाधारां रत्नगर्भां रत्नाकरसमन्विताम् ।वह्रिशुद्धांशुकाधानां सस्मितां वन्दितां भजे
ध्यानेनानेन सा देवी सर्व्वैश्च पूजिता भवेत् ।स्तवनं शृणु विप्रेन्द्र ! काण्वशाखोक्तमेव
श्रीविष्णुरुवाच ।जये जये जयाकारे जयशीले जयप्रदे ! ।यज्ञशूकरजाये जयं देहि जयावहे
मङ्गले मङ्गलाधारे मङ्गल्ये मङ्गलप्रिये ।मङ्गलाढ्ये मङ्गलेशे मङ्गलं देहि मे भवे
सर्व्वाधारे सर्व्वबीजे सर्व्वशक्तिसमन्विते ।सर्व्वकामप्रदे देवि सर्व्वेष्टं देहि मे भवे
पुण्यस्वरूपे पुण्यानां बीजरूपे सनातनि ।पुण्याश्रये पुण्यवतामालये पुण्यदे भवे
रत्नाधारे रत्नगर्भे रत्नाकरसमन्विते ।स्त्रीरत्नरूपे रत्नाढ्ये रत्नसारप्रदे भवे
सर्व्वशस्यालये सर्व्वशस्याढ्ये सर्व्वशस्यदे ।सर्व्वशस्यहरे काले सर्व्वशस्याधिके भवे
भूमे भूमिपसर्व्वस्वे भूमिपानां परायणे ।भूपाहङ्काररूपेण भूमिं देहि भूमिपे
इदं पुण्यं महास्तोत्रं तां संपूज्य यः पठेत्कोटि कोटि जन्म जन्म भवेद्भूमिपेश्वरः
मदानकृतं पुण्यं लभते पाठनाज्जनः ।भूमिदानहरात् पापान्मुच्यते नात्र संशयः
अम्बुवाचीभूखनने पापात् मुच्यते ध्रुवम् ।अन्यकूपे कूपदजात् पापात् मुच्यते ध्रुवम् ।परभूश्राद्धजात् पापान्मुच्यते नात्र संशयः
भूमौ वीर्य्यपरित्यागात् भूमौ दीपादिस्थापनात्पापेन मुच्यते प्राज्ञः स्तोत्रस्य पठनान्मुने ! ।अश्वमेधशतं पुण्यं लभते नात्र संशयः
नारद उवाच ।भूमिदानकृतं पुण्यं पापं तद्धरणे यत् ।परभूमौ श्राद्धपापं कूपे कूपदजं तथा
अम्बुवाचीभूखननं वीर्य्यत्यागजमेव ।दीपादिस्थापनात् पापं श्रोतुमिच्छामि यत्नतः
अन्यं वा पृथिवीजन्यं पापं मत्प्रश्नतः परम् ।यदस्ति तत्प्रतीकारं वद वेदविदांवर !
श्रीनारायण उवाच ।वितस्तिमानां भूमिञ्च यो ददाति भारते ।सन्ध्यापूताय विप्राय याति विष्णुमन्दिरम्
भूमिञ्च सर्व्वशस्याढ्यां ब्राह्मणाय ददाति यः ।भूमिरेणुप्रमाणञ्च वर्षं विष्णुपदे स्थितिः
ग्रामं भूमिञ्च धान्यञ्च यो ददात्याददाति ।सर्व्वपापविनिर्मुक्तौ चोभौ वैकुण्ठवासिनौ
भूमिं दातुञ्च यत्काले यः साधुश्चानुमोदते ।स याति वैकुण्ठं मित्रगोत्रसमन्वितः
स्वदत्त्वां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्तिं हरेत्तु यः ।स तिष्ठति कालसूत्रे यावच्चन्द्रदिवाकरौ
तत्पुत्त्रपौत्त्रप्रभृतिर्भूमिहीनः श्रिया हतः ।पुत्त्रहीनो दरिद्रश्चैवान्ते याति रौरवम्
गवां मार्गं विनिष्कृष्य यश्च शस्यं ददाति ।दिव्यं वर्षशतञ्चैव कुम्भीपाकेषु तिष्ठति
गोष्ठं तडागं निष्कृष्य मार्गं शस्यं ददाति ।स तिष्ठत्यसिपत्रे यावदिन्द्राश्चतुर्द्दश
पञ्चपिण्डमुद्धृत्य परकूपे स्नाति यः ।प्राप्नोति नरकं नैव स्नानजं फलमेव
कामी भूमौ रहसि वीर्य्यत्यागं करोति यः ।स्निग्धरेणुप्रमाणञ्च वर्षं तिष्ठति रौरवे
अम्बुवाच्यां भूखननं यः करोति मानवः ।स याति कृमिदंशञ्च स्थितिस्तत्र चतुर्युगम्
परकीयलुप्तकूपे कूपं मूढः प्रयच्छति ।पुष्करिण्याञ्च लुप्तायां पुष्करिणीं यो ददाति
सर्व्वं फलं परस्यैव तप्त मूर्म्मिं व्रजेत्तु सः ।तत्र तिष्ठति सन्तप्तो यावदिन्द्राश्चतुर्द्दश
परकीयतडागे पङ्कमुत्सृज्य नोत्सृजेत् ।रेणुप्रमाणवर्षञ्च ब्रह्मलोके वसेन्नरः
पिण्डं पित्रे भूमिभर्त्तुर्न प्रदाय मानवः ।श्राद्धं करोति यो मूढो नरकं याति निश्चितम्
भूमौ दीपं योऽर्पयति चान्धः सप्तजन्मनि ।भूमौ शङ्खञ्च संस्थाप्य कुष्ठं जन्मान्तरे लभेत्
मुक्तामाणिक्यहीरञ्च सुवर्णञ्च मणिन्तथा ।यश्च संस्थापयेद्भूमौ तिष्ठेन्नरके युगम्
जपमालां पुष्पमालां कर्पूरं रोचनान्तथा ।यो मूढश्चार्पयेद्भूमौ याति नरकं ध्रुवम्
मुने ! चन्दनकाष्ठञ्च रुद्राक्षं कुशमूलकम् ।संस्थाप्य भूमौ नरके वसेन्मन्वन्तरावधि
पुस्तकं यज्ञसूत्रञ्च भूमौ संस्थापयेत्तु यः ।न भवेद्विप्रयोनौ तस्य जन्मान्तरे जनिः
ब्रह्महत्यासमं पापममुत्र लभेद्ध्रुवम् ।ग्रन्थियुक्तं यज्ञसूत्रं पूज्यञ्च सर्व्ववर्णकैः
यज्ञं कृत्वा यो भूमिं क्षीरेण नहि सिञ्चति ।स याति तप्तमूर्म्मिञ्च सन्तप्तः सप्तजन्मसु
भूकम्पे ग्रहणे यो हि करोति खननं भुवः ।जन्मान्तरे महापापी सोऽङ्गहीनो भवेद्ध्रुवम्
भवनं यत्र सर्व्वेषां भूर्भूमिस्तेन कीर्त्तिता ।वसुरत्नं या दधाति वसुधा सा वसुन्धरा ।हरेरूरौ या जाता सा चोर्व्वी परिकी-र्त्तिता
धरा धरित्री धरणी सर्व्वेषां धारणात्तु या ।इज्या यागाधाराच्च क्षौणी क्षीणालये या ।महालये क्षयं याति क्षितिस्तेन प्रकीर्त्तिता
काश्यपी कश्यपस्येयमचला स्थिररूपतः ।विश्वम्भरा तद्धरणाच्चानन्तानन्तरूपतः
पृथिवी पृथुकन्यात्वाद्विस्तृतत्वान्महामुने !
”इति ब्रह्मवैवर्त्ते प्रकृतिखण्डे पृथिव्युपाख्यानं ७अध्यायः
*
तस्या भारा यथा, --क्षितिरुवाच ।“कृष्णभक्तिविहीना ये ये तद्भक्तनिन्दकाः ।तेषां महापातकिनामशक्ता भारवाहने
स्वधर्म्माचारहीना ये नित्यकृत्यविवर्जिताः ।श्रद्धाहीनाश्च वेदेषु तेषां भारेण पीडिता
पितृमातृगुरुस्त्रीणां पोषणं पुत्त्रपोष्ययोः ।ये कुर्व्वन्ति तेषाञ्च शक्ता भारवाहने
ये मिथ्यावादिनस्तात ! दयासत्यविहीनकाः ।निन्दका गुरुदाराणां तेषां भारेण पीडिता
मित्रद्रोही कृतघ्नश्च मिथ्यासाक्षिप्रदायकः ।विश्वासघ्नः स्थाप्यहारी तेषां भारेण पीडिता
कल्याणयुक्तनामानि हरेर्नामैकमङ्गलम् ।कुर्व्वन्ति विक्रयं ये वै तेषां भारेण पीडिता
जीवघाती गुरुद्रोही ग्रामयाजी लुब्धकः ।शवदाही शूद्रभोजी तेषां भारेण पीडिता
पूजायज्ञोपवासानि व्रतानि नियमानि ।ये येमूढा विहन्तारस्तेषां भारेण पीडिता
सदा द्विषान्त ये पापा गोविप्रसुरवैष्णवान् ।हरिं हरिकथां भक्ति तषां भारेण पीडिता
शङ्खादीनाञ्च भारेण पीडिताहं यथा विधे ! ।ततोऽधिकेन दैत्यानां तेषां भारेण पीडिता
इत्येबमुक्त्वा वसुधा रुरोद मुहुर्मुहुः ।ब्रह्मा तद्रोदनं दृष्ट्वा तामुवाच कृपानिधिः
भारं तवापनेष्यामि दस्यूनामप्युपायतः ।उपायतोऽपि कार्य्याणि सिध्यन्त्येव वसुन्धरे !
मन्त्रं मङ्गलकुम्भञ्च शिवलिङ्गञ्च कुङ्कुमम् ।मधुकाष्ठं चन्दनञ्च कस्तूरीं तीर्थमृत्तिकाम्
खड्गं गण्डकखड्गञ्च स्फटिकं पद्मरागकम् ।इन्द्रनीलं सूर्य्यमणिं रुद्राक्षं कुशमूलकम्
शालग्रामशिलाशङ्खतुलसीप्रतिमाजलम् ।शङ्खप्रदीपमालाञ्च शिलार्च्चातुलसीं तथा
निर्म्माल्यञ्चैव नैवेद्यं हरिद्वर्णमणिन्तथा ।ग्रन्थियुक्तं यज्ञसूत्रं दर्पणं श्वेतचामरम्
गोरोचनाञ्च मुक्ताञ्च शुक्तिं माणिक्यमेव ।पुराणसंहितां वह्निं कर्पूरं परशं तथा
रंजतं काञ्चनञ्चैव प्रवालं रत्नमेव ।कुशद्विजं तीर्थतोयं गव्यं गोमूत्रगोमयम्
त्वयि ये स्थापयिष्यन्ति मूढाश्चैतानि सुन्दरि ! ।पव्यन्ते कालसूत्रे वर्षाणामयुतं ध्रुवम्
”इति ब्रह्मवैवर्त्ते श्रीकृष्णजन्मखण्डे अध्यायः
तस्या रूपान्तरं यथा, --“इति तस्य वचः श्रत्वा जनकस्य तदा क्षितिः ।मुनीनां सन्निधौ रूपं दर्शयामास भूभृते
नीलोत्पलदलश्यामामक्षमालाब्जधारिणीम् ।बाहुयुग्मेन शुभ्रेण मृणालायतशोभिना ।सुन्दरीं लोकधात्रीं तां दृष्ट्वा शश्वन्नृपोऽलयत्
”इति कालिकापुराणे ३६ अध्यायः
पृथिव्यां ग्रामशस्याद्युत्पत्तिकारणं यथा, --प्रजा ऊचुः ।“अराजके नृपश्रेष्ठ ! धरित्र्या सकलौषधीः ।ग्रस्तास्ततः क्षयं यान्ति प्रजाः सर्व्वाः प्रजेश्वर !
त्वं नो वृत्तिप्रदो धात्रा प्रजापालो निरूपितः ।देहि नः क्षुत्परीतानां प्रजानां जीवनौषधीः
श्रीपराशर उवाच ।ततोऽथ नृपतिर्दिव्यमादायाजगवं धनुः ।शरांश्च दिव्यान् कुपितः सोऽभ्यधावद्वसुन्धराम्
ततो ननाश त्वरिता गौर्भूत्वा तु वसुन्धरा ।सा लोकान् ब्रह्मलोकादींस्तत्त्रासादगमन्मही ।यत्र यत्र ययौ देवी सा तदा भूतधारिणी ।तत्र तत्र तु सा वैण्यं ददर्शाभ्युद्यतायुधम्
ततस्तं प्राह वसुधा पृथुं पृथुपराक्रमम् ।प्रवेपमाना तद्बाणपरित्राणपरायणा
पृथिव्युवाच ।स्त्रीवधे त्वं महापापं किं नरेन्द्र ! पश्यसि ।येन मां हन्तुमत्यर्थं प्रकरोषि नृपोद्यमम्
श्रीपृथुरुवाच ।एकस्मिन् यत्र निधनं प्रापिते दुष्टकारिणि ।बहूनां भवति क्षेमस्तस्य पुण्यप्रदो वधः
पृथिव्युवाच ।प्रजानामुपकाराय यदि मां त्वं हनिष्यसि ।आधारः कः प्रजानान्ते नृपश्रेष्ठ ! भविष्यति
पृथुरुवाच ।त्वां हत्वा वसुधे ! बाणैर्मच्छासनपराङ्मुखीम् ।आत्मयोगबलेनेमा धारयिष्याम्यहं प्रजाः
श्रीपराशर उवाच ।ततः प्रणम्य वसुधा तं भूयः प्राहं पार्थिवम् ।प्रवेपिताङ्गी परमं साध्वसं समुपागता
उपायतः समारब्धाः सर्व्वे सिध्यन्त्युपक्रमाः ।तस्माद्वदाम्युपायन्ते त्वं कुरुष्व यदीच्छसि
समस्तास्ता मया जीर्णा नरनाथ ! महौषधीः ।यदीच्छसि प्रदास्यामि ताः क्षीरपरिणामिनीः
तस्मात् प्रजाहितार्थाय मम धर्म्मभृतांवर ! ।तन्तु वत्सं प्रयच्छस्व क्षरेयं येन वत्सला
समाञ्च कुरु सर्व्वत्र येन क्षीरं समन्ततः ।वरौषधीबीजभूतं वीर ! सर्व्वत्र भावये
श्रीपराशर उवाच ।तत उत्सारयामास शैलान् शतसहस्रशः ।घनुष्कोट्या तदा वैण्यस्तेन शैला विवर्द्धिताः
नहि पूर्व्वविसर्गे वै विषमे पृथिवीतले ।प्रतिभागः पुराणां वा ग्रामाणां वा पुराभवत्
शस्यानि गोरक्ष्यं कृषिर्न बणिक्पथः ।वैण्यात् प्रभृति मैत्रेय ! सर्व्वस्यैतस्य सम्भवः
यत्र यत्र समं त्वस्या भूमेरासीद्द्विजोत्तम ! ।तत्र तत्र प्रजानां हि निवासं समरोचयत्
आहारः फलमूलानि प्रजानामभवत्तदा ।कृच्छ्रेण महता सोऽपि प्रनष्टास्वोषधीषु वै
कल्पयित्वा वत्सन्तु मनुं स्वायम्भुवं प्रभुम् ।स्वे पाणौ पृथिवीनाथो दुदोह पृथिवीं पृथुः
शस्यजातानि सर्व्वाणि प्रजानां हितकाम्यया ।तेनान्नेन प्रजास्तात ! वर्त्तन्तेऽद्यापि नित्यशः
प्राणप्रदानात् पृथुर्यस्माद्भूमेरभूत् पिता ।ततस्तु पृथिवीसंज्ञामवापाखिलधारिणी
ततश्च देवैर्मुनिभिर्द्दैत्यै रक्षोभिरद्रिभिः ।गन्धर्व्वैरुरगैर्यक्षैः पितृभिस्तरुभिस्तथा
तत्तत्पात्रमुपादाय तत्र दुग्ध्वा मुने ! पयः ।वत्स ! दोग्धृविशेषाच्च तेषां तद्योनयोऽभवन्
सैषा धात्री विधात्री धारणी पोषणी तथा ।सर्व्वस्य जगतः पृथ्वी विष्णुपादतलोद्भवा
एवंप्रभावः पृथुः पुत्त्रो वेणस्य वीर्य्यवान् ।जज्ञे महीपतिः पूर्व्वो राजाभूज्जनरञ्जनात्
”इति श्रीविष्णुपुराणे अं शे पृथुचरितं १३अध्यायः
*
तस्या नामगोरूपदोहनानां कारणानि यथा, --ऋषय ऊचुः ।“बहुभिर्धरणी भुक्ता भूपालैः श्रूयते पुरा ।पार्थिवाः पृथिवीयोगात् पृथिवी कस्य योगतः
किमर्थञ्च कृता संज्ञा भूमिः किं पारिभाषिकी ।गौरितीयञ्च विख्याता सूत ! कस्माद्ब्रवीहि नः
सूत उवाच ।वंशे स्वायम्भुवे ह्यासीदङ्गो नाम प्रजापतिः ।मृत्योस्तु दुहिता तेन परिणीतातिदुर्मुखी
सुतीर्था नाम तस्यास्तु वेणो नाम सुतः पुरा ।अधर्म्मनिरतः कामी बलवान् वसुधाधिपः
लोकेऽप्यधर्म्मकृज्जातः परभार्य्यापहारकः ।धर्म्माचारप्रसिद्ध्यर्थं जगतोऽस्य महर्षिभिः
अनुनीतोऽपि ददावनुज्ञां यदा ततः ।शापेन मारयित्वैनमराजकभयार्द्दिताः ।ममन्थुर्ब्राह्मणास्तस्य बलाद्देहमकल्मषाः
तत्कायान्मथ्यमानात्तु निष्पेतुर्म्लेच्छजातयः
शरीरे मार्तुरंशेन कृष्णाञ्जनसमप्रभाः ।पितुरङ्गस्य चांशेन धार्म्मिको धर्म्मचारिणः
उत्पन्नो दक्षिणाद्धस्तात् सधनुः सशरो गदी ।दिव्यतेजोमयवपुः सरत्नकवचाङ्गदः
पृथुरेवाभवद्यस्मात्ततः पृथरजायत ।स विप्रैरभिषिक्तश्च तपः कृत्वा सुदुश्चरम्
विष्णोर्व्वरेण सर्व्वस्य प्रभुत्वमगमत् प्रभुः ।निःस्वाध्यायवषट्कारं निर्घनं वीक्ष्य भूतलम्
दग्धुमेवोद्यतः कोपाच्छरेणामितविक्रमः ।ततो गोरूपमास्थाय भूः पलायितुमुत्सहेत्
पृष्ठतोऽनुगतस्तस्याः पृथुर्दीप्तशरासनः ।ततः स्थित्वैकदेशे तु किं करोमीति साब्रवीत्
पृथुरप्यवदद्वाक्यमीप्सितं देहि सुव्रते ! ।सर्व्वस्य जगतः शीघ्रं स्थावरस्य चरस्य
तथैव चाब्रवीद्भूमिदुंदोह नराधिपः ।स्वे स्वे पाणौ पृथुर्वत्सं कृत्वा स्वायम्भुवं मनुम्
तदन्नमभवत् शुद्धं प्रजा जीवन्ति तेन वै ।ततस्तु ऋषिभिर्दुग्धा वत्सः सोमस्तदाभवत्
दोग्धा बृहस्पतिरभूत् पात्रं वेदस्तपो रसः ।वेदैश्च वसुधा दुग्धा दोग्धा मित्रस्तदाभवत्
इन्द्रो वत्सः समभवत् क्षीरमूर्ज्जस्करं बलम् ।देवानां काञ्चनं पात्रं पितॄणां राजतन्तदा
अन्तकश्चाभवद्दोग्धा यमो वत्सः सुधारसः ।अलावुपात्रं नागानां तक्षको वत्सकोऽभवत्
विषं क्षीरं ततो दोग्धा धृतराष्ट्रोऽभवत् पुनः ।असुरैरपि दुग्धेयमायसे शक्रपीडनीम्
पात्रे मायामभूद्वत्सः प्रह्रादिश्च विरोचनः ।दोग्धा द्बिमूर्द्धा तत्रासीन्माया येन प्रवर्त्तिताः
यक्षैश्च वसुधा दुग्धा पुरान्तर्द्धानमीप्सुभिः ।कृत्वा वैश्रवणं वत्समामपात्रे महीपते !
प्रेतरक्षोगणैर्दुग्धा धरा रुचिरमुल्वणम् ।रौप्यलाभोऽभवद्दोग्धा सुमाली वत्स एव तु
गन्धर्व्वैश्च पुनर्दुग्धा वसुधा चाप्सरोगणैः ।वतसं चैत्ररथं कृत्वा गन्धान् पद्मदले तथा
दोग्धा सुरुचिर्नाम नाट्यवेदस्य पारगः ।गिरिभिर्वसुधा दुग्धा रत्नानि विविधानि
औषधानि दिव्यानि दोग्धा मेरुर्महाबलः ।वत्सोऽभूद्धिमवांस्तत्र पात्रं शैलमयं पुनः
वृक्षैश्च वसुधा दुग्धा क्षीरं छिन्नप्ररोहणम् ।पालाशपात्रे दोग्धा तु सालः पुष्पदलाकुलः
प्लक्षोऽभवत्ततो वत्सः सर्व्ववृक्षगणाधिपः ।एवमन्यैश्च वसुधा तथा दुग्धा यथेप्सितम्
”इति मत्स्यपुराणे १० अध्यायः
*
अन्यद्विवरणं भूगोलशब्दे द्रष्टव्यम्
पृथ्वी ।तद्वैदिकपर्य्यायः गौः ग्मा ज्मा क्ष्मा४ क्षा क्षामा क्षोणी क्षितिः अवनिः९ ऊर्व्वी १० पृथ्वी ११ मही १२ रिपः १३अदितिः १४ इला १५ निरृतिः १६ भूः १७भूमिः १८ पूषा १९ गातुः २० गोत्रा २१ ।इत्येकविंशतिपृथिवीनामधेयानि इति वेद-निघण्टौ अध्यायः
(अन्तरिक्षम् इतिनिघण्टुः
यथा, ऋग्वेदे १० १२१ ।“स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमांकस्मै देवाय हविषा विधेम
”“पृथिवीत्यन्तरिक्षनाम ।” इति तद्भाष्ये सायनः
)
Capeller
German
पृथि॑वी
f.
die Erde (eig. die weite, oft als
Göttin personif. )
Land, Reich.
Grassman
German
pṛthivī́, f., die Erde als die weit ausgedehnte [Page856] [= pṛthvī́ von pṛthú], bisweilen (wie {550, 7}) auch pṛthvī́ zu lesen, sehr häufig neben dem Himmel (dív) genannt
ínsbesondere 2〉 im du. neben dyā́vā Himmel und Erde (vergl. dyā́vāpṛthivī́)
3〉 als Göttin personificirt
namentlich 4〉 neben dem Himmel, so besonders im Dual (vgl. dyā́vāpṛthivī́ und pṛthivī́ -dyā́vā)
5〉 als Göttin neben andern Gottheiten, namentlich wird sie 6〉 als Mutter bezeichnet
daneben häufig der Himmel (dyaús) als Vater ({492, 5}
{89, 4}
{164, 33}
{191, 6}
{185, 10}) genannt
7〉 drei Erden, den drei Himmeln entsprechend. Adj. urú, paramá, máh u. s. w.
-i [V.] 3〉 {22, 15}
{420, 5}
{438, 1}
{844, 11}
{885, 8}—_{885, 10}
in {222, 5} und {288, 4} ist zugleich der Himmel hinzugedacht, ohne genannt zu sein. 4〉 {509, 4}
6〉 {492, 5} díaus pitar mā́tar ádhrug.
-ī́ [N. s.] {37, 8}
{39, 6}
{52, 11}
{55, 1}
{57, 5}
{72, 9}
{131, 1} (mahī́)
{164, 47}
{270, 4}
{285, 5}
{289, 22}
{312, 7}
{408, 9}
{410, 3}
{412, 7}
{414, 2}
{437, 5}
{507, 9}
{521, 4}
{523, 5}
{550, 7}
{552, 1} (urvī́)
{660, 4} (mahī́)
{798, 9}
{844, 12}
{886, 9} (mahī́)
{947, 5} (dṛḍhā́)
{999, 4} (dhruvā́)
{973, 1}. 4〉 {22, 13}
{240, 3}
{347, 11} (dyaús ca pṛthivī́ ca devī́)
{511, 6}
{836, 5}
{855, 6}
{862, 2}
neben dem Himmel und der pṛthivī́ noch andere Gottheiten genannt: {94, 16} (Refrain)
{102, 2}
{242, 8}
{288, 19}
{491, 13}
{550, 23}
{635, 8}
{809, 58}
{885, 7}
{914, 2}. _{914, 8}. 5〉 {491, 14}
{492, 11}
{620, 23}
{879, 5}
{911, 2} (mahī́)
{1023, 4}. 6〉 {89, 4}
{164, 33}
{191, 6}
{396, 16}.
-ī́m {34, 7}
{38, 9}
{73, 3}
{103, 2}
{131, 4} (mahī́m)
{154, 4}
{203, 2}
{204, 5}
{206, 2}
{208, 5}
{264, 11}
{266, 8}
{268, 8}
{278, 3} (hárivarpasam)
{289, 21}
{293, 1}. _{293, 7}
{332, 1}
{408, 8}
{411, 3}
{416, 3}
{437, 4}
{439, 1}. _{439, 4} (neben bhū́mim). _{439, 5}
{488, 29}
{492, 8}
{534, 8}
{616, 3}. _{616, 4}
{698, 5}
{729, 2}
{798, 29}
{809, 13}
{812, 9}
{842, 3}
{844, 10} (neben mātáram bhū́mim). _{844, 13}
{853, 23}
{881, 1}
{884, 2}
{891, 11}
{914, 3}
{915, 4}
{920, 4}. _{920, 12}
{923, 19}
{945, 8}—_{945, 10}
{947, 1}
{975, 1}
{1016, 3}. 4〉 {889, 10}
{907, 6}
{891, 4}
(neben dyā́vābhū́mī). 5〉 {396, 16}
{400, 3}
{647, 2}. 6〉 {513, 2}
{888, 3}
{712, 2}.
-ī́m [zu sprechen pṛthvī́m] {67, 5}
{615, 3}.
-yā́ {315, 8}
{493, 1}
{836, 9}
{908, 5}
{951, 8}
{991, 1}. 4〉 {655, 2}. 5〉 {296, 2}.
-yaí 4〉 {288, 2}. _{288, 3}
{299, 5}
{413, 1}
{821, 5}. 6〉 {185, 10}.
-yā́s [Ab.] {61, 9}
{80, 1}
{109, 6}
{229, 11}
{280, 3}
{317, 3}
{340, 5}
{459, 12}
{462, 2}
{471, 1}
{488, 27}
{577, 3}
{620, 4}
{889, 2}
{903, 3}
divás ā́ {522, 7}
{540, 3}
{555, 5}.
-iā́s [Ab.] {720, 8}
{743, 2}
{769, 4}.
-yā́s [G.] dhā́mabhis {22, 16}
upapṛ́k {32, 5}
āpṛ́k {915, 14}
parīnáham {33, 8}
ántam {33, 10}
{164, 34}
ántas {164, 35}
ántāt {295, 4}
kakúbham {615, 2}
kakúbhas {35, 8}
ártham {38, 2}
pratimā́nam {52, 13}
sádaneṣu {56, 6}
sádane {452, 5}
róma {65, 8}
nā́bhis {59, 2} (agnís)
nā́bhā {143, 4}
{194, 7}
{239, 9}
{784, 7}
{794, 3}
{798, 8}
samrā {100, 1}
gárbham {173, 3}
jánanā {231, 1}
mahinā́ {240, 2}
{241, 10}
tánā {259, 1}
váre {257, 4}
[Page857] {287, 11}
váriman {293, 3}
{350, 4}
{854, 2}
{855, 7}
varimā́ṇam {488, 4}
{662, 1}
várṣman {896, 1}
pátī {417, 3}
sā́nau {222, 2}
sā́navi {489, 5}
{775, 27}
{791, 4}
sā́nu {523, 2}
aratím {448, 1}
aratáye {521, 1}
vṛṣabhás {485, 21}
{1026, 3}
púrīsāṇi {490, 6}
róhāṃsi {512, 5}
janítram {550, 2}
rātím {554, 4} (rātiṣā́cas)
rájasī {615, 1}
dharúṇas {801, 6}
janitā́ {808, 5}
{947, 9}
prápathe {843, 6}
vayúnāni {872, 8}
pradíśas {882, 7}
pradíśā {936, 4}
mā́trayā {896, 5}
ū́rjam {935, 7}
pratimā́nam {937, 5}
cikitvā́ṃsas {576, 7}
īśe {915, 10}. 4〉 {335, 1} (carkirāma)
subándhus {235, 3}
{499, 4}
hotrám {251, 2}.
-iā́s [G.] várṣman {242, 3}
janitā́ {656, 4}
pátis {664, 16}
nā́bhā {263, 4}
{827, 6}
vanínas {39, 3}
ántān {645, 18}.
-yā́m {91, 4}
{98, 2}
{100, 18}
{108, 9}—_{108, 11}
{143, 1}
{168, 8}
{190, 4}
{194, 1}
{208, 6}
{231, 4}
{242, 10}
{248, 1}
{256, 2}
{301, 11}
{437, 9}
{442, 5}
{460, 12}
{519, 4}
{521, 2}
{524, 2}
{580, 1}
{586, 1}
{661, 4}
{1009, 3}.
-iā́m {139, 11}
{875, 9}
{899, 9}
{1018, 7}
{1019, 7}.
[V. du.] 4〉 {185, 2}—_{185, 8}.
-ī́ [du.] 2〉 {63, 1}
{143, 2}
{203, 13}
{706, 14}
{917, 3}. 4〉 {159, 1}
{232, 20}
{397, 2}
{452, 1}
{569, 1}
{706, 14}
{861, 3}
{872, 9}.
-ī́s [A. pl.] 7〉 tisrás {34, 8}
{620, 11}
{349, 5} (neben tisrás dívas).
Burnouf
French
पृथिवी पृथिवी (f. de पृथु) la terre.
पृतिवीतल
n.
le sol.
पृथिवीपति
m.
roi, maître de la terre.
Yama.
Sorte
de drogue.
पृथिवीपाल
m.
(c. de पा) roi, gardien de la terre.
Stchoupak
French
पृथिवी-
f.
terre, terre personnifiée, terre comme élément
sol
pays
-मय- -ई- a. fait de terre, terrestre.
°कम्प-
m.
tremblement de terre.
°क्षित्- °पति- °पाल- °भुज्- °भुजंग-
m.
roi, prince.
°तल- nt. sol, monde, monde infernal.
°तीर्थ- nt.
n.
d'un Tīrtha.
°दण्ड-पाल-
m.
chef de la police d'un pays
-ता-
f.
fait de
l'être.
°देवी-
f.
n.
d'une femme.
°भृत्-
m.
montagne.
°राज्य- nt. souveraineté (d'un pays).
पृथिवीश्वर-
m.
roi, prince.